×नेह के रंग, साहÆय के संग ♥ Ë या रे ब क त र फ से स े म भ ट ♥ ❀ बा ल सा ह Æय व शे ष ❀

कुछ कहानयाँ केवल पढ़ नह जात, जीवन भर वे हमारे साथ रह जाती ह। कुछ कवताएँ केवल शÍद नह होत, वे हमारे भीतर कोई भाव जगा जाती ह। और कुछ लेखक ऐसे होते ह, जनक रचनाएँ एक पीढ़ से Ƥसरी पीढ़ तक पƓँचती रहती ह। यह पु×तक आपके लए ऐसी ही कुछ रचनाǞ का संकलन है। इसम आप हद साहÆय के उन रचनाकार क कहानयाँ और कवताएँ पढ़गे, जनक रचनाएँ वष से हमारे साहÆय का ह×सा रही ह। ĒेमचÊद, महादेवी वमा, माखनलाल चतुवद और ऐसे ही अनेक साहÆयकार ने अपने शÍद के माÉयम से मनुÖय, समाज, Ēकृत, रÕत, संवेदनाǞ और जीवन को समझा,ने क कोशश क है। इन रचनाǞ को पढ़ते Ɠए शायद आपको कुछ ऐसी बात मलगी, जनसे आप सहमत हगे, कुछ ऐसी, जन पर आप Ēȱ करना चाहगे और कुछ ऐसी जÊह पढ़कर आप देर तक सोचते रहगे। यही साहÆय क खूबसूरती है, हर बार पढ़ने पर वह हम कुछ नया दखा सकता है। इस पु×तक को आपके लए और भी वशेष बनाते ह इसके चč। इन साहÆयकार के चč हमारे ही ब ने बनाए ह। उÊहने त×वीर को Éयान से देखा, रेखाǞ और अनुपात को समझा, Ēकाश और छाया को पसल से उकेरा और धीरे-धीरे इन चेहर को कागज़ पर उतारा। इसलए इस पु×तक म दो पीढ़याँ साथ दखाई देती ह, एक पीढ़ के शÍद और Ƥसरी पीढ़ क रेखाएँ। हम आपको यह पु×तक केवल पढ़ने के लए नह दे रहे ह। हम चाहते ह क आप इसे अपना समझ। इसम से कोई कहानी चुन, कोई कवता बार-बार पढ़, कसी पाč से जुड़, कसी वचार पर सहमत या असहमत ह या कसी पं को अपने पास रख ल। ·यक साहÆय क वरासत एक ऐसी परंपरा है जसे न केवल सँभालकर रखा जाता है, बक उसे पढ़ा जाता है, समझा जाता है, महसूस कया जाता है और फर आगे बढ़ाया जाता है। आज यह पु×तक आपके हाथ म है। कल शायद आप ही इसे कसी और बे तक पƓँचाएँगे। यही आपक साहÆयक वरासत है। शुभकामनाएँ! वालय परवार एक साहÆयक वरासत

मुंशी ेमचंद- हद साहÆय के साट

मुंशी ेमचंद

हद साहÆय के महान लेखक मुंशी Ēेमचंद जी का असली नाम धनपत राय ीवा×तव था, लेकन वे ‘Ēेमचंद’ के नाम से Ēसȓ Ɠए। वे भारत के बƓत Ēसȓ कहानीकार और लेखक थे। उनक कहानय म आम लोग के जीवन, उनक खुशय, ƣख और संघष को बƓत सुंदर ढंग से बताया गया है। उनक कहानयाँ हम Ēेम, Æयाग, दया और मानवता क सीख देती ह। उनक Ēसȓ रचनाǞ म ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘पÀच-परमेȯर’ और ‘ईदगाह’ शामल ह।ेमचंद जी का परचय

ईद का दन था। गाँव म चार ओर खुशी और चहल-पहल थी। सुबह से ही बे नए कपड़े पहनकर ईदगाह जाने क तैयारी कर रहे थे। सभी के चेहर पर उÆसाह था। कसी के पास नए जूते थे, तो कसी के पास नए कपड़े। बे मेले म मलने वाली चीज़ के बारे म बात कर रहे थे। कोई खलौना खरीदना चाहता था, तो कोई मठाई खाने के लए उÆसाहत था। इÊह ब के बीच हामद भी था। हामद बƓत गरीब था और अपनी दाद अमीना के साथ रहता था। उसके पास केवल तीन पैसे थे। दाद अमीना ने उसे Ëयार से तैयार कया और ईदगाह जाने के लए भेजा। हामद के मन म ईद क खुशी थी। उसे वास था क उसके अÍबा एक दन बƓत- सा धन लेकर लौटगे और उसक अÏमा भी उसके लए बƓत सारी खुशयाँ लेकर आएँगी। दाद ने उसे Ëयार से समझाया और ƣआ देकर ईदगाह भेजा।ईदगाह

हामद गाँव के Ƥसरे ब के साथ ईदगाह पƓँचा। वहाँ बƓत भीड़ थी। सभी लोग ने मलकर नमाज़ पढ़ और एक-Ƥसरे को ईद क शुभकामनाएँ द। नमाज़ के बाद बे खुशी- खुशी मेले क ओर चल पड़े। मेले म तरह-तरह क ƣकान लगी थ। कह खलौने बक रहे थे, कह मठाइयाँ और कह घर म काम आने वाली चीज़। Ƥसरे ब ने अपने पैसे से तरह-तरह के खलौने खरीदे। कसी ने सपाही लया, कसी ने घोड़ा और कसी ने Ƥसरे सुंदर खलौने। बे मठाइयाँ भी खरीदकर बड़े मज़े से खाने लगे। हामद उन सभी चीज़ को Éयान से देख रहा था, लेकन उसने कुछ नह खरीदा। हामद के पास केवल तीन पैसे थे। वह सोचता था क यद वह म का खलौना खरीदेगा, तो वह गरकर टूट सकता है। मठाई खरीदने पर वह थोड़ी देर म खÆम हो जाएगी। इसलए उसने अपने पैसे सँभालकर रखे। तभी हामद क नज़र लोहे के सामान क एक ƣकान पर पड़ी। वहाँ कई चमटे रखे थे। चमटे को देखते ही उसे अपनी दाद अमीना क याद आ गई।

जब दाद घर म रोटयाँ बनाती थ, तो कई बार तवे से रोट उतारते समय उनके हाथ जल जाते थे। हामद ने सोचा, “अगर म दाद के लए चमटा ले जाऊँ, तो उनके हाथ नह जलगे।” उसने ƣकानदार से चमटे क कमत पूछ। ƣकानदार ने बताया क चमटा तीन पैसे का है। हामद ने बना देर कए अपने तीन पैसे ƣकानदार को दे दए और चमटा खरीद लया। अब उसके पास एक भी पैसा नह बचा था, लेकन उसके मन म बƓत खुशी थी। उसे लग रहा था क उसने दाद के लए बƓत उपयोगी चीज़ खरीद है। जब Ƥसरे ब ने हामद के हाथ म चमटा देखा, तो वे उसका मज़ाक उड़ाने लगे। उÊह लगा क मेले म खलौने और मठाइयाँ छोड़कर चमटा खरीदना कोई अ बात नह है। हामद ने अपनी बात समझाते Ɠए कहा क उसका चमटा बƓत उपयोगी है। यह आग म भी काम आएगा, जÒद टूटेगा नह और सबसे बड़ी बात यह है क इससे दाद के हाथ नह जलगे।

हामद क बात सुनकर ब को उसक समझदारी का एहसास होने लगा। जस चमटे का वे मज़ाक उड़ा रहे थे, वही हामद के लए सबसे खास चीज़ बन गया था। जब हामद घर पƓँचा, तो उसने चमटा अपनी दाद अमीना को दे दया। पहले तो दाद को समझ नह आया क वह चमटा कहाँ से लाया है। जब उÊह पता चला क हामद ने अपने तीन पैसे खच करके उनके लए चमटा खरीदा है और अपने लए न कोई खलौना लया, न मठाई, तो उनक आँख म आँसू आ गए। दाद अमीना ने हामद को Ëयार से गले लगा लया। उÊह बƓत खुशी Ɠई क इतने छोटे बे ने अपनी खुशी के बारे म न सोचकर उनक परेशानी के बारे म सोचा। उÊहने हामद को ढेर ƣआएँ द। हामद भी दाद को खुश देखकर बƓत Ēसȡ Ɠआ।

हामद ने अपने छोटे-से Æयाग से यह दखा दया क सा ेम केवल अपने लए चीज़ खरीदने म नह, बक अपन क जƢरत और खुशी को समझने म है। उसका चमटा साधारण था, लेकन उसके पीछे छपा ेम बƓत बड़ा था। सीख - हम अपनी खुशी के साथ-साथ अपने परवार और अपन क जƢरत का भी Éयान रखना चाहए। सा ेम, Æयाग, समझदारी और संवेदनशीलता ही इंसान को महान बनाते ह।

जुÏमन शेख और अलगू चौधरी बचपन से दो×त थे। दोन को एक-Ƥसरे पर पूरा भरोसा था। वे साथ खाते-पीते नह थे। धम भी अलग थे। केवल वचार मलते थे। यही उनक मčता का आधार था। जुÏमन क एक बूढ़ खाला (मौसी) थ। उनके पास थोड़ी ज़मीन-जायदाद थी। जुÏमन ने उÊह फुसलाकर जायदाद अपने नाम लखवा ली। जब तक दान-पč क रज× नह Ɠई थी, खाला का खूब आदर होता था। रज× होते ही सब कुछ बदल गया। अब खाला को सूखी रोट और कड़वे बोल ही सुनने को मलते थे। कुछ दन तक खालाजान ने सुना और सहा। जब और न सह सक तो जुÏमन से बोल, “बेटा! मुझे हर महीने कुछ ơपये दे दया कर। म अलग खा- पका लूँगी।” जुÏमन ने ơपये देने से मना कर दया। इस पर खाला बगड़ गǘ। उÊहने पंचायत करने क धमक द। पढ़ा-लखा होने के कारण जुÏमन का बƓत मान था। वह जानता था क जीत उसी क होगी। हँसकर बोला, “ज़Ƣर करो।” पंच परमेȯरलेखक: मुंशी ेमचंद

कई दन तक बूढ़ खाला, हाथ म लकड़ी लए घर-घर घूम। सब लोग से पंचायत म आने के लए कहा। कसी ने हाँ-हाँ करके टाल दया तो कसी ने उलटे उÊह ही गालयाँ द। चार ओर से घूम-घाम कर बेचारी अलगू चौधरी के पास आǘ। अलगू से भी पंचायत म आने के लए कहा। अलगू बोला, “आ तो जाऊँगा, पर मुँह न खोलूँगा। जुÏमन से मेरी पुरानी दो×ती है। उससे बगाड़ नह कर सकता।” इस पर खाला बोल, “बेटा! ·या बगाड़ के डर से ईमान क बात न कहोगे?” खाला चली गǘ, पर अलगू बƓत देर तक यही बात सोचता रहा। ✦ ✦ ✦ शाम के समय पेड़ के नीचे पंचायत बैठ। खाला ने पंच के आगे जायदाद का मामला रखा और Êयाय माँगा। वे पंच का फैसला मानने को तैयार थ। फर सरपंच बनाने क बारी आई। पूछने पर जुÏमन बोला, “खाला जसे चाह, उसे बनाएँ। म भी पंच का फैसला मानने को तैयार ँ।” तब खाला ने अलगू को सरपंच बनाया। जुÏमन खुश हो गया। अब तो जीत उसी क होनी थी। पर अलगू कतराने लगा। तब खाला बोल—

“बेटा! दो×ती के लए कोई अपना ईमान नह बेचता। पंच न कसी के दो×त होते ह, न ƣÕमन। पंच के दल म खुदा बसता है। उनके मुँह से जो बात नकलती है, वह खुदा क तरफ़ से नकलती है।” अलगू चौधरी सरपंच Ɠआ। खाला और जुÏमन अब उसके लए एक समान थे। अब जुÏमन ने अपनी बात पंच से कही, “खाला क जायदाद से मुझे äयादा फ़ायदा नह होता। इसलए म उÊह हर महीने खचा नह दे सकता। फर इस तरह क कोई लखी-पढ़ भी तो नह Ɠई थी।” इस बात पर अलगू, जुÏमन से सवाल-जवाब करने लगा। जुÏमन हैरान था। फर अलगू ने फैसला सुनाया, “खाला को खचा देने लायक लाभ तो जायदाद से हो ही जाता है। अगर जुÏमन खचा नह देगा तो दान-पč क रज× रȕ कर द जाएगी।” फैसला सुनकर जुÏमन दंग रह गया। “·या यही कलयुग क दो×ती है? जस पर भरोसा था, उसी ने समय पड़ने पर धोखा दया!” सब लोग अलगू क साई क तारीफ़ करने लगे। “इसी का नाम पंचायत है। Ƥध का Ƥध, पानी का पानी कर दया।” इस फैसले ने अलगू और जुÏमन को ƣÕमन बना दया। सच के एक झके ने दो×ती क जड़ हला द।

जुÏमन हर समय बदला लेने क सोचने लगा। शीā ही उसे यह अवसर मला। ✦ ✦ ✦ पछले साल अलगू मेले से बड़े-बड़े सग वाला एक जोड़ा बैल खरीद लाया था। पंचायत के एक महीने बाद ही एक बैल मर गया। अब एक बैल से ·या होता? सो अलगू ने उसे गाँव के साƕ को बेच दया। साƕ ने डेढ़ सौ ơपये म बैल खरीद लया। एक महीने बाद दाम चुकाने क बात Ɠई। समझू साƕ गाँव से गुड़-घी लादकर मंडी ले जाते थे। फर मंडी से तेल, नमक लाकर गाँव म बेचते थे। नया बैल पाया तो दन म तीन-चार च·कर लगाने लगे। पशु के साथ पशु- सा बताव कया। न ठक से चारा दया, न पानी ही। आखर एक दन, कोड़े क मार खाते-खाते बैल जो गरा, फर कभी न उठा। कई महीने बाद अलगू बैल के दाम माँगने गया। समझू साƕ और उसक पÆनी ने उसे बƓत डाँटा। “मरा-सा बैल दया था, उस पर दाम माँगने चला है। यहाँ तो जÊम-भर क कमाई लुट गई।” अलगू डेढ़ सौ ơपये गँवाना नह चाहता था। लोग ने उसे पंचायत करने को कहा। वह मान गया।

पंचायत क तैयारयाँ Ɠǘ। तीसरे दन शाम को उसी पेड़ के नीचे पंचायत बैठ। समझू साƕ ने जुÏमन शेख को सरपंच बनाया। अलगू नराश हो गया। पर कुछ बोला नह। सरपंच बनते ही जुÏमन म ज़Ïमेदारी आ गई। वह Êयाय और धम के आसन पर बैठा था। यह समय बदला लेने का नह था। उसे केवल सच ही बोलना चाहए। पंच ने समझू साƕ और अलगू चौधरी से सवाल-जवाब कया। अंत म जुÏमन ने फैसला सुनाया, “जब बैल खरीदा गया था, तब वह बीमार नह था। समझू साƕ क लापरवाही और अÆयाचार के कारण ही वह मारा गया। समझू साƕ अलगू चौधरी को बैल के पूरे दाम द। अलगू चाह तो दाम कुछ कम कर सकते ह।” अलगू खुशी से झूम गया। उठ खड़ा Ɠआ और ज़ोर से बोला, “पंच परमेȯर क जय!” थोड़ी देर बाद जुÏमन अलगू के पास आया। गले लगकर बोला, “आज पता चला है क पंच न कसी का दो×त होता है, न ƣÕमन। पंच म तो परमेȯर वास करते ह।” अलगू रोने लगा। दल का मैल धुल चुका था। मčता क मुरझाई Ɠई लता फर हरी हो गई। लेखक: मुंशी ेमचंद

महादेवी वमा- छायावाद क Ēथम कवी

महादेवी वमा-

महादेवी वमा क Ēसȓ कहानी ‘गÒलू’ मनुÖय और एक छोटे जीव के बीच Ēेम, कơणा और आÆमीयता को दशाती है। एक दन लेखका को एक नÊही गलहरी का बा घायल अवȸा म मला, जसे वे अपने घर ले आǘ और उसक देखभाल क। उÊहने उसका नाम गÒलू रखा। धीरे-धीरे गÒलू ×वȸ होकर चंचल और शरारती हो गया तथा लेखका से बƓत घुल-मल गया। उसे काजू खाना बƓत पसंद था और वह लेखका का Éयान अपनी ओर आकषत करने के लए तरह-तरह क हरकत करता था। लेखका भी उसे अपने परवार के सद×य क तरह Ëयार करती थ। ×वȸ होने के बाद गÒलू ×वतंč होकर बाहर जाने लगा, फर भी वह Ēतदन लेखका के पास लौट आता था। लेखका के बीमार होने पर उसने उनके Ēत अपना लगाव और भी ȺȲ कया। अंत म गÒलू ने लेखका क उँगली थामे Ɠए अंतम साँस ली। लेखका ने उसे उसक Ēय सोनजुही क लता के नीचे दफना दया और उसक याद को सदैव अपने Ɨदय म सँजोए रखा। संदेश: सा Ēेम और संवेदना मनुÖय और पशु-पय के बीच भी एक गहरा और अनमोल रÕता बना सकते ह। गÒलू कहानी का सार

जयशंकर Ēसाद- छायावाद के महाकव

- जयशंकर Ēसाद

रोहतास-ƣग के Ēकोȵ म बैठ Ɠई युवती ममता, शोण के तीÛण गंभीर Ēवाह को देख रही है। ममता वधवा थी। उसका यौवन शोण के समान ही उमड़ रहा था। मन म वेदना, म×तक म आँधी, आँख म पानी क बरसात लए, वह सुख के कंटक-शयन म वकल थी। वह रोहतास-ƣगपत के मंी चूड़ामण क अकेली ƣहता थी, फर उसके लए कुछ अभाव होना असंभव था, परंतु वह वधवा थी—हƤ-वधवा संसार म सबसे तुǵ नराĜय Ēाणी है—तब उसक वडÏबना का कहाँ अंत था? चूड़ामण ने चुपचाप उसके Ēकोȵ म Ēवेश कया। शोण के Ēवाह म, उसके कल-नाद म अपना जीवन मलाने म वह बेसुध थी। पता का आना न जान सक। चूड़ामण ȭथत हो उठे। ×नेह- पालता पुी के लए ·या कर, यह र न कर सकते थे। लौटकर बाहर चले गए। ऐसा Ēाय: होता, पर आज मंी के मन म बड़ी ƣता थी। पैर सीधे न पड़ते थे। एक पहर बीत जाने पर वे फर ममता के पास आए। उस समय उनके पीछे दस सेवक चाँद के बड़े थाल म कुछ लए Ɠए खड़े थे; कतने ही मनुÖय के पद-शÍद सुन ममता ने घूम कर देखा। मंी ने सब थाल को रखने का संकेत कया। अनुचर थाल रखकर चले गए। ममता -जयशंकर Ēसाद

ममता ने पूछा—यह ·या है, पता जी? तेरे लए बेट! उपहार है।—कहकर चूड़ामण ने उसका आवरण उलट दया। ×वण का पीलापन उस सुनहली संÉया म वकण होने लगा। ममता चक उठ— इतना ×वण! यहा कहाँ से आया? चुप रहो ममता, यह तुÏहारे लए है! तो ·या आपने Ïलेǵ का उÆकोच ×वीकार कर लया? पता जी यह अनथ है, अथ नह। लौटा दजए। पता जी! हम लोग ाɀण ह, इतना सोना लेकर ·या करगे? इस पतनोÊमुख ाचीन सामंत-वंश का अंत समीप है, बेट! कसी भी दन शेरशाह रोहताȯ पर अधकार कर सकता है; उस दन मंÆव न रहेगा, तब के लए बेट! हे भगवान! तब के लए! वपद के लए! इतना आयोजन! परम पता क इǵा के वơȓ इतना साहस! पता जी, ·या भीख

न मलेगी? ·या कोई हƤ भू-पृȵ पर न बचा रह जाएगा, जो ाɀण को दो मु अȡ दे सके? यह असंभव है। फेर दजए पता जी, म काँप रही ँ—इसक चमक आँख को अंधा बना रही है। मूख है—कहकर चूड़ामण चले गए। Ƥसरे दन जब डोलय का ताँता भीतर आ रहा था, ाɀण-मंी चूड़ामण का Ɨदय धक्-धक करने लगा। वह अपने को रोक न सका। उसने जाकर रोहताȯ ƣग के तोरण पर डोलय का आवरण खुलवाना चाहा। पठान ने कहा— यह महलाǞ का अपमान करना है। बात बढ़ गई। तलवार खच, ाɀण वह मारा गया और राजा- रानी और कोष सब छली शेरशाह के हाथ पड़े; नकल गई ममता। डोली म भरे Ɠए पठान-सैनक ƣग भर म फैल गए, पर ममता न मली। काशी के उȉर धमचþ वहार, मौय और गुËत साट क कत का खंडहर था। भ¹न चूड़ा, तृण-गुÒम से ढके Ɠए ाचीर, ǘट क ढेर म बखरी Ɠई भारतीय शÒप क वभूत, ीÖम क चंका म अपने को शीतल कर रही थी।

जहाँ पंचवगय भु गौतम का उपदेश Āहण करने के लए पहले मले थे, उसी ×तूप के भ¹नावशेष क मलन छाया म एक झोपड़ी के दपालोक म एक ×ी पाठ कर रही थी— अनÊयाÊतयÊतो माँ ये जना: पयुपासते... पाठ ơक गया। एक भीषण और हताश आकृत दप के मंद Ēकाश म सामने खड़ी थी। ×ी उठ, उसने कपाट बंद करना चाहा। परंतु उस ȭǮ ने कहा—माता! मुझे आĜय चाहए। तुम कौन हो?—×ी ने पूछा। म मुग़ल ँ। चौसा-युȓ म शेरशाह से वपȡ होकर रा चाहता ँ। इस रात अब आगे चलने म असमथ ँ। ·या शेरशाह से?—×ी ने अपने ओठ काट लए। हाँ, माता! परंतु तुम भी वैसे ही ूर हो, वही भीषण रǮ क Ëयास, वही नुर Ēतबब, तुÏहारे मुख पर भी है! सैनक! मेरी कुट म ान नह। जाओ, कह Ƥसरा आĜय खोज लो। गला सूख रहा है, साथी छूट गए ह, अȯ गर पड़ा है—इतना थका Ɠआ ँ—इतना!—कहते-कहते वह ȭǮ धम-से बैठ गया और उसके सामने ĔाÅड घूमने लगा। ×ी ने सोचा, यह वप कहाँ से आई! उसने जल दया, मुग़ल के Ēाण क रा Ɠई।

वह सोचने लगी—ये सब वधम दया के पाč नह—मेरे पता का वध करने वाले आततायी! घृणा से उसका मन वरǮ हो गया। ×वȸ होकर मुग़ल ने कहा—माता! तो फर म चला जाऊँ? ×वȸ होकर मुग़ल ने कहा—माता! तो फर म चला जाऊँ? ×čी वचार कर रही थी—म ाɀणी ँ, मुझे तो अपने धम- अतथदेव क उपासना-का पालन करना चाहए। परंतु यहाँ...नह-नह ये सब वधम दया के पाč नह। परंतु यह दया तो नह...कतȭ करना है। तब? मुग़ल अपनी तलवार टेककर खड़ा Ɠआ। ममता ने कहा—·या आȮय है क तुम भी छल करो; ठहरो। छल! नह, तब नह— ×čी! जाता ँ, तैमूर का वंशधर ×čी से छल करेगा? जाता ँ। भा¹य का खेल है। ममता ने मन म कहा—यहाँ कौन ƣग है! यही झोपड़ी न; जो चाहे ले-ले, मुझे तो अपना कतȭ करना पड़ेगा। वह बाहर चली आई और मुग़ल से बोली—जाओ भीतर, थके Ɠए भयभीत पथक! तुम चाहे कोई हो, म तुÏह आĜय देती ँ। म ाɀण- कुमारी ँ; सब अपना धम छोड़ द, तो म भी ·य छोड़ ँ? मुग़ल ने चंďमा के मंद Ēकाश म वह महमामय मुखमंडल देखा, उसने मन-ही-मन नम×कार कया। ममता पास क टूट Ɠई दवार म चली गई। भीतर, थके पथक ने झोपड़ी म वĜाम कया।

Ēभात म खंडहर क स से ममता ने देखा, सैकड़ अारोही उस Ēांत म घूम रहे ह। वह अपनी मूखता पर अपने को कोसने लगी। अब उस झोपड़ी से नकलकर उस पथक ने कहा—मज़ा! म यहाँ ँ। शÍद सुनते ही Ēसȡता क चीÆकार-Éवन से वह Ēांत गूँज उठा। ममता अधक भयभीत Ɠई। पथक ने कहा—वह ×ी कहाँ है? उसे खोज नकालो। ममता छपने के लए अधक सचेȲ Ɠई। वह मृग-दाव म चली गई। दन-भर उसम से न नकली। संÉया म जब उन लोग के जाने का उपþम Ɠआ, तो ममता ने सुना, पथक घोड़े पर सवार होते Ɠए कह रहा है—मज़ा! उस ×ी को म कुछदे न सका। उसका घर बनवा देना, ·यक मने वपȉ म यहाँ वाम पाया था। यह ान भूलना मत।—इसके बाद वे चले गए। चौसा के मुग़ल-पठान-युȓ को बƓत दन बीत गए। ममता अब सȉर वष क वृȓा है। वह अपनी झोपड़ी म एक दन पड़ी थी। शीतकाल का Ēभात था। उसका जीण-कंकाल खाँसी से गूँज रहा था। ममता क सेवा के लए गाँव क दो-तीन ×याँ उसे घेर कर बैठ थ; ·यक वह आजीवन सबके सुख-ƣ:ख क समभागनी रही।

ममता ने जल पीना चाहा, एक ×čी ने सीपी से जल पलाया। सहसा एक अारोही उसी झोपड़ी के ार पर दखाई पड़ा। वह अपनी धुन म कहने लगा—मज़ा ने जो चč बनाकर दया है, वह तो इसी जगह का होना चाहए। वह बुढय़ा मर गई होगी, अब कससे पूछूँ क एक दन शाहंशाह Ɠमायूँ कस छËपर के नीचे बैठे थे? यह घटना भी तो सतालीस वष से ऊपर क Ɠई! ममता ने अपने वकल कान से सुना। उसने पास क ×čी से कहा—उसे बुलाओ। अारोही पास आया। ममता ने ơक-ơककर कहा—म नह जानती क वह शाहंशाह था, या साधारण मुग़ल पर एक दन इसी झोपड़ी के नीचे वह रहा। मने सुना था क वह मेरा घर बनवाने क आा दे चुका था! भगवान् ने सुन लया, म आज इसे छोड़े जाती ँ। अब तुम इसका मकान बनाओ या महल, म अपने चर-वाम-गृह म जाती ँ! वह अारोही अवाक् खड़ा था। बुढय़ा के ाण-पी अनंत म उड़ गए। वहाँ एक अȲकोण मंदर बना; और उस पर शलालेख लगाया गया— सात देश के नरेश Ɠमायूँ ने एक दन यहाँ वाम कया था। उनके पुč अकबर ने उनक ×मृत म यह गगनचुंबी मंदर बनाया। पर उसम ममता का कह नाम नह था।

माखन लाल चतुवद- राीय कव और साहÆयकार

कव: माखनलाल चतुवद

चाह नह म सुरबाला के, गहन म गूँथा जाऊँ। चाह नह ेमी-माला म, बध Ëयारा को ललचाऊँ। ✦ ✦ ✦ चाह नह साट के शव पर, हे हर, डाला जाऊँ। चाह नह देव के सर पर, चँ भा¹य पर इठलाऊँ। ✦ ✦ ✦ मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फक। मातृभूम पर शीश चढ़ाने, जस पथ जाव वीर अनेक। पुÖप क अभलाषा कव: माखनलाल चतुवद

सुभा कुमारी चौहान- वीर रस क कवी

सुभा कुमारी चौहान

यह कदंब का पेड़ अगर माँ, होता यमुना तीरे, म भी उस पर बैठ कÊहैया बनता धीरे-धीरे। ले देती यद मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली, कसी तरह नीचे हो जाती यह कदंब क डाली। ✦ ✦ ✦ तुÏह नह कुछ कहता, पर म चुपके-चुपके आता, उस नीची डाली से अÏमा, ऊँचे पर चढ़ जाता। वह बैठ फर बड़े मजे से म बाँसुरी बजाता, अÏमा-अÏमा कह बंसी के ×वर म तुÏह बुलाता। ✦ ✦ ✦ सुन मेरी बंसी को माँ, तुम इतनी खुश हो जाती, मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आती। तुमको आता देख बाँसुरी रख म चुप हो जाता, प म छुपकर धीरे से फर बाँसुरी बजाता। ✦ ✦ ✦ कदंब का पेड कवयी: सुभा कुमारी चौहान

गु×से होकर मुझे डाँटती, कहत, “नीचे आ जा।” पर जब म न उतरता, हँसकर कहत, “मुा राजा! नीचे उतरो मेरे भैया! तुÏह मठाई Ƥँगी, नए खलौने, माखन, मी, Ƥध-मलाई Ƥँगी।” ✦ ✦ ✦ म हँसकर सबसे ऊपर क टहनी पर चढ़ जाता, एक बार “माँ” कह प म वह कह छुप जाता। ✦ ✦ ✦ बƓत बुलाने पर भी माँ, जब म न उतरकर आता, तब माँ का Ɨदय बƓत वकल हो जाता। ✦ ✦ ✦ तुम आँचल पसार कर अÏमा, वहाँ पेड़ के नीचे, ईȯर से कुछ वनती करत, बैठ आँख मचे। तुÏह Éयान म लगी देख म धीरे-धीरे आता, और तुÏहारे फैले आँचल के नीचे छुप जाता। ✦ ✦ ✦ तुम घबराकर आँख खोलत, फर भी खुश हो जात, जब अपने मुा राजा को गोद म ही पात। इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे, माँ, कदंब का पेड़ अगर यह होता यमुना-तीरे।

सुभा कुमारी चौहान

अभी-अभी थी धूप, बरसने लगा कहाँ से यह पानी? कसने फोड़ घड़े बादल के, क है इतनी शैतानी। सूरज ने ·य बंद कर लया अपने घर का दरवाज़ा? उसक माँ ने भी ·या उसको बुला लया कहकर, “आ जा।” ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे ह, बादल ह कसको काका। कसको डाँट रहे ह, कसने कहना नह सुना माँ का? बजली के आँगन म अÏमाँ चलती है कतनी तलवार! कैसी चमक रही है, फर भीपानी और धूप कवयी: सुभा कुमारी चौहान

·य खाली जाते ह वार? ·या अब तक तलवार चलाना माँ, वे सीख नह पाए? इसीलए ·या आज सीखने आसमान पर ह आए? एक बार भी माँ, यद मुझको बजली के घर जाने दो, उसके ब को तलवार चलाना सखला आने दो।कवयी: सुभा कुमारी चौहान

हरवंश राय बǴन— हद के Ēसȓ कव एवं मधुशाला के रचयता

हरवंश राय बǴन

जो बीत गई सो बात गई जीवन म एक सतारा था माना वह बेहद Ëयारा था वह डूब गया तो डूब गया अÏबर के आनन को देखो कतने इसके तारे टूटे कतने इसके Ëयारे छूटे जो छूट गए फर कहाँ मले पर बोलो टूटे तार पर कब अÏबर शोक मनाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन म वह था एक कुसुम थे उस पर नÆय नछावर तुम वह सूख गया तो सूख गया जो बीत गई सो बात गई हरवंश राय बǴन

जो बीत गई सो बात गई मृƣ मटट के ह बने Ɠए मधु घट फूटा ही करते ह लघु जीवन लेकर आए ह Ëयाले टूटा ही करते ह फर भी मदरालय के अंदर मधु के घट ह मधु Ëयाले ह जो मादकता के मारे ह वे मधु लूटा ही करते ह वह कǴा पीने वाला है जसक ममता घट Ëयाल पर जो सǴे मधु से जला Ɠआ कब रोता है चÒलाता है जो बीत गई सो बात गई हरवंश राय बǴन

हद हमारी Ëयारी भाषा है, जो हम अपनी सं×कृत, परंपराǞ और भावनाǞ से जोड़ती है। ×नेह के रंग, साहÆय के संग साहÆय समाज का दपण है, जसम उसक आÆमा का Ēतबब दखाई देता है। Heritage Xperiential Learning School – Sec 64 5 Prajapati Road, Sector 64, Gurugram, Haryana 122101

အမှတ်တံဆိပ် လိုဂို

स्नेह के रंग, साहित्य के संग

Aman Bhardwaj
တိုင်ကြားရန်