1 MaI madBaagavata gaItaa
2 गीता ज्ञ ान कलियुग के लिए श्र ीकृष् ण का संदेश गीता जी के अठारह अध्याय के सात सों श् िोकों का सरि अर्थ माध् यम अजुथन, संदेश समस्त मानव जातत के लिए
3 भूमिका िहाभारत का युद्ध और धिम की लडाई िहाभारत केवल एक युद्ध की कथा नहीं है। यह:िानव जीवन,धिम,सत्य ,कतमव्य ,लोभ,िोह,और ईश्वर के न् याय का सबसे िहान ग्रं थ िाना जाता है। इस युद्ध िें केवल अस्त्र -शस्त्र नहीं टकराए थे,बमकक:धिम और अधिम,सत्य और असत्य ,तथा न् याय औ र अन्याय आिने-सािने खडे थे। िहाभारत हिें यह मसखाता है मक: जब िनुष् य अहंकार और लालच िें अंधा हो जाता है, तो उसका पतन मनमित हो जाता है।और जब िनुष् य: कमिन पररमथथमतयों िें भी धिम नही छोडता, तो अंत िें मवजय उसी की होती है। हमथतनापुर का राजघराना िहाभारत की कहानी हमथतनापुर से शुरू होती है। हमथतनापुर भारत का िहान और शमिशाली राज्य था। वहााँ:भीष्ि मपतािह ,गुरु द्र ोणाचायम ,कृपाचायम,मवदुर,और अनेक िहान योद्ध ारहते थे।राजा धृतराष् र जन् ि से अंधे थे। उनके सौ पुत्र थे मजन् हे “कौरव”कहा गया। दूसरी ओर: पांडु के पााँच पुत्र “पांडव” कहलाए। उनके नाि थे:युमधमिर भीि अजुमन नकुल सहदेवपांडव:धिममिय,सत्यवादी ,और मवनम्र थे।जबमक दुयोधन:
4 अहंकारी,ईष् यामलु,और लोभी था।दुयोधन की ईष् यामदुयोधन को पांडवों से बहुत ईष् याम थी।वह देखता था मक:लोग पांडवों से िेि करते हैं,गुरु जन उनका सम्िान करते हैं ,और वे युद्ध कला िें भी श्रे ि हैं। अजुमन की वीरता,भीि की शमि,और युमधमिर की धिममियता उसे अंदर ही अंदर जलाती थी। ईष्याम धीरे -धीरे:घृणा,और घृणा अधिमिें बदलने लगी। आज भी: जब िनुष् य दूसरों की सफलता देखकर जलता है, तो उसके भीतर शांमत सिाप्त होने लगती है। िहाभारत मसखाता है: तुलना और ईष् याम िनुष् य का मवनाश कर देती है।लाक्ष ागृह और षड्यंत्र दुयोधन ने कई बार पांडवों को िारने का ियास मकया। उसने: लाक्ष ागृह बनवाया, जो िोि और ज् वलनशील पदाथों से बना था। योजना यह थी मक:पांडव उसिें जलकर िर जाएाँ। लेमकन ईश्व र की कृपा से:पांडव बच गए। यहााँ गीता का एक गहरा संदेश मछपा है: जब तक ईश्वर की इच्छा न हो , अधिम धिम का नाश नहीं कर सकता। द्र ौपदी का अपिान िहाभारत का सबसे दुखद और िहत् वपूणम िसंग था: द्र ौपदी चीरहरण दुयोधन और शकुमन ने छल से:युमधमिर को जुए िें हर मदया। मफर:राज्य ,धन,भाइयों , और अंत िें द्र ौपदी तक को दााँव पर लगा मदया गया। सभा िें:द्रौपदी का अपिान मकया गया ,लेमकन अमधकांश लोग िौन रहे। यह िहाभारत का सबसे बडा अधिम था। आज भी: जब सिाज अन् याय देखकर चुप रहता है, तब अधिम बढ़ता जाता है। िहाभारत मसखाता है: अन्याय सहना भी अधिम है।
5श्र ीकृष् ण का संरक्ष ण जब द्र ौपदी ने:सब सहारे छोडकर ,पूणम श्रद्ध ा से श्र ीकृष् ण को पुकारा,तब भगवान ने उसकी रक्षा की। यह घटना मसखाती है: जब िनुष् य सच् चे िन से ईश्व र को पुकारता है, तो ईश्वर उसकी रक्षा अवश्य करते हैं। लेमकन इसका अथम यह नहीं मक:िनुष् य किम छोड दे। गीता मसखाती है: श्रद्ध ा और किम दोनों आवश्यक हैं। वनवास और कष्ट पांडवों को:13 वषम का वनवास मिला। उन्होंने: जंगलों िें जीवन मबताया,कमिनाइयााँ झेलीं ,अपिान सहा, मफर भी:धिम का िागम नहीं छोडा। आज:थोडी परेशानी आते ही लोग टूट जाते हैं। लेमकन िहाभारत मसखाता है: कमिन सिय िनुष् य की परीक्ष ा होता है। जो व् यमि:धैयम , मवश्वास ,और धिम नहीं छोडता , वही अंत िें सफल होता है। शांमत का अंमति ियास युद्ध से पहले कृष् ण थवयं शांमत िथताव लेकर गए।उन् हों ने कहा:पांडवों को केवल पााँच गााँव दे दो।लेमकन दुयोधन अहंकार िें अंधा हो चुका था। उसने कहा:“िैं सूई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूाँगा।”यहीं से थपष्ट हो गया मक:अब युद्ध टालना संभव नहीं । कुरुक्षेत्र — केवल युद्ध भूमि नहीं कुरुक्षेत्र केवल एक थथान नहीं था। यह: िनुष् य के भीतर चलने वाले संघषम का ितीक है। हर िनुष् य के भीतर: दुयोधन भी है, और अजुमन भी। जब:लोभ,क्र ोध ,और अहंकार बढ़ते हैं , तो भीतर अधिम बढ़ता है। लेमकन:मववेक,सत्य ,और ईश्व र का थिरणिनुष् य को धिम की ओर ले जाते हैं।अजुमन का िोह जब अजुमन ने:
6 अपने ही गुरु ,ररश्तेदार , और मित्र युद्ध भूमि िें देखे, तो उनका िन दुख और िोह से भर गया। उनके हाथ कााँपने लगे, गाण्डीव नीचे मगरने लगा , और उन् हों ने युद्ध करने से िना कर मदया। यहीं से भगवद्गीता का िारम्भ होता है। गीता का वाथतमवक जन्ि गीता: मकसी आश्रि िें नहीं , मकसी जंगल िें नहीं ,बमकक युद्ध भूमि िें दी गई। यह बहुत बडा संदेश है। इसका अथम है: जीवन के संघषों के बीच भी ईश्व र का ज्ञ ान िाप्त मकया जा सकता है। गीता केवल संन् यामसयों के मलए नहीं , बमकक: गृहथथ,किमयोगी, और सािान्य िनुष् य सभी के मलए है। धिम की वाथतमवक मवजयकौरवों के पास:मवशाल सेना,धन,और शमि थी।लेमकन पांडवों के साथ:धिम,सत्य ,और श्र ीकृष् ण थे। अंत िें मवजय धिम की हुई। िहाभारत मसखाता है: अधिम कुछ सिय के मलए शमिशाली मदख सकता है, लेमकन थथायी मवजय सत्य की ही होती है। आज के सिय िें िहाभारत का िहत्व आज भी संसार: लोभ, भ्रष्ट ाचार , थवाथम, और अहंकार से भरा हुआ है। लोग:धन के मलए ररश्ते तोड देते हैं ,और सफलता के मलए सत्य छोड देते हैं। ऐसे सिय िें िहाभारत और गीता: िनुष् य को सही िागम मदखाते हैं। वे मसखाते हैं: धिम कमिन हो सकता है, लेमकन वही थथायी शांमत देता है। मनष्कषम िहाभारत केवल इमतहास नहीं है।
7 यह: िानव जीवन का दपमण,धिम का िहान संदेश,और आत्िज्ञान का द्व ार है। और इसी िहान युद्ध भूमि िें: कृष् ण ने अजुमन को वह मदव् य ज्ञ ान मदया, मजसे आज संसार:श्र ीिद्भगवद्गीताके नाि से जानता है। अनुक्र मणणका 1) महाभारत का युद् ध और धमथ की िडाई 2) युद् धभूलम में अजुथन का दुख और मोह 3) आत्मा अमर है — मृत् यु का वास् तववक सत् य
8 4) कमथयोग — कमथ करते रहना क् यों आवश्यक है 5) फि की च ं ता मनुष् य को कमजोर क् यों बनाती है 6) ज्ञ ानयोग — सच् ा ज्ञ ान क् या है 7) मनुष् य का सबसे बडा शत्रु — उसका मन 8) क्र ोध , िोभ और अहंकार का ववनाश 9) भक्क्त क् या है — केवि पूजा या कुछ और 10) कलियुग में धमथ क् यों कमजोर हो रहा है 11) अच् छे और बुरे कमथ का प्र भाव 12) समय और भाग्य का रहस्य 13) भय और च ं ता से मुक्क् त कैसे पाएँ 14) ववद्यार्ी जीवन में गीता का महत्व 15) पररवार और समाज के प्र तत कतथव्य 16) सफिता और शांतत में अंतर 17) धन से बडा क् या है 18) सच् ा सुख कहाँ लमिता है 19) मृत् यु से डरना क् यों नह ं ाहहए 20) कहठन समय में गीता कैसे सहारा देती है 21) श्र ीकृष् ण का नेतृत् व और जीवन प्र बंधन
9 22) आज के युवाओं के लिए गीता का संदेश 23) गीता के महत् वपूणथ श् िोक और उनका सरि अर् थ 24) तनष्कर्थ — जीवन बदिने वािा हदव्य ज्ञ ान रोजमराथ जीवन में गीता को कैसे अपनाएँ jaya MaI kXVNaa
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11 अध्याय 1 युद्ध भूमि िें अजुमन का दुख और िोह कुरुक्षेत्र की पवित्र भूवि िें िहाभारत का िहान युद्ध आरम् भ होने िाला था। दोनों सेनाएँ आिने -सािने खड़ी थीं । शंख बज चुके थे और पूरा िातािरण युद्ध की गजजना से भर गया था। उस सिय अजुजन, जो संसार के सबसे िहान धनुधजरों िें वगने जाते थे, अपने रथ पर खडे होकर युद्ध भूवि को देख रहे थे। लेवकन जब अजुजन ने अपने सािने अपने ह़ी गुरु , वपतािह, भाई, वित्र और संबंवधयों को देखा, तब उनका हृ दय दया और िोह से भर गया। उनका िन विचवलत हो गया। हाथ काँपने लगे और युद्ध करने की शवि सिाप्त होने लग़ी । तभ़ी अजुजन ने श्ऱी कृष् ण से कहा- अजुजन विषाद योग धिमक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे सिवेता युयुत् सवः। िािकाः पाण् डवािैव मकिकुवमत सञ् जय॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 1 सरल अथज धृतराष् र ने पूछा — हे संजय! धिजभूवि कुरुक्षेत्र िें युद्ध की इच् छा से एकत्र हुए िेरे पुत्रों और पांडिों ने क् या वकया? यहीं से ग़ीता का प्र ारम्भ होता है। धृतराष् र जन् ि से अंधे थे, लेवकन ग़ी ता यह संकेत देत़ी है वक िे केिल आँखों से ह़ी नहीं , बवकक िोह से भ़ी अंधे हो चुके थे। िे जानते थे वक उनके पुत्रों ने अन् याय वकया है, विर भ़ी उनका िोह सत्य को स् ि़ीकार नहीं करने दे रहा था। “िािकााः” शब्द विशेष ध् यान देने योग्य है।
12 धृतराष् र ने “िेरे पुत्र ” और “पांडि” अलग-अलग कहा। यह़ी भेदभाि िहाभारत के विनाश का कारण बना। आज भ़ी जब िनुष् य:अपने और पराए िें अन् यायपूणज भेद करता है,सत्य के बजाय पक्षपात करता है , तब संघषज उत् पन् न होता है।कुरुक्षेत्र को “धिजक्षेत्र ” कहा गया क् यों वक िहाँ केिल युद्ध नहीं , धिज और अधिज का वनणजय होने िाला था।दृष्ट् वा तु पाण् डवानीकं व् यूढं दुयोधनथतदा। आचायमिुपसंगम् य राजा वचनिब्र वीत्॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 2 सरल अथज पांडिों की सेना को देखकर राजा दुयोधन अपने गुरु द्र ोणाचायज के पास गया और उनसे बात करने लगा। दुयोधन बाहऱी रू प से शविशाल़ी था, लेवकन भ़ीतर से
13 भयभ़ीत था। अधिज िनुष् य को कभ़ी पूणज शांवत नहीं देता। वजस व् यवि का आधार अन्याय होता है , उसके भ़ीतर कहीं न कहीं भय बना रहता है। आज भ़ी: गलत तऱीके से धन किाने िाला ,दूसरों को धोखा देने िाला, या अहंकार िें ज़ी ने िाला व् यवि, बाहर से सिल वदखाई दे सकता है, लेवकन भ़ीतर असुरवक्ष त रहता हैश् यैतां पाण् डुपुत्र ाणािाचायम िहतीं चिूि्।व् यूढां द्रु पदपुत्रे ण तव मशष् येण धीिता॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 3 सरल अथज हे आचायज! पांडिों की इस विशाल सेना को देवखए, वजसे आपके बुवद्ध िान वशष् य धृष्टद्युम् न ने सजाया है। दुयोधन यहाँ अपने गुरु द्र ोणाचायज को सूक्ष् ि रू प से याद वदला रहा था वक पांडिों की सेना का सेनापवत िह़ी धृष्टद्युम् न है, जो द्र ोणाचायज के वशष्य थे। यह दुयोधन की राजऩी वत और िानवसक चालाकी को दशाजता है। अधिज का िागज अपनाने िाला व् यवि अक्सर:छल ,भय, और िानवसक दबाि का सहारा लेता है। अत्र शूरा िहेष् वासा भीिाजुमनसिा युमध। युयुधानो मवराटि द्रु पदि िहारथः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 4
14 सरल अथज इस सेना िें भ़ी ि और अजुजन जैसे िहान धनुधजर तथा सात् यवक, विराट और द्रु पद जैसे िहारथ़ी उपवस्थत हैं दुयोधन पांडिों की सेना की शवि देखकर वचंवतत हो रहा था। अधिज चाहे वकतना भ़ी शविशाल़ी वदखाई दे , सत्य की शवि उसे भ़ीतर से अवस्थर कर देत़ी है। धृष्ट केतुिेमकतानः कामशराजि वीयमवान्। पुरु मजत् कुमन् तभोजि शैब् यि नरपुङ्गवः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 5 सरल अथज धृष्ट केतु, चेवकतान, ि़ीर काश़ी राजा , पुरु वजत, कुवन् तभोज और शैव् य जैसे श्रेष्ठ योद्धा भ़ी िहाँ उपवस्थत थे। यहाँ ग़ीता बतात़ी है वक धिज के पक्ष िें केिल शवि ह़ी नहीं , बवकक अनेक श्रेष्ठ और ि़ीर लोग भ़ी खडे थे। जब उद्देश्य धिज और सत्य का होता है , तब योग् य लोग स् ियं जुडने लगते हैं। युधािन् युि मवक्र ान् त उत्त िौजाि वीयमवान्। सौभद्रो द्र ौपदेयाि सवम एव िहारथाः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 6 सरल अथज पराक्र ि़ी युधािन् यु, ि़ीर उत्तिौजा , अवभिन् यु और द्र ौपद़ी के पुत्र भ़ी िहान योद्धा थे। यह केिल युद्ध का िणजन नहीं था।यह आने िाले सिय के बडे पररितजन का संकेत था। िहाभारत का युद्ध केिल राजवसंहासन के वलए नहीं , बवकक धिज की स् थापना के वलए था। अथिाकं तु मवमशष्ट ा ये तामन् नबोध मद्व जोत्त ि। नायका िि सैन् यथय संज्ञ ाथं तान्ब्र वीमि ते॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 7 सरल अथज
15 हे श्रेष्ठ ब्र ाह्म ण! अब हिाऱी सेना के प्र िुख योद्ध ाओं को भ़ी जान ल़ी वजए। दुयोधन अपऩी सेना की श वि वदखाकर अपने भय को वछपाने का प्र यास कर रहा था। िनुष् य जब भ़ी तर से अवस् थर होता है, तब िह बाहऱी शवि का प्र दशजन अवधक करता है। भवान् भीष् िि कणमि कृपि समिमतञ् जयः। अश्वत्थािा मवकणमि सौिदमत्तथतथैव च॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 8 सरल अथजआप, भ़ीष्ि , कणज, कृपाचायज, अश्वत्थािा , विकणज और भूररश्र िा जैसे योद्ध ा हिाऱी ओर हैं।दुयोधन को अपऩी सेना की शवि पर गिज था।लेवकन ग़ी ता बार-बार यह वदखात़ी है वक केिल शवि विजय नहीं वदलात़ी। यवद धिज साथ न हो, तो बड़ी सेना भ़ी अंत िें हार सकत़ी है। अन् ये च बहवः शूरा िदथे त् यिजीमवताः। नानाशस्त्र िहरणाः सवे युद्ध मवशारदाः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 9 सरल अथज और भ़ी अनेक ि़ीर योद्धा हैं जो िेरे वलए अपने प्र ाण देने को तैयार हैं। दुयोधन के शब्दों िें अहंकार स् पष्ट वदखाई देता है। िह युद्ध को धिज के बजाय अपऩी विजय का साधन िान रहा था।यह़ी अहंकार आगे चलकर विनाश का कारण बना। अपयामप्तं तदथिाकं बलं भीष् िामभरमक्ष ति्। पयामप्तं मत् वदिेतेषां बलं भीिामभरमक्ष ति्॥ अध्याय 1 , श्ल ोक 10 सरल अथज भ़ीष्ि द्व ारा रवक्षत हिाऱी सेना अस़ीि है , जबवक भ़ी ि द्व ारा रवक्ष त पांडिों की सेना स़ीवित है। दुयोधन स् ियं को आश्वस् त करने की कोवशश कर रहा था। जब िनुष् य
16 सत्य के विरुद्ध होता है , तब िह बार-बार अपने िन को शवि का भरोसा वदलाता है। लेवकन िास्तविक विजय संख् या से नहीं , धिज से होत़ी है अयनेषु च सवेषु यथाभागिवमथथताः। भीष् ििेवामभरक्षन् तु भवन् तः सवम एव मह॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 11 सरल अथज आप सब अपने-अपने स् थान पर रहकर वपतािह भ़ीष्ि की रक्षा करें। दुयोधन जानता था वक उसकी सेना का सबसे बडा सहारा भ़ीष्ि वपतािह हैं। भ़ीष्ि केिल िहान योद्धा ह़ी नहीं , बवकक अपार अनुभि और शवि िाले पुरु ष थे। यहाँ दुयोधन का भय स् पष्ट वदखाई देता है। उसे अपऩी विशाल सेना पर पूरा विश्व ास नहीं था, इसवलए िह बार-बार भ़ीष्ि का सहारा ले रहा था।आज भ़ी िनुष् य जब भ़ी तर से असुरवक्ष त होता है, तब िह बाहऱी सहारों पर अत्यवधक वनभजर हो जाता है। तथय सञ् जनयन् हषं कुरु वृद्ध ः मपतािहः। मसंहनादं मवनद्य ोच् चैः शङ्खं दध् िौ ितापवान्॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 12 सरल अथज दुयोधन का उत् साह बढाने के वलए प्र ताप़ी वपतािह भ़ीष् ि ने वसंह की गजजना के सिान ऊँचे स् िर िें अपना शंख बजाया। भ़ीष्ि वपतािह धिज को सिझते थे , लेवकन हवस् तनापुर के प्र वत अपऩी प्र वतज्ञ ा के कारण कौरिों की ओर से युद्ध कर रहे थे। यह ज़ीिन का एक कविन सत्य वदखाता है कभ़ी -कभ़ी िहान व् यवि भ़ी पररवस् थवतयों और प्र वतज्ञ ाओं िें बँध जाते हैं। भ़ीष् ि का शंखनाद युद्ध की शुरु आत का संकेत था।
17 ततः शङ्खाि भेयमि पणवानकगोिुखाः। सहसैवाभ् यहन् यन् त स शब् दथतुिुलोऽभवत्॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 13 सरल अथज इसके बाद शंख, नगाडे, ढोल और रणभेररयाँ एक साथ बज उिीं , वजनसे बडा भयंकर शब् द हुआ।पूरा कुरुक्षेत्र युद्ध की ध् िवन से गूँज उिा। यह केिल युद्ध का शोर नहीं था, बवकक इवतहास बदलने िाले सिय का संकेत था।ज़ी िन िें भ़ी कुछ क्ष ण ऐसे आते हैं जो आने िाले भविष् य को पूऱी तरह बदल देते हैं। ततः श्वे तैहमयैयुमिे िहमत थयन् दने मथथतौ। िाधवः पाण् डविैव मदव् यौ शङ्खौ िदध् ितुः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 14 सरल अथज इसके बाद सिेद घोडों िाले वदव् य रथ िें बैिे श्ऱी कृष् ण और अजुजन ने अपने वदव् य शंख बजाए। सिेद घोडे पवित्रता और सत्य का प्र त़ीक िाने जाते हैं। श्ऱी कृष् ण और अजुजन का रथ धिज और सत् य का प्र त़ी क था। यहाँ ग़ी ता यह संकेत देत़ी है वक जहाँ धिज और ईश्वर का िागजदशजन होता है, िहाँ अंत िें विजय होत़ी है। पाञ् चजन् यं हृ षीकेशो देवदत्तं धनञ् जयः। पौण् रं दध् िौ िहाशङ्खं भीिकिाम वृकोदरः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 15 सरल अथज श्ऱी कृष् ण ने पाञ् चजन् य शंख, अजुजन ने देिदत्त शंख और भ़ी ि ने पौण्ड् र नािक िहान शंख बजाया। यह केिल शंख नहीं थे , बवकक आत्िविश्वास और धिज की घोषणा थे। भ़ी ि का शंख उनकी शवि का प्र त़ी क था, जबवक अजुजन का शंख धैयज और युद्ध कौशल का।
18 अनन् तमवजयं राजा कुन् तीपुत्र ो युमधमिरः। नकुलः सहदेवि सुघोषिमणपुष् पकौ॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 16 सरल अथज राजा युवधवष्ठ र ने अनन् तविजय शंख, नकुल ने सुघोष और सहदेि ने िवणपुष् पक शंख बजाया। युवधवष्ठ र सत् य और धिज के प्र त़ी क थे। उनका शंख “अनन्तविजय ” यह संकेत देता है वक धिज की विजय स् थाय़ी होत़ी है। काश्यि परिेष्वासः मशखण्डी च िहारथः। धृष्टद्युम् नो मवराटि सात् यमकिापरामजतः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 17 सरल अथज श्रेष्ठ धनुधजर काश़ी राजा, वशखंड़ी , धृष्टद्युम् न, विराट और अपरावजत सात्यवक भ़ी उपवस्थत थे। विस् तृत व् याख् या पांडिों की सेना केिल संख् या िें नहीं , बवकक ि़ी रता और उद्देश् य िें भ़ी िजबूत थ़ी । जब उद्देश्य धिज और सत्य हो , तब लोगों िें अलग प्र कार की शवि उत्पन्न होत़ी है।द्रु पदो द्र ौपदेयाि सवमशः पृमथवीपते। सौभद्र ि िहाबाहुः शङ्खान् दध् िुः पृथक् पृथक्॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 18 सरल अथज द्रु पद, द्र ौपद़ी के पुत्र और िहाबल़ी अवभिन् यु ने भ़ी अपने-अपने शंख बजाए। यहाँ ग़ीता वदखात़ी है वक धिज के पक्ष िें युिा और अनुभि़ी दोनों खडे थे। अवभिन् यु साहस और बवलदान का प्र त़ीक थे।
19 स घोषो धातमराष् राणां हृ दयामन व् यदारयत्। नभि पृमथवीं चैव तुिुलोऽभ् यनुनादयन्॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 19 सरल अथज पांडिों के शंखों की ध् िवन ने धृतराष् र के पुत्रों के हृ दय को कंपा वदया और आकाश तथा पृथ् ि़ी िें गूँज उि़ी । अधिज चाहे बाहर से वकतना भ़ी शविशाल़ी वदखे , भ़ीतर कहीं न कहीं भय रहता है। सत्य की शवि केिल बाहऱी नहीं , िानवसक भ़ी होत़ी है। अथ व् यवमथथतान्दृष्ट् वा धातमराष् रान् कमपध् वजः। िवृत्ते शस्त्र सम् पाते धनुरुद्यम् य पाण् डवः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 20 सरल अथज जब अजुजन ने धृतराष् र के पुत्रों को युद्ध के वलए तैयार देखा, तब उन्होंने अपना धनुष उिाया।अजुजन िहान योद्ध ा थे और धिज की रक्ष ा के वलए तैयार थे। लेवकन आगे उनका िन िोह िें िँसने िाला था।हृ षीकेशं तदा वाक् यमिदिाह िहीपते। सेनयोरु भयोिमध् ये रथं थथापय िेऽच् युत॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 21 सरल अथज
20 अजुजन ने श्ऱी कृष् ण से कहा — हे अच् युत! िेरा रथ दोनों सेनाओं के ब़ी च िें ले चवलए।अजुजन युद्ध से पहले अपने विरोवधयों को देखना चाहते थे। िे अभ़ी तक पूणज आत्िविश्वास िें थे। यावदेतामन् नरीक्षे ऽहं योद्धु कािानवमथथतान्। कैिमया सह योद्धव् यिमथिन् रणसिुद्य िे॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 22 सरल अथज िैं देखना चाहता ह ँ वक इस युद्ध िें िुझे वकन-वकन लोगों से लडना होगा।यहाँ अजुजन का िन अभ़ी कतजव् य की ओर था, लेवकन श़ीघ्र ह़ी भािनाएँ उन पर हाि़ी होने िाल़ी थीं। योत् थयिानानवेक्षे ऽहं य एतेऽत्र सिागताः। धातमराष् रथय दुबुमद्धे युमद्धे मियमचकीषमवः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 23 सरल अथज िैं उन लोगों को देखना चाहता ह ँ जो दुयोधन को प्र सन् न करने के वलए युद्ध िें आए हैं। अजुजन जानते थे वक दुयोधन अधिज के िागज पर है।विर भ़ी युद्ध भूवि िें अपने संबंवधयों को देखकर उनका िन बदलने लगा। एविुिो हृ षीकेशो गुडाकेशेन भारत। सेनयोरु भयोिमध् ये थथापमयत् वा रथोत्त िि्॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 24 सरल अथज अजुजन के ऐसा कहने पर श्ऱी कृष् ण ने रथ को दोनों सेनाओं के ब़ीच खडा कर वदया। श्ऱी कृष् ण अजुजन को ज़ी िन का सबसे बडा सत् य वदखाने िाले थे। यह केिल रथ रोकना नहीं था , बवकक अजुजन के ज़ी िन का वनणाजयक क्ष ण था।
21 भीष् िद्र ोणििुखतः सवेषां च िहीमक्ष ताि्। उवाच पाथम पश् यैतान् सिवेतान् कुरू मनमत॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 25 सरल अथज श्ऱी कृष् ण ने रथ को भ़ीष् ि और द्र ोणाचायज के सािने खडा करके कहा — हे अजुजन! इन कौरिों को देखो। श्ऱी कृष् ण चाहते थे वक अजुजन ज़ी िन की िास् तविक पऱीक्ष ा को सिझें। तत्र ापश् यमत् थथतान् पाथमः मपतॄनथ मपतािहान्। आचायामन् िातुलान्भ्र ातॄन् पुत्र ान् पौत्र ान् सखीं थतथा॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 26 सरल अथज अजुजन ने िहाँ अपने वपतरों , वपतािहों , गुरु जनों , िािा, भाइयों , पुत्रों और वित्रों को देखा। यहीं से अजुजन का िोह आरम् भ हुआ। जब िनुष् य के सािने अपने संबंध और कतजव्य टकराते हैं , तब िन भ्र वित हो जाता है। श्व शुरान् सुहृ दिैव सेनयोरुभयोरमप। तान् सिीक्ष् य स कौन् तेयः सवामन् बन् धूनवमथथतान्॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 27 सरल अथज दोनों सेनाओं िें अपने ससुरों और वित्रों को देखकर अजुजन अत् यंत दुख़ी हो गए। अजुजन का हृ दय करु णा और िोह से भर गया। यहीं से ग़ी ता का सबसे िहत् िपूणज भाग प्र ारम्भ होता है — िनुष् य का आंतररक संघषज।
22 जब िन िोह और कतजव्य के ब़ीच िँसता है , तब उसे सह़ी िागजदशजन की आिश्यकता होत़ी है। इस़ी वलए आगे श्ऱी कृष् ण ग़ी ता का वदव् य ज्ञ ान देने िाले हैं।।—दृष्ट् वेिं थवजनं कृष् ण युयुत् सुं सिुपमथथति्। सीदमन्त िि गात्र ामण िुखं च पररशुष् यमत॥ अध्याय 1 श्ल ोक 28 सरल अथज हे कृष् ण! अपने ही स् वजनों को युद्ध के लिए खड़ा देखकर िेरे अंग वशवथल हो रहे हैं और िेरा िुख सूख रहा है। यह केिल अजुजन की किजोऱी नहीं थ़ी , बवकक यह हर िनुष् य की वस् थवत है। जब ज़ी िन िें कविन वनणजय लेने का सिय आता है, तब िनुष् य का िन डगिगा जाता है। कई बार सह़ी और गलत सिझ िें आने के बाद भ़ी िन िोह और भािनाओं िें उलझ जाता है। अजुजन भ़ी यह़ी सोचने लगे वक अपने ह़ी पररिार को िारकर विलने िाला राज् य वकस काि का होगा। उन् हें लगा वक युद्ध से केिल विनाश होगा सीदमन्त िि गात्र ामण िुखं च पररशुष् यमत। वेपथुि शरीरे िे रोिहषमि जायते॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 29 सरल अथज िेरे अंग वशवथल हो रहे हैं, िुख सूख रहा है, शऱीर काँप रहा है और रोंगटे खडे हो रहे हैं। जब अजुजन ने अपने ह़ी संबंवधयों , गुरु जनों और वित्रों को युद्ध भूवि िें खडा देखा, तब उनका हृ दय करुणा और िोह से भर गया।िे केिल एक योद्धा नहीं थे , बवकक संिेदनश़ी ल और धिजवप्र य व् यवि भ़ी थे।उनके भ़ी तर एक बडा िानवसक संघषज शुरू हो गया:एक ओर कतजव् य था दूसऱी ओर अपने वप्र यजनों के प्र वत प्रे ि इस़ी संघषज ने उनके शऱी र और िन दोनों को किजोर कर वदया।
23 आज भ़ी जब िनुष् य: वकस़ी कविन वनणजय के सािने खडा होता है ,पररिार और सत्य के ब़ीच िँस जाता है,या भविष्य के भय िें वघर जाता है ,तब उसका िन और शऱीर दोनों प्र भावित होने लगते हैं। ग़ीता यहाँ एक गहरा सत्य बतात़ी है — िन की अिस्था का प्र भाि शऱीर पर पडता है। वचंता, भय और िोह: िनुष् य की शवि कि कर देते हैं, वनणजय लेने की क्ष िता किजोर कर देते हैं ,और उसे भ़ीतर से अवस्थर बना देते हैं। अजुजन जैसे िहान योद्ध ा का भ़ी शऱी र काँपने लगा। यह वदखाता है वक िानवसक संघषज वकस़ी को भ़ी किजोर बना सकता है। लेवकन यह़ी िह क्ष ण था जहाँ से श्ऱी कृष् ण ज़ी िन का वदव् य ज्ञ ान देने िाले थे। गाण् डीवं स्रं सते हथतात्त् वक् चैव पररदह्य ते। न च शक् नोम् यवथथातुं भ्र ितीव च िे िनः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 30 सरल अथज िेरा गांड़ी ि धनुष हाथ से छूट रहा है, शऱीर जल रहा है , िैं खडा भ़ी नहीं रह पा रहा ह ँ और िेरा िन भ्र वित हो रहा है। अजुजन संसार के िहानति धनुधजरों िें से एक थे। वजन् हों ने अनेक युद्धों िें विजय प्र ाप्त की थ़ी , िह़ी अजुजन आज अपने ह़ी िन से हारते वदखाई दे रहे थे। यहाँ ग़ी ता िनुष् य के भ़ी तर चलने िाले िास् तविक युद्ध को वदखात़ी है। बाहऱी युद्ध से पहले िनुष् य को अपने भ़ीतर के भय , िोह और भ्र ि से लडना पडता है। अजुजन का “गाण्ड्ड़ीि ” केिल धनुष नहीं था, बवकक: उनके साहस, आत्िविश्वास और कतजव्य का प्र त़ीक था। जब उनका धनुष हाथ से छूटने लगा, तो इसका अथज था वक उनका आत्िबल किजोर हो रहा था।आज भ़ी:कई लोग कविन पररवस्थवत िें टूट जाते हैं,वजम्िेदाररयों से डरने लगते हैं ,और िानवसक तनाि के कारण वनणजय नहीं ले पाते। कारण िह़ी है — िन का भ्र ि।
24 ग़ीता वसखात़ी है वक: जब िन भय और िोह से भर जाता है, तब सबसे शविशाल़ी व् यवि भ़ी किजोर पड सकता है। इस़ीवलए िन को वस्थर रखना ज़ीिन की सबसे बड़ी आिश्यकता है। अजुजन अब पूऱी तरह भ्र वित हो चुके थे। िे सिझ नहीं पा रहे थे वक: धिज क् या है,कतजव्य क् या है ,और सह़ी िागज कौन -सा है। यहीं से श्ऱी कृष् ण का वदव् य उपदेश और भ़ी गहराई से प्र ारम्भ होता है। । न च श्रे योऽनुपश् यामि हत् वा थवजनिाहवे। न काङ्क्षे मवजयं कृष् ण न च राज् यं सुखामन च॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 31 सरल अथम हे कृष् ण! युद्ध िें अपने स् िजनों को िारकर िुझे कोई ककयाण वदखाई नहीं देता। िुझे न विजय चावहए, न राज् य और न सुख।यहाँ अजुजन पूऱी तरह िोह और करु णा से भर चुके थे। जब उन्होंने अपने ह़ी पररिार , गुरु जनों और वित्रों को युद्ध भूवि िें खडा देखा, तब उनका िन युद्ध से हटने लगा। अजुजन को लगने लगा वक: यवद अपने ह़ी लोग नहीं रहेंगे , तो राज् य और सुख का क् या अथज रह जाएगा? यह केिल अजुजन का दुख नहीं था, बवकक हर संिेदनश़ी ल िनुष् य की वस् थवत है।जब ज़ीिन िें कतजव्य और भािनाएँ टकरात़ी हैं , तब िन भ्र वित हो जाता है। आज भ़ी: कई लोग सह़ी वनणजय लेने से डरते हैं ,क् यों वक उन् हें संबंध टूटने का भय होता है,या अपने लोगों को दुख पहुँचाने का डर होता है। अजुजन का िन यह़ी सोचकर किजोर हो रहा था वक युद्ध के बाद उन् हें क् या विलेगा। लेवकन श्ऱी कृष् ण आगे उन् हें यह सिझाने िाले थे वक: केिल भािनाओं िें बह जाना ह़ी धिज नहीं होता,कई बार सत्य और न् याय की रक्षा के वलए किोर वनणजय लेने पडते हैं। यह श्ल ोक यह भ़ी वसखाता है वक धन,राज्य , और बाहऱी सुख तभ़ी अच् छे लगते हैं जब िन शांत हो। यवद िन दुख और अपराधबोध से भरा हो, तो संसार की सबसे बड़ी सिलता भ़ी
25 िनुष् य को सुख नहीं दे सकत़ी ।अजुजन का िोह अब और बढने िाला था, और इस़ी िोह को दूर करने के वलए श्ऱी कृष् ण ग़ी ता का वदव् य ज्ञ ान देने िाले थे। विर अजुजन ने कहा— न काङ्क्षे मवजयं कृष् ण न च राज् यं सुखामन च। मकं नो राज् येन गोमवन् द मकं भोगैजीमवतेन वा॥ —अध्याय 1 ,श्ल ोक 32 सरल अथज हे कृष् ण! िुझे न विजय चावहए, न राज् य और न सुख। जब अपने ह़ी लोग नहीं रहेंगे, तब ऐसे राज्य और ज़ीिन का क् या लाभ ? यहाँ अजुजन का िन करु णा से भरा था, लेवकन श्ऱी कृष् ण जानते थे वक यह करु णा धिज से हटकर िोह बन चुकी है। जब िनुष् य सत् य और कतजव् य छोडकर केिल भािनाओं िें बहने लगे, तब िह सह़ी वनणजय नहीं ले पाता। आज के सिय िें भ़ी ऐसा होता है। कई लोग गलत बात को केिल इसवलए सह लेते हैं क् योंवक सािने अपना व् यवि होता है। कई लोग सत्य बोलने से डरते हैं क् यों वक उन् हें संबंध टूटने का भय होता है। कई बार िनुष् य अपने कतजव्य से प़ीछे हट जाता है क् योंवक उसका िन किजोर हो जाता है। यह़ी अजुजन के साथ भ़ी हुआ था। अजुजन आगे कहते हैं— यहीं से ग़ीता का वदव्य उपदेश आरम्भ होता है , वजसने हजारों िषों से करोडों लोगों को ज़ी िन ज़ीने की सह़ी वदशा द़ी है। अजुजन का हृ दय अब पूऱी तरह करु णा से भर चुका था। उन् हें लगने लगा वक यवद अपने ह़ी लोग युद्ध िें नष्ट हो जाएँगे, तो राज्य और सुख का कोई अथज नहीं रहेगा। यह श्ल ोक वदखाता है वक िनुष् य केिल धन और सिलता से सुख़ी नहीं होता,उसके ज़ीिन िें संबंध और अपनापन भ़ी आिश्यक हैं।
26 आचायामः मपतरः पुत्र ाथतथैव च मपतािहाः। िातुलाः श्व शुराः पौत्र ाः श् यालाः सम् बमन् धनथतथा॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 33 सरल अथम गुरु जन, वपता, पुत्र , वपतािह, िािा, ससुर, पौत्र , साले और अन् य संबंध़ी सब यहाँ उपवस् थत हैं।अजुजन युद्ध भूवि िें केिल शत्रु नहीं देख रहे थे, बवकक अपना पररिार देख रहे थे। जब िनुष् य के सािने अपने लोग खडे होते हैं, तब वनणजय लेना कविन हो जाता है। एतान् न हन् तुमिच् छामि घ् नतोऽमप िधुसूदन। अमप त्रै लोक् यराज् यथय हेतोः मकं नु िहीकृते॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 34 सरल अथज हे कृष् ण! िैं इन्हें िारना नहीं चाहता , चाहे िुझे त़ी नों लोकों का राज् य ह़ी क् यों न विल जाए। अजुजन का िोह अब इतना बढ गया था वक िे धिज और कतजव् य से प़ी छे हटने लगे। यहाँ ग़ीता वदखात़ी है वक अत् यवधक िोह िनुष् य की बुवद्ध को भ्र वित कर देता है। मनहत्य धातमराष्रान्नः का िीमतः थयाज्जनादमन। पापिेवाश्रयेदथिान्हत्वैतानाततामयनः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 35 सरल अथज हे जनादजन! धृतराष् र के पुत्रों को िारकर हिें क् या प्र सन् नता विलेग़ी ? इन्हें िारने से हिें पाप ह़ी लगेगा। अजुजन धिज और पाप के विषय िें भ्र वित हो चुके थे। िे यह नहीं सिझ पा रहे थे वक धिज की रक्ष ा के वलए युद्ध आिश् यक है।
27 तथिान् नाहाम वयं हन् तुं धातमराष् रान् थवबान् धवान्। थवजनं मह कथं हत् वा सुमखनः थयाि िाधव॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 36 सरल अथम इसवलए हिें अपने बंधु-बांधिों को नहीं िारना चावहए। अपने ह़ी लोगों को िारकर हि सुख़ी कैसे रहेंगे? अजुजन केिल ितजिान दुख देख रहे थे, लेवकन श्ऱी कृष् ण आगे उन्हें धिज का व् यापक सत्य सिझाने िाले थे। यद्यप्येते न पश्यमन्त लोभोपहतचेतसः। कुलक्ष यकृतं दोषं मित्रद्र ोहे च पातकि्॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 37 सरल अथज यद्य वप लोभ से अंधे हुए ये लोग कुल के नाश और वित्रों से विश्व ासघात के पाप को नहीं सिझते। अजुजन जानते थे वक लोभ िनुष् य की बुवद्ध को नष्ट कर देता है। आज भ़ी धन का लालच,सत्ता की इच्छा ,और अहंकार िनुष् य को सह़ी और गलत का अंतर भुला देते हैं। कथं न ज्ञे यिथिामभः पापादथिामन् नवमतमतुि्। कुलक्ष यकृतं दोषं िपश् यमद्भ जमनादमन॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 38 सरल अथज हे जनादजन! जब हि कुल के नाश का दोष जानते हैं, तो हिें इस पाप से क् यों नहीं बचना चावहए? अजुजन का िन बार-बार करुणा की ओर जा रहा था। लेवकन िे अभ़ी धिज और िोह के अंतर को पूऱी तरह नहीं सिझ पा रहे थे।
28 कुलक्ष ये िणश् यमन् त कुलधिामः सनातनाः। धिे नष्टे कुलं कृत् थनिधिोऽमभभवत् युत॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 39 सरल अथज कुल के नाश से सनातन कुलधिज नष्ट हो जाते हैं और धिज के नष्ट होने पर अधिज बढ जाता है। यह श्ल ोक सिाज और पररिार के िहत्ि को बताता है ।जब पररिारों िें धिज, संस् कार और ियाजदा सिाप्त होने लगत़ी है, तब सिाज िें अशांवत बढत़ी है। अधिाममभभवात् कृष् ण िदुष् यमन् त कुलमस्त्र यः। स्त्र ीषु दुष्ट ासु वाष् णेय जायते वणमसङ्करः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 40 सरल अथज हे कृष् ण! अधिज बढने पर कुल की वियाँ दूवषत हो जात़ी हैं और सिाज िें अव्यिस्था उत्पन्न होत़ी है। यहाँ अजुजन सिाज के पतन की वचंता व् यि कर रहे हैं। ग़ी ता पररिार और संस् कारों को सिाज की नीं ि िानत़ी है। सङ्करो नरकायैव कुलघ् नानां कुलथय च। पतमन् त मपतरो ह्ये षां लुप्त मपण् डोदकमक्र याः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 41 सरल अथज ऐस़ी अव् यिस् था कुल का नाश करने िालों और उनके पररिारों को पतन की ओर ले जात़ी है। अजुजन को भय था वक युद्ध सिाज और परंपराओं को नष्ट कर देगा। दोषैरेतैः कुलघ् नानां वणमसङ्करकारकैः। उत् साद्यन् ते जामतधिामः कुलधिामि शाश्व ताः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 42
29 सरल अथज इन दोषों से कुलधिज और सिाज के शाश्व त वनयि नष्ट हो जाते हैं। जब सिाज से धिज और नैवतकता हटने लगत़ी है , तब अराजकता बढत़ी है। उत् सन् नकुलधिामणां िनुष् याणां जनादमन। नरके मनयतं वासो भवतीत् यनुशुश्रु ि॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 43 सरल अथज हे जनादजन! वजन लोगों के कुलधिज नष्ट हो जाते हैं, उनके पतन की बात हिने सुऩी है। अजुजन धिज और सिाज के भविष् य को लेकर वचंवतत थे। अहो बत िहत् पापं कतुं व् यवमसता वयि्। यद्र ाज् यसुखलोभेन हन् तुं थवजनिुद्य ताः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 44 सरल अथज हाय! हि वकतना बडा पाप करने जा रहे हैं वक राज् य और सुख के लोभ िें अपने ह़ी लोगों को िारने के वलए तैयार हो गए हैं। अजुजन अब स् ियं को दोष देने लगे थे। उनका िन पूऱी तरह दुख और भ्र ि से भर चुका था। यमद िािितीकारिशस्त्रं शस्त्र पाणयः। धातमराष् रा रणे हन् युथतन् िे क्षे ितरं भवेत्॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 45 सरल अथज यवद शिधाऱी कौरि िुझे वबना प्र वतकार वकए िार दें, तो िह़ी िेरे वलए अवधक ककयाणकाऱी होगा। अजुजन अब युद्ध से पूऱी तरह हटना चाहते थे। उनका आत्िबल किजोर हो चुका था।
30 सञ्जय उिाच। एविुक्त् वाजुमनः सङ्् ये रथोपथथ उपामवशत्। मवसृज् य सशरं चापं शोकसंमवग् निानसः॥ — अध्याय 1 , श्ल ोक 46 सरल अथज संजय ने कहा — ऐसा कहकर अजुजन शोक से व् याकुल होकर अपना धनुष-बाण छोडकर रथ िें बैि गए। यहीं अध्याय 1 सिाप्त होता है। अजुजन:िानवसक रू प से टूट चुके थे,कतजव् य भूल चुके थे,और िोह िें डूब गए थे। लेवकन यह़ी िह क्ष ण था जहाँ से ग़ीता का वदव्य ज्ञ ान प्र ारम्भ होने िाला था। िनुष् य
31 भ़ी ज़ी िन िें कई बार ऐस़ी वस् थवत िें पहुँचता है जहाँ:उसे कोई िागज वदखाई नहीं देता,िन भ्र वित हो जाता है ,और आत्िबल किजोर पड जाता है। ऐसे सिय िें सह़ी ज्ञ ान ह़ी िनुष् य को उिाता है। इस़ीवलए आगे ----श्ऱी कृष् ण अध् याय 2 िें आत् िा, धिज और किज का िहान उपदेश देने िाले हैं। ! िथि अध्याय से मिलने वाली िेरणादायी मशक्षा ! 1. कमिन सिय िें िनुष् य भी किजोर पड सकता है अजुमन जैसे िहान योद्ध ा भी अपने कतमव् य के सिय िोह और दुख से भर गए। इससे सीख मिलती है मक जीवन िें कमिन पररमथथमतयों िें घबराना थवाभामवक है। 2. भावनाओं िें बहकर मनणमय नहीं लेना चामहए अजुमन अपने संबंमधयों को देखकर मवचमलत हो गए और युद्ध छोडने का मवचार करने लगे। यह मसखाता है मक भावुक होकर मलए गए मनणमय अक्सर गलत हो सकते हैं। 3. सिथया को थवीकार करना किजोरी नहीं है अजुमन ने अपनी उलझन और किजोरी को मछपाया नहीं। जीवन िें अपनी सिथया को थवीकार करना ही सिाधान की पहली सीढ़ी है। 4. सही िागमदशमन आवश्यक है जब िन भ्र मित हो जाए , तब मकसी ज्ञ ानी और अनुभवी व् यमि का िागमदशमन लेना चामहए। अजुमन ने भगवान श्र ीकृष् ण की शरण ली।
32 5. कतमव् य सबसे िहत् वपूणम है जीवन िें कई बार ऐसे कायम करने पडते हैं जो कमिन होते हैं, लेमकन यमद वे धिम और कतमव्य के अनुरू प हों तो उनसे पीछे नहीं हटना चामहए। 6. िोह और आसमि दुःख का कारण बनते हैं अजुमन का दुःख अपने मियजनों के िमत अत्यमधक िोह के कारण था। गीता मसखाती है मक अत्यमधक आसमि िन को किजोर बना देती है। िथि अध् याय का िु् य संदेश जब िनुष् य िोह, भय और भ्र ि िें फाँस जाता है , तब उसका मववेक किजोर पड जाता है। ऐसे सिय िें धैयम, सही ज्ञ ान और उमचत िागमदशमन ही उसे सही िागम पर ला सकते हैं। यही कारण है मक िथि अध् याय को "अजुमन मवषाद योग" कहा गया है—क् यों मक अजुमन का मवषाद (दुःख और भ्र ि) ही आगे चलकर उन्हें मदव्य ज्ञ ा न िाप्त कराने का कारण बनता
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34 अध्याय 2 आत्िा अिर है — िृत् यु का िास् तविक सत् य जब अजुजन युद्ध भूवि िें दुख और िोह से भर गए, तब उन्होंने अपने हवथयार ऩीचे रख वदए। उनका िन भ्र वित हो चुका था। उन् हें लगने लगा वक अपने ह़ी संबंवधयों को िारना बहुत बडा पाप होगा। िे दुख, भय और करु णा िें डूब गए। तब कृष् ण ने अजुजन को ज़ी िन का सबसे बडा सत् य सिझाना शुरू वकया आत्िा कभ़ी नहीं िरत़ी तं तथा कृपयाऽमवष्ट िश्रु पूणामकुलेक्ष णि्। मवषीदन् तमिदं वाक् यिुवाच िधुसूदनः॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 1 सरल अथज करु णा और शोक से भरे हुए, आँसुओं से पूणज और व् याकुल अजुजन से श्ऱी कृष् ण ने ये िचन कहे। अजुजन अब पूऱी तरह िोह और दुख िें डूब चुके थे। उनका िन कतजव्य और संबंधों के ब़ी च िँस गया था। िे केिल युद्ध से नहीं डर रहे थे, बवकक अपने ह़ी लोगों को खोने की ककपना से टूट गए थे। यहाँ ग़ी ता िनुष् य की िानवसक वस् थवत का बहुत गहरा वचत्र वदखात़ी है। जब िनुष् य अत्यवधक िोह ,भय,और भािनाओं िें डूब जाता है,तब उसकी बुवद्ध सह़ी वनणजय लेने की क्ष िता खोने लगत़ी है। श्ऱी कृष् ण अब अजुजन के भ्र ि को दूर करने िाले थेश्ऱी भगिानुिाच। कुतथत् वा कश् िलमिदं मवषिे सिुपमथथति्। अनायमजुष्ट िथवग् यमिकीमतमकरिजुमन॥ —
35 अध्याय 2 , श्ल ोक 2 सरल अथज श्ऱी कृष् ण बोले — हे अजुजन! इस कविन सिय िें तुम् हें यह िोह और दुबजलता कहाँ से प्र ाप्त हुई? यह श्रेष्ठ पुरु षों के योग् य नहीं है और इससे न स् िगज विलेगा न कीवतज।श्ऱी कृष् ण अजुजन को डाँट नहीं रहे थे, बवकक उन्हें उनकी िास्तविक शवि याद वदला रहे थे। कई बार िनुष् य पररवस् थवतयों से नहीं , बवकक अपने िन की किजोऱी से हारता है। ग़ीता वसखात़ी है: कविन सिय िें धैयज नहीं खोना चावहएऔर भािनाओं िें बहकर कतजव् य नहीं छोडना चावहए आज भ़ी लोग छोट़ी असिलताओं िें टूट जाते हैं क् योंवक उनका िन िजबूत नहीं रह पाता।क् लैब् यं िा थि गिः पाथम नैतत्त् वय् युपपद्य ते। क्षुद्रं हृ दयदौबमकयं त् यक्त् वोमत्त ि परन् तप॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 3 सरल अथज हे अजुजन! कायरता को ित अपनाओ। यह तुम् हारे योग् य नहीं है। हृ दय की इस दुबजलता को त् यागकर उिो। यह श्ल ोक ग़ी ता का साहस जगाने िाला संदेश है। श्ऱी कृष् ण अजुजन को बता रहे थे वक: संिेदनश़ी ल होना गलत नहीं , लेवकन कतजव्य छोड देना उवचत नहीं।आज कई लोग:भय ,असिलता,आलोचना, या भविष्य की वचंता के कारणअपने कतजव् य से प़ी छे हट जाते हैं। ग़ीता कहत़ी है: सच्चा साहस भय का अभाि नहीं , बवकक भय के बािजूद सह़ी कायज करना है। अजुजन उिाच।
36 कथं भीष् ििहं सङ्् ये द्र ोणं च िधुसूदन। इषुमभः िमतयोत् थयामि पूजाहामवररसूदन॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 4 सरल अथज अजुजन बोले — हे कृष् ण! िैं युद्ध िें भ़ीष् ि और द्र ोणाचायज जैसे पूजऩी य व् यवियों पर बाण कैसे चला सकता ह ँ?अजुजन के िन िें गुरु और बडों के प्र वत सम् िान था। िे धिजवप्रय थे , इसवलए अपने गुरु जनों के विरुद्ध युद्ध करना उन् हें असहऩी य लग रह था। यहाँ ग़ीता वदखात़ी है वक: अच् छे िनुष् य के भ़ी तर दया होत़ी है,लेवकन केिल दया ह़ी पयाजप्त नहीं ,धिज और न् याय भ़ी आिश्यक हैं। गुरू नहत् िा वह िहानुभािान्श्रे यो भोिुं भैक्ष् यिप़ी ह लोके। हत् वाथमकािांथतु गुरू मनहैव भुञ् जीय भोगान्रु मधरिमदग् धान्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 5 सरल अथज इन िहान गुरु जनों को िारने से अच् छा तो िैं इस संसार िें वभक्ष ा िांगकर ज़ी िन वबताऊँ। क् यों वक इन् हें िारकर प्र ाप्त सुख और धन रि से सने हों गे। अजुजन का हृ दय करु णा से भरा था।उन् हें लग रहा था वक अपने ह़ी लोगों को िारकर विलने िाला सुख पापपूणज होगा।आज भ़ी :कई लोग धन तो प्र ाप्त कर लेते हैं,लेवकन भ़ी तर शांवत नहीं होत़ी । ग़ीता वसखात़ी है वक: केिल सिलता ह़ी पयाजप्त नहीं सिलता धिजपूणज भ़ी होऩी चावहए। न चैतमद्वद्म ः कतरन् नो गरीयोयद्व ा जयेि यमद वा नो जयेयुः। यानेव हत् वा न मजजीमवषािःतेऽवमथथताः ििुखे धातमराष् राः॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 6 सरल अथज
37 हि नहीं जानते वक हिारे वलए क् या अच्छा है — हि ज़ीतें या िे ज़ी तें। वजनको िारकर हि ज़ीना नहीं चाहते , िे ह़ी सािने खडे हैं। अजुजन का िन पूऱी तरह भ्र वित हो चुका था। जब िन िोह और दुख से भर जाता है, तब सह़ी और गलत का वनणजय कविन हो जाता है। आज भ़ी:अत्यवधक तनाि ,भय,और भािनात्िक दबाििनुष् य की वनणजय शवि को किजोर कर देते हैं। कापमण्यदोषोपहतथवभावः पृच् छामि त् वां धिमसम् िूढचेताः। यच् रेयः थयामन् नमितं ब्रू मह तन् िे मशष् यथतेऽहं शामध िां त् वां िपन् नि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 7 सरल अथज िेरा स् िभाि दुबजलता से दब गया है और िेरा िन धिज के विषय िें भ्र वित हो गया है। इसवलए िैं आपसे पूछता ह ँ वक िेरे वलए क् या उवचत है। िैं आपका वशष् य ह ँ, िुझे वशक्ष ा द़ी वजए। -यहीं से ग़ी ता का िास् तविक उपदेश शुरू होता है। जब तक अजुजन अपने ज्ञ ान और अहंकार िें थे, तब तक िे सिाधान नहीं पा सके।लेवकन जब उन् हों ने स् ियं को वशष् य िान वलया, तभ़ी ज्ञ ान का िागज खुला। ग़ीता वसखात़ी है: सच्चा ज्ञ ान विनम्रता से विलता है अहंकार ज्ञ ान का सबसे बडा बाधक है न मह िपश् यामि ििापनुद्य ाद्यच् छोकिुच् छोषणमिमन्द्र याणाि्। अवाप् य भूिावसपत् निृद्धं राज् यं सुराणािमप चामधपत् यि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 8 सरल अथज
38 िुझे ऐसा कोई उपाय वदखाई नहीं देता जो िेरे इंवद्र यों को सुखा देने िाले इस शोक को दूर कर सके, चाहे िुझे पृथ् ि़ी का सिृद्ध राज् य या देिताओं का राज् य ह़ी क् यों न विल जाए। यहाँ अजुजन ज़ी िन का एक बडा सत् य बता रहे हैं: बाहऱी सुख िन की शांवत नहीं दे सकते। यवद िन दुख़ी हो, तो:धन,पद,और शविभ़ी िनुष् य को शांवत नहीं दे पाते। सञ्जय उिाच। एविुक्त् वा हृ षीकेशं गुडाकेशः परन् तप। न योत् थय इमत गोमवन् दिुक्त् वा तूष् णीं बभूव ह॥ — अध्याय 2 , श्ल ो क 9 सरल अथज संजय ने कहा — ऐसा कहकर अजुजन ने श्ऱी कृष् ण से कहा, “िैं युद्ध नहीं करूँ गा,” और िे िौन हो गए।अजुजन अब पूऱी तरह टूट चुके थे।उन् हों ने अपने हवथयार रख वदए और युद्ध से हटने का वनश्च य कर वलया।यह िनुष् य की उस अिस् था को दशाजता है जब:िह पररवस्थवतयों से हार िान लेता है,और उसे कोई िागज वदखाई नहीं देता। तिुवाच हृ षीकेशः िहसमन् नव भारत। सेनयोरु भयोिमध् ये मवषीदन् तमिदं वचः॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 10 सरल अथज हे भरतिंश़ी ! दोनों सेनाओं के ब़ी च शोकग्रस् त अजुजन से श्ऱी कृष् ण िुस् कुराते हुए बोले। श्ऱी कृष् ण िुस् कुरा रहे थे क् यों वक िे सत् य को जानते थे। िे जानते थे वक अजुजन का दुख अज्ञ ान और िोह से उत् पन् न हुआ है। अब िे अजुजन को:आत् िा,धिज,किज, और ज़ीिन का वदव्य ज्ञ ान देने िाले थे। यहीं से ग़ीता का िहान उपदेश प्र ारम्भ होता है। । श्ऱी कृष् ण ने कहा—
39 अशोच् यानन् वशोचथत् वं िज्ञ ावादांि भाषसे। गतासूनगतासूंि नानुशोचमन् त पमण् डताः॥ — अध्याय 2, श्ल ोक 11 सरल अथज तुि वजनके वलए शोक कर रहे हो, उनके वलए शोक करना उवचत नहीं है। ज्ञ ाऩी िनुष् य न ज़ी वित के वलए अवधक दुख करता है और न िृतकों के वलए। श्ऱी कृष् ण अजुजन को सिझाते हैं वक िनुष् य केिल शऱी र को देखकर संबंध बनाता है, लेवकन िास्तविक सत्य आत्िा है। शऱीर नश्वर है , जबवक आत्िा शाश्वत है। आज भ़ी अवधकांश लोग िृत् यु से इसवलए डरते हैं क् यों वक िे शऱी र को ह़ी सबकुछ िान लेते हैं। लेवकन ग़ी ता कहत़ी है वक िृत् यु केिल शऱी र का पररितजन है, आत् िा का अंत नहीं। विर श्ऱी कृष् ण कहते हैं— देमहनोऽमथिन् यथा देहे कौिारं यौवनं जरा। तथा देहान् तरिामप्त धीरथतत्र न िुह्य मत॥ — अध्याय 2, श्ल ोक 13 सरल अथज वजस प्र कार इस शऱीर िें बचपन , युिािस् था और बुढापा आता है, उस़ी प्र कार िृत् यु के बाद आत् िा दूसरे शऱी र को प्र ाप्त करत़ी है। ज्ञ ाऩी िनुष् य इससे भ्र वित नहीं होता। यह श्ल ोक ग़ी ता के सबसे गहरे और िहत् िपूणज श्ल ोकों िें से एक है। श्ऱी कृष् ण अजुजन को सिझा रहे थे वक िनुष् य केिल शऱी र नहीं है। शऱी र बदलता रहता है, लेवकन आत् िा सदा एक सिान रहत़ी है।िनुष् य अपने ज़ीिन िें कई अिस् थाओं से गुजरता है:पहले िह बालक होता हैविर युिा बनता हैविर िृद्ध हो जाता हैइन सभ़ी अिस् थाओं िें शऱी र बदलता रहता है, लेवकन भ़ीतर का “िैं” िह़ी रहता है।ि़ी क उस़ी प्र कार िृत् यु भ़ी केिल एक पररितजन है, अंत नहीं ।आज
40 अवधकांश लोग िृत् यु को सबकुछ सिाप्त हो जाना िानते हैं। इस़ी कारण िनुष् य:भय िें ज़ी ता हैअपने वप्र यजनों के वबछडने पर टूट जाता हैऔर संसार की िस् तुओं से अत्यवधक िोह करने लगता हैलेवकन ग़ीता कहत़ी है वक आत्िा कभ़ी सिाप्त नहीं होत़ी। जैसे िनुष् य पुराने कपडे बदलकर नए कपडे पहनता है, िैसे ह़ी आत्िा पुराने शऱीर को छोडकर नया शऱीर धारण करत़ी है। इस सत् य को सिझने िाला िनुष् य: िृत् यु से कि डरता है ज़ीिन को सह़ी दृ वष्ट से देखता है और िोह िें कि िँसता है विर श्ऱी कृष् ण अजुजन को धैयज का िहत् ि सिझाते हैं— िात्र ाथपशामथतु कौन् तेय शीतोष् णसुखदुःखदाः। आगिापामयनोऽमनत् याथतांमथतमतक्ष थव भारत॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 14 सरल अथज हे अजुजन! सदी-गिी, सुख-दुख आवद इंवद्र यों के विषय हैं। ये आते-जाते रहते हैं, इसवलए इन् हें धैयजपूिजक सहन करना चावहए। यह संसार पररितजनश़ी ल है।यहाँ सुख भ़ी स् थाय़ी नहीं है और दुख भ़ी स् थाय़ी नहीं है।लेवकन िनुष् य की सबसे बड़ी सिस् या यह है वक:सुख विलने पर िह अत् यवधक आसि हो जाता हैऔर दुख आने पर पूऱी तरह टूट जाता हैआज लोग छोट़ी -छोट़ी सिस् याओं से भ़ी परेशान हो जाते हैं। थोड़ी असिलता , आलोचना या हावन उन्हें िानवसक रू प से किजोर बना देत़ी है। ग़ीता वस खात़ी है वक: सिय हिेशा बदलता रहता है इसवलए िनुष् य को धैयज रखना चावहए वजस प्र कार वदन और रात स् थाय़ी नहीं होते , उस़ी प्र कार सुख और दुख भ़ी स् थाय़ी नहीं हैं। विर श्ऱी कृष् ण कहते हैं— यं मह न व् यथयन्त् येते पुरु षं पुरु षषमभ। सिदुःखसुखं धीरं सोऽिृतत् वाय ककपते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 15
41 सरल अथज हे श्रेष्ठ पुरु ष! जो व् यवि सुख और दुख िें सिान रहता है और विचवलत नहीं होता , िह़ी अिृतत् ि को प्र ाप्त होने योग् य बनता है।सच् चा िजबूत व् यवि िह नहीं जो केिल बाहऱी शवि रखता हो। िास्तविक शवि िन की वस्थरता िें होत़ी है। आज िनुष् य बाहर से सिल वदखाई देता है, लेवकन भ़ीतर से किजोर होता जा रहा है। कारण यह है वक उसका िन पररवस्थवतयों पर वनभजर हो गया है। ग़ीता कहत़ी है: जो व् यवि हर पररवस् थवत िें संतुवलत रहता है िह़ी ज़ी िन िें शांवत प्र ाप्त करता है विर श्ऱी कृष् ण संसार के सत् य और असत् य का अंतर बताते हैं— नासतो मवद्यते भावो नाभावो मवद्यते सतः। उभयोरमप दृष्ट ोऽन्तथत्वनयोथतत्त्वदमशममभः॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 16 सरल अथज असत्य का कभ़ी स् थाय़ी अवस्तत्ि नहीं होता और सत्य का कभ़ी अभाि नहीं होता। तत् िदशी ज्ञ ाऩी इस सत् य को जानते हैं।इस संसार िें जो च़ीजें बदलत़ी रहत़ी हैं, िे स् थाय़ी नहीं हैं।धन , शऱीर , सुंदरता और पद सिय के साथ बदल जाते हैं। लेवकन आत् िा और सत् य सदा वस् थर रहते हैं।आज िनुष् य अस् थाय़ी िस् तुओं को ह़ी ज़ी िन का आधार बना लेता है।इस़ी कारण जब िे च़ी जें उससे दूर होत़ी हैं, तब िह दुख़ी हो जाता है। ग़ीता वसखात़ी है वक: अस्थाय़ी च़ीजों िें अत्यवधक िोह नहीं करना चावहए और सत्य को पहचानने का प्र यास करना चावहए विर श्ऱी कृष् ण आत् िा की शवि बताते हैं— अमवनामश तु तमद्व मद्ध येन सवममिदं तति्।
42 मवनाशिव् ययथयाथय न कमित् कतुमिहममत॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 17 सरल अथज वजससे यह सम् पूणज संसार व् याप्त है, उसे अविनाश़ी जानो। उस अविनाश़ी आत्िा का विनाश कोई नहीं कर सकता।आत् िा ईश्व र का अंश िाऩी गई है।इसे कोई शि अवग् न या सिय नष्ट नहीं कर सकता।यह़ी कारण है वक ग़ी ता िनुष् य को केिल शऱी र तक स़ीवित रहने की वशक्षा नहीं देत़ी , बवकक आत्िा को पहचानने का िागज वदखात़ी है। विर श्ऱी कृष् ण कहते हैं— अन्तवन्त इिे देहा मनत्यथयोिाः शरीररणः। अनामशनोऽििेयथय तथिाद्युध् यथव भारत॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 18 सरल अथज यह शऱीर नाशिान है , लेवकन इसिें रहने िाल़ी आत्िा अविनाश़ी और अस़ीि है। इसवलए अपने कतजव्य से प़ीछे ित हटो। यहाँ श्ऱी कृष् ण अजुजन को सिझाते हैं वक केिल शऱी र के िोह िें पडकर धिज छोडना उवचत नहीं है अध्याय 2 , श्ल ोक 19 य एनं वेमत्त हन् तारं यिैनं िन् यते हति्। उभौ तौ न मवजानीतो नायं हमन् त न हन् यते॥ सरल अथज
43 जो आत्िा को िारने िाला या िरा हुआ सिझता है, िह सत्य को नहीं जानता। आत् िा न वकस़ी को िारत़ी है और न िाऱी जात़ी है।आत् िा जन् ि और िृत् यु से परे है।िह केिल शऱीर बदलत़ी है। इसके बाद श्ऱी कृष् ण आत् िा की सनातन प्र कृवत बताते हैं— न जायते मम्रयते वा कदामच -न् नायं भूत् वा भमवता वा न भूयः। अजो मनत् यः शाश्व तोऽयं पुराणोन हन् यते हन् यिाने शरीरे॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 20 सरल अथज आत्िा न कभ़ी जन्ि लेत़ी है और न कभ़ी िरत़ी है। िह अजन्िा , वनत्य और सनातन है। शऱीर के नष्ट होने पर भ़ी उसका विनाश नहीं होता।यह़ी ग़ीता का सबसे बडा आध्यावत्िक सत्य है। विर िे कहते हैं— य एनं िेवत्त हन् तारं यश्चै नं िन् यते हति्। वेदामवनामशनं मनत् यं य एनिजिव् ययि्। कथं स पुरु षः पाथम कं घातयमत हमन् त कि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 21 सरल अथज हे अजुजन! जो िनुष् य आत् िा को अविनाश़ी , वनत्य , अजन्िा और अव्यय जानता है , िह कैसे वकस़ी को िार सकता है या वकस़ी को िरिा सकता है ? यहाँ श्ऱी कृष् ण अजुजन को आत् िा के अंवति और गहरे सत् य को सिझा रहे हैं।श्ऱी कृष् ण कहते हैं वक जो व् यवि आत् िा के िास् तविक स् िरू प को जान लेता है, िह सिझ जाता है वक िृत् यु केिल शऱी र की होत़ी है, आत्िा की नहीं।
44 अजुजन अपने संबंवधयों के शऱी र को देखकर दुख़ी हो रहे थे।उन् हें लग रहा था वक युद्ध िें सब सिाप्त हो जाएगा। लेवकन श्ऱी कृष् ण उन् हें बता रहे थे वक आत् िा न जन् ि लेत़ी है और न िरत़ी है। इस श्ल ोक का अथज यह नहीं है वक वहंसा उवचत है। ग़ी ता अन् याय और अधिज के वलए वहंसा का सिथजन नहीं करत़ी। यहाँ श्ऱी कृष् ण धिज की रक्षा के वलए वकए जाने िाले कतजव्य की बात कर रहे हैं। िहाभारत का युद्ध : लोभ के वलए नहीं था स् िाथज के वलए नहीं था बवकक धिज की रक्षा के वलए था आज भ़ी िनुष् य कई बार सह़ी कायज करने से डरता है क् यों वक: उसे लोगों की नाराज़ग़ी का भय होता है संबंध टूटने का डर होता है या पररणाि की वचंता होत़ी है लेवकन ग़ीता वसखात़ी है वक: यवद कायज धिज और सत्य के वलए हो यवद उसिें स् िाथज न हो तो कतजव्य से प़ीछे नहीं हटना चावहए यह श्ल ोक िनुष् य को एक और बड़ी वशक्ष ा देता है — सच्चा ज्ञ ाऩी केिल शऱीर को नहीं देखता, बवकक आत्िा को सिझने का प्र यास करता है। आज का संसार बाहऱी रू प, धन और शऱी र को ह़ी सबकुछ िानता है। इस़ी कारण िनुष् य: िृत् यु से डरता है बुढापे से दुख़ी होता है और िोह िें िँसा रहता है लेवकन जो आत्िा के सत्य को सिझ लेता है , उसका दृ वष्टकोण बदलने लगता है। िह सिझ जाता है वक:शऱीर अस्थाय़ी है आत्िा शाश्वत है और ज़ीिन का उद्देश्य केिल भोग नहीं , बवकक सत्य को पहचानना है ध़ीरे -ध़ी रे अजुजन के भ़ी तर का भय कि होने लगा। अब िे श्ऱी कृष् ण के ज्ञ ान को केिल शब् दों की तरह नहीं , बवकक ज़ीिन के सत्य की तरह सिझने लगे थे। श्ऱी कृष्ण आगे कहते हैं — वासांमस जीणाममन यथा मवहाय नवामन गृह्ण ामत नरोऽपरामण। तथा शरीरामण मवहाय जीणाम न् यन् यामन संयामत नवामन देही॥ — अध्याय 2, श्ल ोक 22
45 सरल अथज िनुष् य जैसे पुराने िि छोडकर नए िि धारण करता है, िैसे ह़ी आत् िा पुराने शऱी र को छोडकर नया शऱीर धारण करत़ी है। यहाँ श्ऱी कृष् ण िृत् यु का भय सिाप्त करने का प्र यास कर रहे थे। िनुष् य का सबसे बडा डर िृत् यु ह़ी होता है। इस़ी डर के कारण िह वचंता, लोभ और असुरक्ष ा िें ज़ी ता है। आज के सिय िें भ़ी लोग: अपने शऱी र और धन को ह़ी सबकुछ िान लेते हैं िृत् यु का नाि सुनकर भयभ़ीत हो जाते हैं अपने वप्र यजनों के वबछडने पर पूऱी तरह टूट जाते हैं लेवकन ग़ीता वसखात़ी है वक आत्िा कभ़ी सिाप्त नहीं होत़ी। विर श्ऱी कृष् ण आत् िा की शवि बताते हैं— नैनं मछन् दमन् त शस्त्र ामण नैनं दहमत पावकः। न चैनं क् लेदयन्त् यापो न शोषयमत िारुतः॥ — अध्याय 2, श्ल ोक 23 सरल अथज आत्िा को न शि काट सकते हैं , न अवग्न जला सकत़ी है , न जल वभगो सकता है और न िायु सुखा सकत़ी है। इस संसार की हर िस् तु नष्ट होत़ी है, लेवकन आत्िा कभ़ी नष्ट नहीं होत़ी । यह़ी कारण है वक ग़ी ता िनुष् य को केिल शऱी र तक स़ी वित रहने की वशक्षा नहीं देत़ी , बवकक आत्िा को पहचानने का िागज वदखात़ी है।आज का िनुष् य बाहऱी सुखों िें इतना उलझ गया है वक िह अपने िास् तविक स् िरू प को भूल चुका है। िह धन, पद और शऱीर को ह़ी ज़ीिन िान बैिा है। लेवकन जब कविन सिय आता है, तब उसे भ़ी तर खाल़ी पन िहसूस होने लगता है।
46 ग़ी ता कहत़ी है वक जो िनुष् य आत् िा के सत् य को सिझ लेता है, िह िृत् यु से अवधक नहीं डरताकविन पररवस्थवतयों िें भ़ी वस्थर रहता है लोभ और अहंकार से दूर रहता है और ज़ीिन को सह़ी दृ वष्ट से देखता है श्ऱी कृष् ण अजुजन को यह सिझाना चाहते थे वक युद्ध िें शऱी र नष्ट हों गे, आत्िाएँ नहीं। इसवलए धिज और कतजव्य से प़ीछे हटना उवचत नहीं है। यहीं से अजुजन के भ़ी तर पररितजन शुरू होने लगा। उनका भ्र ि ध़ीरे -ध़ीरे सिाप्त हो रहा था और िे श्ऱी कृष् ण के वदव् य ज्ञ ान को सिझने लगे थे। अच्छेद्योऽयिदाह्योऽयिक्लेद्योऽशोष्य एव च। मनत्यः सवमगतः थथाणुरचलोऽयं सनातनः॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 24 सरल अथज आत्िा को न काटा जा सकता है , न जलाया जा सकता है, न वभगोया जा सकता है और न सुखाया जा सकता है। आत् िा वनत् य, अचल और सनातन है। श्ऱी कृष् ण अजुजन को सिझाते हैं वक आत् िा वकस़ी भ़ी भौवतक िस् तु की तरह नष्ट नहीं होत़ी । संसार की हर िस् तु सिय के साथ सिाप्त हो जात़ी है, लेवकन आत्िा सदा रहत़ी है। अव् यिोऽयिमचन्त् योऽयिमवकायोऽयिुच् यते। तथिादेवं मवमदत् वैनं नानुशोमचतुिहममस॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 25 सरल अथज आत्िा अदृश्य , अवचंत् य और अविकार है। इसवलए इसके वलए शोक करना उवचत नहीं है । िनुष् य केिल शऱी र को देखता है, इसवलए िृत् यु का दुख उसे तोड देता है। लेवकन ग़ीता कहत़ी है वक आत्िा शऱीर से कहीं अवधक िहान है। अथ चैनं मनत् यजातं मनत् यं वा िन् यसे िृति्। तथामप त् वं िहाबाहो नैवं शोमचतुिहममस॥
47 — अध्याय 2 , श्ल ोक 26 सरल अथज यवद तुि आत् िा को बार-बार जन्ि लेने िाला और बार -बार िरने िाला भ़ी िानो , तब भ़ी शोक करना उवचत नहीं है। यहाँ श्ऱी कृष् ण अजुजन को हर दृ वष्ट से सिझा रहे हैं वक िृत् यु ज़ी िन का वनयि है। जातथय मह ध्रु वो िृत् युध्रु म वं जन् ि िृतथय च। तथिादपररहायेऽथे न त् वं शोमचतुिहममस॥ — अध्या य 2, श्ल ोक 27 सरल अथज वजसका जन् ि हुआ है उसकी िृत् यु वनवश्च त है, और िृत् यु के बाद पुनाः जन् ि भ़ी वनवश्चत है। इसवलए जो टाला नहीं जा सकता , उसके वलए अवधक शोक नहीं करना चावहए। यह ग़ीता का ज़ीिन का सबसे गहरा सत्य है। िनुष् य िृत् यु से बच नहीं सकता, इसवलए भय िें ज़ीने के बजाय सत्य को स् ि़ीकार करना स़ीखना चावहए। अव् यिादीमन भूतामन व् यििध् यामन भारत। अव्यिमनधनान्येव तत्र का पररदेवना॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 28 सरल अथज सभ़ी प्र ाण़ी पहले अव्यि थे , ब़ी च िें प्र कट हुए और अंत िें विर अव् यि हो जाएँगे। विर शोक वकस बात का? िनुष् य इस संसार िें कुछ सिय के वलए आता है। यह़ी ज़ीिन का वनयि है।
48 आियमवत् पश् यमत कमिदेनि् आियमवद्वदमत तथैव चान्यः। आियमवच् चैनिन् यः शृणोमतश्रुत् वाप् येनं वेद न चैव कमित्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 29 सरल अथज कोई आत्िा को आश्चयज की तरह देखता है , कोई उसके बारे िें आश्चयज की तरह बोलता है, और कोई सुनकर भ़ी उसे सिझ नहीं पाता। आत्िा का ज्ञ ान केिल पढने से नहीं , अनुभि और वचंतन से सिझ आता है। देही मनत् यिवध् योऽयं देहे सवमथय भारत। तथिात् सवाममण भूतामन न त् वं शोमचतुिहममस॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 30 सरल अथज हे अजुजन! शऱीर िें रहने िाल़ी आत्िा कभ़ी नष्ट नहीं होत़ी। इसवलए वकस़ी प्र ाण़ी के वलए अत्यवधक शोक नहीं करना चावहए। श्ऱी कृष् ण अजुजन का भय और िोह सिाप्त करना चाहते थे तावक िे अपने धिज को सिझ सकें। थवधिमिमप चावेक्ष् य न मवकमम् पतुिहममस। धम् याममद्ध युद्ध ाच् रेयोऽन् यत्क्ष मत्रयथय न मवद्यते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 31 सरल अथज अपने धिज को देखकर तुम् हें विचवलत नहीं होना चावहए। क्ष वत्र य के वलए धिजयुि युद्ध से श्रेष्ठ कुछ नहीं है। यह युद्ध केिल राज् य का नहीं , धिज और अधिज का संघषज था। यदृच् छया चोपपन् नं थवगमद्व ारिपावृति्। सुमखनः क्ष मत्र याः पाथम लभन् ते युद्ध िीदृ शि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 32
49 सरल अथज ऐसा धिजयुि युद्ध भाग् यशाल़ी क्ष वत्र यों को ह़ी प्र ाप्त होता है, जो स् िगज के द्व ार के सिान है। धिज की रक्षा करना ह़ी सच्चा कतजव्य है। अथ चेत्त् वमििं धम् यं संग्र ािं न कररष् यमस। ततः थवधिं कीमतं च महत्वा पापिवाप्थयमस॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 33 सरल अथज यवद तुि इस धिजयुि युद्ध को नहीं करोगे, तो अपने धिज और कीवतज को खोकर पाप के भाग़ी बनोगे। कतजव्य से भागना कभ़ी भ़ी उवचत नहीं िाना गया। अकीमतं चामप भूतामन कथमयष् यमन् त तेऽव् ययाि्। सम्भामवतथय चाकीमतमिमरणादमतररच्यते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 34 सरल अथज लोग तुम् हाऱी वनंदा करेंगे, और सम् िावनत व् यवि के वलए अपयश िृत् यु से भ़ी अवधक कष्टदायक होता है। सम् िान और चररत्र िनुष् य की सबसे बड़ी संपवत्त होते हैं। भयाद्र णादुपरतं िंथयन् ते त् वां िहारथाः। येषां च त् वं बहुितो भूत् वा याथयमस लाघवि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 35 सरल अथज िहान योद्ध ा सिझेंगे वक तुि भय के कारण युद्ध से प़ी छे हट गए हो, और िे तुम् हें तुच् छ सिझेंगे। श्ऱी कृष् ण अजुजन को साहस और कतजव् य का िहत् ि बता रहे थे। अवाच् यवादांि बहून् वमदष् यमन्त तवामहताः।
50 मनन् दन् तथतव सािर्थ् यं ततो दुःखतरं नु मकि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 36 सरल अथज तुम् हारे शत्रु तुम् हाऱी वनंदा करेंगे और तुम् हाऱी शवि का उपहास उडाएँगे। इससे अवधक दुखद क् या होगा? जब िनुष् य अपने कतजव् य से प़ी छे हटता है, तब संसार उसका सम्िान करना छोड देता है। हतो वा िाप् थयमस थवगं मजत् वा वा भोक्ष् यसे िहीि्। तथिादुमत्त ि कौन् तेय युद्ध ाय कृतमनियः॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 37 सरल अथज यवद युद्ध िें िारे गए तो स् िगज प्र ाप्त होगा और यवद विजय़ी हुए तो पृथ् ि़ी का राज् य विलेगा। इसवलए उिो और युद्ध के वलए दृ ढ वनश्चय करो। यहाँ श्ऱी कृष् ण अजुजन के भ़ी तर साहस और धिज के प्र वत दृ ढता उत्पन्न कर रहे थे सुखदुःखे सिे कृत् वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्ध ाय युज् यथव नैवं पापिवाप् थयमस॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 38 सरल अथज सुख-दुख, लाभ-हावन और ज़ीत -हार को सिान सिझकर अपने कतजव्य का पालन करो। ऐसा करने से तुम् हें पाप नहीं लगेगा। श्ऱी कृष् ण अजुजन को सिझा रहे थे वक सच् चा धिज िह़ी है वजसिें िनुष् य अपने कतजव् य को वनष् पक्ष होकर करे। िनुष् य का िन हर सिय पररवस् थवतयों के अनुसार बदलता रहता है: सुख विले तो प्र सन्नता , दुख विले तो वनराशा, लाभ विले तो उत्साह , हावन हो तो भय। लेवकन ग़ीता कहत़ी है वक जो व् यवि हर पररवस्थवत िें िन को वस्थर रखता है , िह़ी िास्तविक योग़ी है। आज के सिय िें अवधकांश लोग: पररणाि से बहुत अवधक
51 जुड जाते हैं, और इस़ी कारण तनाि , भय और वचंता िें ज़ी ते हैं। ग़ीता वसखात़ी है: पररवस्थवत बदल सकत़ी है , लेवकन िनुष् य का धैयज नहीं टूटना चावहए। एषा तेऽमभमहता सां् ये बुमद्ध योगे मत् विां शृणु। बुद्ध् या युिो यया पाथम किमबन् धं िहाथयमस॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 39 सरल अथज हे अजुजन! अब तक िैंने तुम् हें ज्ञ ान के विषय िें बताया। अब किजयोग सुनो, वजसके द्व ारा तुि किजबंधन से िुि हो जाओगे। यहाँ से श्ऱी कृष् ण किजयोग का गहरा ज्ञ ान देना प्र ारम् भ करते हैं। अब तक: आत्िा ,िृत् यु, और धिज का ज्ञ ान वदया गया था। अब श्ऱी कृष् ण यह सिझाने िाले हैं वक संसार िें रहते हुए किज कैसे करना चावहए। ग़ी ता संसार छोडने की वशक्षा नहीं देत़ी। िह वसखात़ी है: संसार िें रहो, अपना कतजव्य वनभाओ , लेवकन िोह और अहंकार िें ित िँसो। नेहामभक्रिनाशोऽमथत ित्यवायो न मवद्यते। थवकपिप् यथय धिमथय त्र ायते िहतो भयात्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 40 सरल अथज इस किजयोग िें वकया गया थोडा सा प्र यास भ़ी बडे भय से बचा लेता है। इसिें कोई हावन नहीं होत़ी। ग़ी ता का यह बहुत आश्व ासन देने िाला श्ल ोक है। यवद िनुष् य: थोडा भ़ी धिज, थोडा भ़ी सत्य , और थोडा भ़ी ईश्वर की ओर बढता है , तो उसका ज़ीिन बदलना शुरू हो जाता है। आज लोग सोचते हैं वक आध्यावत्िक ज़ी िन बहुत कविन है। लेवकन ग़ीता कहत़ी है: छोटी शुरु आत भी िहान पररणाि दे सकती है।
52व् यवसायामत् िका बुमद्ध रेकेह कुरु नन् दन। बहुशाखा ह्य नन् ताि बुद्ध योऽव् यवसामयनाि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 41 सरल अथज वस् थर बुवद्ध िाले िनुष् य का लक्ष् य एक होता है, लेवकन अवस् थर बुवद्ध िाले लोगों की सोच अनेक वदशाओं िें भटकत़ी रहत़ी है। आज का िनुष् य सबसे अवधक भटकाि िें ज़ी रहा है। उसका िन: तुलना, लालच, भय, और वदखािे िें उलझा रहता है। इस़ी कारण: ध् यान भटकता है , िन अशांत रहता है, और ज़ीिन िें वस्थरता नहीं आत़ी। ग़ीता वसखात़ी है: िन को एक लक्ष्य पर वस्थर करना आिश्यक है। यामििां पुमष् पतां वाचं िवदन्त् यमवपमितः। वेदवादरताः पाथम नान्यदथतीमत वामदनः॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 42 सरल अथज अकपज्ञाऩी लोग आकषजक शब्दों िें केिल बाहऱी किजकाण्ड्ड की बातें करते हैं और उस़ी को सबकुछ िानते हैं।श्ऱी कृष् ण यहाँ वदखािे िाले धिज से सािधान कर रहे हैं। केिल: बाहऱी पूजा, वदखािा, या शब्दों का ज्ञ ान ह़ी पयाजप्त नहीं है। सच् चा धिज िन की शुद्ध ता और सह़ी किज िें है। कािात् िानः थवगमपरा जन् िकिमफलिदाि्। मक्र यामवशेषबहुलां भोगैश्व यमगमतं िमत॥
53 — अध्याय 2 , श्ल ोक 43 सरल अथज भोग और ऐश्वयज िें आसि लोग स् िगज और किजिल की इच्छा िें अनेक किजकाण्ड्ड करते हैं। जब िनुष् य केिल सुख और भोग के प़ी छे भागता है, तब उसका िन ईश्व र से दूर होने लगता है। आज भ़ी लोग: धिज को केिल इच् छा पूऱी करने का साधन बना लेते हैं। लेवकन ग़ीता कहत़ी है: सच्चा धिम आत् िा की शांमत देता है। भोगैश्व यमिसिानां तयापहृ तचेतसाि्। व् यवसायामत् िका बुमद्ध ः सिाधौ न मवधीयते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 44 सरल अथज भोग और ऐश्व यज िें आसि लोगों की बुवद्ध वस् थर नहीं हो पात़ी । अत्यवधक इच् छाएँ िनुष् य के िन को अशांत कर देत़ी हैं। वजसका िन हर सिय: धन, सुख, और वदखािे िें उलझा हो, िह भ़ी तर की शांवत नहीं पा सकता।त्रै गुण् यमवषया वेदा मनस्त्रै गुण् यो भवाजुमन। मनद्व मन्द्व ो मनत् यसत्त् वथथो मनयोगक्षे ि आत् िवान्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 45 सरल अथज हे अजुजन! त़ी न गुणों से ऊपर उिो, सुख-दुख से िुि रहो और आत् िा िें वस् थत हो जाओ। ग़ी ता िनुष् य को केिल बाहऱी संसार तक स़ी वित नहीं रखत़ी । िह उसे भ़ीतर की वस्थरता की ओर ले जात़ी है। यावानथम उदपाने सवमतः सम्प् लुतोदके। तावान् सवेषु वेदेषु ब्र ाह्म णथय मवजानतः॥
54 — अध्याय 2 , श्ल ोक 46 सरल अथज वजस प्र कार चारों ओर जल होने पर छोटे कुएँ का िहत् ि कि हो जाता है, उस़ी प्र कार तत्िज्ञान प्र ाप्त होने पर िेदों के किजकाण्ड्ड का िहत्ि स़ीवित रह जाता है। सच् चा ज्ञ ान विलने पर िनुष् य बाहऱी वदखािे से ऊपर उिने लगता है। किमण् येवामधकारथते िा फलेषु कदाचन। िा किमफलहेतुभूमिाम ते सङ्गोऽथत् वकिममण॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 47 सरल अथज तुम् हारा अवधकार केिल किज करने पर है, उसके िल पर नहीं। इसवलए िल की वचंता िें ित िँसो और किज न करने िें भ़ी आसि ित हो। यह ग़ीता का सबसे प्र वसद्ध श्ल ोक है। आज अवधकांश लोग: पररणाि की वचंता िें, भय और तनाि िें ज़ीते हैं। लेवकन ग़ीता वसखात़ी है: िनुष् य को पूऱी वनष्ठ ा से किज करना चावहए, और पररणाि ईश्वर पर छोड देना चावहए। योगथथः कुरु किाममण सङ्गं त् यक्त् वा धनञ् जय। मसद्ध् यमसद्ध् योः सिो भूत् वा सित् वं योग उच् यते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 48 सरल अथज हे अजुजन! आसवि छोडकर योग िें वस् थत होकर किज करो। सिलता और असिलता िें सिान रहने का नाि ह़ी योग है। सिलता विलने पर अहंकार और असिलता विलने पर वनराशा — यह़ी िनुष् य की किजोऱी है। ग़ीता कहत़ी है: दोनों पररवस्थवतयों िें िन को वस्थर रखना ह़ी सच्चा योग है ।दूरेण ह्य वरं किम बुमद्ध योगाद्ध नञ् जय। बुद्ध ौ शरणिमन् वच् छ कृपणाः फलहेतवः॥
55 — अध्याय 2 , श्ल ोक 49 सरल अथज हे अजुजन! िल की इच् छा से वकया गया किज बुवद्ध योग से बहुत वनम् न है। इसवलए सिबुवद्ध का आश्र य लो, क् यों वक िल की इच् छा रखने िाले िनुष् य कृपण होते हैं। श्ऱी कृष् ण अजुजन को सिझा रहे थे वक केिल पररणाि के वलए वकया गया किज िनुष् य को बाँध देता है। आज अवधकांश लोग: काि इसवलए करते हैं वक उन्हे प्र शंसा विले, धन विले, या दूसरों से अवधक सिलता विले। जब िनुष् य केिल िल के वलए किज करता है, तब: भय उत्पन्न होता है , असिलता का डर बढता है, और िन अशांत हो जाता है। ग़ीता वसखात़ी है: किज पूजा की तरह होना चावहए, केिल स् िाथज का साधन नहीं। बुमद्ध युिो जहातीह उभे सुकृतदुष् कृते। तथिाद्य ोगाय युज् यथव योगः किमसु कौशलि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 50 सरल अथज सिबुवद्ध िाला िनुष् य इस ज़ी िन िें अच् छे और बुरे किों के बंधन से िुि हो जाता है। इसवलए योग िें लगो, क् यों वक योग ह़ी किों िें कुशलता है। यह ग़ी ता का अत् यंत प्र वसद्ध श्ल ोक है। “योगाः किजसु कौशलि्” का अथज है: किज को इतऩी शुद्ध ता, ध् यान , और संतुलन से करना वक िह ईश्वर की उपासना जैसा बन जाए। आज लोग काि तो करते हैं, लेवकन: िन कहीं और होता है, तनाि रहता है, और भ़ी तर शांवत नहीं होत़ी । ग़ीता कहत़ी है: जब िनुष् य शांत िन से किज करता है, तब उसका किज श्रेष्ठ बन जाता है। किमजं बुमद्ध युिा मह फलं त् यक्त् वा िनीमषणः। जन् िबन् धमवमनिुमिाः पदं गच् छन्त् यनाियि्॥
56 — अध्याय 2 , श्ल ोक 51 सरल अथज ज्ञ ाऩी पुरु ष किों के िल का त् याग करके जन् ि-िरण के बंधन से िुि हो जाते हैं और परि शांवत को प्र ाप्त करते हैं। िल की वचंता िनुष् य को बाँधत़ी है। जब िनुष्य: हर सिय लाभ, सिलता, और प्र शंसा के प़ी छे भागता है, तब उसका िन कभ़ी शांत नहीं रहता। लेवकन जो व् यवि: अपना किज ईश्वर को सिवपजत कर देता है , उसका िन ध़ीरे -ध़ी रे शांत होने लगता है। यदा ते िोहकमललं बुमद्धव् यममततररष् यमत। तदा गन् तामस मनवेदं श्र ोतव् यथय श्रु तथय च॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 52 सरल अथज जब तुम् हाऱी बुवद्ध िोह के अंधकार को पार कर जाएग़ी , तब तुि संसार की अनेक बातों से विरि हो जाओगे। िोह िनुष् य की सबसे बड़ी किजोऱी है। िोह के कारण: िनुष् य सत् य नहीं देख पाता, गलत वनणजय लेता है, और दुख िें िँसा रहता है। ग़ीता वसखात़ी है: ज्ञ ान धीरे -धीरे िोह को सिाप्त करता है।श्रु मतमविमतपन् ना ते यदा थथाथयमत मनिला। सिाधावचला बुमद्ध थतदा योगिवाप् थयमस॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 53 सरल अथज जब तुम् हाऱी बुवद्ध वस् थर हो जाएग़ी और विचवलत नहीं होग़ी , तब तुि योग को प्र ाप्त करोगे। आज का िनुष् य सबसे अवधक िानवसक अशांवत से परेशान है। कारण: िन का अवस्थर होना। ग़ीता कहत़ी है: वस्थर िन ह़ी सच्च़ी शवि है।
57 अजुजन उिाच। मथथतिज्ञथय का भाषा सिामधथथथय केशव। मथथतधीः मकं िभाषेत मकिासीत व्र जेत मकि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 54 सरल अथज अजुजन ने पूछा — हे कृष् ण! वस् थर बुवद्ध िाले िनुष् य की पहचान क् या है? िह कैसे बोलता, बैिता और चलता है? अब अजुजन का िन ज्ञ ान की ओर बढने लगा था। िे जानना चाहते थे वक: सच्चा ज्ञ ाऩी कैसा होता है , और िनुष् य वस् थर बुवद्ध कैसे प्र ाप्त कर सकता है। श्ऱी भगिानुिाच। िजहामत यदा कािान् सवामन् पाथम िनोगतान्। आत् िन् येवात् िना तुष्ट ः मथथतिज्ञ थतदोच् यते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 55 सरल अथज जब िनुष् य िन की सभ़ी इच् छाओं का त् याग करके आत् िा िें संतुष्ट हो जाता है, तब िह वस् थर बुवद्ध िाला कहलाता है। आज िनुष् य की इच् छाएँ कभ़ी सिाप्त नहीं होतीं। एक इच् छा पूऱी होत़ी है, दूसऱी उत्पन्न हो जात़ी है। इस़ी कारण: िन अशांत रहता है, और संतोष नहीं विलता। ग़ीता वसखात़ी है: िास् तविक सुख भ़ी तर की शांवत िें है। दुःखेष् वनुमद्वग् निनाः सुखेषु मवगतथपृहः। वीतरागभयक्र ोधः मथथतधीिुममनरुच् यते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 56 सरल अथज
58 जो िनुष् य दुख िें विचवलत नहीं होता, सुख िें आसि नहीं होता और राग, भय तथा क्र ोध से िुि रहता है, िह़ी वस् थर बुवद्ध िाला िुवन कहलाता है। यह़ी ग़ीता का आदशज िनुष् य है। आज लोग: सुख िें अहंकाऱी , दुख िें वनराश, और छोट़ी बातों िें क्र ोवधत हो जाते हैं। ग़ीता कहत़ी है: िन का संतुलन ह़ी िास् तविक शवि है। यः सवमत्र ानमभथनेहथतत्तत् िाप् य शुभाशुभि्। नामभनन्दमत न द्वे मष्ट तथय िज्ञा िमतमिता॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 57 सरल अथज जो िनुष् य शुभ और अशुभ पररवस् थवतयों िें अत् यवधक आसि नहीं होता, न अवधक प्र सन्न होता है और न द्वे ष करता है , उसकी बुवद्ध वस् थर होत़ी है। श्ऱी कृष् ण यहाँ िनुष् य की िानवसक वस् थरता का िणजन कर रहे हैं। आज अवधकांश लोग: अच्छ़ी बात होने पर अत्यवधक उत्सावहत हो जाते हैं , और बुऱी पररवस् थवत आने पर टूट जाते हैं। लेवकन ग़ीता वसखात़ी है: ज़ीिन िें हर पररवस्थवत स् थाय़ी नहीं होत़ी। जो व् यवि: सिलता िें अहंकार नहीं करता, और असिलता िें वनराश नहीं होता , िह़ी िास् तविक शांवत प्र ाप्त करता है। यदा संहरते चायं कूिोऽङ्गानीव सवमशः। इमन्द्रयाणीमन्द्रयाथेभ्यथतथय िज्ञा िमतमिता॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 58 सरल अथज जैसे कछुआ अपने अंगों को भ़ी तर सिेट लेता है, िैसे ह़ी जो िनुष् य अपऩी इंवद्र यों को विषयों से हटा लेता है , उसकी बुवद्ध वस् थर हो जात़ी है। िनुष् य की इंवद्र याँ ह़ी उसे संसार की ओर खीं चत़ी हैं। आज: िोबाइल, वदखािा, भोग, और इच्छाएँ िन को हर सिय भटकात़ी रहत़ी हैं। ग़ीता कहत़ी है:
59 जो िनुष् य अपऩी इंवद्र यों को वनयंवत्र त करना स़ी ख लेता है, िह़ी िन की शांवत प्र ाप्त कर सकता है। मवषया मवमनवतमन्ते मनराहारथय देमहनः। रसवजं रसोऽप् यथय परं दृष्ट् वा मनवतमते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 59 सरल अथज इंवद्र यों के विषयों से दूर रहने पर भ़ी िन का आकषजण बना रहता है , लेवकन परि सत् य को प्र ाप्त करने पर िह आकषजण स् ियं सिाप्त हो जाता है। केिल बाहऱी वनयंत्र ण पयाजप्त नहीं है। यवद िन के भ़ीतर इच्छा बऩी रहे , तो अिसर विलने पर िनुष् य विर उस़ी ओर चला जाता है। ग़ीता वसखात़ी है: जब िनुष् य उच् च और वदव् य आनंद को अनुभि करता है, तब छोट़ी इच्छाएँ ध़ीरे - ध़ीरे सिाप्त होने लगत़ी हैं। यततो ह्य मप कौन् तेय पुरु षथय मवपमितः। इमन्द्र यामण ििाथीमन हरमन् त िसभं िनः॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 60 सरल अथज हे अजुजन! प्र यास करने िाले बुवद्ध िान िनुष् य का िन भ़ी चंचल इंवद्र याँ बलपूिजक भटका सकत़ी हैं। िन को वनयंवत्र त करना आसान नहीं है। आज िनुष् य: ध् यान लगाना चाहता है, शांवत चाहता है, लेवकन उसका िन बार-बार भटक जाता है।
60 ग़ी ता यह स् ि़ी कार करत़ी है वक इंवद्र याँ बहुत शविशाल़ी हैं। इसवलए: वनरंतर अभ्यास , धैयज, और आत् िसंयि आिश्यक हैं। तामन सवाममण संयम् य युि आसीत ित् परः। वशे मह यथयेमन्द्रयामण तथय िज्ञा िमतमिता॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 61 सरल अथज जो िनुष् य अपऩी इंवद्र यों को वनयंवत्र त करके िन को ईश्व र िें वस् थर करता है, उसकी बुवद्ध वस् थर हो जात़ी है। ग़ी ता केिल वनयंत्र ण की बात नहीं करत़ी , बवकक सह़ी वदशा भ़ी देत़ी है। यवद िन खाल़ी रहेगा , तो िह विर संसार की ओर भागेगा। इसवलए िन को ईश्वर , सत्य , और अच्छे किों की ओर लगाना आिश्यक है। ध् यायतो मवषयान् पुंसः सङ्गथतेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कािः कािात्क्र ोधोऽमभजायते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 62 सरल अथज विषयों का वचंतन करने से उनिें आसवि उत् पन्न होत़ी है। आसवि से इच्छा और इच्छा से क्र ोध उत्पन्न होता है। यह श्ल ोक िनुष् य के पतन की शुरु आत बताता है। पहले: िन वकस़ी िस् तु के बारे िें सोचता है, विर: उसिें आसवि बढत़ी है , विर: उसे पाने की त़ीव्र इच्छा होत़ी है। और जब इच् छा पूऱी नहीं होत़ी , तब क्र ोध जन्ि लेता है। आज: तुलना, लालच, और अत्यवधक इच्छाएँ इस़ी कारण बढ रह़ी हैं।क्र ोधाद्भ वमत सम् िोहः सम् िोहात् थिृमतमवभ्र िः। थिृमतभ्रं शाद्बु मद्ध नाशो बुमद्ध नाशात् िणश् यमत॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 63 सरल अथज
61क्र ोध से िोह उत्पन्न होता है , िोह से स् िृवत भ्र वित हो जात़ी है, स् िृवत के भ्र वित होने से बुवद्ध नष्ट हो जात़ी है और बुवद्ध नष्ट होने पर िनुष् य पतन को प्र ाप्त होता है। ग़ी ता यहाँ िनुष् य के विनाश का पूरा क्र ि बता रह़ी है। क्र ोध: वनणजय शवि छ़ीन लेता है, संबंध तोड देता है, और िनुष् य को गलत िागज पर ले जाता है। आज: पररिार टूट रहे हैं, वित्रता सिाप्त हो रह़ी है , और िानवसक तनाि बढ रहा है, इन सबके प़ी छे अवनयंवत्र त िन और क्र ोध बडा कारण है। रागद्वे षमवयुिैथतु मवषयामनमन्द्र यैिरन्। आत्िवश्यैमवमधेयात्िा िसादिमधगच्छमत॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 64 सरल अथज जो िनुष् य राग और द्वे ष से िुि होकर वनयंवत्र त इंवद्र यों के साथ संसार िें रहता है, िह िन की शांवत प्र ाप्त करता है। ग़ी ता संसार छोडने की वशक्ष ा नहीं देत़ी । िह वसखात़ी है: संसार िें रहो, अपना कतजव्य वनभाओ , लेवकन िन को संतुवलत रखो। िसादे सवमदुःखानां हामनरथयोपजायते। िसन् नचेतसो ह्य ाशु बुमद्ध ः पयमवमतिते॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 65 सरल अथज िन की शांवत प्र ाप्त होने पर सभ़ी दुख ध़ी रे-ध़ी रे सिाप्त होने लगते हैं और िनुष् य की बुवद्ध वस् थर हो जात़ी है। आज लोग सुख तो खोज रहे हैं, लेवकन शांवत खो चुके हैं। ग़ीता कहत़ी है: शांवत बाहर नहीं , िन के भ़ीतर प्र ाप्त होत़ी है। वजसका िन शांत है, िह़ी िास्ति िें सुख़ी है।
62 नामथत बुमद्ध रयुिथय न चायुिथय भावना। न चाभावयतः शामन् तरशान् तथय कुतः सुखि्॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 66 सरल अथज अवस्थर िन िाले िनुष् य की बुवद्ध वस् थर नहीं होत़ी । ऐसे व् यवि को न सह़ी भािना विलत़ी है , न शांवत, और वबना शांवत के सुख कैसे विल सकता है? कृष् ण ज़ी यहाँ िनुष् य के ज़ी िन का बहुत गहरा सत् य बता रहे हैं। आज अवधकांश लोग: धन तो किाते हैं, सुविधाएँ भ़ी प्र ाप्त कर लेते हैं, लेवकन विर भ़ी भ़ीतर बेचैऩी रहत़ी है। कारण क् या है ? — िन की अशांवत। यवद िन हर सिय: भय, वचंता, तुलना, और इच् छाओं िें उलझा रहेगा, तो िास् तविक सुख कभ़ी प्र ाप्त नहीं होगा। ग़ीता वसखात़ी है: शांवत के वबना सुख संभि नहीं है। इमन्द्र याणां मह चरतां यन् िनोऽनुमवधीयते। तदथय हरमत िज्ञ ां वायुनामवमिवाम् भमस॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 67 सरल अथज वजस िनुष् य का िन इंवद्र यों के प़ी छे भागता है, उसकी बुवद्ध उस़ी प्र कार नष्ट हो जात़ी है जैसे तेज हिा पाऩी िें नाि को भटका देत़ी है। िनुष् य का िन बहुत चंचल
63 है। यवद उसे वनयंत्र ण िें न रखा जाए, तो िह: इच् छाओं, भोग, और भ्र ि िें भटकने लगता है। आज: िोबाइल, िनोरंजन, लालच, और वदखािा िनुष् य के िन को हर सिय खींचते रहते हैं। इस़ी कारण: ध् यान किजोर हो रहा है , धैयज कि हो रहा है, और िानवसक तनाि बढ रहा है। ग़ीता वसखात़ी है: िन को सह़ी वदशा देना आिश्यक है। तथिाद्यथय िहाबाहो मनगृहीतामन सवमशः। इमन्द्रयाणीमन्द्रयाथेभ्यथतथय िज्ञा िमतमिता॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 68 सरल अथज हे अजुजन! वजसकी इंवद्र याँ विषयों से वनयंवत्र त रहत़ी हैं, उसकी बुवद्ध वस् थर होत़ी है। िनुष् य की सबसे बड़ी विजय बाहऱी संसार पर नहीं , बवकक अपने िन और इंवद्र यों पर होत़ी है। जो व् यवि: क्र ोध को रोक सकता है , लोभ को वनयंवत्र त कर सकता है, और इच् छाओं पर संयि रख सकता है, िह़ी िास्तविक अथज िें शविशाल़ी है। या मनशा सवमभूतानां तथयां जागमतम संयिी। यथयां जाग्र मत भूतामन सा मनशा पश् यतो िुनेः॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 69 सरल अथज जो अिस्था सािान्य लोगों के वलए अज्ञान के सिान है , उसिें संयि़ी िनुष् य जागृत रहता है। और वजसिें संसार के लोग लगे रहते हैं, िह ज्ञ ाऩी के वलए अज्ञान के सिान है। साधारण िनुष् य: केिल भोग, धन, और बाहऱी सुखों िें ज़ी िन देखता है। लेवकन ज्ञ ाऩी िनुष् य: आत्िा , सत्य , और ईश्वर की ओर ध् यान देता है। यह़ी कारण है वक आध्यावत्िक दृ वष्ट सािान्य सोच से अलग होत़ी है। आपूयमिाणिचलिमतिं सिुद्र िापः िमवशमन् त यद्व त्। तद्वत् कािा यं िमवशमन् त सवे स शामन्तिाप्नोमत न कािकािी॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 70 सरल अथज
64 जैसे अनेक नवदयाँ सिुद्र िें विलत़ी हैं लेवकन सिुद्र विचवलत नहीं होता, िैसे ह़ी वजसकी इच् छाएँ शांत हो जात़ी हैं िह़ी शांवत प्र ाप्त करता है। िनुष् य की इच् छाएँ कभ़ी सिाप्त नहीं होतीं। एक इच् छा पूऱी होत़ी है, दूसऱी उत् पन् न हो जात़ी है। इस़ी कारण: लोग थक जाते हैं, लेवकन संतोष नहीं विलता। ग़ीता कहत़ी है: इच् छाओं का दास बनने से शांवत नहीं विलत़ी । वजसका िन सिुद्र की तरह वस् थर हो जाता है, िह़ी िास् तविक आनंद प्र ाप्त करता है। मवहाय कािान् यः सवामन् पुिांिरमत मनःथपृहः। मनिमिो मनरहङ्कारः स शामन् तिमधगच् छमत॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 71 सरल अथज जो िनुष् य सभ़ी इच् छाओं का त् याग करके, ििता और अहंकार से िुि होकर ज़ीिन ज़ीता है , िह़ी शांवत प्र ाप्त करता है। अहंकार और “िेरा-तेरा” की भािना ह़ी अवधकांश दुखों का कारण है। आज: लोग अपने पद का अहंकार करते हैं, धन का अहंकार करते हैं, और दूसरों से तुलना िें ज़ी ते हैं। लेवकन ग़ीता वसखात़ी है: विनम्र ता और संतोष ह़ी िास् तविक शांवत का िागज हैं। एषा ब्र ाह्म ी मथथमतः पाथम नैनां िाप् य मविुह्य मत। मथथत् वाथयािन् तकालेऽमप ब्रह्म मनवामणिृच् छमत॥ — अध्याय 2 , श्ल ोक 72 सरल अथज हे अजुजन! यह ब्रह्म वस् थवत है। इसे प्र ाप्त करने िाला िनुष् य कभ़ी िोह िें नहीं पडता और अंत सिय िें भ़ी परि शांवत को प्र ाप्त करता है। यहीं अध्याय 2 सिाप्त होता है। श्ऱी कृष् ण ने इस अध् याय िें अजुजन को: आत्िा का ज्ञ ान , िृत् यु का सत् य, किजयोग,
65 और वस् थर बुवद्ध का िागज सिझाया। यह केिल अजुजन के वलए नहीं , बवकक हर िनुष् य के वलए ज़ी िन का िागजदशजन है। ग़ीता वसखात़ी है: िनुष् य केिल शऱी र नहीं है, उसका िास्तविक स् िरूप आत्िा है , और ज़ीिन का उद्देश्य केिल भोग नहीं , बवकक सत् य और शांवत को प्र ाप्त करना है। जो िनुष् य: िन को वस्थर करता है , इच् छाओं को वनयंवत्र त करता है, और धिज के िागज पर चलता है, िह़ी िास् तविक शांवत और ईश्व र के वनकटता को प्र ाप्त करता है। अध्याय 2 की ििुख मशक्ष ाएाँ 1. आत् िा अिर है भगिान श्ऱी कृष् ण बताते हैं वक शऱी र नश्व र है, लेवकन आत्िा कभ़ी नहीं िरत़ी। "न जायते वम्र यते िा कदावचत्..." आत्िा का न जन्ि होता है और न िृत् यु। वशक्ष ा: िृत् यु केिल शऱी र की होत़ी है, आत्िा की नहीं। 2. सुख-दुाःख अस् थाय़ी हैं ज़ी िन िें सुख और दुाःख आते-जाते रहते हैं। वशक्षा: पररवस्थवतयों से घबराना नहीं चावहए , धैयज रखना चावहए। 3. कतजव् य का पालन करो िनुष् य को अपने धिज और कतजव् य से प़ीछे नहीं हटना चावहए। वशक्षा: कविनाई आने पर भ़ी सह़ी कायज करते रहना चावहए। 4. किज करो, िल की वचंता ित करो यह ग़ी ता का सबसे प्र वसद्ध उपदेश है।
66 "किजण्ड् येिावधकारस् ते िा िलेषु कदाचन" अथज: तुम् हारा अवधकार केिल किज करने िें है, िल पर नहीं। वशक्षा: अपना सिजश्रेष्ठ प्र यास करो , पररणाि की वचंता भगिान पर छोड दो। 5. वस् थर बुवद्ध िाला व् यवि भगिान श्ऱी कृष् ण बताते हैं वक सच् चा ज्ञ ाऩी िह़ी है जो सुख-दुाःख, लाभ-हावन और िान-अपिान िें सिान रहता है। वशक्ष ा: िन को वस् थर और शांत रखना चावहए। दूसरे अध् याय का सार िनुष् य शऱी र नहीं , अिर आत्िा है। इसवलए िोह , भय और वचंता छोडकर अपने कतजव् य का पालन करना चावहए तथा किज करते हुए िल की वचंता नहीं करऩी चावहए।
67 अध्याय 3 — किजयोग अजुजन उिाच। ज् यायसी चेत् किमणथते िता बुमद्ध जमनादमन। तमत् कं किममण घोरे िां मनयोजयमस केशव॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 1 सरल अथज अजुजन बोले — हे कृष् ण! यवद आपके अनुसार ज्ञ ान किज से श्रेष्ठ है, तो विर आप िुझे इस भयंकर युद्ध िें क् यों लगा रहे हैं? अजुजन अभ़ी भ़ी भ्र ि िें थे। उन्होंने देखा वक श्ऱी कृष् ण: ज्ञ ान की भ़ी बात कर रहे हैं , और किज करने की भ़ी। इसवलए उनके िन िें प्रश्न उत् पन् न हुआ वक यवद आत् िज्ञ ान श्रेष्ठ है, तो युद्ध जैसे किोर किज की आिश्यकता क् यों है ? आज भ़ी बहुत लोग यह़ी सोचते हैं: क् या आध् यावत् िक ज़ी िन का अथज संसार छोड देना है? क् या केिल पूजा-पाि ह़ी धिज है ? लेवकन ग़ीता वसखात़ी है वक: केिल ज्ञ ान पयाजप्त नहीं , सह़ी किज भ़ी आिश्यक है। व् यामिश्रे णेव वाक् येन बुमद्धं िोहयसीव िे। तदेकं वद मनमित् य येन श्रे योऽहिाप् नुयाि्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 2 सरल अथज आपकी बातें िुझे विवश्र त प्र त़ी त हो रह़ी हैं। कृपया वनवश्च त रू प से िह िागज बताइए वजससे िेरा ककयाण हो।
68 अजुजन अब पूणज रू प से वशष् य बन चुके थे। िे केिल तकज नहीं कर रहे थे , बवकक सत्य जानना चाहते थे। यहाँ ग़ीता वसखात़ी है: सच्चा ज्ञ ान तब विलता है जब िनुष् य विनम्र होकर प्रश्न करता है। श्ऱी भगिानुिाच। लोकेऽमथिमन्द्व मवधा मनिा पुरा िोिा ियानघ। ज्ञ ानयोगेन सां् यानां किमयोगेन योमगनाि्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 3 सरल अथज श्ऱी कृष् ण बोले — हे अजुजन! इस संसार िें दो प्र कार के िागज बताए गए हैं — ज्ञ ानयोग और किजयोग। यहाँ श्ऱी कृष् ण सिझा रहे हैं वक: कुछ लोग ज्ञ ान और ध् यान के िागज से आगे बढते हैं, और कुछ किज करते हुए ईश्व र तक पहुँचते हैं। लेवकन ग़ी ता संसार से भागने की वशक्षा नहीं देत़ी। िह वसखात़ी है: अपने कतजव् य वनभाते हुए भ़ी ईश्व र के िागज पर चला जा सकता है। न किमणािनारम् भान् नैष् कम् यं पुरु षोऽश्नु ते। न च संन् यसनादेव मसमद्धं सिमधगच् छमत॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 4 सरल अथज केिल किज छोड देने से िनुष् य किजिुि नहीं होता और केिल संन् यास लेने से वसवद्ध प्र ाप्त नहीं होत़ी। बहुत लोग सोचते हैं: काि छोड देना ह़ी आध्यावत्िकता है। लेवकन श्ऱी कृष् ण कहते हैं: केिल बाहऱी त् याग पयाजप्त नहीं , िन का शुद्ध होना आिश् यक है। आज भ़ी: कई लोग वजम्िेदाररयों से भागना चाहते हैं, लेवकन ग़ीता कहत़ी है वक कतजव्य से भागना सिाधान नहीं है। न मह कमित्क्ष णिमप जातु मतित् यकिमकृत्। कायमते ह्य वशः किम सवमः िकृमतजैगुमणैः॥
69 — अध्याय 3 , श्ल ोक 5 सरल अथज कोई भ़ी िनुष् य एक क्ष ण भ़ी वबना किज वकए नहीं रह सकता। प्र कृवत सभ़ी से किज करिात़ी है। यह संसार वनरंतर किज िें लगा हुआ है: सूयज चल रहा है, नवदयाँ बह रह़ी हैं , पृथ् ि़ी घूि रह़ी है। िनुष् य भ़ी किज से नहीं बच सकता। प्रश्न यह नहीं वक किज करना है या नहीं। प्रश्न यह है वक: किज सह़ी है या गलत। किेमन्द्र यामण संयम् य य आथते िनसा थिरन्। इमन्द्र याथाममन् विूढात् िा मिर्थ् याचारः स उच् यते॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 6 सरल अथज जो िनुष् य बाहर से इंवद्र यों को रोकता है लेवकन िन िें विषयों का वचंतन करता रहता है, िह विथ्याचाऱी है।ग़ीता केिल बाहऱी वदखािे को धिज नहीं िानत़ी। यवद: िन िें लोभ, क्र ोध , और इच्छाएँ भऱी हों , तो केिल बाहऱी साधु जैसा वदखना पयाजप्त नहीं। सच् च़ी साधना भ़ी तर से शुरू होत़ी है। यमथत् वमन्द्र यामण िनसा मनयम् यारभतेऽजुमन। किेमन्द्रयैः किमयोगिसिः स मवमशष्यते॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 7 सरल अथज जो िनुष् य िन से इंवद्र यों को वनयंवत्र त करके आसवि रवहत किज करता है, िह़ी श्रेष्ठ है। यह़ी किजयोग का िास्तविक अथज है। िनुष् य:संसार िें रहे, अपना कतजव्य वनभाए , लेवकन अहंकार और लोभ िें न िँसे। वनयतं कुरु किज त् िं किज ज् यायो ह्य किजणाः। शऱी रयात्र ावप च ते न प्र वसद्ध् येदकिजणाः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 8
70 सरल अथज तुि अपना वनयत किज करो, क् योंवक किज न करने से किज करना श्रेष्ठ है। वबना किज के शऱी र का पालन भ़ी संभि नहीं । आलस्य ज़ीिन को किजोर बना देता है। आज कई लोग: वबना िेहनत सिलता चाहते हैं, लेवकन ग़ीता वसखात़ी है वक: पररश्रि और कतजव्य ह़ी ज़ीिन को िहान बनाते हैं। यज्ञ ाथामत् किमणोऽन् यत्र लोकोऽयं किमबन् धनः। तदथं किम कौन् तेय िुिसङ्गः सिाचर॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 9 सरल अथज यज्ञ अथाजत उच् च उद्देश् य के वलए वकए गए किज िनुष् य को बाँधते नहीं । इसवलए आसवि रवहत होकर किज करो। यवद िनुष् य केिल स् िाथज के वलए किज करेगा, तो उसका िन बंधनों िें िँस जाएगा। लेवकन: सेिा, धिज, और ईश्वर भाि से वकया गया किज िन को शुद्ध करता है। सहयज्ञ ाः िजाः सृष्ट् वा पुरोवाच िजापमतः। अनेन िसमवष् यध् विेष वोऽमथत् वष्ट कािधुक्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 10 सरल अथज सृवष्ट के आरंभ िें प्र जापवत ने यज्ञ सवहत िनुष् यों की रचना करके कहा — इससे तुि उन् नवत करोगे। ग़ीता वसखात़ी है वक: िनुष् य केिल अपने वलए नहीं ज़ीता , उसका ज़ी िन सिाज और धिज से जुडा है। जब िनुष् य: सेिा, त् याग , और सहयोग के साथ ज़ीिन ज़ीता है , तभ़ी िास्तविक उन्नवत होत़ी है। । देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन् तु वः। परथपरं भावयन् तः श्रे यः परिवाप् थयथ॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 11 सरल अथज
71 इस यज्ञ भाि से देिताओं को प्र सन् न करो, और िे देिता तुम् हें उन् नवत देंगे। इस प्र कार एक -दूसरे की सहायता करते हुए तुि परि ककयाण को प्र ाप्त करोगे। श्ऱी कृष् ण यहाँ िनुष् य और प्र कृवत के संतुलन की बात कर रहे हैं। “देिता” का अथज केिल स् िगज के देि नहीं है। यहाँ उसका अथज उन शवियों से भ़ी है जो संसार को चलात़ी हैं: सूयज, िषाज, पृथ् ि़ी , िायु, और प्र कृवत की शवियाँ। जब िनुष् य: प्र कृवत का सम् िान करता है, सिाज के वलए कायज करता है, और केिल स् िाथज िें नहीं ज़ीता , तब संसार िें संतुलन बना रहता है। आज: स् िाथज , प्र दूषण, और लालच के कारण प्र कृवत का संतुलन वबगड रहा है। ग़ीता वसखात़ी है: िनुष् य और प्र कृवत का संबंध सेिा और संतुलन पर आधाररत होना चावहए। इष्टान्भोगामन्ह वो देवा दाथयन्ते यज्ञभामवताः। तैदमत्त ानिदायैभ् यो यो भुङ्िे थतेन एव सः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 12 सरल अथज यज्ञ भाि से प्र सन् न देिता तुम् हें आिश् यक िस् तुएँ देंगे। लेवकन जो िनुष् य उन्हें लौटाए वबना केिल भोग करता है , िह चोर के सिान है। यहाँ ग़ी ता कृतज्ञ ता का िहत्ि वसखात़ी है। िनुष् य जो कुछ प्र ाप्त करता है: अन्न , जल, िायु, ज़ीिन , सब प्र कृवत और ईश्व र की देन है। लेवकन आज का िनुष् य: केिल लेना चाहता है, लौटाना नहीं। ग़ीता कहत़ी है: जो केिल अपने सुख के वलए ज़ी ता है, िह ज़ीिन के िास्तविक धिज को नहीं सिझता। यज्ञ मशष्ट ामशनः सन् तो िुच् यन् ते सवममकमकबषैः। भुञ् जते ते त् वघं पापा ये पचन्त् यात् िकारणात्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 13 सरल अथज
72 जो लोग यज्ञ भाि से किज करके प्र ाप्त िस् तुओं का उपयोग करते हैं, िे पापों से िुि होते हैं। लेवकन जो केिल अपने वलए ज़ी ते हैं, िे पाप भोगते हैं। यहाँ “यज्ञ ” का अथज केिल अवग् न िें आहुवत देना नहीं है। सच्चा यज्ञ है: सेिा, त् याग , और वनाःस्िाथज किज। आज: लोग केिल अपने लाभ के बारे िें सोचते हैं,इसवलए सिाज िें अशांवत बढ रह़ी है। ग़ीता वसखात़ी है: जो दूसरों के वहत के वलए ज़ी ता है, िह़ी िास् तविक पुण्ड् य प्र ाप्त करता है। अन्नाद्भवमन्त भूतामन पजमन् यादन् नसम् भवः। यज्ञ ाद्भ वमत पजमन् यो यज्ञ ः किमसिुद्भ वः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 14 सरल अथज सभ़ी प्र ाण़ी अन्न से ज़ीवित रहते हैं। अन्न िषाज से उत्पन्न होता है , िषाज यज्ञ से होत़ी है और यज्ञ किज से उत्पन्न होता है। ग़ीता यहाँ ज़ीिन के चक्र को सिझा रह़ी है। िनुष् य अकेला नहीं ज़ी सकता। उसका ज़ीिन: प्र कृवत, सिाज, और किज से जुडा हुआ है। जब संसार िें: धिज, संतुलन, और कतजव्य बने रहते हैं, तभ़ी ज़ीिन सह़ी चलता है। किम ब्रह्म ोद्भ वं मवमद्ध ब्रह्म ाक्ष रसिुद्भ वि्। तथिात् सवमगतं ब्रह्म मनत् यं यज्ञे िमतमिति्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 15 सरल अथज किज िेदों से उत् पन् न हुआ है और िेद परिात् िा से प्र कट हुए हैं। इसवलए परिात्िा सदा यज्ञ िें वस्थत हैं। ग़ीता वसखात़ी है वक: सच् चा किज ईश्व र से जुडा होना चावहए।यवद किज:सत्य ,धिज,और सेिासे जुडा हो, तो िह़ी पूजा बन जाता है। एवं िवमतमतं चक्रं नानुवतमयतीह यः।
73 अघायुररमन्द्र यारािो िोघं पाथम स जीवमत॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 16 सरल अथज जो िनुष् य इस धिजिय चक्र का पालन नहीं करता और केिल इंवद्र यों के सुख िें ज़ीता है , उसका ज़ीिन व् य थज जाता है।आज अवधकांश लोग:केिल भोग,िनोरंजन,और इच् छाओंके प़ी छे भाग रहे हैं। लेवकन ग़ी ता पूछत़ी है: क् या केिल खाना, किाना और भोगना ह़ी ज़ीिन है ?यवद िनुष् य:धिज,सेिा,और आत् िज्ञ ानसे दूर हो जाए, तो उसका ज़ी िन अधूरा रह जाता है। यथत् वात् िरमतरेव थयादात् ितृप्त ि िानवः। आत् िन् येव च सन् तुष्ट थतथय कायं न मवद्य ते॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 17 सरल अथज जो िनुष् य आत् िा िें ह़ी आनंद और संतोष प्र ाप्त कर लेता है, उसके वलए बाहऱी िस् तुओं का िहत् ि कि हो जाता है।आज लोग सुख को बाहर खोजते हैं:धन िें,िस् तुओं िें,और प्र शंसा िें।लेवकन ग़ी ता कहत़ी है:िास् तविक आनंद भ़ी तर है। जब िनुष् य:आत् िा,ईश्वर ,और सत् यसे जुडता है, तब उसे भ़ीतर से संतोष विलने लगता है। नैव तथय कृतेनाथो नाकृतेनेह किन। न चाथय सवमभूतेषु कमिदथमव् यपाश्र यः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 18 सरल अथज ऐसे ज्ञ ाऩी िनुष् य का न किज करने िें कोई स् िाथज होता है और न किज छोडने िें। िह वकस़ी पर वनभजर नहीं रहता। वजस िनुष् य ने भ़ी तर की शांवत पा ल़ी , िह अहंकार से िुि हो जाता है, और स् िाथज से ऊपर उिने लगता है। तथिादसिः सततं कायं किम सिाचर। असिो ह्य ाचरन् किम परिाप् नोमत पूरु षः॥
74 — अध्याय 3 , श्ल ोक 19 सरल अथज इसवलए आसवि छोडकर वनरंतर अपना कतजव्य किज करो। ऐ सा करने िाला िनुष् य परि लक्ष् य को प्र ाप्त करता है।यह़ी किजयोग का सार है।िनुष् य:किज करे,लेवकन अहंकार और िल की वचंता िें न िँसे।आज:लोग जकद़ी पररणाि चाहते हैं,इसवलए धैयज खो देते हैं। ग़ीता वसखात़ी है: धैयज,वनष्ठा ,और वनरंतर किजह़ी सिलता का िास्तविक िागज हैं किमणैव मह संमसमद्ध िामथथता जनकादयः। लोकसंग्र हिेवामप सम् पश् यन् कतुमिहममस॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 20 सरल अथज राजा जनक आवद िहापुरु षों ने किज करते हुए ह़ी वसवद्ध प्र ाप्त की थ़ी । इसवलए लोकककयाण को देखकर तुम् हें भ़ी किज करना चावहए। कृष् ण अजुजन को सिझा रहे थे वक िहानता केिल संसार छोडने से नहीं विलत़ी । राजा जनक:राजा होते हुए भ़ी ज्ञ ाऩी थे,राज् य चलाते हुए भ़ी आत्िज्ञान प्र ाप्त कर चुके थे। यहाँ ग़ीता वसखात़ी है: संसार िें रहकर भ़ी आध्यावत्िक ज़ीिन वजया जा सकता है।आज कई लोग सोचते हैं:धिज का अथज केिल जंगल या आश्रि िें जाना है। लेवकन ग़ीता कहत़ी है: पररिार,सिाज और कतजव् य वनभाते हुए भ़ी ईश्व र के िागज पर चला जा सकता है। यद्यदाचरमत श्रे िथतत्तदेवेतरो जनः। स यत् ििाणं कुरु ते लोकथतदनुवतमते॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 21 सरल अथज श्रेष्ठ व् यवि जैसा आचरण करता है , सािान्य लोग भ़ी िैसा ह़ी करने लगते हैं।
75 यह श्ल ोक सिाज के वलए बहुत िहत् िपूणज है। लोग: अपने नेताओं, गुरु ओं, िाता- वपता, और प्र वसद्ध व् यवियों को देखकर स़ीखते हैं। यवद श्रेष्ठ लोग: सत्य , ईिानदाऱी , और धिज का पालन करेंगे, तो सिाज भ़ी उस़ी वदशा िें जाएगा। लेवकन यवद: लालच, भ्रष्ट ाचार , और अहंकार बढेगा, तो सिाज भ़ी उस़ी का अनुसरण करेगा। आज के सिय िें यह श्ल ोक और भ़ी िहत् िपूणज हो जाता है क् यों वक: बच्चे बडों को देखकर स़ीखते हैं , सिाज प्र वसद्ध लोगों का अनुसरण करता है। इसवलए: हर िनुष् य को अपने आचरण पर ध् यान देना चावहए। न िे पाथाममथत कतमव् यं मत्र षु लोकेषु मकञ् चन। नानवाप्त िवाप्तव् यं वतम एव च किममण॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 22 सरल अथज हे अजुजन! त़ी नों लोकों िें िेरे वलए कुछ भ़ी कतजव् य नहीं है और िुझे कुछ प्र ाप्त करना शेष नहीं है , विर भ़ी िैं किज करता ह ँ। यहाँ श्ऱी कृष् ण स् ियं उदाहरण दे रहे हैं। ईश्वर को: कुछ पाने की आिश् यकता नहीं , विर भ़ी िे संसार के संचालन के वलए किज करते हैं। ग़ीता वसखात़ी है: किज केिल स् िाथज के वलए नहीं होना चावहए , बवकक धिज और लोकककयाण के वलए भ़ी होना चावहए। यमद ह्य हं न वतेयं जातु किमण् यतमन्द्र तः। िि वत् िामनुवतमन् ते िनुष् याः पाथम सवमशाः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 23 सरल अथज यवद िैं किज करना छोड दूँ, तो लोग भ़ी िेरे िागज का अनुसरण करके किज करना छोड देंगे। सिाज उदाहरण से चलता है। यवद: िाता-वपता वजम्िेदाऱी छोड दें , गुरु धिज छोड दें, नेता सत्य छोड दें , तो सिाज ध़ीरे -ध़ीरे पतन की ओर जाने लगता है। इसवलए: जो वजतना बडा होता है, उसकी वजम्िेदाऱी उतऩी अवधक होत़ी है। उत् सीदेयुररिे लोका न कुयां किम चेदहि्।
76 सङ्करथय च कताम थयािुपहन् यामििाः िजाः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 24 सरल अथज यवद िैं किज न करूँ , तो ये लोग नष्ट हो जा एँगे और संसार िें अव् यिस् था िैल जाएग़ी। संसार व् यिस् था और कतजव् य पर चलता है। जब: लोग अपने धिज और वजम्िेदाऱी छोड देते हैं , तब: पररिार टूटते हैं, सिाज किजोर होता है, और अधिज बढता है। ग़ीता वसखात़ी है: प्रत् येक िनुष् य का किज संसार को प्र भावित करता है। सिाः किमण् यमवद्व ांसो यथा कुवममन् त भारत। कुयाममद्वद्व ांथतथासिमिकीषुमलोकसंग्र हि्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 25 सरल अथज अज्ञाऩी लोग आसवि से किज करते हैं , लेवकन ज्ञ ाऩी िनुष् य लोकककयाण के वलए वबना आसवि के किज करता है। दो प्र कार के किज होते हैं: स् िाथज से वकया गया किज सेिा और धिज से वकया गया किज, ज्ञ ाऩी िनुष् य: केिल अपने लाभ के वलए नहीं ज़ीता , बवकक दूसरों के वहत के वलए भ़ी कायज करता है। न बुमद्ध भेदं जनयेदज्ञ ानां किमसङ्मगनाि्। जोषयेत् सवमकिाममण मवद्व ान् युिः सिाचरन्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 26 सरल अथज ज्ञ ाऩी िनुष् य को अज्ञ ाऩी लोगों की बुवद्ध िें भ्र ि उत् पन् न नहीं करना चावहए, बवकक स् ियं सह़ी किज करके उन् हें प्रे ररत करना चावहए। ग़ीता वसखात़ी है: दूसरों को अपिावनत करके नहीं , बवकक अपने आचरण से प्रे ररत करना चावहए। आज लोग: वििाद अवधक करते हैं, लेवकन स् ियं सह़ी उदाहरण कि प्रस् तुत करते हैं।
77 िकृतेः मक्र यिाणामन गुणैः किाममण सवमशः। अहङ्कारमविूढात् िा कतामहमिमत िन् यते॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 27 सरल अथज सभ़ी किज प्र कृवत के गुणों द्व ारा वकए जाते हैं, लेवकन अहंकार िें पडा िनुष् य सोचता है वक “िैं ह़ी सबकुछ कर रहा ह ँ।” अहंकार िनुष् य की सबसे बड़ी किजोऱी है। जब: सिलता विलत़ी है , तो िनुष् य सोचने लगता है: “सब िैंने वकया।” लेवकन ग़ीता कहत़ी है: िनुष् य अकेला कुछ नहीं कर सकता। ज़ीिन िें: प्र कृवत, सिय, सिाज, और ईश्वर की कृपा सबका योगदान होता है। अहंकार: िनुष् य को सत् य से दूर कर देता है, और अंत िें पतन का कारण बनता है। तत्त् वमवत्तु िहाबाहो गुणकिममवभागयोः। गुणा गुणेषु वतमन् त इमत ित् वा न सज् जते॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 28 सरल अथज हे अजुजन! जो िनुष् य प्र कृवत के गुणों और किों का सत् य जानता है, िह यह सिझकर आसि नहीं होता वक गुण ह़ी गुणों िें कायज कर रहे हैं। श्ऱी कृष् ण यहाँ बहुत गहरा आध् यावत् िक ज्ञ ान दे रहे हैं। संसार िें जो कुछ हो रहा है: शऱीर , इंवद्र याँ, िन, और प्र कृवत के गुण उनके अनुसार चलता है। लेवकन अज्ञ ाऩी िनुष् य: हर बात िें “िैं” और “िेरा” जोड देता है। ज्ञ ाऩी व् यवि सिझता है: िह केिल ईश्वर की व् यिस्था का एक भाग है। इससे: अहंकार कि होता है, िन शांत होता है, और आसवि घटत़ी है। िकृतेगुमणसम् िूढाः सज् जन् ते गुणकिमसु। तानकृत् थनमवदो िन् दान् कृत् थनमवन् न मवचालयेत्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 29 सरल अथज
78प्र कृवत के गुणों से िोवहत लोग किों िें आसि रहते हैं। ज्ञ ाऩी िनुष् य को उन् हें भ्र वित नहीं करना चावहए। हर व् यवि एक ह़ी स् तर की सिझ नहीं रखता। कुछ लोग: केिल संसार को ह़ी सत् य िानते हैं, और भोग िें ज़ीिन वबताते हैं। ग़ीता वसखात़ी है: ज्ञ ाऩी व् यवि को धैयज रखना चावहए , और दूसरों को ध़ी रे-ध़ीरे सह़ी िागज वदखाना चावहए। िमय सवाममण किाममण संन् यथयाध् यात् िचेतसा। मनराशीमनमिमिो भूत् वा युध् यथव मवगतज् वरः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 30 सरल अथज अपने सभ़ी किज िुझे सिवपजत करके, आशा और ििता छोडकर, वचंता रवहत होकर अपना कतजव्य करो। यह किजयोग का अत् यंत िहत् िपूणज श्ल ोक है। ग़ीता वसखात़ी है: किज करो, लेवकन हर किज को ईश्वर को सिवपजत भाि से करो। जब िनुष् य: हर कायज िें ईश्वर को याद करता है , तो: भय कि होने लगता है, तनाि घटता है, और िन हकका हो जाता है। आज: लोग भविष् य की वचंता िें ज़ी ते हैं, इसवलए िानवसक शांवत खो देते हैं। ग़ीता कहत़ी है: ईश्वर पर विश्वास रखो , और अपना कतजव्य करते रहो। ये िे ितमिदं मनत् यिनुमतिमन् त िानवाः। श्रद्ध ावन् तोऽनसूयन् तो िुच् यन् ते तेऽमप किममभः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 31 सरल अथज जो िनुष् य श्रद्ध ा से िेरे इस उपदेश का पालन करते हैं, िे किजबंधन से िुि हो जाते हैं। श्रद्ध ा के वबना ज्ञ ान अधूरा रह जाता है। आज लोग: बहुत सुनते हैं बहुत पढते हैं, लेवकन ज़ी िन िें लागू नहीं करते। ग़ीता वसखात़ी है:
79 केिल सुनना पयाजप्त नहीं , ज़ीिन िें उतारना आिश्यक है। ये त् वेतदभ् यसूयन् तो नानुमतिमन् त िे िति्। सवमज्ञ ानमविूढांथतामन् वमद्ध नष्ट ानचेतसः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 32 सरल अथज जो लोग िेरे उपदेश का पालन नहीं करते और दोष वनकालते हैं , िे अज्ञान से िोवहत होकर पतन को प्र ाप्त होते हैं। जब िनुष् य: अहंकार, लालच, और िोह िें िँस जाता है, तो िह सत्य को स् ि़ीकार नहीं कर पाता। ग़ीता वसखात़ी है: सत्य को सिझने के वलए विनम्रता आिश्यक है। सदृ शं चेष्ट ते थवथयाः िकृतेज्ञ ामनवानमप। िकृमतं यामन् त भूतामन मनग्र हः मकं कररष् यमत॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 33 सरल अथज ज्ञ ाऩी िनुष् य भ़ी अपऩी प्र कृवत के अनुसार ह़ी कायज करता है। सभ़ी प्र ाण़ी अपऩी प्र कृवत का अनुसरण करते हैं। हर व् यवि का स् िभाि अलग होता है। वकस़ी िें: क्र ोध अवधक , वकस़ी िें दया , वकस़ी िें धैयज , और वकस़ी िें चंचलता होत़ी है। ग़ीता वसखात़ी है: िनुष् य को अपऩी प्र कृवत को सिझकर उसे सह़ी वदशा देऩी चावहए। इमन्द्रयथयेमन्द्रयथयाथे रागद्वेषौ व् यवमथथतौ। तयोनम वशिागच्छेत्तौ ह्य थय पररपमन्थनौ॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 34 सरल अथज इंवद्र यों के विषयों िें राग और द्वे ष वछपे रहते हैं। िनुष् य को उनके िश िें नहीं होना चावहए, क् यों वक िे िागज के शत्रु हैं। िनुष् य: वजसे पसंद करता है, उससे अत्यवधक जुड जाता है, और वजसे नापसंद करता है, उससे द्वे ष करने लगता है। इस़ी से: क्र ोध ,
80 ईष्याज , और दुख पैदा होते हैं। ग़ीता वसखात़ी है: संतुलन आिश् यक है। श्रे यान् थवधिो मवगुणः परधिामत् थवनुमितात्। थवधिे मनधनं श्रे यः परधिो भयावहः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 35 सरल अथज दूसरों के श्रेष्ठ कायज से अपना साधारण कतजव् य श्रेष्ठ है। अपने धिज िें िरना भ़ी ककयाणकाऱी है , दूसरे के धिज का पालन भय उत् पन् न करता है। आज लोग: दूसरो की नकल करते हैं, तुलना िें ज़ी ते हैं, और अपना िागज भूल जाते हैं। ग़ीता वसखा त़ी है: हर व् यवि का अपना कतजव्य और िागज होता है। जो व् यवि: अपऩी क्ष िता , अपने धिज, और अपने कतजव्य को पहचान लेता है , िह़ी वस्थर ज़ीिन ज़ी सकता है। अजुजन उिाच। अथ केन ियुिोऽयं पापं चरमत पूरु षः। अमनच्छन्नमप वाष्णेय बलामदव मनयोमजतः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 36 सरल अथज अजुजन बोले — हे कृष् ण! िनुष् य इच् छा न होते हुए भ़ी पाप क् यों करता है, जैसे वकस़ी बल से प्रे ररत वकया गया हो ? यह बहुत गहरा प्रश्न है। आज भ़ी लोग जानते हैं: क्र ोध गलत है , लोभ गलत है, विर भ़ी िे गलत कायज कर बैिते हैं। अजुजन यह़ी जानना चाहते थे: िनुष् य को पाप की ओर कौन धकेलता है? श्ऱी भगिानुिाच। काि एष क्र ोध एष रजोगुणसिुद्भ वः। िहाशनो िहापाप् िा मवद्ध् येनमिह वैररणि्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 37 सरल अथज श्ऱी कृष् ण बोले — यह कािना और क्र ोध ह़ी िनुष् य का िहान शत्रु है, जो रजोगुण से उत्पन्न होता है। यह़ी ग़ी ता का बहुत िहत् िपूणज संदेश है। िनुष् य का सबसे बडा
81 शत्रु बाहर नहीं , उसके भ़ीतर है: अवनयंवत्र त इच् छाएँ, और क्र ोध। इच् छाएँ पूऱी न होने पर: क्र ोध उत्पन्न होता है , और क्र ोध बुवद्ध को नष्ट कर देता है। आज: पररिार टूट रहे हैं, ररश्ते वबगड रहे हैं , िानवसक तनाि बढ रहा है, इन सबके प़ी छे अवनयंवत्र त इच्छाएँ और क्र ोध बडा कारण हैं धूिेनामव्र यते वमियमथादशो िलेन च। यथोकबेनावृतो गभमथतथा तेनेदिावृति्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 38 सरल अथज जैसे अवग् न धुएँ से, दपजण धूल से और गभज आिरण से ढका रहता है, िैसे ह़ी ज्ञ ान कािना से ढक जाता है। श्ऱी कृष् ण यहाँ बता रहे हैं वक िनुष् य के भ़ी तर ज्ञ ान तो होता है, लेवकन इच्छाएँ उसे ढक देत़ी हैं। वजस प्र कार: धुआँ अवग् न की चिक को कि कर देता है, धूल दपजण को धुंधला कर देत़ी है, उस़ी प्र कार: लोभ, िासना, और अत्यवधक इच्छाएँ िनुष् य की बुवद्ध को ढक देत़ी हैं। आज: लोग सह़ी और गलत जानते हुए भ़ी , लालच और िोह के कारण गलत वनणजय ले लेते हैं। ग़ीता वसखात़ी है: ज्ञ ान का सबसे बडा शत्रु अवनयंवत्र त इच् छा है। आवृतं ज्ञ ानिेतेन ज्ञ ामननो मनत् यवैररणा। कािरू पेण कौन् तेय दुष् पूरेणानलेन च॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 39 सरल अथज हे अजुजन! यह कािना रू प़ी अवग् न ज्ञ ान को ढक देत़ी है। यह िनुष् य का कभ़ी न भरने िाला शत्रु है। इच्छाएँ कभ़ी सिाप्त नहीं होतीं। िनुष् य सोचता है: थोडा धन विल जाए तो सुख विलेगा, विर अवधक धन चाहता है, विर सम्िान , विर शवि इस़ी कारण: िन को शांवत नहीं विलत़ी । ग़ीता कहत़ी है: इच्छा अवग्न के सिान है , उसिें वजतना ईंधन डालो, िह उतऩी ह़ी बढत़ी है। आज: तुलना, वदखािा, और लालच
82 इस़ी अवग्न को और बढा रहे हैं। इमन्द्र यामण िनो बुमद्ध रथयामधिानिुच् यते। एतैमवमिोहयत् येष ज्ञ ानिावृत् य देमहनि्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 40 सरल अथज इंवद्र याँ, िन और बुवद्ध — यह़ी कािना के वनिास स् थान हैं। इनके द्व ारा यह िनुष् य के ज्ञ ान को ढककर उसे भ्र वित कर देत़ी है। िनुष् य का पतन बाहर से नहीं , भ़ीतर से शुरू होता है। पहले: इंवद्र याँ आकवषजत होत़ी हैं, विर: िन उनिें िँसता है, विर: बुवद्ध भ्र वित हो जात़ी है। इस़ी कारण िनुष् य: गलत को सह़ी सिझने लगता है। आज: िोबाइल, भोग, िनोरंजन, और लालच िन को हर सिय खींचते रहते हैं। ग़ीता वसखात़ी है: यवद िन और इंवद्र यों पर वनयंत्र ण न हो, तो बुवद्ध किजोर पड जात़ी है। तथिात्त्वमिमन्द्रयाण्यादौ मनयम्य भरतषमभ। पाप् िानं िजमह ह्ये नं ज्ञ ानमवज्ञ ाननाशनि्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 41 सरल अथज इसवलए हे अजुजन! सबसे पहले इंवद्र यों को वनयंवत्र त करो और इस पाप रू प़ी कािना का नाश करो, जो ज्ञ ान और वििेक को नष्ट करत़ी है। श्ऱी कृष् ण यहाँ सिाधान बता रहे हैं। यवद िनुष् य: अपऩी इच् छाओं को वनयंवत्र त करना स़ी ख ले, तो उसका ज़ीिन बदल सकता है। आज: अवधकांश दुखों का कारण अवनयंवत्र त इच् छाएँ हैं। इस़ीवलए: संयि, धैयज, और आत् िवनयंत्र ण बहुत आिश् यक हैं। ग़ीता वसखात़ी है: िास् तविक स् ितंत्र ता िन की विजय िें है। इमन्द्र यामण पराण् याहुररमन्द्र येभ् यः परं िनः। िनसथतु परा बुमद्ध यो बुद्धे ः परतथतु सः॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 42 सरल अथज
83 इंवद्र याँ श्रेष्ठ िाऩी जात़ी हैं, इंवद्र यों से िन श्रेष्ठ है, िन से बुवद्ध श्रेष्ठ है और बुवद्ध से भ़ी श्रेष्ठ आत्िा है। ग़ी ता िनुष् य की आंतररक शवि का क्र ि बता रह़ी है। शऱीर से ऊपर इंवद्र याँ हैं इंवद्र यों से ऊपर िन िन से ऊपर बुवद्ध और सबसे ऊपर आत्िा आज अवधकांश लोग: शऱी र और इच् छाओं तक ह़ी स़ी वित रह जाते हैं। लेवकन ग़ीता वसखात़ी है: िनुष् य केिल शऱी र नहीं , िह वदव्य आत्िा है। जब िनुष् य: आत्िा को पहचानने लगता है , तब: भय कि होने लगता है, िोह घटता है, और ज़ीिन की वदशा बदलने लगत़ी है। एवं बुद्धे ः परं बुद्ध् वा संथतभ् यात् िानिात् िना। जमह शत्रुं िहाबाहो कािरू पं दुरासदि्॥ — अध्याय 3 , श्ल ोक 43 सरल अथज हे अजुजन! बुवद्ध से परे आत् िा को जानकर िन को वस् थर करो और इस कविन कािना रू प़ी शत्रु को ज़ी त लो। यहीं अध्याय 3 सिाप्त होता है। श्ऱी कृष् ण ने अजुजन को सिझाया: िनुष् य का सबसे बडा शत्रु बाहर नहीं , उसके भ़ी तर की अवनयंवत्र त इच् छाएँ हैं। यवद िनुष् य: िन को वनयंवत्र त करे, बुवद्ध को शुद्ध करे, और आत्िा के सत्य को सिझे, तो िह: क्र ोध , लोभ, और िोह पर विजय पा सकता है।
84 अध् याय 3 का िुख् य संदेश यह़ी है: किज से भागो ित, सह़ी किज करो , लेवकन स् िाथज और िल की वचंता िें ित िँसो। यह़ी किजयोग है , और यह़ी ज़ीिन को िहान बनाने का िागज है तीसरे अध्याय से मिलने वाली िेरणादायक मशक्षाएाँ 1. किज वकए वबना ज़ीिन नहीं चल सकता भगिान श्ऱी कृष् ण कहते हैं वक कोई भ़ी व् यवि एक क्ष ण भ़ी वबना किज वकए नहीं रह सकता। वशक्षा: आलस्य छोडकर सदैि अच्छे किज करते रहना चावहए। 2. वनाःस्िाथज भाि से किज करो अपने लाभ या स् िाथज के वलए नहीं , बवकक कतजव्य सिझकर किज करना चावहए। वशक्षा: सेिा और कतजव्य की भािना से वकया गया कायज श्रेष्ठ होता है । 3. किज ह़ी सिलता का िागज है केिल सोचने या इच्छा करने से सिलता नहीं विलत़ी , उसके वलए किज करना आिश्यक है। वशक्षा: िेहनत और किज ह़ी ज़ीिन को आगे बढाते हैं। 4. िहान व् यवि उदाहरण बनते हैं सिाज के लोग श्रेष्ठ व् यवियों के आचरण का अनुसरण करते हैं। वशक्षा: ऐसा ज़ी िन वजयो वजससे दूसरों को प्रे रणा विले। 5. अहंकार से बचो िनुष् य सोचता है वक "िैं ह़ी सब कुछ कर रहा ह ँ", लेवकन िास् ति िें प्र कृवत के गुणों से ह़ी किज होते हैं। वशक्ष ा: सिलता विलने पर घिंड नहीं करना चावहए।
85 6. काि (िासना) और क्र ोध सबसे बडे शत्रु हैं भगिान श्ऱी कृष् ण बताते हैं वक कािना और क्र ोध िनुष् य के ज्ञ ान को नष्ट कर देते हैं। वशक्ष ा: इच् छाओं और क्र ोध पर वनयंत्र ण रखना चावहए। 7. अपने कतजव्य का पालन करो दूसरे के कायज को करने से बेहतर है वक िनुष् य अपना कतजव् य वनभाए, चाहे उसिें कविनाई ह़ी क् यों न हो। वशक्षा: अपऩी वजम्िेदाररयों से भागना नहीं चावहए। त़ी सरे अध् याय का िुख् य संदेश िनुष् य को िल की इच् छा छोडकर ईिानदाऱी , वनाःस्िाथज भाि और सिपजण के साथ अपने कतजव्य का पालन करते रहना चावहए। यह़ी किजयोग है और यह़ी ज़ीिन की सिलता का िागज है। "किजयोग हिें वसखाता है वक सिलता का रहस्य भाग्य िें नहीं ,बवकक वनरंतरऔर वनाःस्िाथज किज िें वछपा है। "
86 अध्याय 4 — ज्ञ ान किज संन् यास योगश्ऱी भगिानुिाच। इिं मववथवते योगं िोिवानहिव् ययि्। मववथवान् िनवे िाह िनुररक्ष् वाकवेऽब्र वीत्॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 1 सरल अथज श्ऱी कृष् ण बोले — िैंने इस अविनाश़ी योग को सूयजदेि वििस् िान को बताया था। वििस् िान ने िनु को और िनु ने इक्ष् िाकु को बताया। यहाँ श्ऱी कृष् ण अजुजन को बता रहे हैं वक ग़ी ता का ज्ञ ान कोई नया ज्ञ ान नहीं है। यह सनातन ज्ञ ान है , जो सृवष्ट के प्र ारम् भ से चला आ रहा है। “अव्यय योग ” का अथज है: ऐसा ज्ञ ान जो कभ़ी नष्ट नहीं होता , जो हर युग िें सत् य रहता है। आज संसार बदल गया है: विज्ञान बढ गया , तकऩीक बदल गई , ज़ीिन की गवत तेज हो गई, लेवकन िनुष् य के भ़ी तर भय, िोह, क्र ोध , लोभ, और दुख आज भ़ी िैसे ह़ी हैं जैसे हजारों िषज पहले थे। इस़ीवलए ग़ीता का ज्ञ ान आज भ़ी उतना ह़ी आिश्यक है।
87श्ऱी कृष् ण यहाँ यह भ़ी बताते हैं वक सत्य केिल पढने की च़ीज नहीं , बवकक परंपरा से ज़ीिन िें उतारने योग्य ज्ञ ान है। पहले गुरु वशष् य को देते थे, विर िह आगे बढता था। इस़ी कारण धिज और ज्ञ ान ज़ीवित रहते थे। आज जानकाऱी ब हुत है, लेवकन सच्चा ज्ञ ान कि होता जा रहा है। लोग बाहऱी सिलता तो पा रहे हैं , लेवकन भ़ीतर शांवत खो रहे हैं। ग़ीता वसखात़ी है: यवद िनुष् य केिल संसार िें उलझा रहेगा, तो िन कभ़ी शांत नहीं होगा। िास्तविक ज्ञ ान िह़ी है: जो िनुष् य को भ़ी तर से बदल दे, और उसे सत्य के िागज पर ले जाए। एवं परम् परािाप्त मििं राजषमयो मवदुः। स कालेनेह िहता योगो नष्टः परन्तप॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 2 सरल अथज यह ज्ञ ान परंपरा से राजवषजयों द्व ारा जाना गया, लेवकन सिय के साथ यह संसार से लुप्त हो गया। “राजवषज” िे लोग थे: जो राजा भ़ी थे , और ऋवष सिान ज्ञ ाऩी भ़ी। उनके पास: शवि भ़ी थ़ी , और धिज भ़ी। आज संसार की बड़ी सिस् या यह़ी है वक शवि तो बढ रह़ी है , लेवकन धिज और वििेक कि होते जा रहे हैं।जब िनुष् य केिल धन, भोग, और स् िाथज िें डूब जाता है, तब सच्चा ज्ञ ान ध़ीरे -ध़ीरे खोने लगता है। ग़ीता वसखात़ी है: यवद सिाज से धिज हट जाए, तो बाहऱी प्र गवत भ़ी िनुष् य को सुख नहीं दे सकत़ी। आज तनाि, अकेलापन, क्र ोध , और िानवसक अशांवत इस़ी कारण बढ रह़ी है क् यों वक िनुष् य ने आत् िज्ञ ान को प़ी छे छोड वदया है। स एवायं िया तेऽद्य योगः िोिः पुरातनः। भिोऽमस िे सखा चेमत रहथयं ह्ये तदुत्त िि्॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 3 सरल अथज
88 आज िह़ी प्र ाच़ी न योग िैं तुम् हें बता रहा ह ँ क् यों वक तुि िेरे भि और वित्र हो। यह अत् यंत श्रेष्ठ रहस् य है। ग़ी ता का ज्ञ ान हर व् यवि को तुरंत सिझ नहीं आता। इसके वलए आिश्यक है: श्रद्ध ा , विनम्रता , और सत्य जानने की इच्छा । अजुजन: केिल योद्धा नहीं थे , िे सच्चे िन से सत्य जानना चाहते थे। इस़ी कारण श्ऱी कृष् ण उन् हें यह वदव् य ज्ञ ान दे रहे थे। आज भ़ी यवद िनुष् य अहंकार से भरा हो, और केिल तकज करना चाहता हो, तो िह गहरे सत्य को नहीं सिझ पाता। ज्ञ ान उस़ी के भ़ीतर उतरता है जो स़ीखने के वलए तैयार हो। यहाँ श्ऱी कृष् ण अजुजन को “भि” और “वित्र ” दोनों कह रहे हैं। इसका अथज है ईश्वर से केिल भय का नहीं , प्रे ि और विश्व ास का संबंध होन चावहए। जब िनुष् य ईश्वर को अपना िानने लगता है , तब उसका भय ध़ीरे -ध़ीरे कि होने लगता है। अजुजन उिाच। अपरं भवतो जन् ि परं जन् ि मववथवतः। कथिेतमद्व जानीयां त् विादौ िोिवामनमत॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 4 सरल अथज अजुजन बोले — आपका जन् ि तो अभ़ी हुआ है और सूयजदेि का जन् ि बहुत पहले हुआ था। विर आपने उन् हें यह ज्ञ ान कैसे वदया? अजुजन के िन िें स् िाभाविक प्रश्न उत् पन् न हुआ। िे श्ऱी कृष् ण को अपने वित्र और सारथ़ी के रू प िें जानते थे, इसवलए उन् हें आश्च यज हुआ वक श्ऱी कृष् ण इतने प्र ाच़ी न सिय की बात कैसे कर रहे हैं। यहाँ ग़ी ता एक िहत् िपूणज वशक्ष ा देत़ी हैप्रश्न करना गलत नहीं है। सच्चा ज्ञ ान: वजज्ञासा ,
89 और सिझने की इच्छा से प्र ाप्त होता है । आज कई लोग: वबना सिझे विश्वास करते हैं, या वबना सिझे विरोध करते हैं। लेवकन ग़ीता वसखात़ी है सिझकर सत्य को स् ि़ीकार करना चावहए। अजुजन का प्रश्न यह भ़ी वदखाता है वक िे अब केिल युद्ध नहीं , बवकक ज़ीिन और ईश्वर के रहस्य को सिझना चाहते थे। यहीं से ग़ीता का ज्ञ ान औ र भ़ी गहरा होने लगता है। । श्ऱी भगिानुिाच। बहूमन िे व् यतीतामन जन् िामन तव चाजुमन। तान् यहं वेद सवाममण न त् वं वेत् थ परन् तप॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 5 सरल अथज श्ऱी कृष् ण बोले — हे अजुजन! िेरे और तुम् हारे अनेक जन् ि हो चुके हैं। िैं उन सबको जानता ह ँ, लेवकन तुि नहीं जानते। यहाँ श्ऱी कृष् ण आत् िा और पुनजजन् ि के गहरे रहस् य की ओर संकेत कर रहे हैं। श्ऱी कृष् ण अजुजन को बता रहे हैं वक आत्िा केिल एक जन्ि तक स़ीवित नहीं है , िह अनेक जन्िों की यात्रा करत़ी है। लेवकन सािान् य िनुष् य: अपने वपछले जन्िों को याद नहीं रख पाता , क् योंवक िाया, शऱीर , और संसार का िोह उसके ज्ञ ान को ढक लेते हैं। ईश्वर सब जानते हैं क् योंवक िे काल से परे हैं, और उनकी चेतना पूणज है। आज िनुष् य केिल ितजिान ज़ी िन को ह़ी सबकुछ िान लेता है। इस़ी कारण िृत् यु का भय, िोह, और असुरक्ष ा बहुत बढ जात़ी है। ग़ीता वसखात़ी है: आत्िा शाश्वत है, शऱीर बदलते रहते हैं। जब िनुष् य इस सत् य को सिझने लगता है, तब िृत् यु का भय कि होने लगता है, और ज़ीिन को देखने का दृ वष्टकोण बदल जाता है। अजोऽमप सन् नव् ययात् िा भूतानािीश्व रोऽमप सन्। िकृमतं थवािमधिाय सम् भवाम् यात् ििायया॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 6 सरल अथज
90 िैं अजन् िा और अविनाश़ी होते हुए भ़ी अपऩी योगिाया से प्र कट होता ह ँ। यहाँ श्ऱी कृष् ण अपने वदव् य स् िरू प का ज्ञ ान दे रहे हैं। सािान् य िनुष् य: किों के कारण जन्ि लेता है, लेवकन ईश्वर किजबंधन से िुि होते हैं। ईश्वर का अितार वकस़ी िजबूऱी से नहीं , बवकक धिज की रक्षा के वलए होता है। “योगिाया” का अथज है ईश्वर की वदव्य शवि। आज कई लोग ईश्व र को केिल िूवतज या ककपना िानते हैं, लेवकन ग़ीता कहत़ी है ईश्व र सािान् य स़ी िाओं से परे हैं। िे सिय, जन्ि , और िृत् यु से बंधे नहीं हैं। यह श्ल ोक िनुष् य को यह सिझाता है वक संसार की हर च़ी ज स़ी वित है, लेवकन ईश्वर अस़ीि हैं। यदा यदा मह धिमथय ग् लामनभमवमत भारत। अभ् युत् थानिधिमथय तदात् िानं सृजाम् यहि्॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 7 सरल अथज जब-जब धिज की हावन और अधिज की िृवद्ध होत़ी है, तब-तब िैं अितार लेता ह ँ। यह ग़ी ता का अत् यंत प्र वसद्ध और शविशाल़ी श्ल ोक है। जब संसार िें अन्याय , अत्याचार , लोभ, वहंसा, और अधिज बहुत बढ जाते हैं, तब ईश्वर वकस़ी न वकस़ी रू प िें धिज की रक्षा करते हैं। यह केिल भगिान के अितार तक स़ीवित नहीं है। कई बार संत, िहापुरु ष, और सत्य के वलए खडे होने िाले लोग भ़ी ईश्वर की योजना का िाध्यि बनते हैं। आज भ़ी जब सिाज िें झूि बढता है, लोग धिज भूलने लगते हैं, और स् िाथज बढ जाता है , तब यह श्ल ोक आशा देता है वक अधिज स् थाय़ी नहीं है , सत् य अंत िें विजय़ी होता है। ग़ीता वसखात़ी है: िनुष् य को भ़ी धिज के पक्ष िें खडा होना चावहए। पररत्र ाणाय साधूनां मवनाशाय च दुष् कृताि्। धिमसंथथापनाथामय सम् भवामि युगे युगे॥
91 — अध्याय 4 , श्ल ोक 8 सरल अथज सज्जनों की रक्षा , दुष्टों के विनाश और धिज की स् थापना के वलए िैं युग-युग िे प्र कट होता ह ँ। ईश्व र का उद्देश् य केिल दंड देना नहीं है। उनका उद्देश्य धिज की रक्षा , और संसार िें संतुलन बनाए रखना है। “साधु” का अथज केिल साधु िि पहनने िाले लोग नहीं है। सच् चा साधु िह है जो सत्य के िागज पर चलता है , दूसरों का भला चाहता है, और धिज का पालन करता है। आज जो व् यवि ईिानदाऱी से ज़ीिन ज़ीता है , सत् य के वलए संघषज करता है, और दूसरों का भला करता है, िह भ़ी धिज के िागज पर चल रहा है। ग़ीता वसखात़ी है धिज कभ़ी पूऱी तरह नष्ट नहीं होता, ईश्वर वकस़ी न वकस़ी रू प िें उसकी रक्षा करते हैं। जन् ि किम च िे मदव् यिेवं यो वेमत्त तत्त् वतः। त् यक्त् वा देहं पुनजमन् ि नैमत िािेमत सोऽजुमन॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 9 सरल अथज जो िेरे वदव्य जन्ि और किज को सह़ी रू प िें जान लेता है , िह िृत् यु के बाद पुनजजन् ि को प्र ाप्त नहीं होता और िुझे प्र ाप्त होता है। यहाँ “िुझे प्र ाप्त होना” का अथज है परि शांवत, िोक्ष , और ईश्व र के वनकट पहुँचना। ग़ीता वसखात़ी है केिल बाहऱी पूजा पयाजप्त नहीं , ईश्वर के सत्य को सिझना भ़ी आिश्यक है। जब िनुष् य अहंकार,िोह, और अज्ञान से ऊपर उिने लगता है, तब उसका ज़ीिन बदलने लगता है। आज लोग: केिल संसार को ह़ी सत् य िानते हैं, लेवकन ग़ीता कहत़ी है: आत्िा और ईश्वर का ज्ञ ान ह़ी िास्तविक िुवि देता है। वीतरागभयक्र ोधा िन् िया िािुपामश्र ताः। बहवो ज्ञ ानतपसा पूता िद्भ ाविागताः॥
92 — अध्याय 4 , श्ल ोक 10 सरल अथज राग, भय और क्र ोध से िुि होकर, ज्ञ ानरू प़ी तप से शुद्ध होकर अनेक लोग िुझे प्र ाप्त हुए हैं। िनुष् य के सबसे बडे शत्रु : आसवि, भय, और क्र ोध हैं। आज लोग भविष्य के भय िें ज़ीते हैं , छोट़ी बातों पर क्र ोवधत हो जाते हैं , और संसार की िस् तुओं िें अत् यवधक आसि हो जाते हैं। इस़ी कारण िन अशांत रहता है। ग़ीता वसखात़ी है: ज्ञ ान िन को शुद्ध करता है, और ईश्वर के वनकट ले जाता है। जब िनुष् य: सत्य को सिझने लगता है, िन को वनयंवत्र त करता है, और ईश्वर पर विश्वास रखता है, तब भय कि होता है, क्र ोध शांत होता है, और ज़ीिन िें वस्थरता आने लगत़ी है। ये यथा िां िपद्यन् ते तांथतथैव भजाम् यहि्। िि वत् िामनुवतमन् ते िनुष् याः पाथम सवमशः॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 11 सरल अथज जो िनुष् य वजस प्र कार िुझे भजते हैं, िैं भ़ी उन्हें उस़ी प्र कार िल देता ह ँ। हे अजुजन! सभ़ी िनुष् य वकस़ी न वकस़ी रू प िें िेरे ह़ी िागज का अनुसरण करते हैं। श्ऱी कृष् ण यहाँ ईश्व र और िनुष् य के संबंध का बहुत गहरा सत् य बता रहे हैं। ईश्वर वकस़ी से पक्षपात नहीं करते , िे सभ़ी को उनके भाि के अनुसार स् ि़ी कार करते हैं। कोई भवि से ईश्वर को खोजता है , कोई ज्ञ ान से , कोई सेिा से, और कोई दुख िें ईश्वर को याद करता है। ग़ीता वसखात़ी है सच् चा भाि सबसे िहत् िपूणज है। आज कई लोग: केिल वदखािे की पूजा करते हैं, लेवकन िन कहीं और लगा रहता है। ईश्वर बाहऱी वदखािे से अवधक िन की सच्चाई , श्रद्ध ा , और प्रे ि को देखते हैं। यह श्ल ोक यह भ़ी बताता है वक संसार िें जो भ़ी सत् य, प्रे ि और धिज की ओर बढता है, िह अंतताः ईश्व र की ओर ह़ी बढ रहा होता है।
93 काङ्क्षन् तः किमणां मसमद्धं यजन् त इह देवताः। मक्ष िं मह िानुषे लोके मसमद्ध भमवमत किमजा॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 12 सरल अथज जो लोग किों की सिलता चाहते हैं , िे देिताओं की पूजा करते हैं, क् यों वक इस संसार िें किों का िल जकद़ी प्र ाप्त होता है। यहाँ श्ऱी कृष् ण िनुष् य की सािान् य प्र िृवत्त बता रहे हैं। अवधकांश लोग पूजा भ़ी वकस़ी इच्छा के वलए करते हैं, जैसे: धन, सिलता, संतान, या सुख प्र ाप्त करने के वलए। ग़ीता यह नहीं कहत़ी वक यह गलत है, लेवकन यह वसखात़ी है वक केिल इच् छाओं तक स़ी वित भवि अधूऱी है। सच्च़ी भवि िह है वजसिें िनुष् य केिल लाभ के वलए नहीं , बवकक प्रे ि और श्रद्ध ा से ईश्वर को याद करे। आज भ़ी बहुत लोग संकट िें ह़ी ईश्व र को याद करते हैं, लेवकन ग़ीता वसखात़ी है ईश्वर केिल आिश्यकता का साधन नहीं , बवकक ज़ीिन का आधार हैं। चातुवमण् यं िया सृष्टं गुणकिममवभागशः। तथय कतामरिमप िां मवद्ध् यकतामरिव् ययि्॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 13 सरल अथज चार िणों की व् यिस् था िैंने िनुष् यों के गुण और किज के अनुसार बनाई है। यद्य वप िैं उसका कताज ह ँ, विर भ़ी िैं अकताज और अविनाश़ी ह ँ। यहाँ ग़ी ता का बहुत गलत अथज वनकाला जाता है, इसवलए इसे सह़ी सिझना आिश्यक है। श्ऱी कृष् ण यहाँ जन् ि के आधार पर नहीं , बवकक गुण, स् िभाि , और किज के आधार पर िणज व् यिस्था की बात कर रहे हैं। अथाजत: जो ज्ञ ानवप्र य और शांत हो → ब्र ाह्म ण गुण
94 जो साहस़ी और रक्षक हो → क्ष वत्र य गुण जो व् यापार और व् यिस् था संभाले → िैश् य गुण और जो सेिा कायज करे → शूद्र गुण यह व् यिस्था सिाज को व् यिवस्थत रखने के वलए थ़ी , न वक वकस़ी को ऊँचा या ऩीचा सावबत करने के वलए। आज िनुष् य ने अहंकार, जावतिाद, और भेदभाि के कारण इस ज्ञ ान को विकृत कर वदया। ग़ीता वसखात़ी है हर िनुष् य का सम् िान होना चावहए, क् योंवक आत्िा सबिें सिान है। न िां किाममण मलम् पमन् त न िे किमफले थपृहा। इमत िां योऽमभजानामत किममभनम स बध् यते॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 14 सरल अथज किज िुझे बाँधते नहीं और न ह़ी िुझे किजिलों की इच् छा है। जो इस सत् य को जान लेता है, िह भ़ी किजबंधन से िुि हो जाता है। िनुष् य इसवलए बंधता है क् यों वक िह हर किज िें “िैं” और “िेरा” जोड देता है। लेवकन ईश्वर: वबना स् िाथज के किज करते हैं। ग़ीता वसखात़ी है जब िनुष् य: अहंकार लालच, और िल की अत् यवधक वचंता छोड देता है, तब किज उसे बाँधते नहीं। आज लोग पररणाि को लेकर इतने वचंवतत रहते हैं वक िन की शांवत खो देते हैं। ग़ीता कहत़ी है किज करो, लेवकन िन को िल िें ित बाँधो। एवं ज्ञ ात् वा कृतं किम पूवैरमप िुिुक्षु मभः। कुरु किैव तथिात्त् वं पूवैः पूवमतरं कृति्॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 15 सरल अथज
95 इस सत् य को जानकर प्र ाच़ी न िुवि चाहने िाले लोगों ने भ़ी किज वकए थे। इसवलए तुि भ़ी िैसे ह़ी अपना कतजव् य करो। श्ऱी कृष् ण अजुजन को बता रहे हैं वक िहान ज्ञ ाऩी भ़ी किज करते थे। िुवि का अथज वजम्िेदाऱी छोडना नहीं , बवकक सह़ी भाि से किज करना है। आज कई लोग सोचते हैं आध्या वत् िक बनने के वलए संसार छोडन पडेगा। लेवकन ग़ीता वसखात़ी है पररिार, सिाज, और कायज करते हुए भ़ी ईश्व र के िागज पर चला जा सकता है। मकं किम मकिकिेमत कवयोऽप् यत्र िोमहताः। तत्ते किम िवक्ष् यामि यज्ज्ञ ात् वा िोक्ष् यसेऽशुभात्॥ — अध्याय 4 , श्ल ोक 16 सरल अथज किज क् या है और अकिज क् या है — इसिें बडे ज्ञ ाऩी भ़ी भ्र वित हो जाते हैं। इसवलए िैं तुम् हें किज का सत् य बताऊँगा। वसिज कायज करना ह़ी किज नहीं है। कई बार बाहर से शांत वदखने िाला व् यवि भ़ी तर पाप सोच रहा होता है, और बाहर से किोर किज करने िाला व् यवि धिज का पालन कर रहा होता है। इस़ीवलए किज का िूकय केिल बाहऱी रू प से नहीं , बवकक उसके भाि और उद्देश्य से सिझना चावहए। ग़ीता वसखात़ी है सह़ी किज िह़ी है जो धिज, सत्य , और वनाःस्िाथज भाि से वकया जाए।