प्रवासी (विशेषांक) हिन्दी

प्रवासीजुलाई 2026 वाराणसी SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inrLongitudinal Studies in Social and Human Sciences Funded by Indian Council of Social Science Research (ICSSR) टश औपनवेशक शासन के दौरान भारतीय श्र मक प्र वास का सांस् कृतक इतहास (A Cultural History of Indian Labour Migration During British Colonial Rule) A Collaborative Research Project of: Mahatma Gandhi Kashi Vidyapith, University of Hyderabad, Banaras Hindu University & Central University of South Bihar1

प्रवासीजुलाई 2026 वाराणसी SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inपरयोजना परचय संपादकय - नरंजन सहाय एवं गजेन्द्र पाठक दो दवसीय शोध एवं प्र ावली प्र माणन कायक्र मस् मृत-सेतु स् मृत, संघष और संवाद - नलन भारती डजटल मानवक और गरमटया वरासत : कृम बुमा के दौर म अनुसंधान के नए तज- ट. एन. सह भाषक समुद्र संगम : गरमटया समुदाय क भाषक याा- पंचानन मोहंती गरमटया अध् ययन क अवधारणा - गजेन्द्र पाठक वमोचन - ‘प्र वासी’ प्र वेशांक इतहास, वरासत और गरमटया अस् मता पूव यूरोपीय शक रा उपनवेश म गरमटया भारतीय प्र वासय क पहचान, वरासत और सांस् कृतक नरंतरता- आशुतोष कुमार प्र वासी परप्रेक्ष् य से गरमटया पहचान का पुनपाठ - अम् बा पाण् डेय इतहास क ओर पुन – गरमटया जीवन का आघात - स् मृत सह गरमटया संस् कृत : परंपरा, अभव्य और संरक्ष ण गरमटया इतहास और संस् कृत का सनेमाई नैरेटव - धमन्द्र नाथ ओझा गरमटया संस् कृत: भोजन, भाषा और सांस् कृतक वरासत- अनुराधा पाण् डेय परयोजना प्रस् ताव : संवाद, समीक्ष ा और परष् कार परयोजना प्रस् ताव प्रस् तुत - अजीत आया वशेषज्ञ समूह ारा प्रस् ताव पर टप् पणी- पंचानन मोहंती, अम् बा पाण् डेय, अधीर कुमार, स् मृत सह शोध उपकरण, प्र ावली एवं प्र ाथमक आँकड़े (परचचा) शोध उपकरण,प्र ावली, प्र ाथमक आँकड़े संग्र हण - वषा गुप् ता शोध उपकरण - चंदन ीवास् तव वशेषज्ञ प्र तक्र या - पंचानन मोहंती, अम् बा पाण् डेय, अधीर कुमार अद्य तन प्र ावली - रचना वश्व कमा प्र वासन वमश : सांत, भाषक पहचान और गरमटया इतहास प्र वासी समुदाय और भाषक पहचान - पंचानन मोहंती 04 05 07 10 12 14 16 19 20 22 26 29 30 31 33 35 37 41 43 54 अनुक्र माणका 2

प्रवासीजुलाई 2026 वाराणसी SPECIAL ISSUE https://girmitiya.in समुद्र माग से गरमटया प्र वास:जहाजी-भाई क अनकही गाथा- नलन भारती, सृ सहायप्र वासन : सांत, अवधारणा और समकालीन परप्रेक्ष् य - मेघना गुप् ताप्र वासी भारतीय : भू-राजनीत, सांस् कृतक अस् मता और नेतृत् व जहाज़ क लहर पर जन् मा नया जीवन: गरमटया स् य क आत् मनभरता क कहानी- नरंजन सहाय भारतीय अंतराीय प्र वासी श्र मक भू-राजनैतक परप्रेक्ष् य और समकालीन चुनौतयाँ- नलन भारती, मुस् कान कंवर भवानी दयाल सन् यासी : गरमटया चेतना, सांस् कृतक अस् मता और वैक भारतीयता के अग्रदू त- वशाल कुमार प्र वासी भारतीय क सांस् कृतक नरंतरता और फ़जी म रामकथा का वतमान परदृश् य - वीणा कुमारी समापन नह, नई शुरु आत गरमटया इतहास और सांस् कृतक वरासत- ओमप्र काश सह 'पहला गरमटया' म अभव्यक्त जीवन-सत् य - अधीर कुमार साात् कार भाषा, संस् कृत और प्र वासी स् मृत- पंचानन मोहंती गरमटया इतहास का पुनपाठ - आशुतोष कुमार औपनवेशक अथव्य वा, श्र म प्र वासन और गरमटया व्य वा - नलन भारती इतहास, साहत् य और सांस् कृतक स् मृत के आलोक म गरमटया जीवन का पुनपाठ - स् मृत सह दृश् य इतहास, अभलेखागार और गरमटया अध् ययन क नई दशाएँ- धमन्द्र नाथ ओझा पहला गरमटया और गरमटया जीवन-सत् य- अधीर कुमार भारतीय श्र म प्र वासन, स् मृत और सांस् कृतक पहचान - प्र यंका पाठ साहत् यक समीक्ष ा और पूव काय संकलन- रु च सह गतवधयाँ हमारे संरक्ष क हमारे सलाहकार 56 59 61 63 65 67 69 71 73 76 81 87 93 95 97 103 105 107 108 अनुक्र माणका 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 3

परचय गरमिटया: महासागर क पार ृतय क अनन्त जड़ क तलाश जुलाई 2026 SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासी भारतीय सामाजक िवज्ञ ान अनुसंधान परषद (ICSSR) के अंतगत संचालत शोध परयोजना ‘िटश औपनवेशक शासन के दौरानश्र िमक प्र वास का सृितक इितहास’ केवल इितहास के प को पलटने का प्र यास नह है; यह उन असंख्य आवाज़ को फर से सुनने क कोशश है, जो कभी समुद्र क लहर और औपनवेशक अिभलेख के बीच दबा द गई थ। उीसव शताब्द के तीसर दशक से आरम्भ हुई यह यात्र ा लाख भारतीय को अपने गव, स्मृ ितय और संबंध से दूर ले गई। ‘एग्र ीमट’ शब्द के अपंश से बना “गरिमट” उनके जीवन का भाग्य बन गया-ऐसा एग्र ीमट, जसे वे प्र ायः पढ़ भी नह सकते थे। जहाज़ ने उ फजी, मॉरशस, त्र नदाद, गुयाना, सूरनाम और दण अका जैसे दूरस्थ देश तक पहुँचाया, जह उने केवल गे के खेत नह सचे, ब अपने साथ भारत क िम, भाषा, गीत और िवास के बीज भी रोपे। समय बदला, भूगोल बदला, पर स्मृ ितय क जड़ बनी रह। भोजपुर लोकधुन ने नए प क हवाओ म नया स्व र पाया। पव-ोहार ने नए परवेश के साथ स्व यं को ढाला, कु उनक आा भारतीय ह रह। रामायण के पाठ, लोकगीत क धुन, िववाह क रस्म और पीढ़य से सुनाई जाने वाली कहानय-इन सबने समुद्र के पार भी एक सृितक घर बनाए रखा। यह परयोजना इ िबखर हुए सृितक सूत्र को एक साथ जोड़ने का प्र यास है। अिभलेखीय दावेज़, जहाज़ के धुँधले रकॉड, अप्र काशत पत्र , मौखक इितहास और लोक-स्मृ ितय के माध्य म सेयह परयोजना उन जीवन-कथाओ को पुनः सामने लाती है, जो इितहास के औपचारक वृत म अक्स र अनुपस्थ त रह ह। कभी कसी पुराने दावेज़ म दज एक जहाज़ का नाम, कभी पीढ़य से सुनाई जाती कोई दाद क कथा, तो कभी कसी लोकगीत म छपी मातृभूिम क पुकार-हर टुकड़ा िमलकर स्मृ ित क एक िवशाल चत्र यवनका रचता है। यह केवल अतीत का पुनस्म रण नह है। यह पहचान, िवस्थ ापन और सृितक जीवटता को समझने क एक सतत् प्र या है। ‘गरिमटया’ अनुभव हम यह सखाता है क पहचान स्थ र नह होत; वे समय के साथ, बदलती ह, कुछ यात्र ाएँ मंज़ल तक पहुँचकर समाप्त नह होत; वेस्मृ ितय, लोकगीत और पीढ़य क सृितक चेतना म जीिवत रहती ह। गरिमटय क कहानी भी ऐसी ह एक अनवरत यात्र ा है-समुद्र के पार िवस्थ ापन क, संघष क, और अपनी जड़ को बचाए रखने क। नए संदभ म नया अथ ग्र हण करती ह, फर भी अपने मूल से जुड़ रहती ह। आज जब हम िटश सााज्य वाद के षड्यन्त्र के शकार अपने लाख पुरख का स्म रण कर रहे ह, तब हम केवल इितहास के पे नह पलट रहे ह ब हम समय के महासागर को पार करते हुए उस भिवष्य क ओर भी देख रहे ह, जह से िवस्मृ त संबंध का एक नया सलसला शुरू हो रहा है। ...कुछ जड़, चाहे कतनी ह दूर न चली जाएँ, अपने ोत को कभी नह भूलत।डॉ. चंदन ीवास्त वशा िवभागकाशी हू िवश्व िवालय, वाराणसी डॉ. रचना िवश्व कमवाणज्य एवं व्य वसाय अध्य यन िवभागदण िबहार केन्द्र य िवश्व िवालय, गयाडॉ. अनुराधा पाेयह एवं संृित अधकारभारतीय उायोग, लंदन (यू.के.)कैप्ट न ओम प्र काशसमुद्र माग िवशेषज्ञ एवं उद्य मीलंदन (यू.के.) प्र ो. गजेन्द्र पाठकहैदराबाद िवश्व िवालय, हैदराबादह िवभाग परयोजना समन्व यकप्र ो. नरंजन सहायह एवं अन्य भारतीय भाषा िवभागमहाा गधी काशी िवापीठ, वाराणसी परयोजना नदेशक वाराणसी 4

संपादकय औपनवेशक अतीत क ृितय क देहर पर संवाद SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 5कैसी िवडंबना है क जस तेरहव शताब्द के भारत म इटली के माक पोलो को भारत म सोने क जुत्त य पहने लोग िमले थे और उन्न ीसव सद के पूव म इंड वासी लॉड मैकाले को कोई भीख मगते तक नह दखा था उस देश क संतान को दास प्र था के ख़ाे के बाद दुनया के श्र म बाजार म नीलाम होना पड़ा . गुलामी का यह रू प भारत के औपनवेशक अतीत का काला अध्य ाय है जस पर अभी भी अंधकार के बादल जमे हुए है। भारत के कसान, खेितहर श्र िमक और बुनकर ने सदय से अपने परश्र म के बल पर भारत क अथव्य वा को दुनया म सवश्रेष्ठ ान पर रखा था । दुनया ने सदय से इनक ताकत को पहचाना था और आक्र मणकारय के अनेक हमल के बावजूद उने अपना काम अहनश जार रखा ,लेकन ईस्ट इंडया कंपनी और िटश हुक्म रान क नगाह म यह लोग गुनहगार थे। एक तीर से दो शकार हुए . भारत बबद हुआ और भारत को आबाद करने वाले हाथ का उनके सााज्य वाद को आबाद करने म उपयोग कया गया । बहरहाल … अनजान और अनत सफ़र म पेट क भूख के लए सत्तू क पोटलय बँधी तो घर क ग़रबी और जहालत दूर करने के लए भगवान श्र ीराम क तरह वनवास को अिभशप्त हृ दय क हाहाकार म ‘मानस’ क पोथी भी साथ गई . 'प्र वासी' का यह िवशेष अंक औपनवेशक काल म लाख भारतीय श्र िमक के िवापन एवं प्र वासन जनत यातना से जुड़े अनेक अनुत्त रत प्र के उत्त र खोजने के साथ प्र वासन के दघ कालक सृितक अनुभव के िविवध अनछुए पहलुओ से संवाद करने क एक पहल है। गरिमटया अतीत क ृितय को पुनजिवत करने म अधुनातन प्र ौोगक क ा भूिमका हो सकती है , इसी जासा के साथ पत्र का का प्र थम खंड 'ृित-सेतु' हम अतीत और वतमान के मध्य संवाद क भूिम पर ले जाता है। इसम प्र ो .नलन भारती का िवेषण 'ृित, संघष और संवाद' प्र वासी जीवन क आधारभूत संचेतना को स्व र देता है। वतमान तकनीक युग म गरिमटया िवरासत के संरक्ष ण क आवश्य कता को प्र ितपादत करते हुए प्र ो. ट. एन. सह ने 'डजटल मानिवक और गरिमटया िवरासत: कृत्र म बुमत्त ा के दौर म अनुसंधान के नए क्ष ितज' के माध्य म से एक अंत प्र ासंगक िवमश प्र ुत कया है। प्र ो.पंचानन मोहंती का 'भािषक समुद्र संगम : गरिमटया समुदाय क भािषक यात्र ा इस अंक क िवशेष उपल है। गरिमटया समुदाय ने ह के भािषक वृत्त को दुनया के मानचत्र पर जस तरह से िवारत कया है वह िवार भाषा िवान के लए भी आकषण और शोध का िवषय है ।यह बताते हुये हम हष क अनुभूित हो रह है क प्र ो. मोहंती के मागदशन गरिमटया िवरासत से जुड़े िविभन्न देश के भािषक समुदाय पर केन्द्र त शब्द कोश क नमण क दशा म भीप्र यत्न शील ह। यह इितहास िवलाप और संघष का अनवरत आान है . दूसरा खंड 'इितहास, िवरासत और गरिमटया अता' हमार पूवज के संघष और उनके सृितक अवदान का दग्द शन कराता है। प्र ो.आशुतोष कुमार का आलेख 'पूव यूरोपीय शक रा उपनवेश म गरिमटया भारतीय प्र वासय क पहचान, िवरासत और सृितक नरंतरता' औपनवेशक काल के कठन यथाथ और सृितक जजीिवषा को उजागर करती है। वह डॉ.अा पाेय का 'प्र वासी परप्रेक्ष्य से गरिमटया पहचान का पुनपठ' तथा प्र ो. ृित सह का 'इितहास क ओर पुनदृ ' इितहास के उन पन्न को पलटने क पहल है जो अब तक ओझल थे। यह अंक केवल अतीत राग तक सीिमत नह है ब यह जीवन राग भी मौजूद है । नराला जी ने फूल खलने कप्र क्र या को संघष क उपल के रू प म देखा था . गरिमटया िवरासत आज दुनया के बीस से अधक देश म अपनी मज़बूत उपित के साथ बृहद भारत क सृितक अवधारणा को फलीभूत कर रह है . तृतीय खंड 'गरिमटया संृित: परंपरा, अिभव्य और संरक्ष ण' इसके जीवंत पक्ष से हमारा साक्ष ाार कराता है। श्र ी धमन्द्र नाथ ओझा ने 'गरिमटया इितहास और संृित का सनेमाई नैरटव' के माध्य म से दृश्य -श्रव्य माध्य म म इसक प्र ुित को िवेिषत कया है, तो अनुराधा पाेय ने 'गरिमटया संृित: भोजन, भाषा और सृितक िवरासत' के ारा लोक-

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 6 जीवन के अंतसबंध के ाद और खुशबू को श म िपरोया है। एक जीवंत िवमश वह है जह सवाल उठाए जाएँ और उन पर बहस हो। चतुथ खंड 'परयोजना प्रस्त ाव : संवाद, समीक्ष ा और परार' म अजीत आय ारा प्रस्तु त 'परयोजना प्रस्त ाव प्रस्तु ित' पर प्र ो. पंचानन मोहंती, डॉ.अा पाेय, प्र ो.अधीर कुमार और प्र ो.ृित सह जैसे मूधन्य िवान/िवदुषी के िवशेषज्ञ समूह क टप्प णय इस शोध को और अधक परमाजत करती ह और इसे एक खुली बहस के मंच म बदल देती ह। इस वैचारक याा का ावहारक और वैज्ञ ानक पक्ष ा है? पंचम खंड 'शोध उपकरण, प्रश्न ावली एवं प्र ाथिमक आँकड़े (परचच)' इसी जज्ञ ासा को शत करता है। इसम 'शोध उपकरण, प्रश्न ावली, प्र ाथिमक आँकड़े संग्र हण' के अंतगत डॉ. चंदन ीवास्त व का 'शोध उपकरण' िवषयक आलेख परयोजना के लए पाथेय सद्ध हगे। इस पर प्र ो. पंचानन मोहंती, डॉ.अा पाेय, प्र ो.अधीर कुमार क िवशेषज्ञ प्र ितक्र याएँ तथा डॉ. रचना िवश्व कम ारा तैयार 'अद्य तन प्रश्न ावली' इस शोध प्र िवध को पूणता प्र दान करते ह। अंत म, 'प्र वासन िवमश: सद्ध त, भािषक पहचान और गरिमटया इितहास' के तहत पंचानन मोहंती जी का लेख प्र वासी समुदाय और भािषक पहचान के अंतसबंध को नईप्र ामाणकता देता है।' `दो दवसीय शोध एवं प्रश्न ावली प्र माण कायक्र म’ का आयोजन भारतीय प्रद्य ोगक संान (IIT) पटना म हुआ| परयोजना टम, नदेशक प्र ो.ट.एन. सह, कायक्र म के ानीय संयोजक प्र ो.नलन भारती, िवभागाध्यक्ष डॉ.श्वे ता सा समेत मानिवक एवं सामाजक िवज्ञ ान िवभाग के सभी शक्ष क/शक्ष काओ और ऊजवान, हस्त ाक्षे पधम शोधाथय के प्र ित आीय आभार प्र कट करती है| उनक सक्र य बौद्ध क सहभागता ने हमार शोध परयोजना अिभयान को अनेक तरह से सम्पन्न कया| कहना न होगा वैलडेशन कायक्र म क फलुितय और दशानदश हमार शोध-याा म मील का पत्थ र ह| यह आयोजन 21 और 22 मई 2026 को आई. आई. ट. परसर के मानिवक एवं सामाजक िवज्ञ ान केन्द्र म सम्पन्न हुआ| साक्ष ाार और िवमश का जीवंत िवस्त ार: इस पूर अंक क रढ़ वे संवाद और साक्ष ाार ह, जो इस अकादिमक िवमश को एक मानवीय चेहरा देते ह। इस अंक म शािमल िवशेषज्ञ और प्र वासय के साथ हुए साक्ष ाार केवल प्रश्न -उत्त र क औपचारकता नह ह, ब वे उस गहर दद, अदम्य साहस और ृितय के पुनजवन क गाथा ह जो समय क धुंध म खो गए थे। ये साक्ष ाार उन प्र वासय के अंतरमन क परत को खोलते ह जने अपनी जड़ से दूर रहकर भी अपनी पहचान को मरने नह दया। यह खंड हम सखाता है क जब हम कसी से सीधा संवाद करते ह, तो इितहास केवल त का संग्र ह नह रह जाता, ब वह हमार साझी संवेदना बन जाता है। यह अंक केवल पन्न का पुलदा नह, ब गरिमटया प्र वासय के बहाए पसीने, उनके गीत और उनक जजीिवषा से साक्ष ाार करने क एक जीवंत खड़क है। कोई भी अकादिमक प्र यास तब तक अधूरा है, जब तक उसम आपक—यानी हमार पाठक क—आवाज और सहभागता शािमल न हो। हम नह चाहते क आप इस याा म केवल मूक दशक या पाठक बने रह। हम आपको इस वैचारक, ऐितहासक और सृितक खोज क याा म अपना 'सहयाी' बनने का आीय आान करते ह। -नरंजन सहाय एवं गजद्र पाठक

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 7 दो दवसीय शोध एवं प्र ावली प्र माणन कायक्र म

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 8

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 9

आदरणीय मुख्य अितथ, माननीय नदेशक प्र ो. ट. एन. सह जी, िवशष्ट वक्त ागण, आदरणीय प्र ो. पंचानन मोहंती जी, डॉ. अा पडे जी, मंचासीन सभी िवानगण, देश-िवदेश से पधार सानतप्र ाध्य ापक, शोधकत, शोधाथ, छात्र -छात्र ाएँ तथा उपत सभी अितथगण, भारतीय प्र ौोगक संान, पटना के मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग क ओर से आप सभी का इस दो दवसीय राष्ट य संगो " िटश औपनवेशक शासन के दौरान भारतीय श्र िमकप्र वास का सृितक इितहास " म हादक ागत, अिभनंदन एवं शुभकामनाएँ। आज का यह अवसर केवल एक शैक्ष णक आयोजन नह है, ब भारतीय इितहास के एक ऐसे अध्य ाय को पुनः स्म रण करने का अवसर है, जो लंबे समय तक उपेक्ष त रहा। यह उन लाख भारतीय ी-पुरु ष के संघष, श्र म, ाग और सृितक धैय को नमन करने का अवसर है, जने समुद्र पार जाकर अपने श्र म से नए समाज का नमण कया और अपनी सृितक पहचान को जीिवत रखा। मुझे अंत प्र सन्न ता है क इस महत्त्व पूण िवषय पर िवचार-िवमश के लए देश के िविभन्न िवश्व िवालय एवं संान से प्र ितत िवान एक मंच पर एकत्र हुए ह। सबसे पहले म भारतीय प्र ौोगक संान, पटना के माननीय नदेशक प्र ो. ट. एन. सह जी का हृ दय से आभार व्यक्त करता हूँ, जनके मागदशन औरप्रे रणा से मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग म इस प्र कार के बहुिवषयी शैक्ष णक आयोजन को नरंतर प्र ोाहन िमल रहा है। उनका यह िवश्व ास क िवान और प्र ौोगक के साथ-साथ इितहास, संृित, भाषा और समाज का अध्य यन भी समानरू प से आवश्य क है, इस आयोजन क प्रे रक शक्त है। उनके संरक्ष ण के िबना इस संगो का आयोजन संभव नह हो पाता। म िवशेष रू प से इस परयोजना के नदेशक, आदरणीय प्र ो. गजेन्द्र पाठक जी का ागत करता हूँ, जनक दूरदृ ष्ट और शैक्ष णक नेतृत्व म भारतीय ृित, संघष और संवाद - नलन भारतीप्र वासी SPECIAL ISSUE https://girmitiya.in जुलाई 2026 वाराणसी 10 सामाजक िवान अनुसंधान परषद (ICSSR) ारा समथत यह महत्त्व पूण शोध परयोजना संचालत हो रह है। यह परयोजना केवल ऐितहासक त के संकलन तक सीिमत नह है, ब भारतीयश्र िमक प्र वास के सृितक, भाषायी, सामाजक और मानवीय आयाम को समग्र रू प म समझने काप्र यास कर रह है। आज हमार बीच मुख्य वक्त ा के रू प म उपत ह भारत के सुप्र सद्ध भाषािवानी एवं एथ् नोलस्टप्र ो. पंचानन मोहंती। भारतीय भाषाओ, भाषायी िविवधता, मातृभाषा संरक्ष ण और आदवासी तथाप्र वासी समुदाय क भाषायी पहचान पर उनका काय अंतरराष्ट य स्त र पर सानत है। हम िवश्व ास है क उनका बीज वक्तव्य इस संगो के बौद्ध क िवमश को नई दशा प्र दान करगा तथा गरिमटया अध्य यन के भाषायी एवं सृितक आयाम को समझने क नई दृ ष्ट देगा। हमार बीच डॉ. अा पडे जी भी उपत ह, जने भारतीय प्र वासी अध्य यन, गरिमटया इितहास और डायोरा िवमश को नई वैचारक ऊँचाइय प्र दान क ह। उनका शोध हम यह समझने म सहायता करता है क गरिमटया इितहास केवल अतीत क घटना नह, ब वतमान वैश्व क भारतीय समुदाय क सृितक पहचान का आधार भी है। म इस अवसर पर प्र ो. स्मृ ित सह, प्र ो. अधीर कुमार,प्र ो. अशुतोष सह तथा सभी आमंत्र त िवशेष का भी हादक ागत करता हूँ, जने अपने व्यस्त शैक्ष णक कायक्र म के बीच इस आयोजन के लए समय नकाला। आपक सहभागता इस संगो को समृद्ध बनाएगी। िप्र य साथय, आज जब हम गरिमटया इितहास क चच करते ह तो यह केवल प्र वासन का इितहास नह है। यह मानव साहस, सृितक स्मृ ित और अस्तत्व क रक्ष ा का इितहास है। उन्न ीसव शता म भारत के अनेक क्षेत्र , िवशेषकर िबहार और पूव उत्त र प्र देश से लाख लोग को अनुबंधत श्र िमक बनाकर समुद्र

पार भेजा गया। वे अपने गव, अपने परवार और अपनी मातृभूिम से दूर अवश्य चले गए, परंतु वे अपनी भाषा, अपने लोकगीत, अपने ोहार, अपनी आा और अपने संार को कभी पीछे नह छोड़ पाए। यह कारण है क आज भी मॉरशस, फजी, सूरनाम, गुयाना और नदाद जैसे देश म भारतीय संृित क जीवंत उपित दखाई देती है। यद हम इितहास को केवल सरकार अिभलेख म खोजगे तो गरिमटया अनुभव का एक बड़ा हा हमार दृ ष्ट से ओझल रह जाएगा। वह इितहास लोकगीत म है, वह रामायण मंडलय म है, वह जहाजी भाइय क ृितय म है, वह पारवारक परंपराओ म है और उन भाषायी रू प म भी है जप्र वासी भारतीय ने पीढ़-दर-पीढ़ सुरक्ष त रखा। इसलए इस परयोजना का उेश्य केवल दावेज़ तैयार करना नह, ब जीिवत सृितक िवरासत का वैज्ञ ानक दावेजीकरण करना है। इस संगो क एक और िवशेषता यह है क यह केवल व्य ाान तक सीिमत नह है। अगले दो दन म प्र ावली नमण, अनुसंधान पद्ध ित, क्षे ीय अध्य यन, डेटा संकलन तथा िवशेषज्ञ के सुझाव पर गंभीर चच होगी। यह प्र क्र या इस परयोजना को अधक वैज्ञ ानक, अधक िवश्व सनीय और अधक व्य ापक बनाएगी। मुझे िवश्व ास है क यह उपत प्र ेक िवशेषज्ञ के सुझाव भिवष्य के शोध क दशा नधरत करने म अंत उपयोगी सद्ध हगे। मानिवक एवं सामाजक िवज्ञ ान िवभाग, आईआईट पटना सदैव ऐसे शोध को प्र ोाहत करता रहा है जो समाज और इितहास के बीच संवाद ािपत कर। हम गव है क यह संान तकनीक उृष्ट ता के साथ-साथ भारतीय संृित, भाषा, इितहास और समाज के अध्य यन के लए भी एक सक्र य मंच बन रहा है। यह संगो उसीप्र ितबद्ध ता का एक सशक्त उदाहरण है। म इस अवसर पर आयोजन सिमित के सभी सद, सहकमय, शोध सहायक, शोधाथय, िवाथय,स्व यंसेवक तथा तकनीक टम का िवशेष रू प से प्र वासी SPECIAL ISSUE https://girmitiya.in जुलाई 2026 वाराणसी 11 धन्य वाद देना चाहता हूँ, जनके अथक परश्र म से यह आयोजन संभव हो सका। कसी भी शैक्ष णक कायक्र म क सफलता मंच पर दखाई देने वाले लोग से अधक उन लोग के समपण पर नभर करती है जो पद के पीछे नरंतर काय करते ह। म उन सभी के प्र ित अपनी हादक कृतज्ञ ता व्यक्त करता हूँ। जय हन्द । ो. नलन भारती सह-संयोजक, मानवक एवं सामाजक वान वभाग, भारतीय ौोगक संान (आईआईट) पटनाप्रो. नलन भारती भारतीय सामाजक िवान और मानिवक के ेत्र म एक प्र ितत शािवद् एवं शोधकत ह। वे वतमान म मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग, भारतीय प्र ौोगक संान (आई.आई.ट.) पटना म कायरत ह। उनका अकादिमक व्य त्व अंतवषयकदृ कोण, सामाजक इितहास, प्र वासन अध्य यन, संृित एवं समाज के अध्य यन से जुड़ा हुआ है।प्र ो. भारती ने िवशेष रू प से गरिमटया इितहास, भारतीय प्र वासन, औपनवेशक श्र म व्य वा और प्र वासी भारतीय समुदाय के अध्य यन म महत्त्व पूणरु च दखाई है। वे इितहास, समाजशास्त्र , सृितक अध्य यन और प्र वासी िवमश के बीच संवाद ािपत करने वाले िवान म अग्र णी ह। उनके शोध का कद्र भारतीय समुदाय क ऐितहासक ृितय, सृितक पहचान और वैक संदभ म भारतीयता केस्वरू प को समझना है। आई.आई.ट. पटना म रहते हुए उने मानिवक एवं सामाजक िवान को तकनीक शा के व्य ापक परप्रेक्ष्य से जोड़ने का महत्त्व पूणकाय कया है। वे िवाथय और शोधाथय को आलोचनात्म क चतन, बहुिवषयक शोध दृ और भारतीय समाज क जटलताओ को समझने के लए प्रे रत करते ह। गरिमटया िवमश से संबंधत परचचओ और शोध परयोजनाओ म उनका योगदान िवशेष रू प से उेखनीय है। वे गरिमटया समुदाय के इितहास को केवल प्र वासन क घटना के रू प म नह, ब शोषण, संघष, सृितक पुननमण और अता नमण क प्र या के रू प म देखते ह। उनके अकादिमक प्र यास भारतीय प्र वासी इितहास को नए िवमश से जोड़ने क दशा म महत्त्व पूणभूिमका नभाते ह।

भारतीय प्र ौोगक संान (आईआईट) पटना म " िटश औपनवेशक शासन के दौरान भारतीयश्र िमक प्र वास का सृितक इितहास " िवषय पर आयोजत यह संगो केवल एक शैक्ष णक कायक्र म नह है, ब इितहास, संृित, भाषा, ृित और मानवीय संवेदनाओ से संवाद ािपत करने का एक महत्त्व पूण अवसर है। यह आयोजन इस बात का प्र माण है क आधुनक भारत म िवान और प्र ौोगक के साथ-साथ इितहास, मानिवक और सृितक िवरासत का अध्य यन भी समानरू प से आवश्य क है। तकनीक हम भिवष्य का माग दखाती है, कु इितहास हम अपनी पहचान से जोड़ता है। जब ये दोन एक साथ आगे बढ़ते ह, तभी एक सशक्त , संवेदनशील और आत्म बोध से सम्पन्न समाज का नमण होता है। यह अंत प्र सन्न ता का िवषय है क आईआईट पटना जैसा अग्र णी संान आज उस इितहास को कद्र म रखकर राय िवमश आयोजत कर रहा है, जसक प्र ितध्व न लंबे समय तक मुख्य धारा के इितहास लेखन म अपेक्ष त ान नह पा सक। यह आयोजन उन लाख भारतीय ी-पुरु ष के प्र ित हमार सामूहक श्रद्ध जल है, जने अपने श्र म, संघष, साहस और सृितक चेतना के बल पर िवदेशी धरती पर भारतीय अता को जीिवत रखा। साथ ह, यह संगो भारतीय सामाजक िवान अनुसंधान परषद (ICSSR) ारा समथत दघकालक शोध परयोजना के अंतगत गरिमटया इितहास, सृितक िवरासत और भारतीय श्र िमकप्र वास के बहुआयामी अध्य यन को नई दशा प्र दान करने का प्र यास भी है। लगभग डेढ़ से दो सौ वष पूव, जब िटश सााज्य ने दासप्र था के औपचारक अंत के बाद अपने उपनवेश म श्र म क आवश्य कता को पूरा करने के लए अनुबंधत श्र म व्य वा अथत् INDENTURE SYSTEM को अपनाया, तब भारत के िबहार, पूव उत्त र प्र देश, झारखंड तथा अन्य क्षेत्र से लाख नधन और साधारण डजटल मानिवक और गरिमटया िवरासत : कृम बुमा के दौर म अनुसंधान के नए ितज- ट. एन. सह प्र वासी SPECIAL ISSUE https://girmitiya.in जुलाई 2026 वाराणसी 12 लोग को बेहतर जीवन, सानजनक रोजगार और समृद्ध भिवष्य के सपने दखाकर समुद्र पार ले जाया गया। इन श्र िमक ने जस अनुबंध पर हाक्ष र कए, वह उनके लए " गरिमट " बन गया और वे इितहास म " गरिमटया " के नाम से जाने गए। मॉरशस, फजी, सूरनाम, गुयाना, त्र नदाद एवं टोबैगो, जमैका तथा अन्य उपनवेश क धरती पर पहुँचने के बाद उ कठोर श्र म, अमानवीयव्य वहार, सामाजक अलगाव, आथक शोषण और सृितक िवापन जैसी अनेक कठनाइय का सामना करना पड़ा। यह केवल श्र िमक प्र वास क कहानी नह थी, ब मानवीय धैय, संघष और अत्व क सबसे मामक गाथाओ म से एक थी। कु इितहास का सबसे प्रे रक पक्ष यह है क वे लोग अपने साथ केवल कपड़े, बतन या घरलू सामान लेकर नह गए थे। वे अपने गव क िम क सुगंध, अपने खेत क ृितय, अपनी मातृभाषा क िमठास, लोकगीत क लय, लोककथाओ क जीवंतता, रामचरतमानस क चौपाइय, कबीर के नभक पद, तुलसी क भक्त , सूर क करु णा और भारतीय जीवन-दशन के शाश्व त संार भी अपनेहृ दय म संजोकर ले गए थे। जहाज़ क लंबी यात्र ाओ म, गन्ने के खेत म कठन श्र म करते हुए, और अनजान भूिम पर नया जीवन बसाते समय यह सृितक ृितय उनके साहस का आधार बन। भोजपुर के सोहर, चैता, िबरहा, कजर और फाग केवल लोकगीत नह थे; वे उनक ृितय क जीिवत धड़कन थे। रामायण का सामूहक पाठ केवल धामक अनुान नह था; वह उनके िबखर हुए जीवन को जोड़ने वाला सृितक सूत्र था। लोकभाषा केवल संवाद का माध्य म नह थी; वह उनक पहचान, आत्म सान और अत्व का आधार थी। यह कारण है क आज भी मॉरशस, फजी, सूरनाम और गुयाना जैसे देश म भारतीय मूल के समुदाय के बीच भारतीय भाषाओ, ोहार, धामक परंपराओ और सृितक मू क सशक्त उपित दखाई देती है।

गरिमटया इितहास हम यह भी सखाता है क मनुष्य क सबसे बड़ श उसक सृितक ृित होती है। परितय चाहे कतनी हप्र ितकूल न ह, यद समाज अपनी भाषा, अपने लोकान, अपने साहत्य और अपनी सृितक परंपराओ से जुड़ा रहता है, तो वह अपनी पहचान को कभी खोता नह। यह कारण है क जन लोग को अपने गव, परवार और मातृभूिम से दूर कर दया गया था, उने िवदेशी धरती पर भी " छोटा भारत " बसाया और अपनी आने वाली पीढ़य को भारतीय संृित से जोड़े रखा। आज आवश्य कता इस बात क है क गरिमटया इितहास को केवल पीड़ा और शोषण क कथा केरू प म न देखा जाए। यह संघष के साथ-साथ आत्म सान, श्र म, संगठन, सृितक पुननमण और मानवीय गरमा क भी कहानी है। यह इितहास हम बताता है क भारतीय संृित क वास्त िवक श उसक िविवधता, सहनशीलता और पुनसृजन क क्ष मता म नहत है। यह कारण है क गरिमटया समाज ने कठन परितय के बावजूद िवालय ािपत कए, भाषा और साहत्य का संरक्ष ण कया, रामायण मंडलय और सृितक संाओ का नमण कया तथा नई पीढ़य म अपनी िवरासत के प्र ित गव क भावना िवकसत क।प्र वासी SPECIAL ISSUE https://girmitiya.in जुलाई 2026 वाराणसी 13 यह संगो इसलए भी िवशेष महत्त्व रखती है क यह केवल अतीत का पुनपठ नह कर रह, ब वतमान और भिवष्य के लए नए शोध-ार खोल रह है। इस परयोजना के अंतगत तैयार क जा रह प्र ावलय, क्षे ीय अध्य यन, मौखक इितहास, सृितक दस्त ावेज़ीकरण और बहुिवषयी शोध प्र यास हम गरिमटया िवरासत को अधक ापक और वैानक दृ से समझने म सहायता करगे। इितहास तभी जीिवत रहता है जब उसे नई पीढ़य पढ़ती ह नह, ब समझती, महसूस करती और उसके आधार पर भिवष्य का नमण करती ह। आज जब िवश्व वैश्व ीकरण, प्र वासन, सृितक पहचान और भाषायी संरक्ष ण जैसे प्र से जूझ रहा है, तब गरिमटया इितहास हम मानवीय मू का एक महत्त्व पूण पाठ पढ़ाता है। यह हम बताता है क िवापन केवल भौगोलक घटना नह, ब सृितक चुनौती भी है; और संृित केवल अतीत क धरोहर नह, ब भिवष्य क दशा भी है। आइए, इस संगो को केवल िवचार-िवमश का मंच न मानकर एक ऐसे संकल्प के रू प म देख, जसके माध्य म से हम गरिमटया पूवज के संघष, उनक सृितक िवरासत, उनक भाषायी अता और उनके अदम्य साहस को नई पीढ़य तक पहुँचा सक । यह उनके प्र ित हमार सी श्र जल होगी और यह इस आयोजन क सबसे बड़ उपल होगी। ो. लोक नाथ सह नदेशक भारतीय प्र ौोगक संान पटना (िबहार)प्र ो. ट. एन. सह भारतीय भू-िवान, शैल यत्र क (ROCK MECHANICS), इंजीनयरग भूिवान तथा उच्च शक्ष ा प्र शासन के क्षेत्र के प्र ितत शक्ष ािवद् एवं वैानक ह। वतमान म वे भारतीयप्र ौोगक संान (आईआईट) पटना के नदेशक के रू प म कायरत ह। इससे पूव वे महाा गधी काशी िवापीठ, वाराणसी के कुलपित तथा आईआईट बॉे म प्र ो. एवं िविभन्न महत्त्व पूणप्र शासनक दायत्व का सफलतापूवक नवहन कर चुके ह। उने शैल यत्र क, खनन, ढाल रता, सुरंग अिभयत्र क, प्र ाकृितक आपदाओ तथा जलवायु परवतन जैसे क्षेत्र म उेखनीय शोध काय कए ह। उनके शोध-पत्र को ापक अंतरराय मान्य ता प्र ाप्त हुई है तथा उने अनेक शोधाथय का सफल मागदशन कया है। सतंबर 2021 से आईआईट पटना के नदेशक के रू प म प्र ो. सह ने संान म अनुसंधान, नवाचार, बहुिवषयी शक्ष ा तथा उोग–अकादिमक सहयोग को नई गित प्र दान क है। उनके नेतृत्व म संान ने अाधुनक शोध अवसंरचना, डजटल शक्ष ण, अंतरराय सहयोग तथा नवाचार-आधारत शक्ष ा को सुदृ ढ़ कया है। वे इस िवचार के प्र बल समथक ह क िवान,प्र ौोगक और मानिवक का समन्व य ह समाज के समग्र िवकास का आधार है। यह दृ आईआईट पटना म िवान और तकनीक के साथ-साथ इितहास, संृित, भाषा और सामाजक िवान से जुड़े राय एवं अंतरराय िवमश के आयोजन म भी परलक्ष त होती है।

आज " िटश औपनवेशक शासन के दौरान भारतीय श्र िमक प्र वास का सृितक इितहास " जैसे अत्यं त महत्त्व पूण िवषय पर आयोजत इस राय संगो म उपत होना मेर लए प्र सन्न ता का िवषय है। यह आयोजन केवल अतीत क ृितय को पुनजिवत करने का प्र यास नह है, ब भारतीय इितहास, संृित, भाषा और वैश्व क भारतीय समुदाय क सामूहक ृित को नए दृ कोण से समझने क एक गंभीर अकादिमक पहल है। गरिमटया इितहास केवल श्र िमक प्र वास का इितहास नह है। यह मानव पीड़ा, संघष, श्र म, अता, सृितक पुननमण और आत्म सान क ऐसी गाथा है जसने भारत क सीमाओ को पार कर िवश्व के अनेक देश म भारतीयता क नई पहचान नमत क। लगभग दो शताय पूव उत्त र भारत, िबहार, पूव उत्त र प्र देश, झारखंड, छत्त ीसगढ़, तिमलनाडु और आंध्र प्र देश सहत अनेक क्षे से लाख भारतीय अनुबंधत श्र िमक के रू प म मॉरशस, फ़जी, सूरनाम, गुयाना, नदाद एवं टोबैगो तथा अन्य उपनवेश म भेजे गए। वे अपने साथ केवल श्र मश ह नह ले गए, ब अपनी भाषाएँ, लोकगीत, लोककथाएँ, धामक आाएँ, पारवारक संार और सृितक ृितय भी साथ लेकर गए। यह सृितक िवरासत आज भी उन देश म भारतीय मूल के समुदाय क पहचान का आधार बनी हुई है। एक भाषािवानी के रू प म म यह मानता हूँ क कसी भी समुदाय क सबसे बड़ सृितक धरोहर उसक भाषा होती है। भाषा केवल संप्रे षण का माध्य म नह, ब सामूहक ृित, सामाजक अनुभव और सृितक चेतना का जीवंत दस्त ावेज होती है। गरिमटया समुदाय ने अत्यं त कठन परितय म भी अपनी भाषाओ को जीिवत रखा। भोजपुर, अवधी, मगह, मैथली, तिमल, तेलुगु तथा अन्य भारतीय भाषाओ के अनेक रू प आज भीप्र वासी समाज म कसी न कसी रू प म िवद्य मान ह। भािषक समुद्र संगम : गरिमटया समुदाय क भािषक याा - पंचानन मोहंतीप्र वासी SPECIAL ISSUE https://girmitiya.in जुलाई 2026 वाराणसी 14 समय के साथ इन भाषाओ ने ानीय भाषाओ के साथ संवाद ािपत कया और नए भाषायी रू प िवकसत हुए। यह परवतन भाषाई क्ष रण नह, ब सृितक अनुकूलन और सृजनात्म क िवकास का उदाहरण है। गरिमटया समाज का अध्य यन केवल इितहासकार का िवषय नह है। यह इितहास, समाजशास्त्र , मानवशास्त्र , भाषािवान, साहत्य , लोकसंृित, राजनीित िवान, प्र वासन अध्य यन तथा डजटल मानिवक जैसे अनेक िवषय के अंतःिवषयक सहयोग क मग करता है। यद हम वास्त व म गरिमटया अनुभव को समझना चाहते ह तो हम अिभलेखीय दस्त ावेज़ के साथ-साथ मौखक इितहास, लोकृितय, पारवारक परंपराओ, धामक अनुान, लोकगीत, कहावत और ानीय भाषायी व्य वहार का भी गंभीर अध्य यन करना होगा। आज प्रस्तु त ICSSR परयोजना इसी दशा म एक महत्त्व पूण प्र यास है। इसक सबसे बड़ िवशेषता यह है क यह केवल ऐितहासक त के संकलन तक सीिमत नह है, ब प्रश्न ावली आधारतक्षे ीय अध्य यन के माध्य म से वतमान पीढ़ क ृितय, धारणाओ और सृितक अनुभव का भी दस्त ावेजीकरण करना चाहती है। यह दृ कोण भिवष्य के शोध के लए अत्यं त उपयोगी सद्ध होगा क सृितक इितहास केवल अिभलेख म नह, ब लोग क ृितय और जीिवत परंपराओ म भी सुरक्ष त रहता है। म िवशेष रू प से प्रश्न ावली नमण क प्र या पर कुछ बात रखना चाहूँगा। कसी भी सामाजक अनुसंधान म प्रश्न ावली केवल प्रश्न का संग्र ह नह होती; वह शोध-दृ का दपण होती है। यद प्रश्न सीिमत हगे तो नष्क ष भी सीिमत हगे। इसलए आवश्य क है क प्रश्न ावली म केवल जनसकय सूचनाएँ न ह, ब भाषा, सृितक व्य वहार, धामक परंपराएँ, पारवारक ृितय, लोकगीत, िववाह संार, भोजन संृित, नामकरण परंपरा,

शक्ष ा, पीढ़य के बीच सृितक परवतन तथा भारत के प्र ित भावनात्म क संबंध जैसे आयाम भी समुचत रू प से सलत कए जाएँ। म लंबे समय से यह कहता आया हूँ क भाषा और नाम कसी भी समुदाय क पहचान के सबसे महत्त्व पूण सृितक संकेतक ह। प्र वासी भारतीय समाज म पारवारक नाम, देवी-देवताओ के नाम, गव क ृितय और मातृभाषा से जुड़े शब्द आज भी उनक ऐितहासक यात्र ा के जीिवत प्र माण ह। इसलए इस परयोजना म भाषायी सवक्ष ण को िवशेष महत्त्व दया जाना चाहए। यह केवल यह जानने का प्र यास न हो क लोग कौन-सी भाषा बोलते ह, ब यह भी समझा जाए क वे भाषा को अपनी पहचान, संृित और इितहास से कसप्र कार जोड़कर देखते ह। आज वैश्व ीकरण और तीव्र तकनीक परवतन के युग म प्र वासी समुदाय क नई पीढ़य बहुभािषक वातावरण म िवकसत हो रह ह। यह ित अवसर भी प्र दान करती है और चुनौती भी। अनेक बार मातृभाषा का प्र योग सीिमत हो जाता है और सृितक ृितय का हस्त तरण कमजोर पड़ने लगता है। इसलए आवश्य क है क हम भाषा संरक्ष ण को केवल भावनात्म क िवषय न मानकर सृितक नीित और शैक्ष क योजना का महत्त्व पूण हा बनाएँ। मातृभाषा का संरक्ष ण सृितक िविवधता क रक्ष ा का भी प्रश्न है। मेरा यह भी मानना है क गरिमटया अध्य यन को केवल पीड़ा और शोषण क कथा के रू प म नह देखा जाना चाहए। यह संघष के साथ-साथ सृजन, पुननमण और सृितक पुनजगरण क भी कहानी है। गरिमटया समुदाय ने िवपरत परितय म िवालय ािपत कए, हद और अन्य भारतीय भाषाओ का संरक्ष ण कया, रामायण मंडलय, सृितक संगठन और धामक संाओ क ापना क तथा लोकतत्र क समाज के नमण म सय योगदान दया। प्र वासी SPECIAL ISSUE https://girmitiya.in जुलाई 2026 वाराणसी 15 म इस अवसर पर शोधाथय से िवशेष आग्र ह करना चाहूँगा क वे इस िवषय को केवल अकादिमक शोध का माध्य म न मान, ब इसे समाज और इितहास के प्र ित उत्त रदायत्व के रू प म देख। हम डजटल अिभलेखागार, ऑडयो-वीडयो साक्ष ाार, लोकसाहत्य का संग्र ह, बहुभािषक शब्द कोश, सृितक मानचत्र ण और डजटल डेटाबेस जैसे आधुनक शोध उपकरण का उपयोग करना चाहए। भिवष्य का इितहास केवल पुस्त क म नह, ब डजटल संसाधन म भी सुरक्ष त होगा। ो. पंचानन मोहंती हैदराबाद िवश्व िवालय, हैदराबाद (भारत) म अनुप्र युक्त भाषािवान और अनुवाद अध्य यन कद्र म पूव प्र ो./ संकाय अध्यक्ष (मानिवक) रहे ह ,भाषा शक्ष ण, मनोभाषािवान, समाजभाषािवान, नृजातीय भाषािवान, भाषा लुप्तप्र ायता, अनुवाद अध्य यन, कम् ूटेशनल भाषािवान, मात्र ात्म क भाषािवान, ध्व निवान के साथ-साथ ध्व निवान और आकृित िवान जैसे क्षेत्र म प्र ितत पत्र काओ म उनका एक समृद्ध प्र काशन इितहास है। उने अंग्रे जी और उड़या म 28 पुस्त क लख और संपादत क ह, साथ ह उड़या म 4 पुस्त क का अनुवाद भी कया है। उने राय और अंतरराय स्त र पर िविभन्न भाषाई संघ और पत्र काओ म पद संभाले ह। वे फाउंडेशन फॉर एंडजड लेजेज, यूके और स्व देशी पारंपरक ान और लुप्तप्र ाय भाषाओ के संरक्ष ण और संवधन के लए गोलमेज सेलन क कायकार सिमित के सदस्य थे। भारत सरकार के मानव संसाधन िवकास मंत्र ालय ारा प्र ायोजत मैसूर त कद्र य भारतीय भाषा संान क लुप्तप्र ाय भाषाओ के संरक्ष ण और संवधन योजना के अंतगत लुप्तप्र ाय भाषाओ पर परयोजनाओ के प्र धान अेषक भी ह। उने एनटईएलट सेलन म वैानक सिमित के सदस्य के रू प म काय कया है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 16 गरिमटया अध्य यन क अवधारणा - गजेन्द्र पाठक प्र ो. गजेन्द्र पाठक ने दो दवसीय कायक्र म क अवधारणा प्र ुत क, कायक्र म क वैचारक पृष्ठ भूिम एक अंतःिवषय (INTERDISCIPLINARY) एवं सहभागतापरक (PARTICIPATORY) दृ कोण पर आधारत बताई, जसके अंतगत इितहास, समाजशास्त्र , मानवशास्त्र , सृितक अध्य यन, प्र वासन अध्य यन तथा शोध पद्ध ित से संबंधत िवशेषज्ञ को एक साझे मंच पर आमंत्र त कया गया। " िटश औपनवेशक शासन के दौरान भारतीयश्र िमक प्र वास का सृितक इितहास " िवषय पर आयोजत यह -दवसीय शोध एवंप्र ावली प्र माणीकरण परचच केवल एक शैक्ष णक आयोजन नह है, ब भारतीयप्र वासन इितहास, सृितक िवरासत और गरिमटया समुदाय क सामूहक ृितय को वैज्ञ ानक दृ से समझने क दशा म एक महत्त्व पूण राय पहल है। भारतीय सामाजक िवज्ञ ान अनुसंधान परषद (ICSSR) ारा समथत यह दघकालक शोध परयोजना इस िवश्व ास पर आधारत है क भारतीय अनुबंधतश्र िमक (गरिमटया) का इितहास केवल औपनवेशक अिभलेख म सुरक्ष त नह है, ब वह लोकृितय, भाषायी परंपराओ, सृितक व्य वहार, धामक आाओ, पारवारक संरचनाओ, मौखक इितहास औरप्र वासी समुदाय के जीवंत अनुभव म भी समानरू प से िवद्य मान है। अतः इस इितहास का अध्य यन तभी पूण और प्र ामाणक हो सकता है, जब िविभन्न ज्ञ ानानुशासन के बीच साथक संवाद ािपत कया जाए। इस परयोजना का प्र मुख उेश्य केवल गरिमटया इितहास का पुनपठ करना नह है, ब भारतीय श्र िमक प्र वास के सृितक इितहास का ऐसा बहुआयामी दावेज तैयार करना है, जसम ऐितहासक तथ्य , सामाजक परवतन, भाषायी नरंतरता, सृितक पुननमण, सामुदायक ृितय और भारतीयता के संरक्ष ण क प्र क्र याएँ समान महत्त्व के साथ सलत ह। औपनवेशक दावेज हम प्र वास क प्र शासनक संरचना, अनुबंध, जहाज़, श्र मव्य वा और जनसंा संबंधी आँकड़े उपलब्ध कराते ह, कतु वे प्र वासी भारतीय के भावनात्म क संसार, सृितक संघष, पारवारक जीवन, लोकृितय और आत्म ानुभव को पयप्त रू प से अिभव्यक्त नह करते। यह कारण है क यह परयोजना अिभलेखीय ोत के साथ-साथ मौखक इितहास, लोकसाहत्य , सृितक व्य वहार और सामाजक अनुभव को भी समान महत्त्व देती है। इस परचच का सबसे महत्त्व पूण उेश्य परयोजना के लए िवकसत क जा रह प्र ावली का िवशेषज्ञ ारा परक्ष ण, परार औरप्र माणीकरण है। कसी भी सामाजक अनुसंधान मप्र ावली केवल प्र का संग्र ह नह होती, ब वह पूर अनुसंधान क दशा, गुणवा और िवश्व सनीयता नधरत करती है। यद प्र ावलीव्य ापक, संतुलत और संदभ-संवेद होगी, तभी उसके माध्य म से प्र ाप्त आँकड़े भी प्र ामाणक और उपयोगी हगे। इसी दृ से इस दो दवसीय कायक्र म क परकल्प ना क गई है, ताक िविभन्न िवषय के िवशेषज्ञ प्र ावली के प्रत्ये क आयाम का गंभीर परक्ष ण कर सक तथा आवश्य क सुझावप्र दान कर सक । परयोजना क प्र ावली को इस प्र कार िवकसत करने का प्र यास कया जा रहा है क उसम केवल तथ्य ात्म क सूचनाएँ-जैसे नाम, ान, भाषा, शक्ष ा अथवा व्य वसाय-ह न ह, ब प्र वासी समुदाय के जीवनानुभव को भी समुचत ान िमले। इसम मौखक इितहास, पारवारक ृितय, सृितक अनुकूलन, धामक व्य वहार, लोकगीत, लोककथाएँ, त्य ोहार, भाषा-प्र योग, सामाजक संगठन, सामुदायक पहचान, सृितक प्र ितरोध, पारंपरक ज्ञ ान, पीढ़य के बीच सृितक परवतन तथा भारत के साथ भावनात्म क संबंध जैसे अनेक आयाम सलत कए जा रहे ह। इसप्र कार यह प्र ावली मात्र एक सवक्ष ण उपकरण न होकर सृितक इितहास के दावेजीकरण का माध्य म बनेगी।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 17 कायक्र म क अवधारणा का एक अत्यं त महत्त्व पूण पक्ष क्षेत्र ीय िविवधताओ को समुचत ान देना है। भारत से गरिमटया प्र वास मुख्य तः िबहार, पूव उत्त र प्र देश, झारखंड, तिमलनाडु और आंध्र प्र देश सहत अनेक क्षेत्र से हुआ था। प्रत्ये क क्षेत्र क अपनी िवशष्ट भाषायी, सृितक और सामाजक परंपराएँ थ, जो प्र वासी समाज म िविभन्न रू प म संरक्ष त हुईं । इसलए प्रश्न ावली का नमण इस प्र कार कया जाना आवश्य क है क वह क्षेत्र ीय िभन्न ताओ को भी समाहत कर सके। एक हप्र कार के प्रश्न सभी समुदाय पर समान रू प से लागू नह हो सकते। इसीलए िवशेषज्ञ के सुझाव के आधार पर प्रश्न क भाषा, संरचना और सृितक उपयुक्त ता का परक्ष ण इस कायक्र म का प्र मुख उेश्य है। यह परचच शोध प्र क्र या को अधक सहभागी (PARTICIPATORY) बनाने का भी प्र यास है। सामान्य तः अनुसंधान क रू परखा कुछ सीिमत शोधकतओ ारा तैयार क जाती है, कतु इस परयोजना म यह माना गया है क गुणवत्त ापूण शोध सामूहक बौद्ध क सहभागता से ह संभव है। इसलए इितहासकार, समाजशाी, भाषािवज्ञ ानी, मानवशाी, साहत्य कार, सृितक अध्य यन के िवशेषज्ञ तथा क्षेत्र ीय शोधकत एक साथ बैठकर प्रश्न ावली क समीक्ष ा करगे। यह प्र क्र या न केवल शोध क गुणवत्त ा को बढ़ाएगी, ब िविभन्न दृ ष्ट कोण के बीच संवाद ािपत कर उसे अधक समृद्ध भी बनाएगी। कायक्र म का एक अन्य उेश्य अनुसंधान पद्ध ित (RESEARCH METHODOLOGY) को अधक वैज्ञ ानक, संदभ-संवेद तथा िवश्व सनीय बनाना है। सामाजक अनुसंधान केवल आँकड़ के संकलन का काय नह है; उसके पीछे स्पष्ट सैद्ध ितक आधार, उपयुक्त शोध उपकरण तथाप्र माणक िवेषण क प्र क्र या भी आवश्य क होती है। इसी कारण इस परचच म प्रश्न ावली नमण के साथ-साथ नमूना चयन SAMPLING), क्षेत्र काय (FIELDWORK), नैितक पक्ष (RESEARCH ETHICS), डेटा सत्य ापन, मौखक इितहास के संकलन, डजटल अिभलेखीकरण तथा तुलनात्म क अध्य यन क पद्ध ितय पर भी िवस्त ार से िवचार कया जाएगा। इस परयोजना का एक िवशेष उेश्य भारत औरप्र वासी देश के बीच तुलनात्म क अध्य यन क सुदृ ढ़ आधारभूिम तैयार करना भी है। िबहार और पूव उत्त र प्र देश के उन क्षेत्र का अध्य यन, जह से बड़ संख्य ा म श्र िमक िवदेश गए थे, प्र वासी समाज के सृितक अध्य यन के साथ जोड़कर कया जाएगा। इससे यह समझने म सहायता िमलेगी कप्र वास के पात कन सृितक त का संरक्ष ण हुआ, कनम परवतन आया और कन नई सृितक प्र क्र याओ का िवकास हुआ। इस प्र कार अध्य यन केवल ऐितहासक पुननमण तक सीिमत न रहकर सृितक नरंतरता और परवतन दोन का िवेषण करगा। आज डजटल प्र ौोगक ने सामाजक अनुसंधान क संभावनाओ को भी व्य ापक बनाया है। इस परयोजना म संकलत आँकड़ को दघकालक उपयोग के लए व्य वत डजटल रू प म संरक्ष त करने क योजना भी है। भिवष्य म यह सामी शोधाथय, शक्ष क, नीित-नमताओ तथाप्र वासी भारतीय समुदाय के लए एक महत्त्व पूण संदभ ोत सद्ध हो सकती है। इस दृ ष्ट सेप्रश्न ावली का वैज्ञ ानक नमण और उसकाप्र माणीकरण अत्यं त आवश्य क है। गरिमटया इितहास केवल अतीत का अध्य यन नह है; यह वतमान और भिवष्य दोन से जुड़ा हुआ िवषय है। आज जब वैश्व क स्त र पर प्र वासन, सृितक पहचान, भाषायी संरक्ष ण, ृित- अध्य यन और डायस्प ोरा अध्य यन नए िवमश के कद्र म ह, तब भारतीय गरिमटया अनुभव िवश्व मानव इितहास क एक महत्त्व पूण धरोहर के रू प म उभरकर सामने आता है। यह परयोजना उसी िवरासत को व्य वत रू प से समझने, संरक्ष त करने और नई पीढ़य तक पहुँचाने का प्र यास है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 18 इस परचच का अंितम उेश्य केवल एकप्र ावली को अंितम रू प देना नह, ब एक ऐसी अनुसंधान संृित का नमण करना है जो संवाद, सहयोग, सहभागता और बहुिवषयीदृ कोण पर आधारत हो। हम िवश्व ास है क इन दो दन म प्र ाप्त िवशेषज्ञ सुझाव, आलोचनात्म क टप्प णय और वैचारक िवमश इस परयोजना क अनुसंधान पद्ध ित को अधक परृत, अधक वैज्ञ ानक तथा अधक िवश्व सनीय बनाएँगे। यह इस कायक्र म क सबसे बड़ उपल होगी।गजद्र पाठक परयोजना नदेशक वरष्ठ प्र ो. हद िवभाग/ मानिवक संकाय, हैदराबाद िवश्व िवालय, हैदराबाद हम आशा करते ह क यह पहल भारतीय श्र िमकप्र वास, गरिमटया िवरासत, सृितक इितहास और वैश्व क भारतीय समुदाय के अध्य यन के लए एक नई शोध-दशा का उद्घाटन करगी तथा भिवष्य म इस ेत्र म होने वाले अनुसंधान के लए एक सुदृ ढ़ कायप्र णाली, प्र माणक डेटा- संग्र ह प्र णाली और अंतःिवषयक अनुसंधान मॉडल प्र ुत करगी। यह इस परचच क मूल भावना, इसक वैचारक पृष्ठ भूिम और इसक अकादिमक साथकता है।प्र ोफेसर गजेन्द्र कुमार पाठक समकालीन ह जगत के प्र ितत शक्ष ािवद्, आलोचक, शोधकत तथा साहत्ये ितहासकार ह। वतमान म वे हैदराबाद िवश्व िवालय के मानिवक संकाय के ह िवभाग म सीनयर प्र ोफेसर के रू प म कायरत ह। उने जवाहरलाल नेहरू िवश्व िवालय से ह म एम.ए. एवं एम.फल. तथा वीर कुंवर सह िवश्व िवालय, आरा से पीएच.ड. क उपाध प्र ाप्त क। उनका शोध एवं अध्य ापन लगभग तीन दशक से अधक समय तक फैला हुआ है, जसम ह नवजागरण, भक्त आोलन, साहत्ये ितहास, समकालीन ह आलोचना तथा भारतीय भाषाओ के तुलनात्म क अध्य यन प्र मुख क्षेत्र रहे ह। उने हैदराबाद िवश्व िवालय म िवभागाध्यक्ष के रू प म भी सफल प्र शासनक दायत्व नभाया है। उनके नेतृत्व म अनेक शोधाथय ने पीएच.ड. एवं एम.फल. क उपाधय प्र ाप्त क ह। वतमान म भी उनके नदशन म अनेक महत्त्व पूण शोध परयोजनाएँ संचालत ह।प्र ोफेसर पाठक वतमान म भारतीय सामाजक िवान अनुसंधान परषद (ICSSR) ारा िवत्त पोिषत "A CULTURAL HISTORY OF INDIAN LABOUR MIGRATION DURING BRITISH COLONIAL RULE" नामक महत्त्व ाकक्ष ी शोध परयोजना के परयोजना नदेशक ह। इसके अितरक्त उने औपनवेशक भारत म प्र ितबंधत ह-उदू मुद्र ण संृित पर भी महत्त्व पूण शोध का नेतृत्व कया है। ह साहत्य , नवजागरण, भक्त साहत्य , औपनवेशक इितहास तथा सृितक अध्य यन पर उनक अनेक पुस्त क , संपादत ग्रं थ और शोध-लेख प्र काशत हो चुके ह। उ INSTITUTION OF EMINENCE RESEARCH AWARD, रमणलाल अग्र वाल पुरार, UGC-JRF तथा राय छात्र वृत्त जैसे प्र ितत सान प्र ाप्त हुए ह। वे देश-िवदेश के अनेक िवश्व िवालय, शैक्ष णक परषद एवं पाठ्यक्र म सिमितय के सदस्य रहे ह तथा ीलंका, िटेन सहत अनेक अंतरराय मंच पर ाान दे चुके ह। ह भाषा, भारतीय ान परम्प रा, प्र वासी अध्य यन, गरिमटया इितहास तथा सृितक िवमश के क्षेत्र म उनका योगदान िवशेष रू प से उेखनीय है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 19 िवमोचन प्र वासी के प्र वेशक का िवमोचन इस अवसर पर परयोजना के ूज़लेटर ‘प्र वासी ’ का औपचारक लोकापण संपन्न हुआ। जसम िवषय िवशेष, शािवद, शोधाथय तथा िविभन्न संान के प्र ितनधय क गरमामयी उपित रह। कायक्र म का उेश्य गरिमटया श्र िमक प्र वास के इितहास, सृितक िवरासत तथा भारतीय प्र वासी समुदाय क ऐितहासक ृितय को अकादिमक िवमश के कद्र म ािपत करना था। लोकापण समारोह के दौरान वक्त ाओ ने इस प्र कार क शोधपरक सामी के महत्त्व को रखकत करते हुए कहा क इससे प्र वासी भारतीय के इितहास, सृितक पहचान, भाषाई नरंतरता तथा सामाजक संघष को समझने के लए एक सशक्त बौक आधार प्र ाप्त होगा। कायक्र म म वक्त ाओ ने इस बात पर िवशेष बल दया क गरिमटया इितहास केवल औपनवेशक श्र म-प्र था का दावेज नह, ब सृितक ृितय, प्र ितरोध, पहचान नमण तथा सामाजक पुनसरचना काभी इितहास है। इस संदभ म लोकापत सामी को शोधाथय, अध्ये ताओ एवं नीित-नमताओ के लए उपयोगी ोत बताते हुए इसके माध्य म से भारत और प्र वासी भारतीय समुदाय के मध्य ऐितहासक एवं सृितक संबंध को सुदृ ढ़ करने क आवश्य कता पर बल दया गया। उपत िवशेष ने आशा व्यक्त क क यह पहल गरिमटया अध्य यन (INDENTURE STUDIES),प्र वासन इितहास तथा भारतीय डायोरा संबंधी शोध को नई दशा प्र दान करगी तथा उपेत ऐितहासक अनुभव के दावेजीकरण म महत्त्व पूण भूिमका नभाएगी।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 20 पूव यूरोपीय शक रा उपनवेश म गरिमटया भारतीयप्र वासय क पहचान, िवरासत और सृितक नरंतरता- आशुतोष कुमार प्र ो. आशुतोष कुमार ने अपने ाख्य ान म यूरोपीय साा के पूव शक रा (गन्न ा) उपनवेश म बसे गरिमटया भारतीय प्र वासय क पहचान-नमण, सृितक िवरासत तथा धामक-सामाजक जीवन के िविभन्न आयाम पर िवार से चच क। उनका ाख्य ान इस बात पर क त था क उन्न ीसव और बीसव शता के प्र ारक दशक म भारत से गरिमट (INDENTURE) प्र था के अंतगत िविभन्न उपनवेश-जैसे मॉरशस, सूरनाम, फ़जी, त्र नदाद एवं टोबैगो, गुयाना तथा दक्ष ण अका-म भेजे गए भारतीय ने अत्यं त प्र ितकूल परितय के बावजूद अपनी सृितक और धामक पहचान को कसप्र कार संरक्ष त रखा।प्र ो. कुमार के अनुसार, जब भारतीय श्र िमक को गन्न ा बागान म काय करने के लए इन उपनवेश म ले जाया गया, तब वे केवल श्र िमक नह थे, ब अपने साथ भारतीय सभ्य ता, संृित, भाषा, धम, परंपराएँ, रित-रवाज और जीवन-दृ ष्ट भी लेकर गए थे। नए सामाजक और भौगोलक परवेश म उ अनेक चुनौितय का सामना करना पड़ा। भाषायी िविवधता, जातीय िवभाजन, औपनवेशक नयंत्र ण तथा ानीय समाज के दबाव के बीच अपनी सृितक पहचान को बनाए रखना आसान नह था। फर भी उने भारतीय संृित के अनेक तत्व को सुरक्ष त रखा और उ नई परितय के अनुरू प िवकसत भी कया।प्र ो. कुमार भारतीयप्र वासय क पहचान को मुख्य तः दो रू प म देखते ह। पहला है “ टेशन पहचान ” (PLANTATION IDENTITY), जो बागान श्र िमक के रू प म उनके साझा अनुभव, संघष और जीवन-ितय से नमत हुई। िविभन्न क्षेत्र , भाषाओ और जाितय से आए भारतीयश्र िमक ने बागान म एक नई सामूहक पहचान िवकसत क,जसने उ एक समुदाय के रू प म जोड़ने का काय कया। दूसर है “ राजनीितक पहचान ” (POLITICAL IDENTITY), जो समय के साथ सामाजक अधकार,प्र ितनधत्व और राजनीितक भागीदार के संघष के माध्य म से िवकसत हुई। इस पहचान ने भारतीय मूल के समुदाय को उपनवेश के सावजनक और राजनीितक जीवन म महत्त्व पूणान दलाया। ाख्य ान म उने गरिमटया समाज के पारवारक जीवन और िववाह संान पर भी प्र काश डाला।प्र वासी भारतीय ने िववाह, पारवारक संबंध और सामाजक संगठन क भारतीय परंपराओ को यथासंभव बनाए रखा। जन्म और मृत्यु से जुड़े संार एवं अनुान का भी संरक्ष ण कया गया, जससे समुदाय के भीतर सृितक नरंतरता बनी रह। इन संार ने न केवल धामक आा को जीिवत रखा ब सामुदायक एकता को भी सुदृ ढ़ कया।प्र ो. कुमार ने भारतीय प्र वासी समुदाय के सृितक आयोजन और त्य ोहार का िवशेष उेख कया। उने बताया क अक्ष य तृतीया (अखतीज), नागपंचमी, रक्ष ाबंधन, दपावली, होली जैसे पव आज भी इन देश म उाहपूवक मनाए जाते ह। इसी प्र कार ताजया और होसै जैसे आयोजन भारतीय उपमहाप क साझा सृितक िवरासत को दशते ह। धामक आयोजन म सत्य नारायण कथा, रामनवमी, जन्म ाष्ट मी, काली पूजा, शव पूजा तथा ाम देवताओ और देिवय- िवशेष रू प से ‘ डह ’ पूजा-क परंपराएँ भी आज तक जीिवत ह। ये धामक और सृितक प्र दशन प्र वासी भारतीय क सामूहक ृित और पहचान को संरक्ष त रखने म महत्त्व पूणभूिमका नभाते ह। उने भारतीय भोजन और पाक-संृित (CUISINE AND GASTRONOMY) को भी प्र वासी पहचान का एक महत्त्व पूणआधार बताया। भारतीय ंजन, मसाल और भोजन-परंपराओ ने न केवल भारतीय समुदाय को अपनी जड़ से जोड़े रखा, ब ानीय संृितय के साथ संवाद और सृितक आदान-प्र दान का माध्य म भी बने।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 21 प्र ो. आशुतोष कुमार : आधुनक दण एशया, गरिमटया इितहास और भारतीय प्र वासी अध्य यन के अग्र णी इितहासकारप्र ो. आशुतोष कुमार समकालीन भारत के प्र ितत इितहासकार एवं प्र वासन अध्य यन (MIGRATION STUDIES) के अग्र णी िवान ह। वतमान म वे काशी हू िवश्व िवद्य ालय (BANARAS HINDU UNIVERSITY) म इितहास िवभाग के प्र ो. ह। उने दी िवश्व िवद्य ालय से आधुनक भारतीय इितहास म ातक, ातकोत्त र, एम.फल. तथा पीएच.ड. क उपाधय प्र ाप्त क। उनका शैक्ष णक जीवन आधुनक दक्ष ण एशया, सबाल्ट न अध्य यन, भारतीय प्र वासी इितहास, गरिमटया श्र म व्य वा, श्र मप्र वासन, औपनवेशक इितहास, जाित एवं जडर, ास्थ्य एवं चका इितहास, खाद्य इितहास, िवध एवं श्र म तथा सैन्य इितहास जैसे िविवध लेकन परस्प र जुड़े शोध क्षे को समपत रहा है।प्र ो. कुमार क सबसे बड़ िवशेषज्ञ ता गरिमटया इितहास (INDENTURED LABOUR HISTORY) और भारतीय डायस्प ोरा अध्य यन (INDIAN DIASPORA STUDIES) है। उने उन्न ीसव और बीसव शता के औपनवेशक श्र म प्र वासन, गरिमटयाश्र िमक के जीवन, उनक सामाजक-सृितक पहचान, प्र ितरोध, ृित और वैश्व क भारतीय समुदाय के नमण का गहन ऐितहासक िवेषण प्र ुत कया है। उनका शोध यह ािपत करता है क गरिमटया श्र िमक केवल औपनवेशक शोषण के शकार नह थे, ब उने नए समाज म अपनी सृितक पहचान, भाषा, धामक परंपराओ और सामुदायक चेतना को भी सशक्त रू प से संरक्ष त एवं िवकसत कया। उनके शोध का एक िवशष्ट पक्ष सबाल्ट न दृ ष्ट कोण है। वे इितहास को शासक के बजाय श्र िमक, कसान, महलाओ, दलत और हाशये के समुदाय के अनुभव के आधार पर पुनपरभािषत करते ह। गरिमटया महलाओ, श्र म अनुबंध, यौन हसा, िपतृसत्त ा, कानून, लोकृित और श्र िमक प्र ितरोध पर उनके शोध ने आधुनक इितहास लेखन म नए िवमश को जन्म दया है। उनके काय भारतीय श्र म इितहास को वैश्व क इितहास, समु इितहास तथा टसनेशनल नेटव से जोड़ते ह।प्र ो. आशुतोष कुमार ने अनेक प्र ितत अंतरराष्ट य शोध परयोजनाओ का नेतृत्व कया है। SEPHIS (एम्स्ट डम) ारा िवत्त पोिषत INDENTURED MIGRATION FROM NORTHERN INDIA (1830–1920), AHRC (यूके) क BECOMING COOLIES: RETHINKING LABOUR MIGRATION IN THE INDIAN OCEAN, ICSSR समथत GIRMITIYA BHARATIYA: HINDUISM AND CULTURAL IDENTITY AMONG INDIAN INDENTURED DIASPORA तथा भारतीय महासागर और दक्ष ण अका के संबंध पर क त शोध परयोजनाएँ उनके व्य ापक अंतरराष्ट य अकादिमक योगदान का प्र माण ह। इन परयोजनाओ ने भारतीय गरिमटया इितहास को वैश्व क इितहास के व्य ापक संदभ म ािपत करने म महत्त्व पूण भूिमका नभाई है। इस प्र कार गरिमटया भारतीय समुदाय ने अपनी सृितक िवरासत को संरक्ष त रखते हुए एक िवशष्ट प्र वासी पहचान का नमण कया, जो आज भी उनके सामाजक और सृितक जीवन का अिभन्न अंग है। समय के साथ भारतीय और ानीय खाद्य परंपराओं के मश्र ण से नई पाक-संस् कृतय का वकास हु आ, जो आज इन समाज क वशष्ट पहचान बन चुक ह।अपने व्य ाख् यान के अंत म प्र ो. कुमार ने यह महत्त् वपूणतक प्रस् तुत कया क प्र वासी भारतीय संस् कृत के अध् ययन म संस् कृत और कृष के बीच एक प्र कार का संबंध और असंबंध (DIS-LINK) दोन मौजूद ह। यद्य प भारतीय श्र मक कृष काय के लए उपनवेश म भेजे गए थे, कतु उनक सांस् कृतक अभव्य याँ केवल कृष जीवन तक सीमत नह रह। उन् हने अपनी सांस् कृतक और धामक परंपराओं को नए सामाजक संदभ म पुनगठत कया और उन् ह जीवंत बनाए रखा।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 22 प्र वासी परप्रेक्ष्य से गरिमटया पहचान का पुनपठ - अा पाेय अब तक गरिमटया इितहास (GIRMITIYA HISTORY) और प्र वासी अध्य यन (DIASPORA STUDIES) दो समानतर अकादिमक अनुशासन केरू प म िवकसत हुए ह। गरिमटया इितहास का मुख्य सरोकार औपनवेशक अनुबंधत श्र म व्य वा (INDENTURED LABOUR SYSTEM), श्र िमक क भत, समुद्र यााओ, बागान म श्र म-ितय तथा औपनवेशक शोषण क ऐितहासक प्र या से रहा है। दूसर ओर प्र वासी अध्य यन का कद्र प्र वासन, सृितक पहचान, ृित, िवापन, संकरता (HYBRIDITY), अंतरराष्ट यता (TRANSNATIONALISM) तथा वैक नागरकता जैसे वैचारक प्रश्न रहे ह। यद्य िप दोन े का अध्य यन-िवषय एक ह समुदाय के इद-गद घूमता है, फर भी इनके मध्य अपेत संवाद और अंतसबंध अपेाकृत सीिमत रहे ह। परणामस्वरू प गरिमटया अनुभव को प्र ायः केवल औपनवेशक इितहास अथवा श्र म-इितहास के संदभ म देखा गया, जबक उसक बहुआयामी सृितक, सामाजक और मनोवैानक प्र याएँ अपेाकृत कम िवेिषत हुईं । इसलए आज आवश्य कता इस बात क है क गरिमटया अनुभव को प्र वासी अध्य यन क सैद्ध ितक अवधारणाओ के आलोक म पुनपठत कया जाए। इससे न केवल गरिमटया इितहास क नई व्य ाख्य ाएँ संभव हगी, ब प्र वासी अध्य यन को भी एक समृद्ध ऐितहासक आधार प्र ाप्त होगा।प्र वासी अध्य यन इस धारणा को स्व ीकार करता है कप्र वासी समुदाय र, एकरखीय अथवा एकरू प इकाइय नह होते। वे समय, ान, राजनीितक परितय, आथक परवतन तथा पीढ़गत अनुभव के साथ नरंतर रू पतरत होते रहते ह। कसी भी प्र वासी समुदाय क पहचान एक ायी संरचना नह होती, ब वह ृितय, अनुभव, सृितक अंतःयाओ और ऐितहासक परितय के बीच लगातार नमत और पुननमत होती रहती है। इस दृ ष्ट से गरिमटया समुदाय को केवल भारत से बाहर गए श्र िमक के रू प म देखना पयप्त नह है। उ एक ऐसे गितशील प्र वासी समुदाय के रू प म समझना आवश्य क है जसने औपनवेशक दमन, सृितक पुनसृजन, सामाजक संघषतथा वैकप्र वासन के अनेक चरण को पार करते हुए अपनी िवशष्ट पहचान नमत क। गरिमटया पहचान को समझने के लए पच प्र मुख अवधारणाएँ िवशेष रू प से उपयोगी सद्ध होती ह-प्र वासन (MIGRATION), ‘ घर ’ क अवधारणा (HOME), मेजबान समाज के साथ संबंध (HOST SOCIETY), संकरता (HYBRIDITY) तथा अंतरराष्ट यता (TRANSNATIONALISM)। ये पच अवधारणाएँ िमलकर यह स्पष्ट करती ह क गरिमटया समुदाय केवल इितहास का िवषय नह, ब समकालीन वैक प्र वासी िवमश का भी एक महत्त्व पूण अंग है। इन अवधारणाओ के माध्य म से इंडो-फजयन समुदाय का अध्य यन िवशेष रू प से साथक प्र तीत होता है, क यह समुदाय गरिमटया इितहास और आधुनक प्र वासी पहचान दोन के जटल संबंध का प्र ितनधत्व करता है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 23 प्र वासन कसी भी प्र वासी समुदाय क आधारशला है। कतु प्र वासी अध्य यन यह स्पष्ट करता है क मात्र भौगोलक स्थ ानतरण कसी समुदाय को प्र वासी नह बना देता। प्र वासी पहचान का नमण एक दघकालक सामाजक और ऐितहासक प्र या है, जसम अनेक पीढ़य के अनुभव, ृितय, सृितक पुननमण तथा मेजबान समाज के साथ संबंध नणयक भूिमका नभाते ह। इस संदभ म इंडो- फजयन समुदाय का इितहास अंत महत्त्व पूण है। 1879 से 1916 के बीच हजार भारतीय को िटश सााज्य ारा अनुबंधत श्र िमक के रू प म फजी भेजा गया। इन श्र िमक का अधकश भाग उत्त रप्र देश, िबहार तथा वतमान झारखंड के ामीण क्षेत्र से आया था। आथक संकट, अकाल, सामाजक असमानता और औपनवेशक शोषण ने उ इसप्र वासन के लए िववश कया। यद्य िप औपनवेशकप्र शासन ने इसे अनुबंध आधारत स्वै क श्र मव्य वस्थ ा के रू प म प्रस्तु त कया, परंतु अनेक ऐितहासक ोत यह संकेत करते ह क भत प्र या छल, िमा वाद, अपूण जानकार तथा संरचनात्म क आथक िववशताओ से प्र भािवत थी। इसलए यहप्रश्न आज भी इितहासकार और प्र वासी अध्ये ताओ के बीच बहस का िवषय है क गरिमटया श्र िमक वास्त व म कतने स्वे ापूवक इस यात्र ा पर नकले थे। गरिमटया अनुभव का सबसे महत्त्व पूणपक्ष केवल भारत से फजी तक का प्र वासन नह, ब उसका बहुस्त रय िवस्थ ापन है। इंडो-फजयन समुदाय ने दोहर प्र वासन का अनुभव कया। पहला िवस्थ ापन भारत से फजी तक औपनवेशक अनुबंधत श्र मव्य वस्थ ा के अंतगत हुआ। दूसरा िवस्थ ापन स्व तंत्र ता- उपरत फजी क राजनीितक अस्थ रता, नीय तनाव और सैन्य तापलट के परणामस्वरू प हुआ, जसके कारण बड़ संा म इंडो-फजयन समुदाय के लोग ऑेलया, न्यू ज़ीलड, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरका और िटेन जैसे देश क ओर प्र वासत हुए। इस प्र कार यह समुदाय एक बहुस्त रय वैकप्र वासी समुदाय म परवतत हो गया। आज भी शक्ष ा, रोजगार और बेहतर जीवन क आकक्ष ा इस समुदाय को नए वैक प्र वास क ओर प्रे रत कर रह है। अतः गरिमटया अनुभव को एक सतत प्र वासनप्र या के रू प म देखना अधक उपयुक्त है।प्र वासी अध्य यन म ‘ घर ’ (HOME) क अवधारणा अंत क य है। प्र ारंिभक प्र वासी सत म ‘ घर ’ का अथ मूल भूिम म लौटने क आकक्ष ा से जोड़ा गया था। कतु समकालीन िवान-िवशेषतः अवतार ाह- ने इस अवधारणा का पुनपरभाषीकरण करते हुए ‘ होमग डज़ायर ’ (HOMING DESIRE) क संकल्प नाप्रस्तु त क। उनके अनुसार प्र वासी समुदाय के लए ‘ घर ’ केवल भौगोलक स्थ ान नह होता, ब वह एक सृितक, भावनात्म क और मनोवैानक अनुभव होता है, जसे वे अपने वतमान नवास-स्थ ल पर भी नमत कर सकते ह। इस दृ ष्ट से इंडो- फजयन समुदाय ने भारत लौटे िबना ह फजी को अपना सृितक घर बना लया। उने भारतीय धामक परंपराओ, पव-ोहार, िववाह-संार, लोकगीत, रामचरतमानस के पाठ, भजन-कतन, हनुमान पूजा तथा सामुदायक आयोजन के माध्य म से भारतीय सृितक ृितय को जीिवत रखा। यह सृितक संरक्ष ण कसी जड़ परंपरावाद का परणाम नह था, ब नई परस्थ ितय म अपनी सामुदायक पहचान को सुरक्ष त रखने क एक सृजनात्म क प्र या थी। इंडो-फजयन समाज म भाषा भी ‘ घर ’ क अवधारणा का महत्त्व पूणआधार बनी। भोजपुर, अवधी तथा अन्य उत्त र भारतीय बोलय के सश्र ण से िवकसत फजी हद इस बात का प्र माण है क प्र वासी समुदाय अपनी सृितक जड़ को सुरक्ष त रखते हुए नए सामाजक परवेश म नवीन भाषायी रू प का नमण करते ह। यह कारण है क फजी हद केवल एक संपक भाषा नह, ब सृितक ृित और सामुदायक अता का वाहक भी है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 24 आधुनक संचार माध्य म-िवशेषतः बॉलीवुड सनेमा, भारतीय टेलीिवजन, डजटल मीडया, सोशल मीडया, धामक चैनल तथा भारतीय संगीत-ने इस सृितक संबंध को और अधक सुदृ ढ़ कया है। आज भारत और फजी के बीच सृितक दूर भौगोलक दूर क अपेा कह कम प्र तीत होती है।प्र वासी पहचान का तीसरा महत्त्व पूणआयाम मेजबान समाज के साथ संबंध है। कोई भी प्र वासी समुदाय केवल अपनी मूल संृित को सुरत नह रखता, ब ानीय समाज के साथ नरंतर अंतःया करता है। यह संबंध कभी सहयोग का होता है, कभीप्र ितस्प ध का और कभी संघष का। इंडो-फजयन समुदाय ने फजी के ानीय समाज के साथ कृिष,व्य ापार, शा तथा प्र शासनक े म महत्त्व पूणभूिमका नभाई। कतु इसके साथ-साथ उ नीय िवभाजन, राजनीितक प्र ितनधत्व क असमानता तथा सामाजक भेदभाव जैसी चुनौितय का भी सामना करना पड़ा। िवशेषकर 1987, 2000 और 2006 के राजनीितक संकट ने इस समुदाय क असुरा क भावना को और गहरा कया। इसके बावजूद उने लोकतक भागीदार, शा तथा आथक आत्म नभरता के माध्य म से अपनी सामाजक ित को सुदृ ढ़ कया। यह तथ्य स्पष्ट करता है क प्र वासी समुदाय केवल पीड़त समुदाय नह होते, ब वे अपने नए समाज के सय नमता भी होते ह। संकरता (HYBRIDITY) प्र वासी अध्य यन क एक अंत प्र भावशाली अवधारणा है, जसे होमी के. भाभा ने व्य ापक सैद्ध ितक आधार प्र दान कया। उनके अनुसार औपनवेशक और प्र वासी समाज म सृितक पहचान कसी शुद्ध या र रू प म नह रहती, ब िविभन्न संृितय क अंतःया से नए सृितक रू प का नमण होता है। इंडो-फजयन समुदाय इसका उृष्ट उदाहरण प्र ुत करता है। यह भारतीय धामक परंपराएँ, प्र शत पीय सृितक प्र भाव, अंेज़ी शा प्र णाली तथा आधुनक वैक जीवन-शैली एक-दूसर के साथ अंतःया करती ह। परणामस्वरू प भोजन, भाषा, संगीत, वस्त्र , धामकव्य वहार और सामाजक जीवन म एक िवशष्ट िमश्र त सृितक स्वरू प िवकसत हुआ है। यह संकरता सृितक हान का नह, ब सृितक सृजन का प्र तीक है। इसी के माध्य म से प्र वासी समुदाय बदलती परितय के अनुरू प स्व यं को पुनसगठत करता है। अंतरराष्ट यता (TRANSNATIONALISM) समकालीन प्र वासी अध्य यन का एक अन्य महत्त्व पूणआयाम है। इसका आशय यह है क प्र वासी समुदाय एक ह समय म अनेक देश, समाज और सृितक े से जुड़े रहते ह। आधुनक परवहन, डजटल संचार, वैक अथव्य वा तथा सोशल मीडया ने इन संबंध को और अधक सुदृ ढ़ बना दया है। इंडो-फजयन समुदाय आज फजी, भारत, ऑेलया, न्यू ज़ीलड, कनाडा, िटेन और संयुक्त राज्य अमेरका के बीच िवृत सामाजक, आथक और सृितक नेटवक का नमण कर चुका है। धामक संाएँ, पारवारक संबंध, िववाह, शा,व्य ापार, पयटन और सृितक उत्स व इस अंतरराष्ट य नेटवक को नरंतर सय बनाए रखते ह। भारत सरकार ारा आयोजत प्र वासी भारतीय दवस, भारतीय सृितक संबंध परषद क गितिवधय तथा वैक भारतीय संगठन क सयता भी इन संबंध को मजबूत करती ह। अंततः यह कहा जा सकता है क गरिमटया इितहास और प्र वासी अध्य यन को पृथक-पृथक अनुशासन केरू प म देखने के ान पर उनके अंतसबंध को समझना समय क महत्त्व पूणबौद्ध क आवश्य कता है। गरिमटया अनुभव केवल औपनवेशक शोषण, अनुबंधत श्र म और ऐितहासक पीड़ा क कथा नह है, ब यह सृितक पुननमण, सामाजक अनुकूलन, पहचान के पुनसृजन और वैक नागरकता क भी कथा है। प्र वासी अध्य यन क अवधारणाएँ-प्र वासन, घर, मेजबान समाज, संकरता और अंतरराष्ट यता-गरिमटया इितहास को नईव्य ाात्म क संभावनाएँ प्र दान करती ह। इंडो- फजयन समुदाय इस बात का सशक्त उदाहरण है

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 25 Iइस अथ म, गरिमटया श्र िमक समुदाय उन्न ीसव सद के भारत का एक र अवशेष नह है, ब एक बहुआयामी, गितशील और अंतरराष्ट य स्त र पर मान्य ता प्र ाप्त समुदाय है। इस प्र कार, प्र वासी परप्रेक्ष्य से गरिमटया इितहास का अध्य यन यह स्पष्ट करता है क उनके अनुभव वैश्व क प्र वासी समुदाय क व्य ापक सामाजक, सृितक और राजनीितक प्र याओ का एक अिभन्न अंग ह डॉ. अा पडे : भारतीय प्र वासी अध्य यन और गरिमटया िवमश क अग्र णी िवदुषी डॉ. अा पडे समकालीन भारत क प्र ितत शक्ष ािवद्, शोधकत एवं अंतरराष्ट य अध्य यन क िवशेषज्ञ ह, जने भारतीय प्र वासन (Migration), भारतीय प्र वासी समुदाय (Indian Diaspora), गरिमटया इितहास, जडर अध्य यन, टसनेशनलज़् म तथा दक्ष ण-पूव एशया और दक्ष ण प्र शत क्षेत्र के अध्य यन म उेखनीय योगदान दया है। वे जवाहरलाल नेहरू िवश्व िवालय (जेएनयू), नई दी के ूल ऑफ इंटरनेशनल स्ट डज़ म प्र लेखन एवं अनुसंधान अधकार के रू प म कायरत ह और भारतीय प्र वासी अध्य यन क अग्र णी िवान म उनक गणना क जाती है। डॉ. पडे ने इितहास एवं अंतरराष्ट य अध्य यन म उच्च शक्ष ा प्र ाप्त क तथा जेएनयू से एम.फल. और पीएच.ड. क उपाधय अजत क। उनके शोध क िवशेषता यह है क उसम इितहास, राजनीित, समाजशास्त्र , संृित और अंतरराष्ट य संबंध का अंतःिवषयक समन्व य दखाई देता है। उने भारतीय प्र वासन के ऐितहासक िवकास, औपनवेशक गरिमटया श्र म व्य वा, भारतीय प्र वासय क सृितक पहचान, वैश्व क भारतीय समुदाय, प्र वासी महलाओ क ित, भारत क प्र वासी नीित तथा अंतरराष्ट य प्र वासन के समकालीन प्र पर व्य ापक शोध कया है। गरिमटया अध्य यन के क्षेत्र म उनका योगदान िवशेष रू प से उेखनीय है। उने फजी, मॉरशस, सूरनाम, मार तथा दक्ष ण-पूव एशया के भारतीय मूल के समुदाय के इितहास, संृित, भाषा, ृित, पहचान और सामाजक परवतन का गहन अध्य यन कया है। उनके शोध म गरिमटया अनुभव को केवल औपनवेशक शोषण क कथा के रू प म नह, ब सृितक संरक्ष ण, प्र ितरोध, आत्म नमण और वैश्व क भारतीय पहचान के िवकास क प्र या के रू प म देखा गया है। भारतीय डायस्प ोरा के ऐितहासक और समकालीन आयाम को समझने म उनका काय अंत महत्त्व पूण माना जाता है। डॉ. पडे का एक अन्य प्र मुख शोध क्षेत्र जडर और प्र वासन है। उने भारतीय प्र वासी महलाओ के अनुभव, श्र म, सामाजक ित, सृितक अनुकूलन तथा पहचान नमण पर अनेक शोधपत्र और संपादत पुस्त क प्र काशत क ह। उनक कृितय प्र वासी महलाओ के इितहास और उनके योगदान को वैश्व क परप्रेक्ष्य म ािपत करती ह। इसके अितरक्त उने भारत–मार संबंध, भारत क Act East Policy, प्र वासन शासन (Migration Governance), भारत–आसयान संबंध तथा वैश्व क दक्ष ण के संदभ म भारत क भूिमका जैसे िवषय पर भी महत्त्व पूण शोध कया है। डॉ. अा पडे का संपूण अकादिमक जीवन भारतीय प्र वासी समुदाय, िवशेषकर गरिमटया समाज के इितहास, संघष, सृितक िवरासत और वैश्व क पहचान के अध्य यन को समपत रहा है। उनके शोध ने भारतीय डायस्प ोरा अध्य यन को नई वैचारक दशा प्र दान क है और प्र वासन, संृित तथा पहचान के अंतसबंध को समझने के लए एक सुदृ ढ़ बौक आधार नमत कया है। इसी कारण वे आज भारतीय प्र वासी अध्य यन और गरिमटया िवमश क सवधक सानत एवं प्र भावशाली िवदुिषय म प्र ितत ह।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 26 इितहास क ओर पुन – गरिमटया जीवन का आघात - ृित सह प्र वासन एक ऐसी वास्त िवकता है जससे हम सभी परचत हो चुके ह। लोग का रोजगार के लए देश के एक भाग से दूसर भाग म अथवा कसी अन्य देश म जाना आज हमार लए कोई आश्च य क बात नह है। कतु 1838–1924 के औपनवेशक भारत क परितय क कल्प ना कजए। यह वह काल था जब लगभग 15 लाख भारतीय का पहला संगठत पलायन हुआ। इन प्र वासय को सााज्य केस्व ािमत्व वाले िविभन्न बागान-कैरिबयाई प, मॉरशस, फजी आद-म अनुबंधत श्र िमक (INDENTURED LABOURERS) के रू प म नयुक्त कया गया। आज इन देश म भारतीय मूल क जनसंा का 35% से 70% तक हा इप्र वासय के वंशज का है (परजपे, 2001, 2)। यद्य िप बागान पर उनके जीवन के संबंध म अनेक अध्य यन हुए ह, कतु समुद्र यात्र ा के दौरान उनके अनुभव तथा उस प्र वासन के उनके जीवन पर पड़ेप्र भाव क अपेाकृत उपेा क गई है।प्रत्ये क प्र वासन म एक तत्व समान रू प से उपत रहता है-आघात (TRAUMA)। स्व यं प्र वासन ह आघात का एक प्र मुख ोत बन जाता है; दुघटनाएँ, बीमारय और मृत्यु उसी बड़े आघात के परणाम ह। यह पर साहत्य क भूिमका आरम्भ होती है। गरिमटया प्र वासय के वंशज ारा लखत पुस्त क और अन्य सामी के अध्य यन से उन कठोर परितय पर प्र काश पड़ता है जनका सामना उने प्र वासन क प्र या के दौरान -जहाज पर और बाद म िवदेशी भूिम पर-कया। तोताराम सनाढ्य , मुंशी रहमान ख़ान, पेगी मोहन, ऋिष झगुन के वृत्त त, अथवा गैत्र ा बहादुर ारा अपनी परदाद के जीवन पर आधारत ऐितहासक िववरण, तथा लोकगीत के संकलन, सभी अनुबंधत प्र वासय के जीवन म व्य ाप्त संघष और उथल-पुथल क केवल झलक मात्र प्रस्तु त करते ह। अधकश प्र वासी भारत के हृ दय-प्र देश से आए थे और उनके लए समुद्र पार करना ‘ काला पानी ’ पार करने के समान था। िज वी. लाल ने अपने अध्य यन म सकय आँकड़ के माध्य म से दखाया है क अधकश प्र वासी उत्त र प्र देश और िबहार जैसे उत्त र भारतीय मैदानी ेत्र से थे। फजी के एक लोकगीत क नम्न लखत पंक्त य समुद्र यात्र ा के दौरान भारतीय अनुबंधत श्र िमक ारा अनुभव कए गए मनोवैानक आघात को स्पष्ट करती ह। ये पंक्त य उस भय और अनश्च तता को व्यक्त करती ह जसका सामना गरिमटय ने कया। यह गीत अस्तत्व गत चताओ और भावनात्म क उथल- पुथल को चत्र त करता है अनश्च त भिवष्य के बीच श्र िमक क व्य ाकुलता को अिभव्यक्त करता है। ‘ पाल के जहजुआ म रोई-धोई पैठ हो कैसे होई काला पानी पार र िवदेशया जयरा डोले, घाट काहे नह आए हो बीता दन, कल भये मास र िवदेशया।’ अनुवाद: पाल वाले जहाज म रोते-िबलखते बैठ गए ह, हे िवदेशया, यह काला पानी कैसे पार होगा ?हृ दय डूब रहा है और मन व्य ाकुल है, क गंतव्य कह दखाई नह दे रहा है। गरिमटय का आघात उस समय से प्र ारम्भ हो गया था जब एजट ने उ श्र िमक के रू प म भत कया। उ यह झूठ आशा द गई थी क वे धन अजत करगे और समृद्ध होकर घर लौटगे, जससे उनका जीवन बेहतर हो जाएगा। जहाज पर जीवन भी अत्यं त कठन था।

यद्य िप पुरु ष और महलाओ के रहने के लए अलग-अलग ान थे, फर भी वे अस्वच्छ , खराब रखरखाव वाले और घुटनभर थे। इसके अितरक्त शोषण क घटनाएँ भी होती थ, जनके कारण कुछ महलाओ ने समुद्र म कूदकर आत्म हा तक कर ली। िवदेशी भूिम पर पहुँचने के बाद यह आघात और भी गहरा हो गया, क उ यह एहसास हुआ क वे शायद कभी अपने घर वापस नह लौट पाएँगे। कई मामल म परवार िबछड़ गए और यह िबछड़ाव मानसक तथा शाररक बीमारय का कारण बना। इस ित को इंडो-मॉरशस लेखक अिभमन्यु उनुथ (1937–2018) के उपन्य ास SUEURS DE SANG (‘स्वे ट ऑफ ब्ल ड ’) के माध्य म से समझा जा सकता है। ऐसे प्र संग संागत हसा (INSTITUTIONALIZED VIOLENCE) क श्रे णी म आते ह। एक अन्य उदाहरण वह है जब श्र िमक से कहा गया क उ ‘ राम के नगर ’ ले जाया जाएगा, कतु वे सूरनाम पहुँच गए। सूरनाम का नम्न लखत लोकगीत प्र वासय ारा अनुभव कए गए िवासघात और मोहभंग क भावना को अिभव्यक्त करता है। यह समुद्र याा के दौरान झेली गई कठनाइय- अपयप्त सुिवधाओ और शाररक क-को भी दशता है। ‘अब से खबरदार रहो भाई, तेर िबगड़ बात बन जाई। कलके म भरती करके भेज दए जब भाई, लाए उतार सूरनाम म, डपू म भात खलाई। तीन महने जलयान सफर म लाख झपेर खाई। ीराम नगर क चच करके सूरनाम गए पहुँचाई, तीन महने जलयान सफर म।’ अनुवाद: अब से सावधान रहो, भाई, तुार दुख-दद दूर हो जाएँगे। कलका म हम श्र िमक के रू प म भत कया गया SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 27 ,फर हम सूरनाम के डपो म ले जाकर चावल खलाया गया। तीन महने क समुद्र याा म समुद्र क गम हवाओ और अनेक क को सहना पड़ा। भत करने वाल ने राम के नगर ले जाने क बात कह, लेकन वे हम सूरनाम पहुँचा गए। आघात का एक अन्य ोत था-नॉेया (ृितलगाव), अथत् उस घर क याद जह वे िविभन्न कानूनी परवतन तथा अनुबंध क शत के कारण वापस नह लौट सकते थे। यद्य िप गरिमटया धनीव्य ापार नह थे जो राजाओ को प्र भािवत कर सक , फर भी रामकथा को याद रखने और संरक्ष त करने के पीछे एक गहरा व्य क्त गत पक्ष था। एक अपरचत भूिम म, अपने घर से दूर ज उने गरबी, जाितगत उत्प ीड़न या सामाजक बहार से बचने के लए छोड़ा था-रामचरतमानस उनके लए सत्व ना, ृित और ऐसे मातृभूिम-प्र तीक का ोत बन गया जो वास्त िवक घर से भी अधक वास्त िवक प्र तीत होता था। संागत आघात और नॉेया से उत्पन्न आघात के अितरक्त , लग आधारत हसा तथा अन्य कारण से भी अनेक प्र कार क पीड़ाएँ उत्पन्न हुईं । इन सभी ने िमलकर अगली पीढ़य को प्र भािवत कया और जसे हम ‘अंतरपीढ़य आघात ’ - (INTERGENERATIONAL TRAUMA) कह सकते ह, उसे जन्म दया। यद्य िप इस िवशाल पलायन को हुए 150 वष से अधक समय बीत चुका है, फर भी इसक प्र ितध्व नय आज भी महसूस क जा सकती ह-न केवल प्र वासय के वंशज के बीच, ब भारत म रह गए उनके परवार म भी।

इन व्य क्त गत और संागत वृत्त त को पढ़ने, िवेिषत करने और उनक आलोचनात्म क समीक्ष ा करने क आवश्य कता है। िवश्व को यह जानना और ीकार करना चाहए क उपनवेशवादय ारा बनाया गया एक दमनकार कानून कस प्र कार दस लाख से अधक लोग को हसा और आघात का शकार बनाने का कारण बना। SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 28बहादुर, जी. (2015). कूली वुमन: द ओिडसी ऑफ़ इंडचर। गुरु ाम: हैशेट इंिडया। लाल, बी. (1980). “एोचेज़ टू द स् टडी ऑफ़ इंिडयन इिमेशन िवद स् पेशल रेफ़रस टू िफ़जी।” द जनल ऑफ़ पैिसिफ़क िहस् टी, 15(1), 52–70। परांजपे, एम. आर. (सम् पा.). (2001). इन डायस् पोरा: थ् योरीज़, िहस् टीज़, टेक्स्ट् स। नई िदी: इंडायलॉग पलकेशन् स। उुथ, ए. (2001). स् वेस द सॉं (SUEURS DE SANG)। केसन बुधू एवं इसाबेल जारी (अनुवादक)। पेरस: एिडशन् सस् टॉक।प्र ो. ृित सह : उत्त र-औपनवेशक साहत्य , भारतीय डायोरा और ृित-अध्य यन क प्र ितत िवदुषीप्र ो. ृित सह समकालीन भारतीय अंेज़ी साहत्य और सृितक अध्य यन के क्षेत्र क एक प्र ितत शक्ष ािवद् एवं शोधकत ह। वे वतमान म भारतीय प्र ौोगक संान पटना (IIT PATNA) के मानिवक एवं सामाजक िवज्ञ ान िवभाग म अंेज़ी क प्र ो. ह। वष 2008 से IIT पटना से जुड़ हुई ह और अपनी दघकालीन अकादिमक यात्र ा म अंेज़ी साहत्य , उत्त र-औपनवेशक अध्य यन, भारतीय लेखन, प्र वासी साहत्य और साहत्य क- सृितक िवमश के क्षेत्र म उेखनीय योगदान दे रह ह। प्र ो. ृित सह ने पटना िवश्व िवालय से अंेज़ी साहत्य म पीएच.ड. (2007) प्र ाप्त क। उनक अकादिमक यात्र ा क शुरु आत 2001 म पटना िवमस कॉलेज के अंेज़ी िवभाग म अध्य ापन से हुई। वष 2005 म उ प्र ितत FULBRIGHT FELLOWSHIP प्र ाप्त हुई, जसके अंतगत उने अमेरका त UNIVERSITY OF TEXAS AT AUSTIN म FOREIGN LANGUAGE TEACHING ASSISTANT के रू प म काय कया। इसके पात उने चाणक्य नेशनल लॉ यूनवसट, पटना तथा रची कॉलेज, रची िवश्व िवालय म अध्य ापन कया और वष 2008 म IIT पटना से जुड़।प्र ो. सह क प्र मुख िवशेषज्ञ ता उत्त र-औपनवेशक अध्य यन (POSTCOLONIAL STUDIES), भारतीय अंेज़ी साहत्य (INDIAN WRITING IN ENGLISH), प्र वासी साहत्य (DIASPORIC WRITINGS), भाषा शक्ष ण, ृित एवं आघात अध्य यन (MEMORY AND TRAUMA STUDIES), जलवायु कथा साहत्य (CLIMATE FICTION), नाटक तथा िवज्ञ ान कथा अध्य यन म है। उनका शोध साहत्य को केवल सदयबोध क दृ से नह देखता, ब उसम इितहास, िवापन, पहचान, औपनवेशक अनुभव, सृितक ृित और सत्त ा-संबंध के प्र को भी िवेिषत करता है। भारतीय डायोरा और प्र वासी साहत्य के क्षेत्र म प्र ो. ृित सह का योगदान िवशेष रू प से उेखनीय है। उने प्र वासी समुदाय के अनुभव, सृितक िवापन, पहचान नमण और औपनवेशक िवरासत के साहत्य क प्र ितनधत्व पर गंभीर काय कया है। उनक संपादत पुस्त क DIASPORIC CONSCIOUSNESS: LITERATURES FROM THE POSTCOLONIAL WORLD प्र वासी साहत्य के िविवध आयाम को समझने का महत्त्व पूण प्र यास है। इस पुस्त क के माध्य म से उने प्र वासी लेखन म ृित, ान, संृित और पहचान के प्र को वैश्व क संदभ म प्रस्तु त कया है। उनका एक महत्त्व पूण शोध क्षेत्र गरिमटया और काला पानी आान (INDENTURE AND KALA PANI NARRATIVES) भी है। उनके नदशन म हुए शोध और प्र काशत अध्य यन म भारतीय गरिमटया श्र िमक के िवापन, समु यात्र ा, औपनवेशक शोषण, सृितक पहचान और ऐितहासक ृित के प्र का अध्य यन कया गया है। उने गरिमटया अनुभव को साहत्य क और सृितक दृ से समझने म महत्त्व पूण योगदान दया है, िवशेषकर उन आान पर ध्य ान क त कया है जनम प्र वासी भारतीय क पीड़ा, संघष और सृितक नरंतरता अिभव्यक्त होती है। नारवाद और उत्त र-औपनवेशक िवमश भी उनके शोध का प्र मुख आयाम है। उनक पुस्त क FEMINISM AND POSTCOLONIALISM IN KRUPABAI SATTHIANADHAN भारतीय महला लेखन, औपनवेशक संदभ और ी अता के प्र का िवेषण प्रस्तु त करती है। वे साहत्य म लगक प्र ितनधत्व , सामाजक असमानता और औपनवेशक सत्त ा संरचनाओ के प्र भाव का अध्य यन करती ह।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 29 गरिमटया इितहास और संृित का सनेमाई नैरटव -धमन्द्र नाथ ओझा गरिमटया इितहास केवल प्र वासन, शोषण और पीड़ा का इितहास नह है, ब यह संघष, सृितक पुनजन्म और मानवीय जजीिवषा क भी अत गाथा है। 1833 म िटश सााज्य म दासप्र था क समा के बाद उपनवेश म श्र िमक क भार आवश्य कता उत्पन्न हुई। इस आवश्य कता को पूरा करने के लए भारत के िबहार, उत्त र प्र देश और बंगाल जैसे े से हजार गरब कसान और मजदूर को बहला-फुसलाकर अथवा िविभन्नप्र लोभन के माध्य म से मॉरशस, फजी, सूरनाम, नदाद एवं टोबैगो जैसे देश म भेजा गया। 10 सतम्ब र 1834 को ‘ एटलस ’ नामक जहाज से मॉरशस के लए पहला गरिमटया दल रवाना हुआ। यह याा केवल भौगोलक िवापन नह थी, ब अपने घर, परवार, भाषा और पहचान से िबछड़ने क एक ददनाक प्र या थी। समु याा के दौरान जाित, धम और ेीय भेदभाव क दवार टूट गईं और नई पहचान का जन्म हुआ- ‘ जहाजी भाई ’। कठन परितय, बीमार, भूख और अपमान के बीच भी इन प्र वासय ने अपने साहस और श्र म से नए देश क अथव्य वा को सशक्त बनाया। साथ ह उने अपनी भाषा, लोकगीत, रामायण, फगुआ, सोहर और सृितक परंपराओ को भी जीिवत रखा।यद हम गरिमटया इितहास को सनेमा के माध्य म से देख, तो यह िवषय अंत व्य ापक और भावनात्म क संभावनाओ से भरपूर दखाई देता है। िवश्व सनेमा ने दास प्र था, युद्ध , नरसंहार और िवापन जैसी मानवीय ासदय को प्र भावशाली ढंग से प्रस्तु त कया है। ROOTS: THE SAGA OF AN AMERICAN FAMILY अक दास क पीड़ा और पहचान क खोज को चत करती है, जबक SCHINDLER’S LIST, THE PIANIST और HOTEL RWANDA मानवता, संघष और अस्तत्व क कहानय को संवेदनात्म क रू प म प्रस्तु त करती ह। इसी प्र कार गरिमटया इितहास भी एक ऐसा िवषय है जसे फचर फ, वेब सीरज़ और डॉुडामा के- माध्य म से वैश्व क दशक तक पहुँचाया जा सकता है। गरिमटया इितहास म अनेक मामक घटनाएँ ह- मॉरशस के ‘ मौत के टापू ’ क ासद, परवार का िबछड़ना, श्र िमक का शोषण और पहचान का संकट। ये घटनाएँ केवल इितहास के तथ्य नह ह, ब ऐसी मानवीय कहानय ह जो दशक केहृ दय को गहराई से स्प श कर सकती ह। आश्च य क बात है क भारतीय सनेमा ने अब तक इस िवषय को वह ान नह दया है जसका वह वास्त व म अधकार है।अंततः, गरिमटया इितहास केवल भारतीय प्र वास का इितहास नह, ब ृित, संृित और प्र ितरोध क एक महान गाथा है। यह हम बताता है क िवपरत परितय म भी मनुष्य अपनी पहचान और सृितक िवरासत को बचाए रख सकता है। आज आवश्य कता केवल इस इितहास को पढ़ने क नह, ब उसे महसूस करने क है। सनेमा वह सशक्त माध्य म है जो इितहास के आँकड़ को मानवीय चेहर म बदल देता है और भूली-िबसर ृितय को पुनः जीिवत कर देता है। धमन्द्र नाथ ओझा हंसराज कॉलेज, दल् ली वश्व वालय से शा ग्र हण क। पछले 20 साल से मुम् बई फ़ल् म और टवी इंडस् म बतौर पटकथा लेखक एवं नदशक के रू प म कायरत ह।धमन्द्र नाथ ओझा ह साहत्य , सनेमा और टेलीिवजन लेखन के क्षेत्र म सय बहुआयामी रचनाकार ह। वे िबहार के सासाराम से संबंध रखते ह और दी िवश्व िवालय के हंसराज कॉलेज के पूव छात्र रहे ह। िपछले दो दशक से अधक समय से वे मुंबई के फल्म एवं टेलीिवजन उोग म पटकथा लेखक, संवाद लेखक और नदशक के रू प म अपनी िवशष्ट पहचान बना चुके ह। डॉ. ओझा का पटकथा लेखन सामाजक संवेदना, मानवीय संबंध और भारतीय जीवन-मू पर आधारत है। उने टेलीिवजन के लोकिप्र य धारावाहक के लए लेखन कया है, जनम ‘अफ़सर िबटया’, ‘घर आ जा परदेसी’, ‘फर जीने क तमा है’ और ‘स से सरसती’ जैसे धारावाहक उेखनीय ह। उनक पटकथाओ म कथा-िवास, चरत्र नमण और संवाद क प्र भावशीलता िवशेष रू प से दखाई देती है। वे साहत्य क कथ्य को दृश्य माध्य म क भाषा म रू पतरत करने क कला म दक्ष ह। डॉ. ओझा ने भारतीय सनेमा के इितहास पर भी महत्त्व पूणलेखन कया है। उनक पुस्त क ‘हुस्त ानी साइलट सनेमा’ भारतीय मूक फल्म क परंपरा और इितहास के अध्य यन क दशा म उेखनीय प्र यास है। साहत्य और दृश्य माध्य म के बीच रचनात्म क संबंध ािपत करने वाले डॉ. ओझा समकालीन ह पटकथा लेखन के महत्त्व पूणहस्त ाक्ष र ह। उनका योगदान ह भाषा और भारतीय दृश्य संृित के िवकास म िवशेष महत्त्व रखता है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 30 “ गरिमटया संृित : भोजन, भाषा और सृितक िवरासत ” िवषय केवल इितहास का एक अध्य ाय नह, ब भारतीय संघष, संृित और पहचान क अमर गाथा है। “ गरिमटया ” शब्द अंग्रे ज़ी के AGREEMENTशब्द से नकला है। िटश शासन के दौरान लाख भारतीय श्र िमक को अनुबंध (गरिमट) के आधार पर मॉरशस, फ़जी, सूरनाम, गुयाना तथा नदाद एवं टोबैगो जैसे देश म काम करने के लए भेजा गया। वे केवल श्र िमक बनकर नह गए, ब अपने साथ भारत क भाषा, संृित, परंपराएँ और जीवन-मूल्य भी लेकर गए। गरिमटया समाज क सृितक पहचान को जीिवत रखने म भोजन क महत्त्व पूणभूिमका रह। अपने देश और परवार से दूर रहने के बावजूद उने भारतीय भोजन परंपरा को सुरक्ष त रखा। आज भी मॉरशस और फ़जी जैसे देश म रोट, दाल, अचार, कर, खीर और पूड़ जैसे ंजन भारतीय पहचान के प्र तीक ह। इन ंजन म भारतीय मसाल क सुगंध और ानीय ाद का सुंदर समन्व य दखाई देता है। भोजन केवल पेट भरने का साधन नह था, ब अपनी जड़ और ृितय से जुड़े रहने का माध्य म भी था। ोहार और सामाजक आयोजन म बनने वाले पारंपरक ंजन ने भारतीय संृित को पीढ़-दर-पीढ़ संरक्ष त रखने म महत्त्व पूणयोगदान दया। यद भोजन शरर को जीिवत रखता है, तो भाषा आा को जीिवत रखती है। अधकश गरिमटया श्र िमक िबहार, पूव उत्त र प्र देश और आसपास के क्षे से गए थे, इसलए उनके साथ भोजपुर, अवधी, मगह और हदुस्त ानी भाषाएँ भी िवदेश पहुँच। समय के साथ इन भाषाओ ने नए रू प ग्र हण कए, जैसे फ़जी हद और कैरिबयाई हदुस्त ानी। जीिवत ह। आज भी इन देश म भोजपुर गीत, लोककथाएँ और पारंपरक अिभवादनयह भारतीय भाषाओ क जीवंतता और सृितक श का प्र माण है। गरिमटया संृित: भोजन, भाषा और सृितक िवरासत -अनुराधा पडे गरिमटया समाज ने अपनी सृितक िवरासत को केवल सुरक्ष त ह नह रखा, ब उसे नई पहचान भी द। उनके लोकगीत, िवशेषकर “ िबदेसया ” जैसे गीत म उनके दद, संघष और आशाओ क झलक िमलती है। यह इितहास हम सखाता है क संृित केवल पुस्त क म नह रहती, ब लोग क ृितय, भाषा, गीत और जीवन-शैली म जीिवत रहती है- सुंदर सुभूिम भैया भारत के देसवा से मोर ाण बसे हम-खोह र बटोहया एक ार घेर रामा हम-कोतवलवा से तीन ार सधु घहरावे र बटोहया जाऊ-जाऊ भैया र बटोह हद देखी आउ जहव कुहुक कोइली गावे र बटोहया पवन सुगंध मंद अगर चंदनव से कािमनी िबरह-राग गावे र बटोहया अंतत: गरिमटया समुदाय भारतीय संृित के वैश्व क िवस्त ार का जीवंत उदाहरण है। उने कठन परितय म भी अपनी भाषा, संृित और पहचान को बनाए रखा तथा िवश्व को यह संदेश दया क जसक जड़ अपनी संृित से जुड़ ह, उसे कोई भी श पराजत नह कर सकती।अनुराधा पडे वतमान म लंदन त भारतीय उायोग (HIGH COMMISSION OF INDIA, LONDON) म राजभाषा एवं सृितक अधकार (OFFICIAL LANGUAGE & CULTURAL OFFICER) के रू प म कायरत ह। वह यूनाइटेड कगडम (UK) म भारतीय संृित, कला और हद भाषा के प्र चार-प्र सार तथा संरक्ष ण म एक महत्त्व पूणसेतु क भूिमका नभा रह ह। भारतीय उायोग और नेहरू कद्र (THE NEHRU CENTRE, LONDON) के माध्य म से वह यूके म भारतीय प्र वासय को अपनी जड़ से जोड़ने के लए नरंतर प्र यासरत ह, जसके अंतगत वह िविभन्न शैक्ष णक कायक्र म, कायशालाओ और ' बुनयाद हद जागरू कता पाठ्यक्र म ' का कुशलतापूवक संचालन करती ह। अंतरराय स्त र पर आयोजत होने वाले किव सेलन, पुस्त क िवमोचन और साहक संगोय म भारतीय उायोग का प्र ितनधत्व करते हुए डॉ. पडे अपने अकादिमक अनुभव, भाषाई कौशल और सृितक ना के माध्य म से वैश्व क पटल पर भारत क ' सॉफ्ट पावर ' (SOFT POWER) को सुदृ ढ़ बनाने म नरंतर अपना बहुमूल्य योगदान दे रह ह। अनुराधा पडे

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 31 परयोजना प्र ाव प्र ुित -अजीत आय सत्र के अगले चरण म डॉ. अजीत आय ने परयोजना का िवस्तृ त प्रस्त ाव प्रस्तु त कया। उने स्पष्ट कया क प्रस्त ािवत शोध औपनवेशक शासन के दौरान भारतीय श्र िमक प्र वास, िवशेषतः गरिमटया व्य वा, के सृितक इितहास के व्य ापक एवं अंतवषयी अध्य यन पर कद्र त है। यह अध्य यन केवल ऐितहासक त के पुनसकलन का प्र यास नह है, ब उन मानवीय अनुभव, सृितक ृितय, भाषाई परंपराओ और सामाजक संरचनाओ को समझने का एक गंभीर अकादिमक प्र यास है, जने गरिमटया समुदाय क सामूहक पहचान के नमण म नणयक भूिमका नभाई। अपने प्रस्तु तीकरण म उने बताया क उन्न ीसव शता के मध्य से लेकर बीसव शता के प्र ारंभ तक, दास प्र था के उूलन के पात िटश तथा अन्य यूरोपीय औपनवेशक शय ने अपनी कृिष- आधारत अथव्य वा, िवशेषतः गन्न ा उादन, को बनाए रखने के लए भारत से बड़ संा म अनुबंधतश्र िमक क भत क। इन श्र िमक को मॉरशस, फजी, िटश गुयाना (वतमान गुयाना), सूरनाम, त्र नदाद एवं टोबैगो, दक्ष ण अका तथा अन्य उपनवेश म भेजा गया। यह प्र वास केवल भौगोलक िवापन नह था, ब सामाजक, सृितक, भािषक और मानसकस्त र पर गहर परवतन क प्र या थी। समुद्र पार करने क पीड़ा, अपरचत परवेश, औपनवेशक नयंत्र ण, नीय भेदभाव और श्र म-शोषण के बीच इन समुदाय ने अपने अस्तत्व , सान और सृितक पहचान को बनाए रखने के लए नरंतर संघष कया। गरिमटया इितहास पर उपलब्ध अधकश शोध आथक इितहास, श्र म व्य वा, अनुबंध प्र णाली, औपनवेशक नीितय और राजनीितक संघष पर कद्र त रहे ह। यद्य िप ये अध्य यन अत्यं त महत्त्व पूण ह, कतु गरिमटया समाज के सृितक जीवन, सामाजक संबंध, पारवारक संरचनाओ, धामक परंपराओ, भाषाई नरंतरता, लोकृितय तथा सृितक पुननमण क प्र याओ पर अपेक्ष ाकृत कम ध्य ान दया गया है। यह कारण है क प्रस्त ािवत परयोजना इन उपेक्ष त आयाम को कद्र म रखकर गरिमटया इितहास का पुनपठ प्रस्तु त करने का प्र यास करती है। इस शोध का उेश्य केवल यह जानना नह है क भारतीय श्र िमक कन परितय म िवदेश गए, ब यह समझना भी है क उने नई भूिम म अपनी सृितक अता को कस प्र कार सुरक्ष त रखा, उसका पुनगठन कया और ानीय समाज के साथ संवाद ािपत करते हुए नई सृितक संरचनाओ का नमण कया। इस दृ ष्ट से यह अध्य यन प्र वासन को केवल आथक आवश्य कता या औपनवेशकश्र म-व्य वा का परणाम नह मानता, ब इसे सृितक परवतन, प्र ितरोध, अनुकूलन और पहचान-नमण क बहुआयामी प्र या के रू प म देखता है।प्रस्त ाव क एक प्र मुख िवशेषता इसका अंतवषयीस्वरू प है। यह परयोजना इितहास, समाजशास्त्र , मानवशास्त्र , भाषािवान, सृितक अध्य यन,प्र वासी अध्य यन, लोकसाहत्य तथा डजटल मानिवक जैसे िविवध अनुशासन के समतदृ ष्ट कोण पर आधारत होगी। उनका मानना था क गरिमटया समाज क जटलताओ को कसी एक िवषय क सीमाओ म समझना संभव नह है; इसके लए बहुिवषयी अनुसंधान पद्ध ित अपनाना आवश्य क है। उने परयोजना के अध्य यन क्षेत्र का िवस्तृ त परचय देते हुए बताया क इसम भारतीय प्र वास के प्र मुख गंतव्य देश-मॉरशस, फजी, गुयाना, सूरनाम, त्र नदाद एवं टोबैगो तथा दक्ष ण अका-को सलत कया गया है। साथ ह भारत के वे मूलप्र वासन क्षेत्र , िवशेषकर िबहार तथा पूव उत्त र प्र देश, जह से सवधक संा म श्र िमक िवदेश भेजे गए थे, अध्य यन का अिभन्न अंग हगे। इससे प्र वासन के ोत और गंतव्य दोन के सृितक संबंध को तुलनात्म कदृ ष्ट से समझने का अवसर िमलेगा। परयोजना का एक कद्र य उेश्य प्र वासी भारतीय समुदाय क सृितक पहचान के नमण और संरक्ष ण क प्र या का अध्य यन करना है। इस संदभ म उने िवशेष रू प से भोजपुर, हद, अवधी तथा तिमल जैसी भारतीय भाषाओ क भूिमका पर प्र काश डाला। उने कहा क भाषा केवल संप्रे षण का

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 32 माध्य म नह, ब स्मृ ित, संृित और सामुदायक पहचान क आधारशला है। गरिमटया समुदाय ने कठन परितय म भी अपनी भाषाओ को जीिवत रखा, उ ानीय भाषाओ के साथ संवाद म िवकसत कया और नई भािषक संरचनाओ का नमण कया। आज भी अनेक देश म भोजपुर लोकगीत, हद साहत्य , धामक पाठ और सृितक कायक्र म भारतीय मूल क पहचान के महत्त्व पूण प्र तीक ह। रामायण मंडलय, संग परंपराओ, मंदर, धामक अनुान, िववाह संार, लोकगीत, लोकनाट्य , पव-त्य ोहार तथा सामुदायक संगठन क भूिमका पर िवशेष बल दया। उनके अनुसार ये सभी संाएँ केवल धामक या सृितक गितिवधय नह थ, बप्र वासी समाज म सामूहकता, आत्म िवास और सृितक नरंतरता के आधार बन। दपावली, होली, रामलीला, रामचरतमानस का सामूहक पाठ, लोकगायन तथा अन्य सृितक आयोजन ने नई पीढ़य को अपनी जड़ से जोड़ने का महत्त्व पूण काय कया। लोकस्मृ ितय और मौखक इितहास (Oral History) के महत्त्व को रखकत कया। उने कहा क औपनवेशक अिभलेख अक्स र शासक के दृ कोण को प्रस्तु त करते ह, जबक सामान्य श्र िमक क संवेदनाएँ, संघष, पारवारक अनुभव, महलाओ क भूिमका और सृितक जीवन का वास्त िवक चत्र मौखक परंपराओ, लोकगीत, संस्म रण और पारवारक कथाओ म सुरक्ष त है। इसलए परयोजना म मौखक इितहास को एक महत्त्व पूण ोत के रू प म सलत कया गया है, जससे इितहास लेखन को अधक मानवीय और संतुलत बनाया जा सके। परयोजना क शोध-पद्ध ित पर प्र काश डालते हुए उने बताया क अध्य यन म अिभलेखीय ोत, िटश प्र शासनक रपोट, प्र वासी पंजीकरण अिभलेख, जहाज़ क यात्र य क सूचय,न्य ायालयीय दस्त ावेज, सरकार अिभलेख, नजी पत्र , संस्म रण, आत्म कथाओ, प्र वासी साहत्य , लोकगीत, धामक ग्रं थ तथा समकालीन शोध साहत्य का उपयोग कया जाएगा। इसके अितरक्त क्षेत्र ीय अध्य यन, िवशेषज्ञ साक्ष ाार, समुदाय-आधारत सहभागता तथा मौखक इितहास के माध्य म सेप्र ाथिमक ोत का संग्र ह भी कया जाएगा। उने यह भी बताया क परयोजना म डजटल तकनीक के उपयोग पर िवशेष बल दया जाएगा। दस्त ावेज के डजटलीकरण, डजटल अिभलेखागार के नमण, ऑडयो-वीडयो साक्ष ाार के संरक्ष ण तथा बहुभाषी सामग्र ी के सुव्य वत संकलन के माध्य म से भिवष्य के शोधाथय के लए एक ायीज्ञ ान-संसाधन िवकसत करने क योजना है। इसप्र कार परयोजना केवल एक शोध-रपोट तक सीिमत न रहकर गरिमटया अध्य यन के लए एक दघकालक शैक्ष णक आधार तैयार करगी।प्रस्तु ित के दौरान उने िवशेष रू प से महलाओ के अनुभव को भी परयोजना का एक प्र मुख आयाम बताया। गरिमटया इितहास म महलाओ ने श्र म, परवार, संृित और सामाजक पुननमण म अत्यं त महत्त्व पूण भूिमका नभाई, कतु उनके अनुभव पर अपेक्ष ाकृत कम शोध हुआ है। यह परयोजना महलाश्र िमक के जीवन, लगक संबंध, पारवारक संरचनाओ, सृितक नेतृत्व तथा सामाजक परवतन म उनक भूिमका का भी िवेषण करगी। इसके अितरक्त उने धामक पहचान, सृितक अनुकूलन तथा बहुसृितक समाज म भारतीय समुदाय के योगदान पर भी िवशेष चच क। उनके अनुसार गरिमटया समुदाय ने ानीय समाज के साथ संवाद ािपत करते हुए अपनी सृितक परंपराओ को सुरक्ष त रखा और साथ ह नए सामाजक-सृितक रू प का िवकास भी कया। यह प्र क्र या सृितक संरक्ष ण और सृितक परवतन दोन का अतीय उदाहरण प्रस्तु त करती है। डॉ. अजीत आय परयोजना सहायक के रू प म कायरत

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 33 िवशेषज्ञ समूह ारा प्र ाव पर टप्प णी- पंचानन मोहंती, अा पाेय, अधीर कुमार, ृित सह प्रस्त ाव क प्रस्तु ित के उपरत एक िवस्तृ त िवशेषज्ञ परचच आयोजत क गई। इस सत्र म प्र ो. पंचानन मोहंती, डॉ. अा पाेय, प्र ो. अधीर कुमार तथा प्र ो.स्मृ ित सह ने प्रस्त ाव क वैचारक संरचना, शोध-पद्ध ित, अध्य यन-क्षेत्र , ोत-सामी तथा संभािवत नष्क ष पर अपने िवचार व्यक्त कए। िवशेषज्ञ ने परयोजना को समयानुकूल, मौलक तथा अंतरिवषयी शोध का महत्त्व पूण प्र यास बताते हुए अनेक रचनात्म क सुझाव दए, जनसे प्रस्त ाव को और अधक समृद्ध एवं प्र भावी बनाया जा सकता है।प्र ो. पंचानन मोहंती : भाषा, सृितक ृित औरप्र वासी अताप्र ो. पंचानन मोहंती ने अपने िवचार व्यक्त करते हुए कहा क गरिमटया अध्य यन म भाषा को केवल संप्रे षण का माध्य म मानना पयप्त नह होगा। भाषा कसी भी प्र वासी समुदाय क सामूहक स्मृ ित, सृितक नरंतरता और सामाजक पहचान क आधारशला होती है। इसलए परयोजना म भाषाई आयाम को अधक क य ान दया जाना चाहए। उने सुझाव दया क मॉरशस, फजी, सूरनाम, गुयाना तथा त्र नदाद जैसे देश म िवकसत हुई हद, भोजपुर, अवधी तथा अन्य भारतीय भाषाओ के ानीयरू प का तुलनात्म क अध्य यन कया जाए। िवशेष रू प से फजी हद जैसी संपक भाषाओ (Contact Languages) के िवकास को सृितक अनुकूलन और पहचान नमण क प्र या के रू प म समझना आवश्य क है। केवल भाषा का दस्त ावेजीकरण पयप्त नह होगा, ब उसके सामाजक उपयोग, पीढ़य के बीच उसके हस्त तरण, शक्ष ा म उसक ित, धामक आयोजन म उसक भूिमका तथा पारवारक जीवन म उसके प्र योग का भी अध्य यन कया जाना चाहए। भाषा संरक्ष ण के साथ-साथ भाषा-परवतन (Language Shift) और बहुभािषकता (Multilingualism) को भी अनुसंधान का महत्त्व पूण आयाम बनाया जाना चाहए।प्र ो. मोहंती ने नामकरण (Naming Practices), पारवारक संबोधन, लोक मुहावर, कहावत तथा लोकभाषा के शब्द -संसार को सृितक स्मृ ित के महत्त्व पूण ोत बताया। उनके अनुसार इन छोटे-छोटे भािषक संकेत म प्र वासी समुदाय के इितहास और सृितक अनुभव के गहर सूत्र सुरक्ष त रहते ह। उने सुझाव दया क परयोजना म भाषाई अिभलेख के साथ- साथ ऑडयो दस्त ावेज़ीकरण और मौखक परंपराओ के संरक्ष ण को भी सलत कया जाए। डॉ. अा पाेय : प्र वासी दृ , ृित और पहचान डॉ. अा पाेय ने परयोजना क सराहना करते हुए कहा क गरिमटया इितहास को केवल औपनवेशकश्र म-व्य वा के संदभ म नह, ब वैक प्र वासी अध्य यन (Diaspora Studies) के व्य ापक परप्रेक्ष्य म देखने क आवश्य कता है। उनके अनुसार यह परयोजना भारतीय प्र वासी अस्म ता के नमण, स्मृ ित और सृितक पुनसृजन को समझने का उृष्ट अवसरप्र दान करती है। उने सुझाव दया क शोध म "डायस्प ोरा" क अवधारणा को स्पष्ट सैद्ध ितक आधार प्र दान कया जाए तथा स्मृ ित (Memory), िवापन (Displacement), अपनत्व (Belonging), सृितक पुननमण (Cultural Reconstruction) और संकर पहचान (Hybrid Identity) जैसे िवमश को िवेषण का हा बनाया जाए। उने िवशेष रू प से यह सुझाव दया क गरिमटया समुदाय क आत्म कथाओ, संस्म रण, नजी पत्र , मौखक इितहास, पारवारक कथाओ और सृितक संस्मृ ितय को प्र ाथिमक ोत के रू प म अधक महत्त्व दया जाए। उनके अनुसार आधकारक औपनवेशक अिभलेख सा क दृ ष्ट प्रस्तु त करते ह, जबक प्र वासी समुदाय क वास्त िवक संवेदनाएँ लोकस्मृ ितय और व्य क्त गत अनुभव म अधक सुरक्ष त रहती ह।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 34 डॉ. पाेय ने यह भी कहा क िविभन्न देश म बसे भारतीय मूल के समुदाय के अनुभव समान नह रहे ह। इसलए तुलनात्म क अध्य यन (Comparative Perspective) को परयोजना क एक प्र मुख शोध- पद्ध ित बनाया जाना चाहए, जससे प्रत्ये क समाज क िवशष्ट ऐितहासक और सृितक परितय को समझा जा सके। ो. अधीर कुमार : इितहास लेखन, ोत-समीा और शोध-पद्ध ितप्र ो. अधीर कुमार ने परयोजना को इितहास, समाज और संृित के अंतसबंध को समझने का महत्त्व पूण प्र यास बताते हुए इसक शोध-पद्ध ित को और अधकव्य वत एवं ोत-आधारत बनाने पर बल दया। उने सुझाव दया क अध्य यन म प्र ाथिमक ोत (Primary Sources) को सवच्च प्र ाथिमकता द जाए। िटश प्र शासनक अिभलेख, जहाज़ क यात्र ी सूचय, गरिमट अनुबंध, जनगणना रपोट, ायालयीय अिभलेख, िमशनर दावेज़ तथा ानीय प्र शासनक रकॉड को व्य वत रू प से एकत्र त कर उनका आलोचनात्म क िवेषण कया जाना चाहए। उने यह भी सुझाव दया क परयोजना म भारत औरप्र वासी देश के अिभलेखागार के बीच तुलनात्म क अध्य यन कया जाए, जससे ोत क िवश्व सनीयता और ऐितहासक नष्क ष क प्र ामाणकता और अधक सुदृ ढ़ हो सके।प्र ो. अधीर कुमार ने शोध क समय-सीमा, अध्य यन-क्षेत्र , सपल चयन तथा डेटा-संग्र ह क प्र या को स्पष्टरू प से परभािषत करने का सुझाव दया। उनके अनुसार परयोजना क पद्ध ित जतनी अधक पारदश और वैानक होगी, उसके नष्क ष उतने ह अधक िवश्व सनीय हगे। उने यह भी कहा क परयोजना म डजटल अिभलेखागार (Digital Archives), जीआईएस आधारत प्र वासन मानचत्र (Migration Mapping) तथा डजटल मानिवक (Digital Humanities) के उपकरण का उपयोग भिवष्य के शोधाथय के लए अत्यं त उपयोगी सद्ध होगा। ो. ृित सह : सृितक इितहास, लोकृित और मानवीय अनुभवप्र ो. स्मृ ित सह ने अपने िवचार व्यक्त करते हुए कहा क गरिमटया इितहास केवल श्र म, अनुबंध और आथक शोषण का इितहास नह है, ब यह मानवीय संवेदनाओ, सृितक संघष और सामूहक स्मृ ितय का इितहास भी है। इसलए परयोजना का सबसे बड़ा योगदान यह होगा क वह इितहास के मानवीय पक्ष को सामने लाए। उने सुझाव दया क शोध म लोकगीत, भजन, रामायण मंडलय, धामक आयोजन, िववाह गीत, पारवारक परंपराओ तथा सृितक उत्स व का िवृत अध्य यन कया जाए। ये सभी ोत प्र वासी समाज क भावनात्म क संरचना और सृितक नरंतरता को समझने म अत्यं त महत्त्व पूण ह। उने िवशेष रू प से महलाओ के अनुभव को परयोजना का अनवाय भाग बनाने पर बल दया। उनके अनुसार गरिमटया महलाओ ने केवल श्र म नह कया, ब परवार, संृित, भाषा और धामक परंपराओ के संरक्ष ण म क य भूिमका नभाई। इसलए महला अनुभव कोस्व तंत्र शोध-आयाम के रू प म िवकसत कया जाना चाहए।प्र ो. सह ने यह भी सुझाव दया क प्र वासी साहत्य , संस्म रण, आत्म कथाएँ, किवताएँ तथा लोककथाएँ सृितक इितहास के महत्त्व पूण ोत ह। इनका िवेषण केवल साहत्य क दृ ष्ट से नह, ब सृितक इितहास के दावेज़ के रू प म कया जाना चाहए। उने अंत म यह भी कहा क वतमान पीढ़ और प्र वासी युवाओ क सृितक पहचान का अध्य यन परयोजना को समकालीन संदभ प्र दान करगा। इससे यह समझने म सहायता िमलेगी क गरिमटया िवरासत आज भी कसप्र कार नई पीढ़य के सामाजक और सृितक जीवन को प्र भािवत कर रह है।

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 35 शोध उपकरण,प्र ावली, प्र ाथिमक आँकड़े संग्र हण - वष गुा परयोजना के अंतगत आयोजत इस सत्र म "शोध उपकरण, प्र ावली एवं प्र ाथिमक आँकड़े " िवषय पर डॉ. वष गुप्त ा ारा िवृत प्र ुित द गई। इस प्र ुित का मुख्य उेश्य परयोजना के लए िवकसत क गईप्र ारम्भ क प्र ावली, उसके परक्ष ण, िवशेषज्ञ से प्र ाप्त सुझाव तथा अंितम संशोधत प्र ावली के नमण कप्र क्र या से िवशेषज्ञ समूह को अवगत कराना था। परयोजना के प्र ारम्भ क चरण म शोध के उेश्य कोध्य ान म रखते हुए एक प्र ारम्भ क प्र ावली (DRAFT QUESTIONNAIRE) तैयार क गई थी। यह प्र ावली गरिमटया समुदाय के सामाजक, आथक, सृितक एवं ऐितहासक पक्ष से संबंधत आधारभूत जानकारप्र ाप्त करने के उेश्य से िवकसत क गई थी। परचच के दौरान डॉ. वष गुप्त ा ने इस प्र ारम्भ क प्र ावली को िवशेषज्ञ समूह के समक्ष प्र ुत करते हुए इसक संरचना, प्र क प्र कृित तथा अपेक्ष त डेटा के स्वरू प पर िवार से प्र काश डाला। प्र ुित का उेश्य यह सुनत करना था क अध्य यन क दशा, िवषय- वु तथा अनुसंधान के प्र मुख आयाम क स्पष्ट पहचान हो सके और प्र ावली परयोजना के व्य ापक उेश्य के अनुरू प िवकसत क जा सके। िवशेषज्ञ ारा प्र ावली क समीक्ष ा के दौरान यह िवचार सामने आया क यद्य िप प्र ारम्भ क प्र ावली अध्य यन के लए एक उपयोगी आधार प्र दान करती है, तथािप इसक संरचना को अधक व्य वत, ताकक एवं वैज्ञ ानक बनाया जा सकता है। प्र ारम्भ क साहत्य समीक्ष ा, उपलब्ध ऐितहासक दावेज के अध्य यन, अिभलेखीय ोत के िवेषण तथा गरिमटया अध्य यन के िवशेषज्ञ के साथ िवृत संवाद के पात यह स्पष्ट हुआ क प्र ावली म िवषयगत एकरू पता, ताकक अनुक्र म तथा िविभन्न अनुभाग के मध्य बेहतर समन्व य क आवश्य कता है। िवशेषज्ञ ने सुझाव दया क प्र को अलग-अलग िवषयगत खंड म व्य वत कया जाए ताक उत्त रदाताओ के लएप्र को समझना सरल हो तथा डेटा संग्र हण अधकव्य वत एवं वैज्ञ ानक ढंग से कया जा सके।चच के दौरान यह भी अनुभव कया गया क प्र ारम्भ कप्र ावली म प्र वासी श्र िमक के जीवन से जुड़े अनेक महत्त्व पूण आयाम पयप्त रू प से सलत नह थे इन सभी सुझाव को ध्य ान म रखते हुए िवषय िवशेषज्ञ , शोधकतओ, परयोजना समन्व यक तथा परयोजना दल के सद के साथ अनेक िवृत िवचार-िवमश एवं कायशालाएँ आयोजत क गईं ।प्रत्ये क अनुभाग क अलग-अलग समीक्ष ा क गई तथाप्र ाप्त टप्प णय के आधार पर प्र ावली का पुनरक्ष ण कया गया। इस प्र क्र या म प्र क भाषा का परार, अनावश्य क प्र का िवलोपन, नए िवषय का समावेश, अनुभाग का पुनगठन तथा प्र के ताककक्र म का पुननधरण कया गया। प्र ावली को इसप्र कार पुनसरचत कया गया क उत्त रदाता क सामान्य जानकार से प्र ारम्भ होकर क्र मशः सामाजक, आथक, सृितक, ऐितहासक तथा समकालीन अनुभव तक सहज रू प से पहुँचा जा सके। संशोधत प्र ावली म नम्न लखत प्र मुख अनुभाग को सुव्य वत रू प से सलत कया गया- उत्त रदाता क सामान्य एवं व्य गत जानकार। पारवारक एवं सामाजक पृष्ठ भूिम। गरिमटया पूवज से संबंधत ऐितहासक एवं वंशावली संबंधी जानकार।प्र वासन क परितय एवं ऐितहासक अनुभव।श्र म व्य वा, काय परितय एवं आथक जीवन। शक्ष ा, स्व ास्थ्य एवं सामाजक सुिवधाओ क ित। भाषा, धम, संृित एवं पारंपरक जीवन-पद्ध ित। सृितक पहचान, सामाजक समायोजन एवं सामुदायक सहभागता। वतमान पीढ़ म सृितक िवरासत का संरक्ष ण एवं परवतन। भारत के साथ भावनात्म क, सृितक एवं ऐितहासक संबंध। समकालीन चुनौितय, अपेक्ष ाएँ एवं भिवष्य संबंधीदृ ष्ट कोण। उत्त रदाता के व्य गत अनुभव, सुझाव एवं खुली टप्प णय।

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 36 प्र ावली के पुननमण म अनुसंधान पद्ध ित के मानक का िवशेष ध्य ान रखा गया। प्रत्ये क अनुभाग को शोध के िवशष्ट उेश्य के साथ जोड़ा गया ताक संकलत आँकड़े प्रत्यक्ष रू प से अनुसंधान प्र का उत्त र देने म सहायक ह। प्र के क्र म, भाषा, िवश्व सनीयता (RELIABILITY), वैधता (VALIDITY), वुनष्ठ ता (OBJECTIVITY) तथा उपयोगता को ध्य ान म रखते हुए अंितम रू प प्र दान कया गया। साथ ह, यह सुनत कया गया क प्र ावली िविवध सामाजक एवं सृितक पृष्ठ भूिम के उत्त रदाताओ के लए समान रू प से उपयुक्त एवं सहज हो। सत्र के अंत म डॉ. वष गुप्त ा ने संशोधत प्र ावली के आधार पर प्र ाप्त होने वाले प्र ाथिमक आँकड़ (PRIMARY DATA) क उपयोगता पर भी प्र काश डाला। उने बताया क यह प्र ावली न केवल अधक वैज्ञ ानक एवं व्य वत रू प से डेटा संग्र हण करने म सहायक होगी, ब गुणात्म क एवं मात्र ात्म क दोन प्र कार के आँकड़ के समुचत िवेषण के लए भी उपयुक्त आधार प्र दान करगी। इसके माध्य म से गरिमटया समुदाय के इितहास, सामाजक संरचना, सृितक िवरासत, आथक ित तथा वतमान सामाजक-सृितक परवतन का बहुआयामी अध्य यन संभव होगा। अंततः िवशेषज्ञ समूह ने संशोधत प्र ावली क संरचना, िवषयगत व्य ापकता तथा अनुसंधान क आवश्य कताओ के अनुरू प उसके पुनगठन क सराहना क। यह नष्क ष नकाला गया क अंितम प्र ावली परयोजना के उेश्य के अनुरू प अधक उेश्य परक, वैज्ञ ानक, िवश्व सनीय एवं व्य ापक है। इसके माध्य म से संकलत आँकड़े न केवल शोध क गुणवत्त ा को सुदृ ढ़ करगे, ब गरिमटया अध्य यन के क्षेत्र मप्र माणक, िवेषणात्म क एवं नीित-नमण के लए उपयोगी नष्क ष प्र ुत करने म भी महत्त्व पूण भूिमका नभाएँगे। वष गुा प्र ोजेक्ट क्षेत्र पयवेक्ष क

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 37 शोध उपकरण - चंदन ीवास्त वप्र ो. चंदन श्र ीवास्त व ने परयोजना के संबंध म संक्षे प म बताते हुए कहा क यह परयोजना िटश औपनवेशक शासन के दौरान भारतीय श्र म-प्र वासन को केवल आथक प्र या के रू प म नह, ब एक सृितक, सामाजक और ऐितहासक परवतन केरू प म देखती है. इसका क य प्रश्न यह है क ऐितहासक और गुणात्म क शोध-पद्ध ितय के माध्य म सेप्र वासी श्र िमक के अनुभव और स्मृ ितय का पुननमण कैसे कया जाए. परयोजना का उेश्य उपनवेशी अिभलेख के भीतर दबे हुए जन-जीवन के स्व र को पुनः सामने लाना है। यह अध्य यन बहु-िवषयी है और इसम इितहास, समाजशास्त्र , मानवशास्त्र , सृितक अध्य यन तथाश्र म-अध्य यन क दृ य सलत ह. शोध कप्र कृितऐितहासक, गुणात्म क, व्य ाात्म क और सृितक है. इसलए यह अध्य यन केवल घटनाओ का वणन नह करता, ब उनके अथ, अनुभव और सामाजक प्र भाव को भी समझने का प्र यास करता है। परयोजना म ऐितहासक पद्ध ित, गुणात्म क पद्ध ित औरव्य ाात्म क दृ कोण का प्र योग प्रस्त ािवत करते हुए अध्य यन के लए औपनवेशक अिभलेख, सरकार अिभलेख, जनगणना रपोट, श्र म-भत रजस्ट र, पत्र , डायर, संस्म रण और समाचार-पत्र प्र मुख ोत ह. इसके साथ ह लोकगीत, मौखक परंपराएँ और ऐितहासक फोटोग्र ाफ भी उपयोगी ोत माने गए ह. तीयक ोत मप्र काशत पुस्त क, शोध-पत्र , थीसस, ICSSR रपोट और सरकार अध्य यन शािमल ह. परयोजना म साक्ष ाार, फोकस समूह चच, प्रेक्ष ण और सामग्र ी-िवेषण क तकनीक का उपयोग कया जाएगा. साक्ष ाार म संरचत, अध-संरचत, असंरचत और गहन कथात्म क िवधय का सहारा लया जाएगा.प्रेक्ष ण के अंतगत समुदाय के रित-रवाज, ोहार, लोक-प्र दशन और प्र वासी बस्त य के पैटन का अध्य यन कया जाएगा. परयोजना म डजटल मानिवक के औजार का भी उपयोग कया जाएगा, जैसे GIS मैपग, ऑडयो टसप्श न सॉफ़् टवेयर, Zotero/Mendeley, Google Scholar, NVivo और Excel/SPSS. इन उपकरण से ोत-संग्र ह, वगकरण, थीम-िवेषण और प्र वासन- माग के दृश्य ीकरण म सहायता िमलेगीइससे शोध अधक संगठत, प्र माणक और िवेषणात्म क बनेगा। नमूना-चयन म purposive, snowball और criterion sampling क िवधय अपनाने का प्रस्त ाव है. डेटा क िवश्व सनीयता बढ़ाने के लए data triangulation, methodological triangulation और source triangulation क व्य वस्थ ा क गई है. इससे अिभलेखीय ोत और मौखक साक्ष्य के बीच तुलना करके अधक संतुलत नष्क ष नकाले जा सक गे. शोध म सूचत सहमित, गोपनीयता, समुदाय- संवेदनशीलता और बौद्ध क ईमानदार पर बल दया गया है. प्र मुख चुनौितय म अिभलेख क अपूणता, भाषा-बाधा, मौखक परंपराओ का क्ष य और दूरस्थ समुदाय तक पहुँच क कठनाई शािमल है. इन समाओ के समाधान के लए बहु-ोत सापन, अनुवाद-सहायता, स्थ ानीय सहयोग और डजटल संरक्ष ण को आवश्य क माना गया है इसम प्र योग कए जाने वाले रसच टूल्स के बार म अपनीप्रस्तु ित द। ऐितहासक पद्ध ित के अंतगत अिभलेखीय ोत का गहन परक्ष ण कया जाएगा, जबक गुणात्म क पद्ध ित के माध्य म से मौखक साक्ष्य , साक्ष ाार और जीवनानुभव को संकलत कया जाएगा. व्य ाात्म कदृ से प्र वासी समुदाय क प्र तीक, परंपराओ और सृितक व्य वहार क अथ-व्य ाा क जाएगी.

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 38 प्र ो. चंदन श्र ीवास्त व ने इस परयोजना म उपयोग कए जाने वाले िविभन्न उपकरण के माध्य म से श्र म-प्र वासन के इितहास को आथक सीमाओ से आगे बढ़ाकर उसक सृितक ृित, सामाजक संरचना और मानव-अनुभव केस्त र पर समझने का प्र यास करती है. ICSSR के शोध-मानक के अनुरू प इसम वैानक कठोरता, अंतरिवषयी दृ और नैितक उत्त रदायत्व का समन्व य दखाई देता है.

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 39

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 40 डॉ. चन्द न ीवास्त व (परयोजना नदेशक) बनारस हदू िवश्व िवालय, वाराणसी म शा िवभाग के सहायक ो. ह। 2022 म, भारत सरकार के शा मंालय ने उ भारतीय भाषा सिमित के अकादिमक समन्व यक के रू प म नयुक्त कया। यह सिमित भारतीय भाषाओ से संबंधत नई शा नीित-2020 के ावधान को लागू करने के लए गठत क गई एक उच्चस्त रय सिमित है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 41 शोध उपकरण, प्र ावली एवं प्र ाथिमक आँकड़ा-संग्र हण पर िवशेषज्ञ प्र ितया डॉ. वष गुप्त ा ारा शोध उपकरण (Research Tools),प्रश्न ावली (Questionnaire) तथा प्र ाथिमक आँकड़ा- संग्र हण (Primary Data Collection) क रू परखाप्र ुत कए जाने के पात िवशेष ारा िवृत समीक्ष ा क गई। िवशेष ने प्रश्न ावली क संरचना, शोध-पद्ध ित, उत्त रदाताओ के चयन, सृितक संवेदनशीलता तथा डेटा-संग्र हण क प्र क्र या पर महत्त्व पूणसुझाव प्र ुत कए। उनका मत था क गरिमटया अध्य यन जैसी बहुआयामी परयोजना मप्रश्न ावली केवल सूचना-संग्र ह का माध्य म नह, ब सृितक ृितय, सामाजक अनुभव और ऐितहासक चेतना को समझने का एक महत्त्व पूण शोध उपकरण है। ो. पंचानन मोहंती (भाषा, भािषक अता एवं सृितक संप्रे षण के संदभ म)प्र ो. पंचानन मोहंती ने प्रश्न ावली क रू परखा क सराहना करते हुए कहा क गरिमटया समुदाय के अध्य यन म भाषा को क य ान दया जाना चाहए। उने सुझाव दया क प्रश्न ावली म ऐसे प्रश्न शािमल कए जाएँ, जनसे यह स्पष्ट हो सके क िविभन्न देश म भारतीय मूल के समुदाय आज कन भाषाओ का प्र योग करते ह, पारवारक जीवन म कौन-सी भाषा प्र चलत है तथा नई पीढ़ भारतीय भाषाओ से कस सीमा तक जुड़ हुई है। उने िवशेष रू प से भोजपुर, हद, अवधी, तिमल तथा अन्य भारतीय भाषाओ के संरक्ष ण, भाषा-परवतन (Language Shift) और बहुभािषकता (Multilingualism) से जुड़े प्रश्न को सलत करने क अनुशंसा क। उनके अनुसार केवल भाषा-ान का आकलन पयप्त नह होगा, ब भाषा के सामाजक एवं सृितक उपयोग, धामक आयोजन, लोकगीत, पारवारक संार और सामुदायक कायक्र म म उसक भूिमका का भी अध्य यन कया जाना चाहए।प्र ो. मोहंती ने यह भी सुझाव दया क प्रश्न ावली का ानीय भाषाओ म अनुवाद कया जाए तथा आवश्य कता पड़ने पर भािषक (Bilingual) प्र ारू प अपनाया जाए, ताक उत्त रदाता सहजता से अपने िवचारव्यक्त कर सक। उने उत्त रदाताओ के नाम, उपनाम, पारवारक संबोधन, लोक-शावली तथा सृितकअिभव्य क्त य को भी शोध का महत्त्व पूण भािषक ोत बताया। डॉ. अा पाेय (प्र वासी अध्य यन, ृित एवं सृितक पहचान के संदभ म) डॉ. अा पाेय ने कहा क प्रश्न ावली को केवल तात्म क जानकार तक सीिमत न रखकर प्र वासी अनुभव, सृितक ृितय तथा पहचान के नमण को समझने का माध्य म बनाया जाना चाहए। उने सुझाव दया क बंद प्रश्न (Closed-ended Questions) के साथ पयप्त संा म खुले प्रश्न (Open-ended Questions) भी शािमल कए जाएँ, ताक उत्त रदाता अपने व्य क्त गत अनुभव, पारवारक इितहास तथा सृितक ृितय को स्व तंत्र रू प से अिभव्यक्त कर सक। उने सुझाव दया क प्रश्न ावली म नम्न िवषय को िवशेष रू प से सलत कया जाए- परवार क प्र वासन-कथा और पूवज क ृितय। भारत से भावनात्म क एवं सृितक संबंध। धामक एवं सृितक आयोजन म सहभागता। भारतीय ोहार, लोकपरंपराओ एवं सृितकप्र तीक का वतमान स्वरू प। नई पीढ़ म भारतीय सृितक पहचान का ान। ानीय समाज के साथ सृितक अंतःक्र या और बहुसृितक अनुभव। उने इस बात पर भी बल दया क िविभन्न देश म बसे भारतीय मूल के समुदाय क परितय एक-दूसर से िभन्न ह। इसलए प्रश्न ावली म ानीय संदभ के अनुसार आवश्य क संशोधन क गुंजाइश रखी जानी चाहए। उनके अनुसार यह लचीलापन (Flexibility) शोध क गुणवत्त ा को और अधक समृद्ध करगा। ो. अधीर कुमार (शोध-पद्ध ित, डेटा क िवश्व सनीयता एवं क्षेत्र काय के संदभ म)प्र ो. अधीर कुमार ने प्रश्न ावली क संरचना को व्य वत बताते हुए कुछ महत्त्व पूण पद्ध ितगत सुझाव दए।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 42 उने कहा क प्र ाथिमक आँकड़ा-संग्र हण क सफलता उत्त रदाताओ के उचत चयन, क्षेत्र ीय प्र ितनधत्व तथा डेटा क िवश्व सनीयता पर नभर करती है। इसलए सपल चयन (Sampling) क प्र या स्पष्ट , संतुलत एवं वैानक होनी चाहए। उने सुझाव दया क अध्य यन म िविभन्न आयु-वग, महलाओ, युवाओ, धामक नेताओ, शक्ष क, सृितक संगठन, सामाजक कायकतओ तथा सामान्य समुदाय के सद को सलत कया जाए, ताक िविभन्न सामाजक समूह का प्र ितनधत्व सुनत हो सके। उने क्षेत्र काय (Fieldwork) प्र ारम्भ करने से पूवप्र ावली का पायलट सव (Pilot Survey) करने क अनुशंसा क। इससे प्र क स्पष्ट ता, उत्त रदाताओ क समझ तथा संभािवत ावहारक कठनाइय का पूव आकलन कया जा सकेगा।प्र ो. अधीर कुमार ने यह भी सुझाव दया क प्र ावली सेप्र ाप्त आँकड़ को साक्ष ाार, अिभलेखीय ोत, मौखक इितहास तथा ानीय सृितक अवलोकन (Participant Observation) के माध्य म से सािपत (Triangulation) कया जाए। उनके अनुसार िविभन्न ोत के समत उपयोग से शोध के नष्क ष अधकप्र माणक और िवश्व सनीय हगे। उने डेटा-संग्र हण के दौरान शोध नैितकता (Research Ethics), उत्त रदाताओ क पूव सहमित (Informed Consent), गोपनीयता तथा सृितक संवेदनशीलता का िवशेष ध्य ान रखने पर भी बल दया। िवशेष क समेकत अनुशंसाएँ िवशेष क चच के उपरत नम्न प्र मुख अनुशंसाएँ सामने आईं -प्र ावली म भाषा, सृितक िवरासत, लोकृितय, धामक परंपराओ तथा प्र वासी पहचान से संबंधत प्र का िवार कया जाए। बंद प्र के साथ खुले प्र को भी पयप्त ान दया जाए, जससे गुणात्म क (Qualitative) आँकड़ेप्र ाप्त हो सक। िविभन्न देश एवं ानीय परितय के अनुसारप्र ावली म आवश्य क संशोधन क सुिवधा रखी जाए।प्र ावली का पायलट परक्ष ण कर अंितम रू प दया जाए। डेटा-संग्र हण म आयु, लग, भाषा, सामाजक पृष्ठ भूिम एवं भौगोलक िविवधता का समुचतप्र ितनधत्व सुनत कया जाए।प्र ावली, साक्ष ाार, मौखक इितहास, अिभलेखीय ोत तथा सहभागी अवलोकन को समत शोध-पद्ध ित के रू प म अपनाया जाए। शोध के प्र ेक चरण म नैितक मानक, सृितक संवेदनशीलता एवं उत्त रदाताओ क गोपनीयता का पालन कया जाए।

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 43 अद्य तन प्र ावली - रचना िवश्व कम 1. Consent of the Respondent (उत्त रदाता क सहमित) 1. Do you consent to share your information for this research? ा आप इस शोध के लए अपनी जानकार साझा करने हेतु सहमत ह? ☐ Yes (ह) ☐ No (नह) 2. Do you permit your responses to be quoted and analyzed? ा आप अपनी प्र ितयाओ को उत (Quote) तथा शोध-िवेषण म उपयोग कए जाने क अनुमित देते ह? ☐ Yes (ह) ☐ No (नह) 3. Would you like your name to be kept confidential? ा आप चाहते ह क इस शोध म आपका नाम गोपनीय रखा जाए? ☐ Yes (ह) ☐ No (नह) 4. Do you give permission for audio/video recording of the interview? ा आप इस सााार क ऑडयो एवं/अथवा वीडयो रकॉडग क अनुमित देते ह? ☐ Yes (ह) ☐ No (नह) 2. Personal and Demographic Information (व्य गत एवं जनसकय जानकार) 1. What is your full name? आपका पूरा नाम ा है? 2. What is your age? आपक आयु ा है? 3. What is your gender? आपका लग ा है? 4. What is your marital status? आपक वैवाहक ित ा है? 5. What is your educational level? आपक शैक योग्य ता ा है? 6. What is your current occupation/profession? आपका वतमान व्य वसाय/ पेशा ा है? 7. In which region/town/village of Mauritius do you live? आप मॉरशस के कस ेत्र , नगर अथवा गव म नवास करते ह? 8. Do you identify yourself as being of Indian origin? ा आप स्व यं को भारतीय मूल का मानते ह? ☐ Yes (ह) ☐ No (नह) 9. What is your religious identity? आपक धामक पहचान ा है?

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 44 10. How many members are there in your family? आपके परवार म कुल कतने सदस्य ह? 3. Family and Genealogical History (पारवारक एवं वंशावली संबंधी इितहास) 1. From which region of India did your ancestors come to Mauritius? आपके पूवज भारत के कस ेत्र अथवा राज्य से मॉरशस आए थे? 2. What information is known in your family about the indenture history? आपके परवार म गरिमटया (Indentured Labour) इितहास के बार म ा जानकारप्र चलत है? 3. Is the name, village, or caste/regional identity of any ancestor remembered in your family? ा आपके परवार को कसी पूवज का नाम, मूल गव, जाित अथवा ेत्र ीय पहचान आज भीस्म रण है? 4. Does your family preserve any documents, letters, photographs, or memorabilia brought from India? ा आपके परवार ने भारत से लाए गए कसी दावेज़, पत्र , फोटोाफ अथवा अन्य स्मृ ित- च को सुरत रखा है? 5. Who in your family knows the genealogy best? आपके परवार म वंशावली (Genealogy) के बार म सबसे अधक जानकार कस व्य को है? 6. Is memory of marriage, kinship, or clan/gotra still alive in the family? ा आपके परवार म िववाह-संबंध, रेदार, कुल अथवा गोत्र से जुड़ स्मृ ितय आज भी सुरत ह? 7. What memories of the original homeland has your family preserved? आपके परवार ने अपने मूल देश (भारत) से संबंधत कन स्मृ ितय, परंपराओ अथवा सृितक िवरासत को अब तक संरत रखा है? 4. Oral History and Collective Memory (मौखक इितहास एवं सामूहक ृित) 1. What have you heard from your elders about the indentured past? आपने अपने परवार के बुज़ु ग से गरिमटया अतीत के बार म ा-ा सुना है? 2. Is there any story in your family about the journey from India to Mauritius? ा आपके परवार म भारत से मॉरशस क यात्र ा से संबंधत कोई कथा, संस्म रण अथवा पारवारक कहानी प्र चलत है?

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 45 4. Oral History and Collective Memory (मौखक इितहास एवं सामूहक स्मृ ित) 1. What have you heard from your elders about the indentured past? आपने अपने परवार के बुज़ु ग से गरिमटया अतीत के बार म ा-ा सुना है? 2. Is there any story in your family about the journey from India to Mauritius? ा आपके परवार म भारत से मॉरशस क याा से संबंधत कोई कथा, संस्म रण अथवा पारवारक कहानी प्र चलत है? 5. Do you know of any event that has become part of your family or community's collective memory? ा आप कसी ऐसी घटना के बार म जानते ह जो आपके परवार या समुदाय क सामूहकस्मृ ित का हा बन चुक है? 6. Is there a tradition of public remembrance of the indentured past in your community? ा आपके समुदाय म गरिमटया अतीत के सावजनक स्म रण (Public Remembrance) क कोई परंपरा है? 7. Do you know any folk story, song, narrative, or proverb related to this history? ा आप इस इितहास से संबंधत कसी लोककथा, लोकगीत, पारवारक आान अथवा कहावत के बार म जानते ह? 5. Cultural Identity and Indianness (सृितक अता एवं भारतीयता) 1. How do you define your cultural identity? आप अपनी सृितक अस्म ता (Cultural Identity) को कस प्र कार परभािषत करते ह? 2. Do you consider yourself Indian-origin, Mauritian, or both? ा आप स्व यं को भारतीय मूल का, मॉरशसवासी अथवा दोन मानते ह? ☐ Indian-origin (भारतीय मूल का) ☐ Mauritian (मॉरशसवासी) ☐ Both (दोन) 3. What does Indianness mean to you? आपके लए ‘ भारतीयता ’ का ा अथ है? 4. Is connection with India regarded as a matter of pride in your family? ा आपके परवार म भारत से जुड़ाव को गौरव का िवषय माना जाता है? ☐ Yes (ह) ☐ No (नह) 5. Do you feel emotional or cultural attachment to India?

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 46 ा आप भारत के प्र ित भावनात्म क अथवा सृितक जुड़ाव महसूस करते ह? 6. Is the identity of “Hindustani origin” given importance in your community? ा आपके समुदाय म ‘ हदुानी मूल ’ (Hindustani Origin) क पहचान को िवशेष महत्त्व दया जाता है? 7. Do you think identity has changed over time? ा आपको लगता है क समय के साथ आपक सृितक अथवा सामुदायक पहचान म परवतन आया है? 6. Language and Linguistic Practices (भाषा एवं भाषाई व्य वहार) 1. Which languages are spoken in your home? आपके घर म कौन-कौन सी भाषाएँ बोली जाती ह? 2. Do members of your family use Hindi, Bhojpuri, Awadhi, Tamil, Telugu, Urdu, or any other Indian language? ा आपके परवार के सदस्य ह, भोजपुर, अवधी, तिमल, तेलुगु, उदू अथवा कसी अन्य भारतीय भाषा का प्र योग करते ह? 3. Can you understand, speak, read, or write Hindi? ा आप ह को समझ, बोल, पढ़ या लख सकते ह? ☐ Understand (समझ सकते ह) ☐ Speak (बोल सकते ह) ☐ Read (पढ़ सकते ह) ☐ Write (लख सकते ह) 4. Where and how did you learn this language? आपने यह भाषा कह और कस माध्य म से सीखी? 5. Is the language used at home different from the language used in public life? ा घर म प्र युक्त भाषा सावजनक जीवन म प्र युक्त भाषा से िभन्न है? 6. Has the use of Indian languages declined in your generation? ा आपक पीढ़ म भारतीय भाषाओ का प्र योग कम हुआ है? ☐ Yes (ह) ☐ No (नह) 7. Are Indian languages used in religious rituals, songs, or family occasions? ा धामक अनुान, गीत अथवा पारवारक अवसर पर भारतीय भाषाओ का प्र योग कया जाता है? 8. Do you connect language with identity and heritage? ा आप भाषा को अपनी पहचान (Identity) और सृितक िवरासत (Heritage) से जोड़कर देखते ह?

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 47 9. Is there any family tradition of language teaching in your household? ा आपके परवार म अगली पीढ़ को भारतीय भाषाएँ सखाने क कोई पारवारक परंपरा है? 10. Do you think special efforts should be made to preserve the language? ा आपके िवचार म भारतीय भाषाओ के संरक्ष ण के लए िवशेष प्र यास कए जाने चाहए? 7. Religion, Rituals, and Religious Life (धम, धामक अनुान एवं धामक जीवन) 1. Which religion do you follow? आप कस धम का पालन करते ह? 2. How are religious traditions practiced in your family? आपके परवार म धामक परंपराओ का पालन कस प्र कार कया जाता है? 3. Are Indian traditions reflected in your religious life? ा आपके धामक जीवन म भारतीय परंपराओ क स्पष्ट झलक दखाई देती है? 4. Are worship, aarti, bhajan, kirtan, prayer, fasting, or festivals observed at home or in the community? ा आपके घर अथवा समुदाय म पूजा, आरती, भजन, कतन, प्र ाथना, व्र त-उपवास तथा धामक पव-ोहार मनाए जाते ह? 5. Do your religious rituals show Indian influence in language, attire, food, or symbols? ा आपके धामक अनुान म भाषा, वेशभूषा, भोजन, धामक प्र तीक अथवा अन्य सृितक त पर भारतीय प्र भाव दखाई देता है? 6. Is local Mauritian influence also included in religious life? ा आपके धामक जीवन एवं अनुान म ानीय मॉरशसी संृित का प्र भाव भी दखाई देता है? 7. Do religious events strengthen community unity? ा धामक आयोजन आपके समुदाय म सामाजक एकता, सहभागता और सामुदायक बंधन को सुदृ ढ़ करते ह? 8. Folk Culture, Festivals, and Cultural Performance (लोक संृित, पव-ोहार एवं सृितक अिभव्य य) 1. What are the major festivals in your community? आपके समुदाय के प्र मुख पव-ोहार कौन-कौन से ह? 2. How are Holi, Diwali, Shivratri, Eid, Navratri, Ganesh Chaturthi, or other festivals celebrated? आपके समुदाय म होली, दपावली, महाशवरा, ईद, नवरा, गणेश चतुथ तथा अन्य पव- ोहार कस प्र कार मनाए जाते ह?

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 48 3. DO THE FESTIVALS SHOW A BLEND OF INDIAN AND LOCAL TRADITIONS? ा इन पव-त्य ोहार के आयोजन म भारतीय एवं ानीय मॉरशसी परंपराओ का समन्व य दखाई देता है? 4. ARE FOLK SONGS, DANCES, DRAMAS, PROCESSIONS, OR MUSIC USED? ा इन अवसर पर लोकगीत, लोकनृत्य , लोकनाट्य , शोभायााएँ अथवा पारंपरक संगीत प्र ुत कए जाते ह? 5. DO YOU PARTICIPATE IN ANY SPECIAL CULTURAL PROGRAM OR EVENT? ा आप कसी िवशेष सृितक कायक्र म, आयोजन अथवा उत्स व म सक्र य रू प से भाग लेते ह? 6. ARE TRADITIONAL INSTRUMENTS OR SONGS STILL ALIVE IN THE COMMUNITY? ा आपके समुदाय म पारंपरक वाद्य यं, लोकगीत अथवा संगीत क परंपरा आज भी जीिवत है? 7. ARE CHILDREN INVOLVED IN THESE CULTURAL PERFORMANCES? ा इन सृितक कायक्र म एवं प्र ुितय म ब और युवाओ क सक्र य भागीदार होती है? 8. ARE FESTIVALS NOT ONLY RELIGIOUS BUT ALSO A MEANS OF CULTURAL IDENTITY? ा आपके िवचार म पव-त्य ोहार केवल धामक आयोजन नह, ब सृितक पहचान (CULTURAL IDENTITY) को बनाए रखने का भी महत्त्व पूणमाध्य म ह? 9. FOODWAYS AND EVERYDAY CULTURE (खाद्य संृित एवं दैनक जीवन) 1. WHAT TRADITIONAL DISHES ARE PREPARED IN YOUR HOME? आपके घर म कौन-कौन से पारंपरक ंजन बनाए जाते ह? 2. IS THERE CONTINUITY OF INDIAN-ORIGIN DISHES IN YOUR FOOD HABITS? ा आपके भोजन म भारतीय मूल के पारंपरक ंजन क नरंतरता आज भी बनी हुई है? 3. ARE LOCAL MAURITIAN INFLUENCES INCLUDED IN COOKING METHODS? ा भोजन बनाने क पद्ध ितय म ानीय मॉरशसी प्र भाव भी सलत है? 4. IS SPECIAL FOOD PREPARED DURING FESTIVALS AND CELEBRATIONS? ा पव-त्य ोहार एवं पारवारक उत्स व के अवसर पर िवशेष पारंपरक ंजन तैयार कए जाते ह? 5. IS THERE ANY FAMILY MEMORY OR TRADITION CONNECTED WITH FOOD? ा भोजन अथवा कसी िवशेष ंजन से जुड़ कोई पारवारक ृित, परंपरा या कथा आपके परवार मप्र चलत है? 6. DO YOU BELIEVE FOOD IS AN IMPORTANT PART OF CULTURAL IDENTITY? ा आप मानते ह क भोजन कसी समुदाय क सृितक पहचान का एक महत्त्व पूणअंग है? 7. DOES THE YOUNGER GENERATION KNOW AND ENJOY TRADITIONAL FOOD? ा नई पीढ़ पारंपरक ंजन को जानती है और उ पसंद करती है? 10. LABOR, SOCIAL LIFE, AND COMMUNITY ORGANIZATION (श्र म, सामाजक जीवन एवं सामुदायक संगठन) 1. WHAT WAS THE MAIN LIVELIHOOD OF YOUR ANCESTORS? आपके पूवज क आजीिवका का मुख्य साधन ा था ?

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 49 2. DOES YOUR FAMILY HAVE A HISTORY OF PLANTATION WORK, AGRICULTURE, BUSINESS, OR GOVERNMENT SERVICE? ा आपके परवार का इितहास बागान श्र म, कृिष, व्य ापार अथवा सरकार सेवा से जुड़ा रहा है? 3. IS THERE STILL A TRADITION OF MUTUAL SUPPORT IN THE COMMUNITY? ा आपके समुदाय म आज भी पारस्प रक सहयोग एवं सामुदायक सहायता क परंपरा िवद्य मान है? 4. ARE SOCIAL ORGANIZATIONS, PANCHAYATS, COMMITTEES, ASSOCIATIONS, OR CULTURAL GROUPS ACTIVE? ा आपके समुदाय म सामाजक संगठन, पंचायत, सिमितय, सृितक संाएँ अथवा अन्य सामुदायक समूह सय ह? 5. DID INDENTURE HISTORY AFFECT LABOR CULTURE AND SOCIAL ORGANIZATION? ा गरिमटया इितहास ने श्र म संृित (LABOUR CULTURE) तथा सामाजक संगठन (SOCIAL ORGANIZATION) को प्र भािवत कया है? 6. DO YOU SEE STRUCTURES OF MARRIAGE, ASSISTANCE, CELEBRATION, AND SUPPORT WITHIN THE COMMUNITY? ा आपके समुदाय म िववाह, पारस्प रक सहयोग, उत्स व के आयोजन तथा सामाजक सहायता क पारंपरक व्य वाएँ आज भी िवद्य मान ह? 7. IS THERE ANY SPECIFIC TRADITION OF LEADERSHIP AND PARTICIPATION IN THE INDIAN DIASPORA COMMUNITY? ा भारतीय प्र वासी समुदाय म नेतृत्व , सामुदायक सहभागता तथा सामाजक उत्त रदायत्व क कोई िवशष्ट परंपरा िवद्य मान है? 11. WOMEN’S EXPERIENCES AND GENDER RELATIONS (महलाओ के अनुभव एवं लगक संबंध) 1. HOW DO YOU VIEW THE ROLE OF WOMEN IN YOUR FAMILY/COMMUNITY? आप अपने परवार/ समुदाय म महलाओ क भूिमका को कस रू प म देखते ह? 2. HAVE WOMEN PLAYED AN IMPORTANT ROLE IN PRESERVING CULTURAL TRADITIONS? ा महलाओ ने सृितक परंपराओ के संरक्ष ण म महत्त्व पूणभूिमका नभाई है? 3. DO MOTHERS AND GRANDMOTHERS PASS ON LANGUAGE, SONGS, RITUALS, AND MEMORY? ा माताएँ और दादय/ नानय भाषा, लोकगीत, धामक अनुान तथा सृितक ृितय को अगली पीढ़ तक पहुँचाती ह? 4. HAS THERE BEEN A CHANGE IN WOMEN’S EDUCATION, LABOR, AND DECISION- MAKING IN THE FAMILY? ा परवार म महलाओ क शक्ष ा, श्र म म भागीदार तथा नणय लेने क भूिमका म परवतन आया है?

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 50 5. Have gender relations changed over time in your community? ा समय के साथ आपके समुदाय म लगक संबंध (Gender Relations) म परवतन आया है? 6. Do women’s experiences receive enough attention in indenture history? ा गरिमटया इितहास म महलाओ के अनुभव को पयप्त महत्त्व दया गया है? 7. Do you think women’s stories should be recorded separately? ा आपके िवचार म महलाओ क कहानय और अनुभव का अलग से दावेजीकरण कया जाना चाहए? 12. Cultural Change, Adaptation, and Resistance (सृितक परवतन, अनुकूलन एवं संरक्ष ण) 1. What changes have occurred in your culture over the last 20–30 years? िपछले 20–30 वष म आपक संृित म कौन-कौन से परवतन आए ह? 2. Which Indian traditions have been preserved, and which have weakened? कौन-कौन सी भारतीय परंपराएँ आज भी संरक्ष त ह और कौन-सी परंपराएँ कमजोर हुई ह? 3. Has local Mauritian culture influenced Indian culture? ा ानीय मॉरशसी संृित ने भारतीय संृित को प्र भािवत कया है? 4. Have modern education, urbanization, media, and migration changed identity? ा आधुनक शक्ष ा, नगरकरण, मीडया तथा प्र वासन ने आपक सृितक पहचान कोप्र भािवत कया है? 5. Do you see cultural adaptation as natural or as a loss? ा आप सृितक अनुकूलन (Cultural Adaptation) को एक ाभािवक प्र या मानते ह या इसे सृितक ास (Cultural Loss) के रू प म देखते ह? 6. Has the community made any active effort to resist cultural erosion? ा आपके समुदाय ने सृितक क्ष रण (Cultural Erosion) को रोकने के लए कोई सय प्र यास कए ह? 7. Is the younger generation sufficiently connected to its roots? ा नई पीढ़ अपनी सृितक जड़ और िवरासत से पयप्त रू प से जुड़ हुई है? 13. Contemporary Generation, Heritage Preservation, and Future Vision (समकालीन पीढ़, िवरासत संरक्ष ण एवं भिवष्य क दृ ) 1. Does the younger generation know about indenture history? ा नई पीढ़ गरिमटया इितहास के बार म जानती है? 2. Is this history taught in school, in the family, or in the community? ा यह इितहास िवालय, परवार अथवा समुदाय म पढ़ाया और साझा कया जाता है?

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 51 3. In your opinion, is digital documentation necessary for heritage preservation? आपके िवचार म ा सृितक िवरासत के संरक्ष ण के लए डजटल दावेजीकरण आवश्य क है? 4. Do you think websites, archives, videos, podcasts, or oral collections would be useful? ा आपके िवचार म वेबसाइट, अिभलेखागार (Archives), वीडयो, पॉडकास्ट अथवा मौखक इितहास संग्र ह (Oral Collections) उपयोगी हो सकते ह? 5. Should cultural ties between India and Mauritius be further strengthened? ा भारत और मॉरशस के बीच सृितक संबंध को और अधक सुदृ ढ़ कया जाना चाहए? 6. Would you like your family story to be recorded? ा आप चाहते ह क आपके परवार क कहानी और ृितय का दावेजीकरण कया जाए? 7. What traditions would you like to preserve for future generations? आप आने वाली पीढ़य के लए कन परंपराओ को संरक्ष त रखना चाहगे? 8. What do you expect from the Girmitiya.in project? आप गरिमटया.इन (Girmitiya.in) परयोजना से ा अपेक्ष ाएँ रखते ह?

PRESENCE SPEAKS LOUDER THAN PERFECTION. SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 52 गरिमटया समुदाय क ऐितहासक चेतना, सृितक पहचान और िवरासत को समझने के उेश्य से मॉरशस के संदभ म तैयार क गईप्रश्न ावली को िवार देते हुए गुयाना, सूरनाम, फ़जी तथा भारत के िवशेष संदभ को भी इसम समाहत कया गया है। इस प्रश्न ावली का उेश्यप्र वासी भारतीय समुदाय के अनुभव, ृितय और सृितक नरंतरताओ का व्य वत अध्य यन करना है।प्रश्न ावली म सबसे पहले उत्त रदाताओ क सहमित,व्य क्त गत जानकार और पारवारक इितहास से जुड़ेप्रश्न को शािमल कया गया है। इसके माध्य म से यह जानने का प्र यास कया गया है क प्र वासी परवार अपने पूवज के भारत से संबंध, मूल क्षेत्र , गव, जातीय एवं भाषाई पहचान तथा गरिमटया इितहास को कस प्र कार संरक्ष त रखते ह। पुराने दावेज, पत्र , तीर और पारवारक ृित-च के माध्य म से प्र वासन क ऐितहासक यात्र ा को समझने काप्र यास कया गया है।प्रश्न ावली का एक प्र मुख भाग मौखक इितहास और सामूहक ृित पर क त है। गरिमटया समुदाय का इितहास केवल अिभलेख म ह नह, ब लोककथाओ, गीत, कहावत और पारवारक आान म भी सुरक्ष त है। इस खंड के माध्य म से भारत से िवदेश यात्र ा, श्र म अनुभव, बागान के जीवन और पूवज के संघष से जुड़ ृितय को दज करने का प्र यास कया गया है। भाषा और सृितक पहचान के अध्य यन के लएप्रश्न ावली म हद, भोजपुर, अवधी, तिमल, तेलुगु, उदू तथा अन्य भारतीय भाषाओ के प्र योग से संबंधतप्रश्न शािमल कए गए ह। मॉरशस म भोजपुर, सूरनाम म सरनामी हदुानी और फ़जी म फ़जी हद जैसी भाषाई परंपराएँ प्र वासी अता के महत्त्व पूणआधार ह। इसी प्र कार धामक जीवन, ोहार, लोक संृित, भोजन परंपराओ और सृितक आयोजन के माध्य म से भारतीय एवं ानीय संृितय के समन्व य को समझने काप्र यास कया गया है।प्रश्न ावली म महलाओ के अनुभव को भी िवशेष ान दया गया है। गरिमटया इितहास म महलाओ ने परवार, भाषा, संृित और परंपराओ के संरक्ष ण म महत्त्व पूणभूिमका नभाई है। इसलए उनके श्र म, सामाजक भूिमका और सृितक योगदान को दज करना इस अध्य यन का महत्त्व पूणउेश्य है। इसके अितरक्त प्रश्न ावली म नई पीढ़, सृितक परवतन, वैश्व ीकरण, शक्ष ा, मीडया और डजटल संरक्ष ण से जुड़े प्रश्न भी शािमल कए गए ह। इसका उेश्य यह समझना है क वतमान पीढ़ अपने गरिमटया अतीत से कस प्र कार जुड़ हुई है और भिवष्य म इस िवरासत को संरक्ष त करने के लए कौन-से प्र यास आवश्य क ह। इस प्र कार मॉरशस, गुयाना, सूरनाम, फ़जी और भारत के संदभ को समाहत करते हुए तैयार क गई यह प्रश्न ावली गरिमटया इितहास को केवल श्र मप्र वासन के रू प म नह, ब अता, ृित, भाषा, संृित और वैश्व क भारतीय िवरासत के अध्य यन के रू प म प्र ुत करती है। यह शोध उपकरण प्र वासी भारतीय समुदाय क ऐितहासक चेतना और सृितक नरंतरता के दावेजीकरण म महत्त्व पूणभूिमका नभाएगा। डॉ. रचना िवश्व कम (प्र ोजेक्ट नदेशक) ारा दो दवसीय िवमश के बाद िवषय िवशेष ारा दए गए सुझाव को समाहत करते हुए प्रश्न ावली का संशोधतप्र ारू प प्र ुत कया गया जसम यह िवशेष रू प सेध्य ान रखा गया क प्रश्न ावली केवल ऐितहासक त तक सीिमत न होकर गरिमटया समुदाय के सामाजक, सृितक, आथक एवं भावनात्म क अनुभव को भी बेहतर से समाहत कर। इसी परप्रेक्ष्य म प्रश्न ावली म व्य क्त गत एवं जनसकय जानकार, पारवारक एवं वंशावली इितहास, मौखक इितहास एवं सामूहक ृित, सृितक पहचान एवं भारतीयता, भाषा एवं भाषायीव्य वहार, धम एवं अनुानक जीवन, लोक संृित एवं ोहार, खान-पान एवं दैनक जीवन संृित,श्र म, सामाजक जीवन एवं सामुदायक संगठन, महला अनुभव एवं लगक संबंध, सृितक

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 53 परवतन एवं अनुकूलन, तथा िवरासत संरक्ष ण एवं भावी दृ कोण जैसे महत्त्व पूण आयाम को सलत कया गया। परचच म यह भी िवशेष रू प से रखकत कया गया क शोध प्र ावली म मात्र तात्म क जानकार ह नह, बप्र ितभागय के व्य गत अनुभव, ृितय, पारवारक कथाओ, सृितक प्र थाओ एवं पीढ़य के बीच हतरत िवरासत को भी अिभव्य का अवसर दया जाए। इस दृ से प्र ावली म संरचत एवं अध-संरचतप्र का समावेश कया गया, ताक गुणात्म क (QUALITATIVE) एवंमात्र ात्म क (QUANTITATIVE) दोन प्र कार के आँकड़ का संकलन संभव हो सके। अंततः -दवसीय परचच से प्र ाप्त सुझाव एवं िवशेषीय िवचार-िवमश के आधार पर प्र ावली को अंितम रू प प्र दान कया गया तथा परयोजना के शोध उे के अनुरू प इसे प्र ुत कया गया। यह प्र ावली गरिमटया समुदाय के ऐितहासक अनुभव, सृितक ृित, पहचान नमण तथा वतमान पीढ़य म िवरासत संरक्ष ण क प्र या को समझने हेतु एक महत्त्व पूण शोध उपकरण के रू प म काय करगी।रचना िवश्व कम प्र ोजेक्ट नदेशक असट प्र ोफ़ेसर दक्ष ण िबहार केय िवश्व िवालय गया जी (िबहार) डॉ. रचना िवश्व कम दक्ष ण िबहार केय िवश्व िवालय (CENTRAL UNIVERSITY OF SOUTH BIHAR), गया के वाणज्य एवं व्य वसाय अध्य यन िवभाग म सहायक प्र ाध्य ापक के रू प म कायरत ह। उने काशी हू िवश्व िवालय (BANARAS HINDU UNIVERSITY) से वाणज्य िवषय म उच्च शक्ष ा एवं पीएच.ड. प्र ाप्त क। शक्ष ण और शोध के क्षेत्र म उनका अनुभव क य िवश्व िवालय से जुड़ा रहा है, जह उने ातक, ातकोत्त र तथा शोध स्त र के िवाथय का मागदशन कया है। वतमान म वे एम.कॉम. तथा पीएच.ड. के िवाथय के अध्य ापन एवं शोध-नदशन से संबद्ध ह। उनक प्र मुख शोध-अिभरु चय म कॉरपोरट गवनस, िवत्त (FINANCE), माइोफाइनस, िवत्त ीय समावेशन (FINANCIAL INCLUSION), कॉपरट सामाजक उत्त रदायत्व (CSR), डजटल िवत्त , सतत िवकास (SUSTAINABILITY), पयवरण, सामाजक एवं प्र शासनक (ESG) अध्य यन तथा एमएसएमई (MSME) िवकास शािमल ह। उनके शोधपत्र राय एवं अंतरराय शोध-पत्र काओ म प्र काशत हुए ह तथा उने सकय अनुसंधान पद्ध ितय, िवशेषतः STRUCTURAL EQUATION MODELING (SEM) और AMOS जैसे िवेषणात्म क उपकरण के प्र योग एवं प्र शक्ष ण म भी उेखनीय योगदान दया है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 54 प्र वासी समुदाय और भािषक पहचान - पंचानन मोहंती इस परचच म प्र ो. पंचानन मोहंती ने प्र वासी समुदाय क भािषक और सृितक पहचान पर अत्यं त महत्त्व पूणिवचार प्रस्तु त कए। उनका मुख्य ान िवशेष रू प से फ़जी के भारतीय समुदाय पर था, जह उने यह स्पष्ट कया क प्र वासी समाज म भाषा और संृित के कुछ तत्व समय के साथ सुरक्ष त बने रहते ह, जबक कुछ धीर-धीर लुप्त हो जाते ह। उनके अनुसार जो तत्व पीढ़य तक सुरक्ष त रहते ह, वह कसी समाज और संृित के “ कोर ” या मूल स्वरू प का प्र ितनधत्व करते ह। यह िवचार शोधकतओ के लए इसलए महत्त्व पूणहै क प्रश्न ावली नमण के दौरान ऐसे मूल सृितक तत्व क पहचान करना आवश्य क होता है, ताक समुदाय क वास्त िवक सृितक ृित और पहचान को समझा जा सके।प्र ो. मोहंती ने बहुभािषक शक्ष ा के प्रश्न पर गंभीर चता व्यक्त क। उने “ सेमीलग्व लज़् म ” (SEMILINGUALISM) क अवधारणा का उेख करते हुए कहा क यद ब को इस प्र कार अनेक भाषाएँ सखाई जाएँ क वे अपनी मातृभाषा म ह असहजता या भ्र म महसूस करने लग, तो इसकाप्र ितकूल प्र भाव उनके संानात्म क िवकास पर पड़ सकता है। यह िवचार शोध प्रश्न ावली के नमण म िवशेष महत्त्व रखता है, क कसी भी प्र वासी समुदाय के ब क भाषाई दक्ष ता, मातृभाषा केप्र ित उनका जुड़ाव, तथा बहुभािषक परवेश केप्र भाव को समझने के लए उपयुक्त प्रश्न तैयार करना आवश्य क है। उने भाषाई पहचान और नाम के सृितक महत्त्व पर भी िवशेष बल दया। उदाहरणस्वरू प “ पडा ” और “ पडे ” जैसे नाम का उेख करते हुए उने स्पष्ट कया क नाम केवल ध्व न या - उारण भर नह होते, ब वे सामाजक, सृितक और जातीय पहचान के वाहक होते ह। शोध प्रश्न ावली बनाते समय व्य क्त के नाम, उनके उारण, तथा उनसे जुड़े सृितक संदभ को समझने वाले प्रश्न का समावेश करना इसलए महत्त्व पूणहै क ये पहचान के सूक्ष्म स्त र को उजागर करते ह।प्र ो. मोहंती ने प्र सद्ध समाजभाषािवद् WILLIAM LABOV के संदभ म यह भी बताया क भाषा समाज क संरचना और उसके स्त रकरण को प्र कट करती है। उने उदाहरण देते हुए बताया क बंगाली, तेलुगु और उड़या जैसी भारतीय भाषाओ म सवनाम का प्र योग केवल व्य ाकरणक इकाई नह, ब सामाजक संबंध, सान और पदानुक्र म का संकेतक होता है। इस संदभ म प्रश्न ावली तैयार करते समय यह आवश्य क है क शोधकत भाषा के प्र योग म मौजूद सामाजक स्त र, संबोधन के रू प और उनके सृितक अथ को ान म रख।प्रश्न ावली नमण के संबंध म प्र ो. मोहंती ने अप्रत्यक्षरू प से यह सुझाव दया क प्रश्न केवल तात्म क न ह, ब वे व्य क्त के अनुभव, सृितक ृितय और सामाजक व्य वहार को समझने म सहायक ह। उदाहरण के लए, प्र वासी समुदाय से यह पूछा जा सकता है क वे कन त्य ोहार, परंपराओ या भाषाईव्य वहार को आज भी संरक्ष त रखते ह, और कन तत्व म परवतन अनुभव करते ह। इससे शोधकत यह समझ सकते ह क संृित का “ कोर ” ा है और कौन से तत्व समय के साथ बदल रहे ह।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 55 अंततः प्र ो. मोहंती ने भारतीय समाज क सृितक सहजीिवता क ऐितहासक पृष्ठ भूिम को रखकत करते हुए बताया क RAMAYANA और MAHABHARATA जैसी परंपराएँ भारतीय समाज म सामाजक समावेशता और सृितक नरंतरता क सशक्त िमसाल ह। इन ंथ ने िविवध समुदाय को एक साझा सृितक धरातल प्र दान कया है। शोध के संदभ म यह दृ ष्ट कोण महत्त्व पूणहै क यह दशता है क प्र वासी समुदाय अपने मूल देश क सृितक परंपराओ को कस प्र कार नए परवेश म जीिवत रखते ह। नष्क षतः, प्र ो. पंचानन मोहंती के िवचार शोध प्र ावली नमण के लए अंत उपयोगी मागदशन प्र दान करते ह। उने स्पष्ट कया क प्र ावली म भाषा, नाम, सृितक व्य वहार, सामाजक संबंध और पहचान जैसे त को समाहत करना आवश्य क है। इससे शोध अधक गहन, संवेदनशील और समुदाय क वास्त िवकताओ के अधक नकट हो सकता है। िवशेषकर गरिमटया और प्र वासी समुदाय के अध्य यन म यह दृ ष्ट कोण शोध क गुणवा और िवश्व सनीयता को सुदृ ढ़ बनाता है। ो. पंचानन मोहंती हैदराबाद िवश्व िवालय, हैदराबाद (भारत) म अनुप्र युक्त भाषािवान और अनुवाद अध्य यन कद्र म पूव प्र ो./ संकाय अध्यक्ष (मानिवक) रहे ह ,भाषा शक्ष ण, मनोभाषािवान, समाजभाषािवान, नृजातीय भाषािवान, भाषा लुप्तप्र ायता, अनुवाद अध्य यन, कम् ूटेशनल भाषािवान, माात्म क भाषािवान, ध्व निवान के साथ-साथ ध्व निवान और आकृित िवान जैसे क्षे म प्र ितष्ठ त पकाओ म उनका एक समृद्धप्र काशन इितहास है। उने अंेजी और उड़या म 28 पुस्त क लख और संपादत क ह, साथ ह उड़या म 4 पुस्त क का अनुवाद भी कया है। उने राष्ट य और अंतरराष्ट य स्त र पर िविभन्न भाषाई संघ और पकाओ म पद संभाले ह। वे फाउंडेशन फॉर एंडजड लेजेज, यूके और स्व देशी पारंपरक ान और लुप्तप्र ाय भाषाओ के संरक्ष ण और संवधन के लए गोलमेज सेलन क कायकार सिमित के सदस्य थे। भारत सरकार के मानव संसाधन िवकास मंालय ाराप्र ायोजत मैसूर त कद्र य भारतीय भाषा संान क लुप्तप्र ाय भाषाओ के संरक्ष ण और संवधन योजना के अंतगत लुप्तप्र ाय भाषाओ पर परयोजनाओ के प्र धान अेषक भी ह। उने एनटईएलट सेलन म वैानक सिमित के सदस्य के रू प म काय कया है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 56 समु माग से गरिमटया प्र वास:जहाजी-भाई क अनकह गाथा- नलन भारती और सृ सहाय उन्न ीसव शताब्द का इितहास केवल औोगक ित और सााज्य वाद के िवार का इितहास नह है, ब यह उन लाख भारतीय क पीड़ा, संघष और जीवटता का भी इितहास है ज अपने घर- परवार से दूर समुद्र पार अात भूिम पर श्र म करने के लए भेजा गया। ये भारतीय " गरिमटया " कहलाए। अंेज़ी शब्द AGREEMENT का ानीयरू प " गरिमट " था, जसके अंतगत श्र िमक से पच वष के अनुबंध पर हाक्ष र कराए जाते थे। इसी से " गरिमटया " शब्द प्र चलत हुआ। दास प्र था के उन्मू लन के बाद िटश सााज्य को अपने उपनवेश के गन्न ा बागान के लए सेश्र िमक क आवश्य कता थी। इस आवश्य कता ने भारत से अनुबंधत श्र म-प्र वास क एक ऐसी वैक व्य वा को जन्म दया जसने हद महासागर, अटलटक महासागर और दक्ष ण प्र शत महासागर को मानव प्र वास के माग म परवतत कर दया। दासता का नया रू प: शरर नह, समय का स्व ािमत्व 1833 म िटश संसद ारा दास प्र था उन्मू लन अधनयम पारत कया गया। इससे कैरिबयाईक्षेत्र क चीनी अथव्य वा संकट म पड़ गई। ऐसे समय म िटश शासन ने एक नई श्र म व्य वा िवकसत क, जसम जसम श्र िमक के शरर का नह, ब उनके श्र म-समय का स्व ािमत्व ािपत कया गया। गरिमटया श्र िमक कानूनी रू प से "स्व तंत्र " थे, कु पच वष के अनुबंध, सीिमत िवक और भौगोलक दूर ने उ बागान से बध दया। इसप्र कार दासता क जंजीर का ान कानूनी अनुबंध ने ले लया। मुद्र माग: सााज्य वाद अथव्य वा क धमनय गरिमटया प्र वास कसी स्व ाभािवक जन-आवागमन का परणाम नह था, ब यह एक सुव्य वतप्र शासनक और आथक परयोजना थी। कलका, मद्र ास और बंबई जैसे बंदरगाह से जहाज के माध्य म से भारतीय श्र िमक को िविभन्न उपनवेश तक पहुँचाया जाता था।यह वैक नेटवक तीनप्र मुख समुद्र परपथ म िवभाजत था- 1.हद महासागर परपथ: " महान प्र योग " मॉरशस इस व्य वा का पहला कद्र बना। 1834 के बाद बड़ संा म भारतीय श्र िमक यह भेजे गए। िटश सााज्य यह देखना चाहता था क ा दास के ान पर अनुबंधत श्र िमक के माध्य म से भी बागान अथव्य वा लाभकार बनी रह सकती है। मॉरशस क सफलता के बाद यह मॉडल अन्य उपनवेश म लागू कया गया। 1834 से 1920 के बीच लगभग 4.5 लाख भारतीय मॉरशस पहुँचे। बाद म नटाल, रयूनयन, सेशेल्स और पूव अका भी इस परपथ का हा बने। 2.अटलटक महासागर परपथ: "नई दास प्र था " इितहासकार टकर (1974) ने इस व्य वा को "A NEW SYSTEM OF SLAVERY" अथत् " दासता क नई प्र णाली " कहा। गुयाना, त्र नदाद, जमैका और सूरनाम जैसे क्षेत्र म भारतीय श्र िमक को भेजा गया ताक कैरिबयाई चीनी उोग को पुनजिवत कया जा सके। यह यात्र ा अंत लंबी और कष्ट दायक होती थी। जहाज म भीड़भाड़, अस्वच्छ ता, बीमार और मृु सामान्य घटनाएँ थ। कई यात्र ाएँ दस से बीस साह तक चलती थ। हैजा, पेचश और खसरा जैसी बीमारय से बड़ संा म लोग क मृु हो जाती थी। इन परितय ने गरिमटया अनुभव को केवल आथक नह, ब गहर मानवीय आघात का अनुभव बना दया।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 57 3.दण प्र शत परपथ: फजी क ओर अंितम िवार 1879 म फजी के लए गरिमटया प्र वास आरम्भ हुआ। यहप्र शत ेत्र म िटश सामरक हत को सुरत करने का प्र यास भी था।फजी जाने वाले अधकश श्र िमक िबहार और उत्त र प्र देश के भोजपुर भाषी ेत्र से आते थे। यह कारण है क आज भी फजी हद, भोजपुर क ृितय को संजोए हुए एक िवशष्ट भाषा के रू प म जीिवत है। काला पानी: भय, िवापन और अत्व का संकट भारतीय समाज म समुद्र पार करना " काला पानी " माना जाता था। इसे धामक और सामाजक दृ ष्ट से अशु का प्र तीक समझा जाता था। इसलए गरिमटया श्र िमक के लए समुद्र यात्र ा केवल भौितक दूर तय करना नह थी, ब अपनी सामाजक पहचान, जाितगत ित और पारवारक संबंध से िवेद का अनुभव भी थी।समुद्र उनके लए भय का प्र तीक था, कु यह समुद्र उनके जीवन म परवतन का माध्य म भी बना। जहाजी-भाई: पीड़ा से जा भाईचारा जहाज पर िविभन्न जाितय, धम और ेत्र से आए लोग एक साथ रहने को िववश थे। भोजन, बीमार, मृु और अनत भिवष्य के बीच उने एक- दूसर का सहारा बनना सीखा।यह से " जहाजी-भाई " क अवधारणा का जन्म हुआ। यह रक्त -संबंध से पर एक नया सामाजक संबंध था, जो साझा पीड़ा और संघष पर आधारत था। जहाजी-भाईचारा जाितगत िवभाजन को चुनौती देता था। जहाज पर ाह्म ण, अहर, चमार, राजपूत, मुसलमान और अन्य समुदाय के लोग समान परितय म साथ रहते थे। इस प्र कार समुद्र ने भारतीय समाज के कठोर सामाजक ढच को पुनपरभािषत कया। समुद्र पहचान और कूलीूड मॉरशस के िवान खाल तोराबुली ने " कूलीूड " क अवधारणा प्र ुत करते हुए कहा क गरिमटया पहचान क जड़ केवल "रू ट " (मूल ान) म नह, ब "रू ट " (यात्र ा-पथ) म भी नहत ह। समुद्र यात्र ा ने एक नई " समुद्र अता " का नमण कया, जसम भारतीय, अक और कैरिबयाई सृितक तत्व का सश्र ण दखाई देता है। यह पहचान र नह, ब गितशील और बहुसृितक है। आज क गरिमटया िवरासत आज मॉरशस क लगभग दो-ितहाई आबाद भारतीय मूल क है। गुयाना, त्र नदाद, सूरनाम और फजी म भी गरिमटया वंशज सामाजक और राजनीितक जीवन के महत्त्व पूणंभ ह। उने अपनी भाषा, संृित, धामक परंपराओ और सामुदायक मू को जीिवत रखा।होली, दपावली, रामायण पाठ, ताजया,

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 58 भोजपुर लोकगीत और फजी हद जैसी सृितक अिभव्य य गरिमटया इितहास क अमूल्य धरोहर ह।नष्क ष गरिमटया इितहास केवल शोषण और पीड़ा क कहानी नह है। यह मानव साहस, अनुकूलन क्ष मता और सामूहकता क भी गाथा है। िटश सााज्य ने समुद्र को नयंत्र ण औरश्र म-शोषण का माध्य म बनाया, कु गरिमटयाश्र िमक ने उसी समुद्र को भाईचार, सृितक पुननमण और नई पहचान के ोत म परवतत कर दया। आज जब हम वैक भारतीय प्र वासी समुदाय क उपलय का उत्स व मनाते ह, तब यह स्म रण करना आवश्य क है क उनक यात्र ा क शुरु आत काला पानी क भयावह लहर से हुई थी। गरिमटया इितहास हम यह सखाता है क िवपरत परितय म भी मनुष्य अपनी अस्म ता, संृित और मानवीय संवेदनाओ को बचाए रख सकता है। यह केवल अतीत का इितहास नह, ब संघष से जी आशा और मानवता क अमर िवरासत है। ोफ़ेसर नलन भारती मानिवक और सामाजक िवान िवभाग आई.आई. ट. पटना सृ सहाय शोधाथ मानिवक और सामाजक िवान िवभाग आई.आई. ट. पटनाप्रो. नलन भारती भारतीय सामाजक िवान और मानिवक के ेत्र म एक प्र ितत शािवद् एवं शोधकत ह। वे वतमान म मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग, भारतीय प्र ौोगक संान (आई.आई.ट.) पटना म कायरत ह। उनका अकादिमकव्य त्व अंतवषयक दृ कोण, सामाजक इितहास, प्र वासन अध्य यन, संृित एवं समाज के अध्य यन से जुड़ा हुआ है।प्र ो. भारती ने िवशेष रू प से गरिमटया इितहास, भारतीयप्र वासन, औपनवेशक श्र म व्य वा और प्र वासी भारतीय समुदाय के अध्य यन म महत्त्व पूणरु च दखाई है। वे इितहास, समाजशास्त्र , सृितक अध्य यन और प्र वासी िवमश के बीच संवाद ािपत करने वाले िवान म अग्र णी ह। उनके शोध का कद्र भारतीय समुदाय क ऐितहासक ृितय, सृितक पहचान और वैक संदभ म भारतीयता के स्वरू प को समझना है। आई.आई.ट. पटना म रहते हुए उने मानिवक एवं सामाजक िवान को तकनीक शा के व्य ापक परप्रेक्ष्य से जोड़ने का महत्त्व पूणकाय कया है। वे िवाथय और शोधाथय को आलोचनात्म क चतन, बहुिवषयक शोध दृ और भारतीय समाज क जटलताओ को समझने के लए प्रे रत करते ह। गरिमटया िवमश से संबंधत परचचओ और शोध परयोजनाओ म उनका योगदान िवशेष रू प से उेखनीय है। वे गरिमटया समुदाय के इितहास को केवल प्र वासन क घटना केरू प म नह, ब शोषण, संघष, सृितक पुननमण और अता नमण क प्र या के रू प म देखते ह। उनके अकादिमक प्र यास भारतीय प्र वासी इितहास को नए िवमश से जोड़ने क दशा म महत्त्व पूणभूिमका नभाते ह।सृ सहाय आई.आई.ट. पटना के मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग से जुड़ युवा शोधाथ/शािवद् ह। मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग, आई.आई.ट. पटना तकनीक शा के साथ मानवीय दृ , सामाजक चतन और अंतवषयक शोध को बढ़ावा देने के लए सय है, जह साहत्य , भाषा, समाज, संृित और सामाजक िवान के िविवध ेत्र म शोध काय कए जाते ह। सृ सहाय का अकादिमक काय सामाजक-सृितक अध्य यन, साहत्य क िवमश और समकालीन मानवीय प्र के अध्य यन क दशा म क द्र त है। वे शोध और संवाद क ऐसी परंपरा से जुड़ ह जो भारतीय समाज, संृित और इितहास कोव्य ापक परप्रेक्ष्य म समझने का प्र यास करती है। आई.आई.ट. पटना जैसे तकनीक संान म मानिवक के अध्य यन से जुड़कर वे िवान और तकनीक के साथ मानवीय संवेदना, सृितक चेतना और सामाजक सरोकार के समन्व य को आगे बढ़ाने म योगदान दे रह ह।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 59प्र वासन : सत, अवधारणा और समकालीन परप्रेक्ष्य डॉ. मेघना गुा सत्र के अंतगत डॉ. मेघना गुप्त ा ने "प्र वासन : सद्ध त, अवधारणा एवं समकालीन परप्रेक्ष्य " िवषय पर ाान प्र ुत करते हुए गरिमटया परयोजना क वैचारक आधारभूिम को स्पष्ट कया। उने कहा क मानव इितहास का िवकास नरंतर प्र वासन क प्र या से जुड़ा रहा है। मनुष्य ने िविभन्न कालखंड म आथक, सामाजक, राजनीितक, धामक, पयवरणीय तथा सृितक कारण से एक ान से दूसर ान क ओर गमन कया है। इसलए प्र वासन को केवल जनसंा के ानतरण के रू प म नह, ब सामाजक परवतन, सृितक आदान-प्र दान और नई पहचान के नमण क प्र या के रू प म समझना आवश्य क है। ाान म उने प्र वासन क अवधारणा कोस्पष्ट करते हुए बताया क यह एक बहुआयामी सामाजक प्र या है, जसका अध्य यन इितहास, समाजशास्त्र , मानवशास्त्र , अथशास्त्र , राजनीित िवान, भाषािवान तथा प्र वासी अध्य यन जैसे अनेक अनुशासन म कया जाता है। उने रवेनन के प्र वासन सद्ध त, ली के पुश–पुल सद्ध त (PUSH–PULL THEORY), िवश्व -प्र णाली सद्ध त (WORLD SYSTEMS THEORY), नेटवक सद्ध त (MIGRATION NETWORK THEORY) तथा टसनेशनलज़् म (TRANSNATIONALISM) जैसी प्र मुख अवधारणाओ का संप्त परचय देते हुए बताया क समकालीन प्र वासन अध्य यन केवल आथक कारण तक सीिमत नह है, ब ृित, पहचान, संृित और वैश्व क संबंध क पुना का भी िवषय है। डॉ. गुप्त ा ने प्र वासन के िविभन्न प्र कार का िवृत िववेचन करते हुए बताया क प्र वासन को अनेक आधार पर वगकृत कया जा सकता है। भौगोलक आधार पर आंतरक (INTERNAL MIGRATION) और अंतरराष्ट य (INTERNATIONAL MIGRATION), अवध के आधार पर ायी (PERMANENT), अायी (TEMPORARY) तथा मौसमी (SEASONAL) प्र वासन, कारण के आधार पर ैक (VOLUNTARY) और बलात् (FORCED MIGRATION), तथा उेश्य के आधार पर आथक, शैक, धामक, राजनीितक, वैवाहक, पयवरणीय एवं श्र िमक प्र वासन जैसे िविभन्न रू प देखने को िमलते ह। उने िवशेष रू प से यह रखकत कया क औपनवेशक काल का अनुबंधत श्र िमक प्र वासन (INDENTURED MIGRATION) इन सभी प्र वासन प्र कार से िभन्न एक िवशष्ट ऐितहासक प्र या थी, जसने भारतीय प्र वासी समुदाय के इितहास और सृितक िवकास को गहराई से प्र भािवत कया। गरिमटया परयोजना के संदभ म उने स्पष्ट कया क उन्न ीसव और बीसव शता के दौरान भारत से मॉरशस, फजी, गुयाना, सूरनाम, त्र नदाद एवं टोबैगो तथा दण अका जैसे उपनवेश म भेजे गए भारतीय श्र िमक का प्र वासन केवल आथक आवश्य कता का परणाम नह था। यह औपनवेशक सा, श्र म-शोषण, सामाजक िवापन और सृितक पुननमण क जटलप्र या थी। इसलए गरिमटया अध्य यन कोप्र वासन के ापक सद्ध त के आलोक म समझना आवश्य क है। उने कहा क गरिमटया समुदाय ने अपनी मातृभूिम से दूर रहते हुए भी भाषा, लोकगीत, धामक परंपराओ, पारवारक संार, ोहार और सामुदायक जीवन के माध्य म से भारतीय सृितक पहचान को सुरत रखा। इस प्र कारप्र वासन केवल िवापन क कथा नह रहा, ब सृितक नरंतरता, सामुदायक ृित, प्र ितरोध और नई पहचान के नमण का भी माध्य म बना। ाान के दौरान डॉ. गुप्त ा ने समकालीन वैश्व कप्र वासन क चुनौितय पर भी प्र काश डाला। उने बताया क आज आथक अवसर के साथ-साथ जलवायु परवतन, युद्ध , राजनीितक अरता, वैश्व ीकरण और डजटल प्र ौोगक भी प्र वासन क प्र कृित को प्र भािवत कर रहे ह। ऐसे म प्र वासी

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 60 समुदाय क पहचान, सृितक संरक्ष ण और वैक नागरकता के प्रश्न पहले क अपेक्ष ा अधक महत्त्व पूण हो गए ह। अपने ाान का समापन करते हुए उने कहा क गरिमटया परयोजना प्र वासन अध्य यन को केवल इितहास क एक घटना के रू प म नह, ब मानव सभ्य ता, सृितक ृित, भाषाई नरंतरता, सामाजक पुनसरचना और वैक भारतीय अता के अध्य यन के रू प म देखने का अवसर प्र दान करती है। उनके अनुसार प्र वासन के सद्ध त और प्र कार क समुचत समझ के िबना गरिमटया इितहास और प्र वासी भारतीय समुदाय के सृितक िवकास का समग्र िवेषण संभव नह है। यह ाान परयोजना के आगामी शोध काय के लए एक महत्त्व पूण वैचारक एवं पद्ध ितगत आधार सद्ध हुआ। गरिमटया परयोजना म उनका ाान "प्र वासन : सद्ध त, अवधारणा एवं समकालीन परप्रेक्ष्य " परयोजना क वैचारक आधारभूिम को स्पष्ट करने वाला महत्त्व पूण ाान रहा, जसम उने प्र वासन के प्र मुख सद्ध त, िविभन्न प्र कार तथा गरिमटया अनुभव को वैक प्र वासी अध्य यन के संदभ म समझने क आवश्य कता पर बल दया। डॉ. मेघना दा मानिवक एवं समाज िवान संकाय आई आई ट पटना डॉ. मेघना दा भारतीय प्र ौोगक संान (आईआईट) पटना के मानिवक एवं सामाजक िवान के क्षेत्र से संबद्ध एक शक्ष ािवद् एवं शोधकत ह। उनके अध्य यन और शोध काप्र मुख क्षेत्र प्र वासन अध्य यन, सामाजक इितहास, सृितक अध्य यन तथा अंतःिवषयी अनुसंधान है। उने भारतीय समाज, प्र वासी समुदाय और समकालीन सामाजक प्रश्न पर िविभन्न अकादिमक गितिवधय म सय योगदान दया है। शक्ष ण एवं शोध के क्षेत्र म डॉ. गुा क िवशेष रु च प्र वासन क अवधारणा, सृितक पहचान, सामाजक परवतन तथा शोध-पद्ध ित से संबंधत िवषय म रह है। वे अंतःिवषयीदृ ष्ट कोण को महत्त्व देते हुए इितहास, समाजशास्त्र , मानवशास्त्र तथा सृितक अध्य यन के समन्व य से जटल सामाजक प्रश्न का िवेषण करती ह।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 61 जहाज़ क लहर पर जा नया जीवन: गरिमटया य क आत्म नभरता क कहानी- नरंजन सहाय उीसव शता म जब हजार भारतीय को गरिमट (एीमट) के तहत समुद्र पार दूर देश म ले जाया गया तब उनके मन म केवल एक आशा थी, बेहतर जीवन क। लेकन यह यात्र ा केवल भौगोलक दूर तय करने क नह थी; यह दद, संघष, आघात और आत्म -खोज क यात्र ा भी थी। गव और क से आए ये लोग अलग-अलग जाितय, धम और सामाजक पृष्ठ भूिमय से थे। उनके खान-पान, रित-रवाज और जीवनशैली अलग-अलग थे। भारत म जह जाित और धम के आधार पर लोग के बीच दूरय थ, वह समुद्र के बीच-बीच डोलते जहाज़ ने उन सभी भेद को धीर- धीर िमटाना शुरू कर दया। जहाज़ पर सबक परितय एक जैसी थ। तंग जगह, अनत भिवष्य , परवार से िबछड़ने का दद और समुद्र यात्र ा क कठनाइय सभी को एक-दूसर के करब ले आईं । जब कोई बीमार पड़ता, तो उसक सेवा करने वाला यह नह पूछता था क वह कस जाित या धम का है। जब कसी के पास खाने को कम होता, तो दूसर अपने हे से उसे बट देते। इसी साझा पीड़ा और सहयोग ने जन्म दया एक नए रे को " जहाजी भाईचारा "। यह भाईचारा केवल पुरु ष तक सीिमत नह था। महलाओ ने भी एक-दूसर का सहारा बनकर इस नए सामाजक ताने-बाने को मजबूत कया। कई य ऐसी थ जो अपने पीछे घरलू हसा, सामाजक उीड़न और असमानता का जीवन छोड़कर आई थ। उनके लए यह यात्र ा भयावह थी, लेकन इसी यात्र ा ने उ अपने अत्व को नए रू प म देखने का अवसर भी दया। नए देश म पहुँचने के बाद गरिमटया मजदूर ने कठन परितय म काम कया। गे के खेत, कारखान और बागान म दन-रात मेहनत करके उने अपना जीवन बनाया। इसप्र या म महलाओ क भूिमका भी अंत महत्त्व पूणरह। वे केवल घर संभालने तक सीिमत नह रह, ब खेत और बागान म पुरु ष के साथ कंधे से कंधा िमलाकर काम करने लग। समय के साथ इन महलाओ ने आथक स्व तंत्र ता का महत्त्व समझा। पहली बार उ अपने श्र म का मूल्य िमला। पहली बार उने महसूस कया क वे अपने जीवन के बार म स्व यं नणय लेने म सक्ष म ह। यह अनुभव उनके लए िबुल नया था, क भारत म अधकश महलाओ का जीवन परवार और समाज क सीमाओ के भीतर ह बंधा हुआ था। जब गरिमट क अवध समाप्त हुई, तब कुछ मजदूर को भारत लौटने का अवसर दया गया। कई पुरु ष अपने गव, अपनी िम और अपने परवार को याद करके वापस जाना चाहते थे। लेकन अनेक महलाओ क सोच बदल चुक थी। उने अपने पितय से कहा, “ हम वापस नह जाएँगे। वह फर वह पुरानी बेड़य हमारा इंतज़ार कर रह ह। यह हमने अपने श्र म से सान कमाया है, अपनी पहचान बनाई है। अब हम यह रहकर अपना भिवष्य बनाएँगे।” यह नणय केवल एक ान पर रहने का नह था, ब अपनी स्व तंत्र ता को स्व ीकार करने का था। इन महलाओ ने महसूस कया क वे केवल कसी क पी या बहू नह ह, ब स्व यं एक स्व तंत्र व्य त्व ह। उने नए देश को अपना घर बनाया, अपने ब को शक्ष त कया और आने वाली पीढ़य के लए बेहतर जीवन क नव रखी।गरिमटया इितहास म य क यह भूिमका िवशेष महत्त्व रखती है। उने न केवल कठन परितय का सामना कया, ब सामाजक बदलाव क वाहक भी बन।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 62 जहाज़ पर शुरू हुआ भाईचारा और समानता का भाव नए देश म एक नए समाज के नमण का आधार बना। आज जब हम गरिमटया इितहास को देखते ह, तो यह केवल प्र वास क कहानी नह लगती। यह मानव साहस, सामूहकता और िवशेष रू प से ी आत्म नभरता क प्रे रक गाथा है। समुद्र क लहर पर शुरू हुई वह यात्र ा अनेक महलाओ के लएस्व तंत्र ता और आत्म सान क मंज़ल बन गई। नरंजन सहाय परयोजना समन्व यक प्र ोफेसर, ह एवं अन्य भारतीय भाषा िवभाग महात्म ा गधी काशी िवापीठ (वाराणसी) गरिमटया य क यह िवरासत आज भी हम याद दलाती है क सी स्व तंत्र ता केवल भौगोलक सीमाएँ पार करने से नह िमलती, ब अपने भीतर क श को पहचानने से प्र ाप्त होती है।उने सािबत कर दया क परितय चाहे कतनी भी कठन न ह, साहस और आत्म िवास से एक नया भिवष्य बनाया जा सकता है।प्र ोफेसर नरंजन सहाय महाा गधी काशी िवापीठ, वाराणसी के ह एवं अन्य भारतीय भाषा िवभाग म प्र ोफेसर के पद पर कायरत ह। वे ह साहत्य , आलोचना, भाषा-अध्य यन तथा शक्ष ा के क्षेत्र के प्र ितष्ठ त अध्ये ता, शक्ष क, लेखक, समीक्ष क एवं शोध-नदशक ह। उने जवाहरलाल नेहरू िवश्व िवालय (जेएनयू), नई दी से ह म एम.ए. एवं एम.फल. तथा मोहनलाल सुखाड़या िवश्व िवालय, उदयपुर से पीएच.ड. क उपाध प्र ाप्त क। उनका शक्ष ण अनुभव लगभग तीन दशक का है। वे 1997 से अध्य ापन काय म सय ह तथा वष 2016 से महाा गधी काशी िवापीठ म प्र ोफेसर के रू प म कायरत ह। प्र ो. सहाय क शोध-अिभरु चय म भ आंदोलन एवं साहत्य , आधुनक ह किवता, समकालीन ह साहत्य , अतामूलक िवमश, भाषा- शक्ष ण, साहत्य क आलोचना तथा सृितक अध्य यन प्र मुख ह। उने ह साहत्य , भाषा-शक्ष ण और शक्ष ा-िवमश से संबंधत अनेक पुस्त क , शोध-पत्र , पुस्त क अध्य ाय तथा अध्य यन सामी का लेखन एवं संपादन कया है। उनके शैक्ष णक लेखन म भारतीय समाज, लोकतत्र क मू, भाषा-संवेदना तथा सामाजक न्य ाय के प्र का गंभीर िवेषण िमलता है। एक शक्ष क एवं प्र शासक के रू प म भी उनका योगदान उेखनीय रहा है। वे िवभागाध्यक्ष , आईूएसी (IQAC) सदस्य , यूजीसी प्र कोष्ठ के नोडल अधकार, नैक (NAAC) असेसर तथा िवश्व िवालय क िविभन्न अकादिमक एवं प्र शासनक सिमितय म महत्त्व पूण दाय का नवहन कर चुके ह।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 63प्र ावली को अधक व्य ापक, समकालीन एवं शोधोुख बनाने के उेश्य से “INDIA’S INTERNATIONAL MIGRANT WORKERS: GEOPOLITICS AND BEYOND” शीषक शोधपत्र का प्र ुतीकरण प्र ो. नलन भारती और सुश्र ी मुान कंवर ारा कया गया। शोधपत्र म भारतीयप्र वासय के आथक, सामाजक, कानूनी, शैक्ष क, सृितक तथा सुरक्ष ा संबंधी अनुभव का िवेषण प्र ुत करते हुए इसके आधार परप्र ावली के िविभन्न आयाम को सुदृ ढ़ करने हेतु महत्त्व पूणसुझाव प्र ाप्त हुए। शोधपत्र से स्पष्ट हुआ क प्र वासी समुदाय केवल सृितक पहचान और ऐितहासक ृितय का वाहक नह है, ब वह रोजगार, श्र म अधकार, सामाजक समावेशन तथा प्र शासनक व्य वाओ से संबंधत अनेक चुनौितय का भी सामना करता है। इसलए प्र ावली म प्र वासय क रोजगार ित, काय परितय, आय के ोत, वेतन संतुष्ट तथाश्र म अधकार से संबंधत प्र को और अधकव्य वत रू प से सलत करने का सुझाव दया गया। इससे प्र वासी जीवन के आथक पक्ष का यथाथपरक िवेषण संभव होगा। िविभन्न देश कप्र वासन नीितय, वीज़ा प्र ितबंध तथा नागरकता संबंधी जटलताओ का उेख कया गया है। इस आधार पर यह सुझाव सामने आया क प्र ावली मप्र वास क प्र या, कानूनी ित, नागरकता, दूतावासीय सहायता तथा प्र शासनक अनुभव से जुड़े प्र को शािमल कया जाए। इससे प्र वासय क संागत एवं कानूनी चुनौितय को समझने म सहायता िमलेगी। अध्य यन म शक्ष ा प्र ाप्त करने वाले भारतीय छात्र तथा उनके परवार के समक्ष उपत समाओ को भी रखकत कया गया है। इसलए प्र ावली म शक्ष ा, भाषा, कौशल िवकास, रोजगार क संभावनाओ तथा भिवष्य क योजनाओ से संबंधतप्र को जोड़े जाने क आवश्य कता अनुभव क गई। यह िवशेष रू प से युवा प्र वासी पीढ़ के अध्य यन के लए उपयोगी होगा। शोधपत्र ने सामाजक भेदभाव, नीय पूवग्र ह, सृितक अीकायता तथा मानसक तनाव जैसे मु को भी प्र मुखता से प्र ुत कया है। इस दृ ष्ट से सुझाव दया गया क प्र ावली म सामाजक ीकृित, ानीय समुदाय से संबंध, सृितक पहचान, मातृभाषा केप्र योग तथा भेदभाव के अनुभव से जुड़े प्र को शािमल कया जाए। इससे प्र वासी समुदाय क सृितक ित और सामाजक समावेशन का समग्र मूकन कया जा सकेगा। इसके अितरक्त कोिवड-19 महामार, युद्ध , राजनीितक संघष तथा अन्य संकट के दौरान प्र वासय क असुरक्ष ा और कठनाइय को ध्य ान म रखते हुए ास्थ्य , सामाजक सुरक्ष ा, आपदा प्र बंधन तथा संकट के समयप्र ाप्त सहायता से संबंधत प्र को भी प्र ावली म सलत करने का सुझाव दया गया। यह आयामप्र वासी समुदाय क संवेदनशील परितय को समझने म महत्त्व पूणभूिमका नभाएगा। अध्य यन से यह भी स्पष्ट हुआ क अंतरराष्ट य संगठन, पक्ष ीय समझौत तथा सरकार नीितय का प्र वासी जीवन पर प्रत्यक्ष प्र भाव पड़ता है। अतः प्र ावली मप्र वासय क नीितगत जागरू कता, सरकार योजनाओ क जानकार तथा संागत सहयोग के अनुभव को जानने के लए उपयुक्त प्र को सलत करने क अनुशंसा क गई। भारतीय अंतरराय प्र वासी श्र िमक: भू-राजनीितक परप्रेक्ष्य और समकालीन चुनौितय- नलन भारती और मुान कंवर

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 64 समग्र रू प से यह शोधपत्र प्र ावली के परष्क रण हेतु अंत उपयोगी सद्ध हुआ। इसके आधार परप्र ावली म आथक, कानूनी, शैक्ष क, सामाजक, सृितक, ास्थ्य एवं सुरक्ष ा संबंधी आयाम को ोफ़ेसर नलन भारती मानिवक और सामाजक िवान िवभाग आई.आई. ट. पटना मुान कंवर शोधाथ मानिवक और सामाजक िवान िवभाग आई.आई. ट. पटना अधक व्य वत रू प से समाहत करने का सुझावप्र ाप्त हुआ। इन सुझाव के समावेशन से प्र ावलीप्र वासी भारतीय समुदाय के बहुआयामी जीवन, अनुभव और चुनौितय का अधक व्य ापक एवंप्र ामाणक दावेजीकरण करने म सक्ष म होगी।प्रो. नलन भारती भारतीय सामाजक िवान और मानिवक केक्षेत्र म एक प्र ितत शक्ष ािवद् एवं शोधकत ह। वे वतमान म मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग, भारतीय प्र ौोगक संान (आई.आई.ट.) पटना म कायरत ह। उनका अकादिमकव्य त्व अंतवषयक दृ कोण, सामाजक इितहास, प्र वासन अध्य यन, संृित एवं समाज के अध्य यन से जुड़ा हुआ है।प्र ो. भारती ने िवशेष रू प से गरिमटया इितहास, भारतीयप्र वासन, औपनवेशक श्र म व्य वा और प्र वासी भारतीय समुदाय के अध्य यन म महत्त्व पूणरु च दखाई है। वे इितहास, समाजशास्त्र , सृितक अध्य यन और प्र वासी िवमश के बीच संवाद ािपत करने वाले िवान म अग्र णी ह। उनके शोध का कद्र भारतीय समुदाय क ऐितहासक ृितय, सृितक पहचान और वैक संदभ म भारतीयता के स्वरू प को समझना है। आई.आई.ट. पटना म रहते हुए उने मानिवक एवं सामाजक िवान को तकनीक शक्ष ा के व्य ापक परप्रेक्ष्य से जोड़ने का महत्त्व पूणकाय कया है। वे िवाथय और शोधाथय को आलोचनात्म क चतन, बहुिवषयक शोध दृ और भारतीय समाज क जटलताओ को समझने के लए प्रे रत करते ह। गरिमटया िवमश से संबंधत परचचओ और शोध परयोजनाओ म उनका योगदान िवशेष रू प से उेखनीय है। वे गरिमटया समुदाय के इितहास को केवल प्र वासन क घटना केरू प म नह, ब शोषण, संघष, सृितक पुननमण और अता नमण क प्र या के रू प म देखते ह। उनके अकादिमक प्र यास भारतीय प्र वासी इितहास को नए िवमश से जोड़ने क दशा म महत्त्व पूणभूिमका नभाते ह।मुान कंवर आई.आई.ट. पटना के मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग म शोधाथ ह। वे संान के उस अंतवषयक अकादिमक परवेश से जुड़ ह, जह समाज, अथव्य वा, संृित और मानव जीवन से जुड़े िविवध प्र पर आधुनक शोध पद्ध ितय के माध्य म से अध्य यन कया जाता है। मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग, आई.आई.ट. पटना िविभन्न क्षेत्र - अथशास्त्र , साहत्य , भाषािवान, समाजशास्त्र , मनोिवान एवं िवकास अध्य यन-म शोध को प्र ोाहत करता है। मुान कंवर का शोध काय सामाजक िवान के क्षेत्र म क द्र त है। उनके अकादिमक काय म घरलू सवक्ष ण (HOUSEHOLD SURVEY), बड़े पैमाने के आँकड़ का िवेषण (LARGE SCALE DATA ANALYSIS) तथा सकय उपकरण केप्र योग क िवशेष रु च दखाई देती है। वे सामाजक-आथक िवषय को अनुभवजन्य शोध पद्ध ितय के माध्य म से समझने काप्र यास कर रह ह। उने शोधाथ के रू प म आई.आई.ट. पटना के मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग से जुड़कर समकालीन सामाजक प्र के अध्य यन म योगदान दया है। उनका शोध दृ कोण डेटा- आधारत िवेषण और सामाजक वास्त िवकताओ क गहन समझ पर आधारत है। वे नई पीढ़ के उन शोधकतओ म ह जो सामाजक िवान को आधुनक शोध तकनीक के साथ जोड़ते हुए समाज क बदलती संरचनाओ और चुनौितय को समझने काप्र यास कर रहे ह।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 65 भवानी दयाल सासी : गरिमटया चेतना, सृितक अता और वैक भारतीयता के अग्र दूत - िवशाल कुमार भवानी दयाल सन्य ासी का नाम भारतीय प्र वासी इितहास, गरिमटया चेतना और वैक भारतीय अता के इितहास म अत्यं त सान के साथ लया जाता है। यद महात्म ा गधी ने दक्ष ण अका म सत्य ाग्र ह क राजनीितक चेतना का सूत्र पात कया, तो भवानी दयाल सन्य ासी ने उस चेतना को सृितक, सामाजक, भािषक और वैचारक आधार प्र दान कया। वे केवल एक समाज-सुधारक या राजनीितक कायकत नह थे, ब एक ऐसे दूरदश चतक थे जने प्र वासी भारतीय के जीवन को शक्ष ा, संगठन, भाषा, धम और साहत्य के माध्य म से नई दशा देने का काय कया। इस दृ ष्ट से उनका व्य क्तत्व गरिमटया इितहास के अध्य यन म एक कद्र य ान रखता है। उीसव शता के उत्त राद्ध और बीसव शता के पूवद्ध म जब लाख भारतीय गरिमटया अनुबंध के अंतगत मॉरशस, फजी, दक्ष ण अका, गुयाना, सूरनाम तथा त्र नदाद जैसे देश म भेजे गए, तब उनका संघष केवल आथक शोषण तक सीिमत नह था। वे अपनी भाषा, संृित, धामक पहचान और आत्म सान को बचाने क लड़ाई भी लड़ रहे थे। भवानी दयाल सन्य ासी ने इस संघष को गहराई से समझा और अनुभव कया। उने महसूस कया क यद प्र वासी भारतीय अपनी भाषा और सृितक ृितय से कट जाएंगे, तो उनका अस्तत्व केवल श्र िमक समुदाय के रू प म सीिमत रह जाएगा। इसलए उने भारतीयता के सृितक आधार को पुनसगठत करने का बीड़ा उठाया। उनका कायक्षेत्र अत्यं त व्य ापक था। उने दक्ष ण अका म हद, वैदक धम, भारतीय शक्ष ा और सामाजक संगठन के िवकास के लए उेखनीय काय कए। उने केवल भाषण नह दए, ब संाएँ ािपत क, पुस्त कालय का नमण कराया, धामक एवं सृितक कद्र िवकसत कए और प्र वासी समाज को संगठत करने का सततप्र यास कया। उनक पहल पर हदू समाज के लए सामुदायक भवन क ापना का िवचार सामने आया तथा ऐसे प्र चारक को आमंत्र त करने क बात कह गई जो प्रे म, सत्य और आत्म बलदान के आधार पर समाज को जोड़ सक । भवानी दयाल सन्य ासी का योगदान केवल सामाजक क्षेत्र तक सीिमत नह रहा। वे दक्ष ण अका के सावजनक जीवन म भी अत्यं तप्र भावशाली व्य क्तत्व के रू प म उभर। उ डरबन का COMMISSIONER OF OATHS नयुक्त कया गया तथा उनके सान म एक सड़क का नाम ' दयाल रोड ' रखा गया। आगे चलकर वे नेटाल इंडयन कग्रे स के अध्यक्ष नवचत हुए। महात्म ा गधी ारा ािपत इस संा के इितहास म यह एक ऐितहासक घटना थी, क पहली बार कसी हदू नेता ने इस पद को ग्र हण कया। उनके नेतृत्व म कग्रे स का पुनगठन हुआ, सदस्य ता काव्य ापक िवस्त ार हुआ और वृद्ध , िवधवाओ तथा अनाथ के काण के लए अनेक सामाजक योजनाएँ प्र ारम्भ क गईं । उनके जीवन का एक महत्त्व पूण पक्ष भारत औरप्र वासी भारतीय के बीच वैचारक सेतु का नमण था। दक्ष ण अका के प्र ितनध के रू प म भारत आकर उने गया त राजेन्द्र आश्र म का उद्घाटन कया, कग्रे स अधवेशन म प्र वासी भारतीय क समस्य ाओ को रखा तथा महात्म ा गधी, डॉ. राजेन्द्र प्र साद और अन्य राष्ट य नेताओ से संवाद ािपत कया। पृथक्क रण (SEGREGATION) संबंधी नीितय के िवरुद्ध भारत म जनमत तैयार करने म उनक भूिमका उेखनीय रह। साहत्य के क्षेत्र म भवानी दयाल सन्य ासी का योगदान उ एक िवशष्ट ान प्र दान करता है। वे महात्म ा गधी के आरंिभक जीवनीकार म माने जाते ह। उनक पुस्त क " सत्य ाग्र ह महात्म ा गधी " (1917) गधीजी के जीवन पर प्र ारंिभक महत्त्व पूण कृितय म से एक है। इसके अितरक्त " दक्ष ण अका म सत्य ाग्र ह का इितहास ", " दक्ष ण अका के मेर

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 66 अनुभव ", " हमार कारावास क कहानी ", " टसवाल म भारतवासी ", "नेटाली हदू ", " वैदक प्र ाथना " तथा िवशेष रू प से "प्र वासी क आत्म कथा " जैसी कृितयप्र वासी भारतीय इितहास क अमूल्य धरोहर ह। उनक आत्म कथा क भूिमका भारत के प्र थम रापित डॉ. राजेन्द्र प्र साद ने लखी थी, जो इस कृित के ऐितहासक महत्त्व को भी रखकत करती है। यद आज गरिमटया अध्य यन (GIRMITIYA STUDIES) एक स्व तंत्र अकादिमक अनुशासन केरू प म िवकसत हो रहा है, तो उसके वैचारक ोत म भवानी दयाल सन्य ासी क रचनाएँ अंत महत्त्व पूणान रखती ह। उने इितहास को केवल घटनाओ का क्र म नह माना, ब उसे मानवीय अनुभव, सृितक ृित और सामुदायक संघष के रू प म देखा। यह कारण है क उनक आत्म कथा और अन्य लेखन आज इितहासकार, समाजशाय, भाषािवद और प्र वासी अध्य यन के शोधकतओ के लए प्र ाथिमक ोत (PRIMARY SOURCES) का काय करते ह। आज, जब वैश्व ीकरण और तीव्र प्र वासन के कारण भारतीय समुदाय िवश्व के लगभग प्र ेक महाप म अपनी उपित दज करा चुका है, तब भवानी दयाल सन्य ासी का चतन और भी अधक प्र ासंगक हो उठता है। उने बहुत पहले ह यह समझ लया था क प्र वासी समाज क वास्त िवक श उसक आथक ित म नह, ब उसक भाषा, सृितक ृित, शक्ष ा, संगठन और आत्म सान म नहत है। यह िवचार आज प्र वासी अध्य यन, डायोरा िवमश और सृितक इितहास कप्र मुख अवधारणाओ के रू प म स्व ीकार कए जाते ह। इस प्र कार भवानी दयाल सन्य ासी केवल एक ऐितहासक व्य त्व नह, ब भारतीय प्र वासी चेतना के ऐसे नमता ह जने गरिमटया समाज को आत्म िवश्व ास, संगठन और सृितक पहचानप्र दान क। उनके िवचार आज भी वैश्व क भारतीय समाज को यह प्रे रणा देते ह क सृितक िवरासत और मानवीय मूल्य का संरक्ष ण ह कसी भी प्र वासी समुदाय क ायी श है। िवशाल कुमार सहायक प्र ाध्य ापक वल्ल भभाई पटेल कॉलेज, भभुआ (िबहार)डॉ. िवशाल कुमार ह साहत्य एवं संृित के क्षेत्र म सय युवा शक्ष ािवद् और साहत्य -संवेदनशील अध्य ापक ह। वे सरदार वल्ल भभाई पटेल महािवालय, भभुआ ( कैमूर, िबहार ) के ह िवभाग म सहायकप्र ाध्य ापक के रू प म कायरत ह। यह महािवालय क्षेत्र म उच्च शक्ष ा के एक महत्त्व पूण कद्र के रू प म ािपत है। डॉ. िवशाल कुमार का अकादिमक व्य त्व ह भाषा, साहत्य और सृितक अध्य यन के प्र ित उनक गहर प्र ितबद्ध ता को दशता है। अध्य ापन के साथ-साथ वे साहत्य क एवं सृितक गितिवधय के आयोजन म भी सय भूिमका नभाते ह। उने महािवालय म साहत्य और संृित के प्र ित िवाथय म रु च िवकसत करने के उेश्य से आयोजत ‘ कहत कबीर : एक सृितक हस्तक्षे प ’ जैसी पहल म महत्त्व पूण भूिमका नभाई है, जसका उेश्य भाषा, साहत्य , इितहास और संृित के प्र ित जागरू कता को बढ़ावा देना है। डॉ. िवशाल कुमार महािवालय क अकादिमक एवं सृितक गितिवधय से नरंतर जुड़े रहते ह। वे सरदार वल्ल भभाई पटेल महािवालय के पूव छात्र संगठन (ALUMNI ASSOCIATION) म सचव क भूिमका का भी नवहन कर चुके ह, जससे संान के िवकास और पूव छात्र को जोड़ने के प्र यास म उनका योगदान स्पष्ट होता है। ह साहत्य के अध्ये ता और शक्ष क के रू प म डॉ. िवशाल कुमार का काय िवाथय म साहत्य क चेतना, आलोचनात्म क दृ ष्ट और सृितक समझ िवकसत करने क दशा म महत्त्व पूणहै। वे परंपरा और आधुनकता के समन्व य के साथ ह भाषा एवं साहत्य के अध्य यन-अध्य ापन को नई ऊज प्र दान कर रहे ह। उनका अकादिमक एवं सृितक योगदान क्षेत्र ीय उच्च शक्ष ा के िवकास और ह के प्र सार क दृ ष्ट से उल्ले खनीय है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 67 प्र वासी भारतीय क सृितक नरंतरता और फ़जी म रामकथा का वतमान परदृश्य वीणा कुमार ‘प्र वासी भारितय क सृितक नरंतरता और फ़जी म रामकथा का वतमान परदृश्य ’ िवषय न केवल धामक दृ ष्ट से महत्त्व पूणहै, ब भारतीयप्र वासी इितहास, संृित और पहचान के अध्य यन म भी अत्यं त प्र ासंगक है। सनातन धम िवश्व के सबसे प्र ाचीन धम म से एक माना जाता है। यह केवल एक धामक व्य वा नह, ब जीवन जीने क एक समग्र पद्ध ित है। इसके मूल म सत्य , धम, करु णा, सहष्णु ता, आत्म ानुशासन और आध्य ात्म क िवकास क भावना नहत है। सनातन धम क िवशेषता इसक उदारता और समन्व यवाद दृ ष्ट है। यह मानता है क सत्य तक पहुँचने के अनेक माग हो सकते ह और िविभन्न धामक परंपराएँ अंततः एक ह परम सत्य क ओर ले जाती ह। इसी कारण सनातन धम ने समय-समय पर अनेक िवचारधाराओ और सृितक परंपराओ को आत्म सात कया है। फजी म सनातन धम का इितहास भारतीय गरिमटया मजदूर के आगमन से जुड़ा हुआ है। 14 मई 1879 को लयोनडास (LEONIDAS) नामक जहाज से भारतीय श्र िमक का पहला दल फजी पहुँचा।ये लोग िटश औपनवेशक शासन ारा बंधुआ श्र िमक के रू प म भारत से ले जाए गए थे। अधकश मजदूर उत्त र प्र देश और िबहार के ग्र ामीणक्षेत्र से आए थे. वे अपने गव, परवार और मातृभूिम को छोड़कर एक अात भिवष्य क ओर बढ़े थे। उनके सामने अनेक कठनाइय थ, परंतु वे अपने साथ अपनी भाषा, संृित, धामक िवश्व ास और परंपराएँ भी लेकर आए थे। फजी पहुँचने के बाद गरिमटया मजदूर को अत्यं त कठन परितय म काम करना पड़ा। बागान म लंबे समय तक श्र म, सामाजक अलगाव, आथक शोषण और सृितक चुनौितय का सामना करना उनक नयित बन गया।ऐसे कठन समय म सनातन धम उनके लए सबसे बड़ा सहारा बना। धम ने उ मानसक श, आत्म िवश्व ास और आशा प्र दान क। । रामायण, भगवता, भजन-कतन और हनुमान चालीसा जैसे धामक ग्रं थ और परंपराएँ उनके जीवन का अिभन्न हा बन गईं । गरिमटया मजदूर अपने साथ िविभन्न धामक परंपराएँ लेकर आए थे। उनम वैष्ण व, रामानंद, कबीरपंथी, सतनामी, दादूपंथी तथा अन्य संप्र दाय के अनुयायी शािमल थे। फजी क नई परितय म इन िविभन्न परंपराओ के बीच समन्व य ािपत हुआ और धीर-धीर एक व्य ापक सनातन धामक पहचान िवकसत हुई। जाितगत और क्षेत्र ीय भेदभाव, जो भारत म अपेक्ष ाकृत अधकप्र भावी थे, फजी म कमजोर पड़ने लगे। समुद्र यात्र ा और साझा संघष ने लोग म ‘ जहाजी भाई ’ और ‘ जहाजी बहन ’ क भावना को जन्म दया, जसने सामुदायक एकता को मजबूत कया। धामक आयोजन ने प्र वासी भारतीय समाज को संगठत करने म महत्त्व पूणभूिमका नभाई। रामायण मंडलय, संग सभाओ, कथा-प्र वचन औरत्य ोहार के माध्य म से भारतीय संृित का संरक्ष ण हुआ। दपावली, रामनवमी, होली, जन्म ाष्ट मी और नवरात्र जैसे पव न केवल धामक आा के प्र तीक बने, ब सामाजक एकता और सृितक नरंतरता के माध्य म भी बने। मंदर क ापना ने धामक और सामाजक जीवन को नई दशा प्र दान क। ये मंदर केवल पूजा के कद्र नह थे, ब शक्ष ा, संृित और सामुदायक संगठन के महत्त्व पूणसंान भी बने। बीसव शता के प्र ारंभ म फजी म सनातन धम के संगठनात्म क िवकास क प्र या तेज हुई। धामक नेताओ और प्र चारक ने भारतीय मूल के लोग म धामक चेतना और सृितक जागरू कता का प्र सार कया।सनातन धम सभा जैसी संाओ ने धामक शक्ष ा, सामाजक सुधार और सृितक संरक्ष ण केक्षेत्र म उेखनीय काय कया। इन संाओ ने नई पीढ़ को अपनी जड़ से जोड़ने और भारतीय सृितक िवरासत

अंत म कहा जा सकता है क फजी म सनातन धम का इितहास भारतीय गरिमटया मजदूर के संघष, ाग और सृितक दृ ढ़ता का इितहास है। उने िवपरत परितय म भी अपनी धामक आा को जीिवत रखा और उसे आने वाली पीढ़य तक पहुँचाया। सनातन धम ने उ आत्म बल, एकता और सृितक पहचान प्र दान क। इसलए फजी म सनातन धम क कहानी केवल एक धम क कहानी नह, ब मानव धैय, संघष और सृितक पुननमण क प्रे रणादायक गाथा है। SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 68 को सुरत रखने म महत्त्व पूणयोगदान दया। सनातन धम क सबसे बड़ उपल यह रह क उसने फजी के भारतीय समुदाय को अपनी पहचान बनाए रखने क श द। गरिमटया मजदूर के लए धम केवल पूजा-पाठ तक सीिमत नह था, ब वह उनके आत्म सान, संघष और अत्व का आधार था। धम ने उ यह िवास दलाया क कठन परितय म भी धैय, परश्र म और नैितक मू के माध्य म से जीवन को साथक बनाया जा सकता है। आज फजी म भारतीय मूल के लोग क सृितक और धामक पहचान म सनातन धम का महत्त्व पूणान है। मंदर, धामक संगठन, सृितक कायक्र म और पारंपरक उत्स व आज भी उस िवरासत को जीिवत रखे हुए ह, जसे गरिमटया पूवज अपने साथ भारत से लेकर आए थे।यह िवरासत केवल अतीत क ृित नह है, ब वतमान और भिवष्य क पीढ़य के लए प्रे रणा का ोत भी है। वीणा कुमार असट प्र ोफेसर साे कॉलेज मुंबईडॉ. वीणा कुमारी हन् द भाषा एवं साहत् य क अध् येता, शक्ष का और शोध-संलग् न वदु षी ह। वे मुंबई त साे कॉलेज (AUTONOMOUS), वले पाल (पूव), मुंबई के हन् द वभाग म असस् टट प्र ो. के रू प म कायरत ह। साे कॉलेज मुंबई वश्व वालय से संबद्ध एक प्र तत उच्च शक्ष ण संान है, जहाँ हन् द सहत कला, वान और वाणज् य के वभन्न वषय म स् नातक एवं स् नातकोत्त र स् तर पर अध् ययन- अध् यापन क व्य वा है। डॉ. वीणा कुमारी का अकादमक व्य क्तत् व हन् द साहत् य, भाषा शक्ष ण और सांस् कृतक अध् ययन के प्र त उनक गहरी प्र तबद्ध ता को अभव्यक्त करता है। अध् यापन के साथ- साथ वे हन् द साहत् य के ववध आयाम, समकालीन साहत् यक वमश और भाषा- संवधन से जुड़े काय म सय ह। उनका प्र यास हन् द को केवल अध् ययन का वषय न मानकर सामाजक संवाद, सांस् कृतक चेतना और भारतीय अस् मता क अभव्य क्त के माध् यम के रू प म ापत करना है। मुंबई जैसे बहु भाषी और बहु सांस् कृतक महानगर म हन् द के अध् ययन-अध् यापन से जुड़कर डॉ. वीणा कुमारी हन् द भाषा के प्र चार-प्र सार तथा वाथय म साहत् यक संवेदना वकसत करने का महत्त् वपूणकाय कर रही ह। वे साहत् य, संस् कृत और समाज के अंतसबंध को समझने वाली शक्ष का के रू प म वाथय को आलोचनात् मक दृ एवं रचनात् मक सोच के लए प्रे रत करती ह। हन् द वभाग, साे कॉलेज म उनक भूमका हन् द शक्ष ा और शोध परंपरा को सुदृ ढ़ करने क दशा म उल् लेखनीय है। उनका अकादमक योगदान हन् द भाषा एवं साहत् य के वस् तार तथा राीय स् तर पर हन् द के सांस् कृतक महत्त् व को रेखांकत करने म महत्त् वपूणहै

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 69 इस व्य ाान म वा कैप्ट न ओमप्र काश ने गरिमटया इितहास, उसक सृितक िवरासत, वतमान पीढ़ क जासाओ तथा भारत और िवश्व भर म बसे गरिमटया वंशज के बीच संबंध को पुनिपत करने क आवश्य कता पर िवार से िवचार प्र ुत कए। उने अपने िविभन्न गरिमटया देश के प्र वास के अनुभव का उेख करते हुए बताया क मॉरशस, फ़जी, सूरनाम, गुयाना और अन्य देश म आज भी भारतीय मूल के लोग अपनी भाषा, भोजन, लोकगीत और सृितक परंपराओ को जीिवत रखे हुए ह। उने उदाहरण देते हुए कहा क “ फुलौर ”, “ चोखा ” और “ फगुआ ” जैसे शब्द आज भी उन देश म प्र चलत ह, जबक भारत के अनेक क्षे म इनका प्र योग कम होता जा रहा है। यह तथ्य इस बात का प्र माण है क गरिमटया समुदाय ने अपनी सृितक ृितय को पीढ़य तक सुरक्ष त रखा है। कैप्ट न ओमप्र काश ने इस बात पर िवशेष बल दया क गरिमटया समुदाय पर िविभन्न देश म पयप्त शोध काय हुआ है, जसके माध्य म से वह के लोग को अपने पूवज के जहाज, प्र वास, श्र म जीवन और संघष क जानकार प्र ाप्त है। कतु एक महत्त्व पूणकमी यह रह क जन क्षे से ये लोग गए थे, िवशेष रू प से िबहार और पूव उत्त र प्र देश, वह इस इितहास पर अपेक्ष त ध्य ान नह दया गया। परणामस्वरू प भारत म आज भी बहुत कम लोग गरिमया इितहास और उसके महत्त्व से परचत ह। उने कहा क वतमान पीढ़ के गरिमटया वंशज अपने पूवज के मूल गव, भाषा, संृित, सामाजक परितय और प्र वास के कारण को जानना चाहते ह, कतु उनके पास इन प्र के संतोषजनक उत्त र उपलब्ध नह ह।व्य ाान म यहस्पष्ट कया गया क यह परयोजना केवल दावेज और अिभलेख के संकलन तक सीिमत नह है, ब लोग को उनक जड़ से जोड़ने का प्र यास है। गरिमटया इितहास और सृितक िवरासत - ओमप्र काश सह इसका उेश्य दुनया भर म बसे गरिमटया वंशज और उनके मूल ोत क्षे के बीच एक जीवंत संवाद ािपत करना है। वा ने कहा क गरिमटया समुदाय के साथ संबंध केवल औपचारक कूटनीित या पयटन तक सीिमत नह रहने चाहए, ब उ अपने पूवज क ृितय और सृितक िवरासत से पुनः जोड़ने का प्र यास होना चाहए। उने “ पीपल टू पीपल कनेक्ट ” क अवधारणा को रखकत करते हुए बताया क यह परयोजना भावनात्म क और सृितक पुनसबंध का माध्य म बन सकती है। वा ने गरिमटया व्य वा को सामान्य प्र वास से िभन्न बताते हुए कहा क यह औपनवेशक श्र मव्य वा का हा थी, जसम गरबी, छल, असमानता और शोषण क परितय शािमल थ। इसलए इस इितहास को ईमानदार से संरक्ष त औरप्र ुत कया जाना आवश्य क है। उने यह भी कहा क इस परयोजना का उेश्य कसी प्र कार क वैमनस्य ता उत्पन्न करना नह, ऐितहासक सत्य को संरक्ष त करना और उन अनुभव को सामने लाना है जो समय के साथ िवृत होते जा रहे ह। उने चेतावनी द क यद मौखक इितहास, लोकगीत, पारवारक कथाएँ और सृितक ृितय अभी संकलत नह क गईं , तो आने वाली पीढ़य अपने इितहास का एक महत्त्व पूणहा खो दगी। इसी कारण परयोजना के अंतगत भोजपुर भाषा, लोकगीत, भोजन संृित, रित-रवाज, महलाओ के गीत, प्र वास क ृितय तथा पारवारक इितहास के संरक्ष ण पर िवशेष बल दया गया है। वा के अनुसार यह केवल अकादिमक काय नह, ब सृितक न्य ाय क प्र या भी है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 70 बव्य ाान म परयोजना के व्य ापक उेश्य का भी उेख कया गया। इनम गरिमटया इितहास का दस्त ावेजीकरण, मौखक इितहास का संकलन, सृितक िवरासत का संरक्ष ण, डजटल अिभलेखागार का नमण, प्र वास मानचत्र तैयार करना, शोध एवं प्र काशन को प्र ोाहत करना तथा भारत और गरिमटया देश के बीच शैक्ष णक एवं सृितक सहयोग को बढ़ावा देना शािमल है। उने िवशेष रू प से इस बात पर बल दया क आधुनक तकनीक, कृत्र म बुद्ध मा, डजटल आकइव, वचुअल रयलट और डेटा िवज्ञ ान के माध्य म से गरिमटया िवरासत को नई पीढ़ तक प्र भावी रू प से पहुँचाया जा सकता है। अपने वक्तव्य के अंत म उने कहा क गरिमटया वंशज ने िबना संागत सहायता के भारतीय भाषा, संृित और परंपराओ को पीढ़य तक सुरक्ष त रखा। अब भारत क जेदार है क वह उनके इस योगदान का सान कर और उनक िवरासत को संरक्ष त करने म सय भूिमका नभाए। उने इस परयोजना को इितहास, संृित, तकनीक और मानवीय संबंध के संगम के रू प म देखते हुए इसे भारत और वैक गरिमटया समुदाय के बीच एक ायी सेतु बनाने क आवश्य कता पर बल दया। उने िवास व्यक्त कया क यह पहल आने वाली पीढ़य को अपनी जड़ से जोड़ने तथा गरिमटया इितहास को वैक स्त र पर उचत पहचान दलाने म महत्त्व पूणभूिमका नभाएगी। ओमप्र काश सहप्र ोजेक्ट नदेशक समु माग िवशेषज्ञ , लन्द न (यूके) ओमप्र काश सह अंतरराष्ट य समु परवहन (INTERNATIONAL SHIPPING) एवं वैक लॉजक्स के क्षेत्र के वरष्ठ िवशेषज्ञ ह। उ समु उोग म लगभग सत्र ह वष का व्य ापक अनुभव प्र ाप्त है, जसके दौरान उने जहाज संचालन, शप-ोकग, टकर एवं कागप्र बंधन, चाटर पाट प्र शासन, दाव के नस्त ारण तथा वैक समु परचालन के िविवध आयाम म उेखनीय योगदान दया है। वतमान म वे भारतीय श्र िमक प्र वास के सृितक इितहास से संबंधत एक महत्त्व पूण अनुसंधान परयोजना म परयोजना नदेशक के रू प म कायरत ह, जो उनके व्य ावसायक अनुभव और सामाजक- ऐितहासक अनुसंधान के मध्य सशक्त अंतःिवषय संबंध को अिभव्यक्त करता है। उने यूनाइटेड कगडम के प्र ितष्ठ त संान से समु अध्य यन एवं अंतरराष्ट य शपग म उच्च शक्ष ा प्र ाप्त क है। BILL OF LADING FRAUD िवषय पर कया गया उनका शोध समु व्य ापार, िवधकप्र याओ तथा अंतरराष्ट य वाणज्य के जटल पक्ष पर उनक गहन समझ का परचायक है। AFFINITY TANKERS तथा D’AMICO TANKERS जैसी प्र ितष्ठ त संाओ म वरष्ठ दाय का नवहन करते हुए उने वैक स्त र पर पोत संचालन, अनुबंध प्र बंधन, लागत नयंत्र ण तथा समु परचालन प्र णालय के प्र भावी प्र बंधन म िवशष्ट दक्ष ता अजत क है। समु उोग क व्य ावहारक िवशेषज्ञ ता, अंतरराष्ट य अनुभव,प्र शासनक क्ष मता तथा प्र वासन अध्य यन के प्र ित उनक अकादिमकप्र ितबद्ध ता उ अंतःिवषय शोध और नीित-आधारत िवमश के क्षेत्र म एक िवशष्ट पहचान प्र दान करती है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 71 ' पहला गरिमटया ' म अिभव्यक्त गरिमटया जीवन-सत्य - अधीर कुमार ' पहला गरिमटया ' महात्म ा गधी के दण- अका म पाए गए जीवनानुभव और उनकेव्य त्व िवकास क जटल प्र या को समग्र तः सामने लाने वाला कालजयी उपन्य ास है। इसके केन्द्र म गधी जी के वे बहुिवध अनुभव ह जो न केवल उनके ब वह रह रहे वृहत्त र गरिमटया समाज के साझा अनुभव ह। सार पीड़ाएँ, अपने देश और परवेश से िबछड़ने का दद, गोर लोग ारा द जानेवाली अमानवीय प्र ताड़नाएँ, अपमान और घृणा; जी-तोड़ मेहनत और ईमानदार और सहयोग क भावना के बावजूद लगातार िमलने वाला ितरार और अकारण शु-भाव; यह सब न केवल गधी जी के जीवन का सच बना ब यह समस्त भारतवंशय का जीवन-सत्य बना। गधी वह एक साल के गरिमट पर गए और फर भी वह के लोग क अमानुिषक जीवन-ितय को देखते-समझते हुए उने प्र ितरोध के तरके तलाश कए। अब उ पढ़े-लखे होने, कानून और अंग्रे जी भाषा, रहन-सहन का ान होने के बावजूद अनेक बार अपमान और हसा का सामना करना पड़ा। उने अपनी व्य गत चुनौितय और संघष के अपने देशवासय से जोड़कर देखा। जो बात उ सबसे अधक परशान करती थी वह यह क जब पढ़े-लखे होने, चीज ितय को जानने और समझने तथा इन सबका सामना करने म समथ होने के बावजूद उनपर इतना जुल्म कया जा रहा है तो उन गरब, अनपढ़ और पूर तरह से नरात भारतीय लोग पर ा बीतती होगी जब उ इ चुनौितय के बीच ज़ा रहना या मर जाना था। वे वह से नकल भी तो नह सकते थे। गरिमट के तहत लाए गए ये लोग बेहतर जीवन ितय क खोज म लालच या बहकावे म आकर यह पहुँचा दए गए थे। उनका भिवष्य पूर तरह से अन्ध कारमय था। गधी के लए गरिमटया लोग क जीवन-ितय आईने क तरह थ। उने इसी आईने म अपने व्य त्व को तराशा। तमाम व्य गत, पारवारक और सामाजक उलझन और जेदारय को कनार रखकर उने इन लोग से खुद को एकात्म कर लया। यह वह प्र या है जो गधी के अहम् को वयम् म बदलती है। यह वह प्र या है जो मोहनदास करमचंद गधी को महात्म ा गधी म बदल देती है। पीड़त क सेवा, मदद-सहायता और पीड़क से सतत संघष का रास्त ा उ गरिमटया समाज ने दया। उन भयानक परितय म भी गरिमटया समाज ने अपने पारम्प रक जीवन-मू को, संृित के आचार को, सामुदायक सहयोग को और आशावाद दृ कोण और आा को नह छोड़ा। गरिमटया जजिवषा ह गधी दशन का आधार बनी। वे सभी प्र यत्न जो दण-अका के प्र वासी भारतीय समुदाय के सहयोग और समथन से आकार पा रहे थे, गधी जी के लए नरन्त र कए जा रहेप्र योग क एक ली ृंखला क तरह ह। दण- अका के िविभन्न े म गरिमटया समुदाय के लए न्य ाय संगत मानवीचत अधकार के लए कए गए संघष ने ह उ सत्य ाग्र ह (PASSIVE RESISTANCE) का रास्त ा सुझाया। भेड़-बकरय क तरह जहाज म भरकर िवदेशी धरती पर पहुँचा दए गए इन लोग को पच साला एग्र ीमट के तहत काम म जोत दया जाता था। इस उपन्य ास म उन गरिमटया लोग के देश से बाहर ले जाए जाने, उपनवेश (नेटाल तथा अन्य दण अक इलाक) म उनके ऊपर गोर ारा कए जाने वाले अत्य ाचार, गरिमटया मजदूर क लाचार और बेबसी के इतने सजीव और हृ दय िवदारक दृ से यह उपन्य ास आंत भरा-पड़ा है। इस याा से गुजरते हुए पाठक के मन म यह सवाल बार-बार कधता है क मनुष्य ता, सभ्य ता, संृित और आधुनकता क इतनी बड़-बड़ बात करने वाले लोग ाथ होकर अपने ह जैसे कसी और मनुष्य के साथ इतना अमानुिषक बतव कैसे कर सकते ह।

हत और चुनौितय साझा ह। ऐसे परस्प र धम, जाित, शा और सम्पन्न ता के आधार पर और ेत्र और भाषा के आधार पर िवभाजत रहने पर कोई संघष करना संभव नह हो सकता। इन परस्प र िवभाजक रखाओ को िमटाकर उने सभी भारतवंशय को एक मत करने म सफलता पायी और उ हर लड़ाई म एकजुट रहने का रास्त ा दखाया। इस तरह उने उन िवकट परितय का सामना अहसक आोलन के आधार पर कया और सफल हुए। यद गरिमटया जीवन के इितहास और संघष क उस अिमत दास्त ान को जानना और समझना हो तो ' पहला गरिमटया ' एक अनवाय पाठ बन जाता है। SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 72 रंग भेद दृ अथवा जातीय ेष्ठ ता का दंभ मनुष्य को कस हद तक नीचे गरा सकता है इसक कोई सीमा नह। नेटाल तथा अन्य उपनवेश म बसे अंेज तथा अन्य यूरोपीय लोग क सबसे बड़ परशानी यह थी क वे वह के मूल बाशद से मनचाहा काम नह ले पा रहे थे। दास प्र था के अंत क घोषणा ने उ इस बात पर िववश कर दया था क वे भारत से गरिमटया मजदूर को अपने यह लाय। भारतीय मजदूर गन्ने तथा अन्य उष्ण कटबंधीय फसल के उादन म सद्ध हस्त होने के कारण उनके लए बहुत उपयोगी थे। भारत क तालीन औपनवेशक सरकार से िवशेष अनुमित के आधार पर उने मजदूर के भेजे जाने क ीकृित पायी। यह उनके लए बेहद फायदेमंद सािबत हुआ। इसके बावजूद वे गरिमटया मजदूर को उनका न्य ायोचत अधकार देना तो दूर उ आदमी मानने तक को तैयार नह थे। गधी जी ने सबसे पहले वह के भारतीय ापार वग और गरिमटया समुदाय के बीच क खाई को िमटाया/ पाट दया। उने इ यह समझाने म सफलता पायी क भारतीय ापारय के और गरिमटया लोग के अधीर कुमारप्र ोफेसर ह िवभाग, पं.ल.मो.ामी परसर, ऋिषकेश ी देव सुमन उत्त राखण्ड िवश्व िवालय उत्त राखण्ड - 249201प्रो. अधीर कुमार ह साहत्य के प्र ितत अध्ये ता, शक्ष क और शोध-मागदशक ह। वे ह िवभाग, पंडत ललत मोहन शम परसर, ऋिषकेश, ी देव सुमन उत्त राखण्ड िवश्व िवालय म प्र ो. के पद पर कायरत ह। उच्च शक्ष ा के क्षेत्र म दघ अनुभव रखने वाले प्र ो. अधीर कुमार ने ह भाषा एवं साहत्य के अध्य यन-अध्य ापन, शोध एवं अकादिमक िवार म महत्त्व पूणयोगदान दया है। उनका अकादिमक व्य त्व ह साहत्य क िविवध िवधाओ, साहत्य क आलोचना, आधुनक ह िवमश और सृितक अध्य यन से जुड़ा हुआ है। वे साहत्य को केवल सदयबोध क अिभव्य न मानकर समाज, संृित और मानवीय चेतना के िवकास का महत्त्व पूणमाध्य म मानते ह। उनके अध्य ापन और शोध काय म भारतीय साहत्य क परंपरा, समकालीन साहत्य क प्र वृत्त य तथा सामाजक सरोकार क स्पष्ट उपित दखाई देती है।प्र ो. अधीर कुमार ने अनेक शोधाथय का मागदशन करते हुए ह साहत्य के शोध क्षेत्र को समृद्ध कया है। वे राष्ट य एवं अंतरराष्ट य संगोय, व्य ाान और अकादिमक परचचओ म सय सहभागता करते रहे ह। उनके शोध-पत्र और अकादिमक लेख ह साहत्य के िविवध प्र पर गंभीर िवमश प्र ुत करते ह।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 73 भाषा, संृित और प्र वासी ृित- पंचानन मोहंती िवषय िवशेषज्ञ का परचयप्र ो. पंचानन मोहंती एक प्र ितत भाषावैानक और पूव प्र ो. ह, जो हैदराबाद िवश्व िवालय से जुड़े रहे ह। उनका अकादिमक योगदान भाषा, संृित, पहचान, बहुभािषकता और प्र वासी अध्य यन के गहन अंतसबंध को समझने म िवशेष महत्त्व रखता है।प्र ुत सााार म वे इस क य प्रश्न पर िवचार करते ह क प्र वासन केवल ान का परवतन नह है, ब भाषा, सृितक ृित, सामाजक आचरण और सामुदायक पहचान के पुनगठन कप्र या भी है। वे यह स्पष्ट करते ह क प्र वासी समुदाय को समझने के लए भाषा को अलग से नह, ब संृित और ृित के साथ जोड़कर देखना चाहए। भारतीय लेबर माइग्रे शन, डायस्प ोरा अध्य यन और गरिमटया अनुभव के संदभ म उनकादृ ष्ट कोण अंत उपयोगी है, क यह प्र वास को भाषाई परवतन और सृितक नरंतरता क संयुक्तप्र या के रू प म सामने लाता है।प्रश्न 1: प्र वासी समुदाय क पहचान को संरत करने म भाषा कतनी महत्त्व पूण है? भाषा प्र वासी समुदाय क पहचान का सबसे महत्त्व पूण आधार है। जब मनुष्य एक ान से दूसर ान पर जाता है, तो वह केवल अपना भौगोलक परवेश नह बदलता, ब अपने साथ भाषा, संृित और ृित भी ले जाता है। भाषा उसके संबंध, िवचार, संार और सामाजक व्य वहार को जीिवत रखती है। इसलए प्र वासी समुदाय क पहचान को समझने के लए यह देखना आवश्य क है क भाषा कस तरह बचती है, कस तरह बदलती है और कस रू प म अगली पीढ़य तक पहुँचती है।प्रश्न 2: प्र वासन के बाद भाषा और संृित पर ाप्र भाव पड़ता है?प्र वासन के बाद भाषा और संृित दोन म परवतन होना स्व ाभािवक है। नया सामाजक परवेश, नई जीवन-शैली, नए संबंध और नई आवश्य कताएँ भाषा को प्र भािवत करती ह। लोग ानीय समाज क भाषा के शब्द , संबोधन और अिभव्य क्त य अपनाने लगते ह। इसके साथ ह अपनी पुरानी भािषक और सृितक आदत को भी कुछ हद तक बनाए रखने का प्र यास करते ह। परणामस्वरू प भाषा शुद्ध और र रू प म नह रहती, ब िमत और गितशील हो जाती है।प्रश्न 3: ा प्र वासी समुदाय म िमत या संकर भािषक रू प बनते ह? ह, प्र वासी समाज म संकर भािषक रू प बनना एक सामान्य प्र या है। जब अलग-अलग भाषाएँ और संृितय संपक म आती ह, तो वे एक-दूसर से शब्द , मुहावर, संबोधन और अिभव्य क्त य ग्र हण करती ह। इससे नई भािषक संरचनाएँ बनती ह। यह परवतन केवल भाषा तक सीिमत नह रहता, ब सामाजक संबंध, पारवारक संरचनाओ और सृितक व्य वहार पर भी असर डालता है।प्रश्न 4: भाषा और सृितक ृित के बीच ा संबंध है? भाषा और सृितक ृित के बीच गहरा और अिवभाज्य संबंध है। भाषा के िबना संृित क कल्प ना नह क जा सकती और संृित के िबना भाषा का सामाजक अथ अधूरा रह जाता है। मनुष्य जस भाषा म बोलता है, उसी म उसक ृितय, उसके संबंध, उसके संार और उसके अनुभव बसते ह। इसलए जब कोई समुदाय अपनी भाषा को बचाए रखता है, तो वह केवल शब्द नह बचाता, ब अपनी ृित और पहचान भी बचाता है।प्रश्न 5: ा आप इस संबंध को कुछ उदाहरण से समझा सकते ह? ह, र के संबोधन इसका अा उदाहरण ह। भारत के िविभन्न े म एक ह संबंध के लए अलग-अलग शब्द का प्र योग होता है, जैसे “ चाचा ”, “ मामा ” या अन्य पारवारक संबोधन। इन शब्द के पीछे केवल भाषाई िविवधता नह, ब सृितक िभन्न ता भी छपी होती है। इससे स्पष्ट होता है क भाषा केवल बोलचाल का साधन नह, ब सामाजक संरचना और सृितक जीवन का अंग है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 74प्रश्न 6: प्र वासन और डायोरा म ा अंतर है?प्र वासन और डायोरा म अंतर समझना आवश्य क है। हर प्र वासी समुदाय डायोरा नह होता। डायोरा केवल बाहर चले जाने का नाम नह है, ब दूरस्थ समाज म सामुदायक और सृितक पुनगठन क प्र या भी है। इसम भाषा, संृित और सामूहक ृित क भूिमका बहुत बड़ होती है। इसलए डायोरा अध्य यन म स्थ ानतरण के साथ- साथ नरंतरता और परवतन दोन को ध्य ान म रखना चाहए।प्रश्न 7: ा प्र वासन के साथ भाषा म परवतन अपरहाय है? ह, प्र वासन के साथ भाषा म परवतन लगभग अनवाय होता है। नई जगह पर लोग नए शब्द सीखते ह, नई वस्तु ओ के नाम अपनाते ह और नए सामाजक संदभ के अनुसार बोलने लगते ह। आधुनक जीवन म टेलीफोन, कंूटर, बस, टेन, शट, पट जैसे शब्द इसके उदाहरण ह। भाषा जीवंत होती है, इसलए वह समय, समाज और परस्थ ित के अनुसार बदलती रहती है।प्रश्न 8: मातृभाषा और मातृभूिम का प्र वासी संदभ म ा अथ बदल जाता है?प्र वासी संदभ म मातृभाषा और मातृभूिम क अवधारणाएँ जटल हो जाती ह। पहली पीढ़ इ अपेाकृत स्थ र रू प म याद रखती है, लेकन बाद क पीढ़य म ये संबंध बदल जाते ह। नई पीढ़यस्थ ानीय भाषा, वैक भाषा और िमश्र त भािषकव्य वहार क ओर झु क सकती ह। फर भी, भीतर कह न कह मातृभाषा और मातृभूिम क ृित जीिवत रहती है, भले ह उसका रू प बदल जाए।प्रश्न 9: भाषा परवतन संृित परवतन को कैसे जन्म देता है? जब भाषा बदलती है, तो उसके साथ सोचने का ढंग, सामाजक व्य वहार और सृितक आदत भी बदलती ह। नए शब्द के साथ नए अथ आते ह, और नए अथ के साथ नई जीवन-शैलय बनती ह। इसप्र कार भाषा और संृित एक-दूसर को प्र भािवत करती ह। इसलए भाषा परवतन को केवल शाब्द क परवतन न मानकर सृितक रू पतरण के रू प म देखना चाहए।प्रश्न 10: शोधकत इस िवषय का अध्य यन कैसे कर ? शोधकत को भाषा, संृित, प्र वासन और पहचान के संबंध को बहुत सूक्ष्म ता से देखना चाहए। उसे केवल पुस्त कय ान पर नभर नह रहना चाहए, ब सामाजक व्य वहार, पारवारक संरचना,स्थ ानीय प्र योग और सामुदायक अनुभव का भी अध्य यन करना चाहए। भाषाई परवतन को समझने के लए संदभ, उदाहरण और ऐितहासक परस्थ ितय सभी महत्त्व पूण ह।प्रश्न 11: ा हद को भारतीय भाषाई िविवधता के समतुल्य मानना उचत है? भारत क भाषाई स्थ ित अंत िविवध है, इसलए कसी एक भाषा को सभी संदभ म क य या समतुल्य मानना उचत नह है। हर ेत्र क अपनी भाषाई परंपरा, सामाजक ृित और सृितक वास्त िवकता होती है। इसलए भाषा को राजनीितक नार क तरह नह, ब सृितक यथाथ क तरह समझना चाहए।प्रश्न 12: युवा शोधकतओ के लए आपका ा संदेश है? युवा शोधकतओ को चाहए क वे संृित को एक िवशाल और बहुस्त रय ेत्र के रू प म देख, जसम भाषा का स्थ ान क य है। उ शब्द , संबोधन,स्थ ानीय प्र योग, भािषक िमश्र ण और सामुदायक ृितय पर ध्य ान देना चाहए। अा शोध वह है जो बारक अवलोकन, संदभ-समझ और अनुभव क गहराई के साथ कया जाए।प्रश्न 13: प्र वासी समुदाय के अध्य यन म बहुभािषकता को कैसे देखा जाना चाहए ? बहुभािषकता प्र वासी समुदाय क एक प्र ाकृितक और महत्त्व पूण िवशेषता है। प्र वासी लोग अक्स र एक साथ कई भािषक संसार म जीते ह-अपनी िवरासत क भाषा, नए समाज क भाषा और कभी- कभी वैक भाषा। इससे उनक पहचान जटल होती है, लेकन समृद्ध भी बनती है। बहुभािषकता

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 75 को समा नह, ब सृितक अनुकूलन और रचनात्म कता के रू प म देखना चाहए।प्रश्न 14: भाषा और संृित को अलग-अलग करके देखना कठन है? भाषा और संृित मानव जीवन म इतने गहर जुड़े ह क उ पूर तरह अलग नह कया जा सकता। भाषा के भीतर संृित रहती है और संृित के भीतर भाषा। कसी समुदाय के रित-रवाज, संबोधन,व्य वहार, ृितय और प्र तीकात्म क संसार भाषा के माध्य म से ह अिभव्यक्त होते ह। इसलए इन दोन को संयुक्त रू प म पढ़ना ह उचत दृ है।प्र मुख नष्क ष भाषा प्र वासी पहचान का सबसे सशक्त आधार है।प्र वासन के साथ भाषा और संृित दोन म परवतन होता है। संकर भािषक रू प प्र वासी समाज क ाभािवक िवशेषता ह। भाषा और सृितक ृित एक-दूसर से गहराई से जुड़ ह। पारवारक संबोधन सृितक संरचना को समझने का महत्त्व पूण साधन ह। डायोरा और सामान्य प्र वासन म वैचारक अंतर है।प्र वासन के बाद भािषक परवतन अपरहाय है। नई शावली भाषा क जीवंतता को दखाती है। मातृभाषा और मातृभूिम क ृितय प्र वासी समाज म रू पतरत हो जाती ह। भाषा परवतन संृित परवतन को भी जन्म देता है। भारतीय भाषाई िविवधता को ध्य ान म रखकर ह अध्य यन करना चाहए। शोध म सूक्ष्म अवलोकन और संदभ-समझ आवश्य क है। बहुभािषकता प्र वासी जीवन क बाधा नह, उसक रचनात्म क शक्त है। भाषा और संृित को अलग करके नह, एक संयुक्त सृितक प्र या के रू प म समझना चाहए।प्र ो. पंचानन मोहंती सेवानवृत्त प्र ो. हैदराबाद िवश्व िवालय प्र ो. पंचानन मोहंती से डॉ. रु च सह और िप्र यदश गौतम क बातचीत

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 76 गरिमटया इितहास का पुनपठ - आशुतोष कुमार िवषय िवशेषज्ञ का परचयप्र ो. आशुतोष कुमार, बनारस हू िवश्व िवद्य ालय के सामाजक िवज्ञ ान संकाय के इितहास िवभाग म प्र ो. ह। उनका शोध आधुनक दक्ष ण एशया, सबाल्ट न अध्य यन, भारतीय प्र वासी इितहास, अनुबंधत श्र म (INDENTURED LABOUR), श्र म प्र वासन, खाद्य इितहास, ास्थ्य एवं चका इितहास, कानून और श्र म, सैन्य इितहास तथा जाित एवं जडर अध्य यन जैसे िविवध क्षेत्र तक िवस्तृ त है। उनके शोध का िवशेष योगदान उत्त र भारत से गरिमटयाप्र वासन, अनुबंधत श्र म व्य वा क कानूनी संरचना, श्र िमक क एजसी तथा औपनवेशक शासन के अंतवरोध को समझने म रहा है। वे इितहास को केवल शासकय अिभलेख के आधार पर नह, ब साधारण श्र िमक, य, ानीय समाज और सृितक ृितय के दृ ष्ट कोण से पढ़ने पर बल देते ह। इसी कारण उनका शोध गरिमटया इितहास को एक नए वैचारक परप्रेक्ष्य म प्रस्तु त करता है।प्रश्न –1 सर, आपका अधकश शोध 1830–1920 के बीच उत्त र भारत से हुए गरिमटया (इंडटड)प्र वासन पर क त है। सबसे पहले, समकालीन पाठक के लए आप गरिमटया प्र णाली को कैसे समझाएँगे ? यह दासत्व (SLAVERY) से कन तरक म अलग थी, और कन महत्व पूण समानताओ को आप देखते ह? गरिमटया व्य वा को समझने के लए उसे केवल दासप्र था का िवस्त ार मान लेना पयप्त नह है। दासप्र था के उूलन के बाद िटश सााज्य के सामने सबसे बड़ चुनौती अपने उपनवेश म श्र म क उपलब्ध ता सुनत करना था। कैरिबयन, मॉरशस, फजी, गुयाना, त्र नदाद तथा अन्य उपनवेश म दास क मु के बाद बागान मश्र िमक का गंभीर अभाव उत्पन्न हो गया। इस संकट से उबरने के लए िटश शासन ने भारत क िवशाल जनसंा को संभािवत श्र म-ोत के रू प म देखा। वे स्पष्ट करते ह क दासप्र था और गरिमटयाव्य वा म सबसे महत्त्व पूण अंतर अनुबंध (CONTRACT) का था। गरिमटया श्र िमक एक नत अवध के लए अनुबंध के अंतगत िवदेश जाते थे, जबक दास क ित संपत्त (PROPERTY) के समान थी। यद्य िप व्य वहार म अनेक प्र कार के शोषण और दमन मौजूद थे, फर भी अनुबंध व्य वा ने कुछ कानूनी संभावनाएँ और सीिमत अधकार उपलब्ध कराए, ज श्र िमक अपने पक्ष म प्र योग भी करते थे। इस कारण गरिमटया व्य वा को केवल दासप्र था का दूसरा नाम कहना ऐितहासक जटलताओ क उपेक्ष ा होगी।प्रश्न –2 िबहार, पूव उत्त र प्र देश और पड़ोसी ेत्र से बड़े पैमाने पर प्र वासन के आथक, सामाजक और राजनीितक कारण ा थे ? आथक कारण म जनसंा-सघनता के साथ छोटे और अपयप्त ज़मीने, कम कृिष उपज, तथा ायी जमीनदार (PERMANENT SETTLEMENT)व्य वा के कारण कृषक क जमीन-ािमत्व क कमी और भार कर-योगदान का दबाव प्र मुख थे; परणामतः परवार के सदस्य कृिष के बाहर रोजी तलाशने को मजबूर हुए. सामाजक-संृितक कारण म जाित-प्र थाएँ, अंतर-जात िववाह पर कठोर नषेध, िवधवाओ और छेद-छूटे/अपराधत तबक के प्र ित अपमान जैसे तंत्र शािमल थे; कई महलाओ और दलत के लए इंडोर एक “ नकास ार ” (ESCAPE HATCH) बन गया. राजनीितक/ संचार पहलू के रू प म यह भी क उत्त र भारत से आंतरक रू प से लोग क आवागमन- परंपरा थी (सेना, शहर म रोज़गार आद ) और लौटकर बने रूटस/ वापस आए मजदूर ने जानकार फैलाकर िवदेश जाने का ज्ञ ान लोक-स्त र पर दया, इसलए लोग पूर अनिभज्ञ ता म नह थे— उनके पास गंतव्य और िवक के संबंध मप्र ाथिमक जानकार थी.प्रश्न –3 मजदूर के पत्र ा बतलाते ह जो औपनवेशक अिभलेख नह बताते ?

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 77श्र िमक के अपने पत्र सीधे उनक नजी अनुभूितय, शकायत, घरलू संबंध, भाषा-िवशेष (स्थ ानीय भोजपुर/ेत्र ीय शावली) और भावनात्म क तार- तनाव उजागर करते ह; ये दस्त ावेज़ औपचारक सरकार रपोट से िभन्न , आत्म -प्र ितपादत आवाज़ ह जो सापन के लए भाषा तथा शैलीगत सूक्ष्म ताओ से पहचानी जा सकती ह. पत्र और याचकाएँ यह भी दखाते ह क श्र िमक के पास एजसी थी—वे वेतन कटौती, बदसलूक, यौन हसा व अन्य समाओ के बार म गवनर/ मजस्ट े ट से सीधे शकायत कर रहे थे—जो सरकार रपोट म अक्स र तटस्थ या प्र शासकय परप्रेक्ष्य से झकती सीिमत जानकार के िवपरत एक प्र थम-हाथ दृ देती हप्रश्न –4 : गरिमटया इितहास के अध्य यन म ी- अनुभव (WOMEN'S EXPERIENCE) को कसप्र कार देखा जाना चाहए ? गरिमटया इितहास का प्र ारक लेखन मुख्य तः पुरु ष श्र िमक के अनुभव पर क त रहा है। इसका एक कारण यह भी था क उपलब्ध अिभलेख का अधकश भाग औपनवेशक प्र शासन ारा तैयार कया गया था, जनका उेश्य श्र म-प्र बंधन था, न क य के सामाजक जीवन का दस्त ावेजीकरण। परणामस्वरू प गरिमटया य के अनुभव लंबे समय तक इितहास-लेखन के हाशए पर रहे। वतमान समय म इितहासलेखन क प्र वृय म परवतन आया है। अब इितहासकार केवल यह नह पूछते क कतने श्र िमक िवदेश गए, ब यह भी जानने का प्र यास करते ह क उन य ने िवस्थ ापन,श्र म, परवार, मातृत्व , हसा और सृितक पुननमण जैसी परस्थ ितय का सामना कस प्र कार कया। इस दृ से गरिमटया ी केवल पीड़ता नह, ब नए सामाजक परवेश का नमण करने वाली सय ऐितहासक श भी है। गरिमटया समाज म य क संख्य ा अपेाकृत कम होने के कारण उनके सामाजक संबंध, वैवाहक संरचना तथा पारवारक जीवन म उेखनीय परवतन दखाई देते ह। इन परवतन को केवल नैितक दृ से नह, ब औपनवेशकश्र म व्य वस्थ ा, जनसख्य कय असंतुलन और सामाजक पुनगठन के व्य ापक संदभ म समझना चाहए। इसीलए ी-अनुभव गरिमटया इितहास के अध्य यन का एक अनवाय आयाम बन चुका है।प्रश्न –5 : ा गरिमटया समाज म पारंपरक भारतीय सामाजक संरचना यथावत बनी रह या उसम परवतन हुए?प्र वासन केवल भौगोलक परवतन नह होता; वह सामाजक संरचनाओ का भी पुननमण करता है। भारत से जब िविभन्न ेत्र , भाषाओ, जाितय और धामक समुदाय के लोग एक साथ उपनवेश म पहुँचे, तो उनक पारंपरक सामाजक संरचनाएँ पूववत् नह रह सक। बागान म श्र म क परस्थ ितय सभी के लए समान थ। वह व्य क पहचान उसक जाित क अपेा उसके श्र िमक होने से अधक नधरत होती थी। इससे भारतीय समाज क अनेक परंपरागत सीमाएँ शथल हुईं । भोजन, आवास, श्र म और सामाजकव्य वहार के स्त र पर ऐसे परवतन दखाई देते ह जो भारत म तालीन परस्थ ितय म संभव नह थे। हालक इसका अथ यह नह क जाित या सृितक पहचान पूर तरह समाप्त हो गई। अनेक सृितक परंपराएँ, धामक िवास, भाषाएँ और पारवारक संार नए परवेश म भी जीिवत रहे, कतु उनका स्वरू प परवतत हो गया। इसलए गरिमटया समाज को भारतीय समाज क प्र ितकृित नह, ब भारतीय परंपराओ और औपनवेशक परस्थ ितय के अंतःसंवाद से नमत एक नवीन सामाजक संरचना के रू प म देखा जाना चाहए।प्रश्न -5: समुद्र पार करने से ा जाित-पदानुक्र म कम हुए या पुनः उादत हुए ? यात्र ा और जहाज़/ टेशन क सामूहक जीवन-प्र णाली (साथ रहना, साथ खाना, साथ काम करना) पारंपरक जाित-िवभाजन को कठन बनाती थी और ऐतराजजनक रू प से एक अस्थ ायी समतावाद (EGALITARIAN) व्य वस्थ ा उत्पन्न हुई; कई मामल म उच्च और नम्न जाितय के लोग समान श्रे णी “ कूली/ लैबर ” बन कर सामूहक भूिमका नभाते थे. फर भी दघकालक या पोस्ट ‑इंडोर संपक म—

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 78 िवशेषकर लौटकर गव या भारत‑जैसे प्र भाव वालेक्षेत्र (MAURITIUS इत्य ाद ) म—जाितगत पहचान मन म बनी रह और िमशनर/ ानीय भारतीयप्र भाव के कारण जातीय भेद पुनः सय हुए; अतः यात्र ा ने अायी रू प से कमजोर कया पर पुनप्र त्य य संभव हुआप्रश्न –6 : गरिमटया इितहास के अध्य यन म अिभलेखीय ोत (ARCHIVAL SOURCES) का ा महत्त्व है? गरिमटया इितहास का सबसे महत्त्व पूण आधार अिभलेखीय ोत ह। औपनवेशक शासन ने श्र िमक क भत, अनुबंध, परवहन, ास्थ्य , ायक मामल और प्र शासनक नयंत्र ण से संबंधत िवस्तृ त अिभलेख तैयार कए। ये दस्त ावेज़ इितहासकार के लए अत्यं त मूल्य वान ोत ह, क इनके माध्य म से श्र िमक के जीवन क अनेक परत उद्घाटत होती ह। कु इन ोत का उपयोग अत्यं त सावधानी से कया जाना चाहए। अधकश अिभलेख औपनवेशक अधकारय ारा तैयार कए गए ह; इसलए उनम सा का दृ कोण ाभािवक रू प से िवद्य मान है। यद इितहासकार केवल सरकार अिभलेख पर नभर रहेगा, तो श्र िमक क वास्त िवक आवाज़ दब सकती है। इसी कारण अिभलेखीय सामी को पत्र , आत्म कथाओ, ानीय समाचारपत्र , ायक अिभलेख, मौखक इितहास और सृितक ोत के साथ पढ़ना आवश्य क है। िविभन्न ोत का तुलनात्म क अध्य यन इितहास को अधक संतुलत और िवश्व सनीय बनाता है।प्रश्न –7 : ा मौखक इितहास (ORAL HISTORY) गरिमटया अध्य यन म नई संभावनाएँ प्र ुत करता है? गरिमटया इितहास केवल सरकार दस्त ावेज़ म सुरक्ष त नह है; उसका एक बड़ा हा ृितय, पारवारक परंपराओ और लोक-सृितक अिभव्य य म भी जीिवत है। यह कारण है क मौखक इितहास आज गरिमटया अध्य यन क एक अत्यं त महत्त्व पूण शोध-पद्ध ित बन चुका है।प्र वासी समुदाय म पीढ़-दर-पीढ़ संजोई गई ृितय, लोकगीत, पारवारक कथाएँ, धामक अनुान और ानीय परंपराएँ इितहास के ऐसे आयाम को सामने लाती ह, जनका उेख औपनवेशक अिभलेख म नह िमलता। ये ोत हम यह समझने म सहायता करते ह क प्र वासी भारतीय ने अपने अतीत को कस प्र कार याद रखा और नई परितय म अपनी सृितक पहचान का नमण कैसे कया। यद्य िप मौखक ोत का उपयोग करते समय इितहासकार को आलोचनात्म क दृ अपनानी चाहए, फर भी वे इितहास के मानवीय पक्ष को समझने के लए अत्यं त आवश्य क ह। अिभलेख और ृित-दोन के समन्व य से ह गरिमटया इितहास का अधक व्य ापक और संतुलत पुननमण संभव है।प्रश्न –8 : गरिमटया इितहास के अध्य यन म अंतवषयी (INTERDISCIPLINARY) दृ कोण क आवश्य कता है? गरिमटया इितहास केवल राजनीितक अथवा आथक इितहास का िवषय नह है। इसम समाजशास्त्र , मानवशास्त्र , प्र वासन अध्य यन, िवध अध्य यन, साहत्य , भाषािवान, सृितक अध्य यन और जडर अध्य यन जैसे अनेक अनुशासन का योगदान आवश्य क है। यद इितहासकार केवल प्र शासनक दस्त ावेज़ तक सीिमत रहेगा, तो वह प्र वासी समाज क सृितक चेतना, भाषायी परवतन, धामक व्य वहार, पारवारक संरचना तथा सामुदायक ृितय को समझ नह पाएगा। इसी प्र कार यद केवल साहत्य क ोत पर नभर रहा जाए, तो आथक और राजनीितक संरचनाओ का समुचत िवेषण संभव नह होगा। अतः गरिमटया अध्य यन का भिवष्य अंतवषयी शोध-पद्ध ित म नहत है, जह िविभन्न अनुशासन के बीच संवाद ािपत कर इितहास क अधकव्य ापक व्य ाा क जा सके।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 79प्रश्न –9 : उत्त र भारत से गरिमटया प्र वासन को समझने के लए कन ऐितहासक परितय कोध्य ान म रखना चाहए ? उत्त र भारत से गरिमटया प्र वासन को केवल आथक संकट का परणाम मान लेना इितहास क जटलता को सरल बना देना होगा। उन्न ीसव शता का उत्त र भारत औपनवेशक भूिम-राजस्व नीितय, अकाल,ग्र ामीण नधनता, ऋणग्रस्त ता तथा सामाजक असुरक्ष ा से प्र भािवत था। इन परितय ने बड़ संा म ग्र ामीण आबाद को वैकक आजीिवका क तलाश के लए प्रे रत कया। औपनवेशक प्र शासन ने इसी सामाजक-आथक संकट का उपयोग करते हुए भत एजसय के माध्य म से श्र िमक को अनुबंधत श्र म प्र णाली म शािमल कया। कतु यह भी ध्य ान रखना चाहए क सभी प्र वासी एक जैसी परितय म िवदेश नह गए। कुछ लोग ने मजबूर म यह माग अपनाया, जबक कुछ ने इसे बेहतर जीवन क संभावना केरू प म देखा। इसलए गरिमटया प्र वासन को एकरखीय दृ से नह, ब िविभन्न सामाजक, आथक और मनोवैानक कारक के समन्व य से समझना चाहए। इितहासकार का दायत्व केवल यह बताना नह है क लोग गए, ब यह भी समझना है क उने प्र वासन को स्व यं कस रू प म अनुभव कया और नए समाज म अपने जीवन का पुननमण कैसे कया।प्रश्न –10 : बाबा रामचन्द्र और गरिमटया अनुभव के बीच कस प्र कार का संबंध ािपत कया जा सकता है? बाबा रामचन्द्र भारतीय कसान आंदोलन के इितहास म एक अत्यं त महत्त्व पूण व्य त्व ह। उनके जीवन का गरिमटया अनुभव उत्त र भारत के कसान आंदोलन को समझने के लए िवशेष महत्त्व रखता है। िवदेश म अनुबंधत श्र म क कठोर परितय का प्रत्यक्ष अनुभव उ औपनवेशक शोषण क वास्त िवकता से परचत कराता है। भारत लौटने के बाद यह अनुभव अवध कसान आंदोलन म उनक भी सय भूिमका का आधार बना। इस संदभ म गरिमटया इितहास और भारतीय कसान आंदोलन को अलग-अलग नह देखा जा सकता। प्र वासन के दौरान अजत अनुभव नेग्र ामीण समाज, भूिम संबंध और औपनवेशक सत्त ा के प्र ित एक नई चेतना का नमण कया। यह दृ इितहास के उस व्य ापक परप्रेक्ष्य को उद्घाटत करती है जसम प्र वासन केवल िवदेश का इितहास नह, ब भारत के सामाजक और राजनीितक इितहास का भी अिभन्न अंग बन जाता है।प्रश्न –11 : वतमान समय म गरिमटया इितहास के अध्य यन क सबसे बड़ चुनौितय ा ह? गरिमटया अध्य यन ने िपछले कुछ दशक म उेखनीय प्र गित क है, कु अभी भी अनेक चुनौितय िवद्य मान ह। सबसे बड़ चुनौती उपलब्ध ोत क प्र कृित है। अधकश दस्त ावेज़ औपनवेशक प्र शासन ारा तैयार कए गए ह, जनम सत्त ा क दृ प्र मुख है। इसलए इितहासकार को इन ोत का आलोचनात्म क अध्य यन करना आवश्य क है। दूसर चुनौती यह है क गरिमटया इितहास को अभी भी अनेक बार केवल पीड़ा और शोषण के आान के रू प म प्रस्तु त कया जाता है। जबक इसके भीतर सृितक पुननमण, भाषायी िवकास, धामक परवतन, सामाजक संगठन और राजनीितक चेतना जैसे अनेक सकारात्म क एवं जटल आयाम भी ह। तीसर चुनौती िविभन्न देश म िबखर अिभलेख तक पहुँच क है। भारत, मॉरशस, फजी, गुयाना, सूरनाम, त्र नदाद तथा िटेन के अिभलेखागार म उपलब्ध सामग्र ी का समेकत अध्य यन अभी सीिमत है। डजटल अिभलेख का िवस्त ार इस दशा म नई संभावनाएँ अवश्य प्रस्तु त कर रहा है।प्रश्न –12 : युवा शोधाथय के लए गरिमटया अध्य यन म कौन-सी संभावनाएँ दखाई देती ह? गरिमटया अध्य यन आज भारतीय इितहास लेखन का अत्यं त सय और िवकसत होता हुआ क्षेत्र है। युवा शोधाथय के लए इसम अनेक नई दशाएँ

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 80 उपलब्ध ह। िवशेष रू प से जडर अध्य यन, पयवरणीय इितहास, खाद्य संृित, लोकृित, समु इितहास, भाषायी परवतन, प्र वासी साहत्य , डजटल अिभलेखागार तथा तुलनात्म क प्र वासन अध्य यन ऐसे ेत्र ह जन पर गंभीर शोध क आवश्य कता है। वे इस बात पर भी बल देते ह क शोध केवलप्र काशत पुस्त क तक सीिमत नह होना चाहए। अिभलेखागार, ानीय ोत, ायक अिभलेख, नजी पत्र , पारवारक दस्त ावेज़ तथा मौखक इितहास जैसे ोत शोध को अधक मौलक बनाते ह। अंतवषयी दृ ष्ट कोण अपनाकर शोधाथ गरिमटया इितहास के उन प को सामने ला सकते ह जो अब तक अपेाकृत उपेत रहे ह। इस सााार से नम्न लखत महत्त्व पूण नष्क ष उभरकर सामने आते ह- गरिमटया व्य वा को दासप्र था का मात्र िवस्त ार न मानकर उसक िवशष्ट ऐितहासक संरचना के रू प म समझना आवश्य क है। अनुबंध (AGREEMENT) गरिमटया व्य वा का क य तत्व था, जसने श्र िमक के अधकार और औपनवेशक नयंत्र ण दोन को प्र भािवत कया। गरिमटया श्र िमक केवल औपनवेशक शोषण के नय पात्र नह थे; वे उपलब्ध कानूनी अवसर और सामाजक परितय का सय उपयोग भी करते थे। गरिमटया इितहास के अध्य यन म ी-अनुभव और जडर संबंध को क य ान दया जाना चाहए। मौखक इितहास (ORAL HISTORY) अिभलेखीय ोत का महत्त्व पूण पूरक है औरप्र वासी ृितय के अध्य यन के लए अनवाय ोत है। आशुतोष कुमारप्र ोफेसर इितहास िवभाग काशी हू िवश्व िवद्य ालय, वाराणसी सरकार अिभलेख का उपयोग आलोचनात्म कदृ ष्ट से कया जाना चाहए, क वे औपनवेशक सत्त ा के दृ ष्ट कोण से नमत ह। गरिमटया समाज भारतीय सामाजक संरचनाओ का यथावत िवस्त ार नह, ब नए सामाजक- सृितक पुनगठन का उदाहरण है। उत्त र भारत का ामीण संकट, औपनवेशक अथव्य वा और श्र म-भत क प्र या को एक साथ समझे िबना प्र वासन क सह व्य ाा संभव नह है। बाबा रामचन्द्र जैसे व्य त्व यह सद्ध करते ह क गरिमटया अनुभव भारतीय कसान आंदोलन और सामाजक चेतना से गहराई से जुड़ा हुआ था। गरिमटया अध्य यन का भिवष्य अंतवषयी (INTERDISCIPLINARY) शोध-पद्ध ित, अंतरराष्ट य अिभलेखागार के तुलनात्म क अध्य यन तथा डजटल ोत के उपयोग म नहत है। आशुतोष कुमार से रु च सह और ियदश गौतम क बातचीत

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 81 औपनवेशक अथव्य वा, श्र म प्र वासन और गरिमटयाव्य वा - नलन भारती भारतीय गरिमटया इितहास को प्र ायः सृितक, साहत्य क और सामाजक दृ से अधक पढ़ा गया है, जबक उसके आथक आयाम अपेाकृत कम चच म रहे ह। वास्त व म गरिमटया श्र म-प्र वास केवल श्र िमक के िवापन क कहानी नह था, ब वह वैक पूँजीवाद, औद्य ोगक ित, उपनवेशवाद और श्र म-बाज़ार के िवस्त ार से जुड़ एक व्य ापक आथक प्र या का परणाम था। इसी संदभ म आईआईट पटना के मानिवक एवं सामाजक िवज्ञ ान िवभाग के प्र ो. तथा प्र सद्ध अथशास्त्र ी प्र ो. नलन भारती से यह िवस्तृ त संवाद आयोजत कया गया।प्र ो. नलन भारती श्र म अथशास्त्र (LABOUR ECONOMICS), िवकास अथशास्त्र (DEVELOPMENT ECONOMICS), अंतररायव्य ापार (INTERNATIONAL TRADE), प्र वासन अध्य यन (MIGRATION STUDIES) और सावजनक नीित (PUBLIC POLICY) के िवशेषज्ञ ह।प्रश्न –1 : 1834 से 1917 के बीच गरिमटया श्र म-प्र वास को कन आथक परितय ने जन्म दया ? यद हम गरिमटया व्य वा को समझना चाहते ह, तो हम इसे केवल प्र वासन के रू प म नह, ब उन्न ीसव शता के वैक आथक परवतन के संदभ म देखना होगा। यह वह समय था जब इंड म औद्य ोगक ित अपने चरम पर थी। उद्य ोग के िवस्त ार ने के माल और सस्ते श्र म क मग को अत्य धक बढ़ा दया था। दूसर ओर भारत जैसे उपनवेश को के माल के ोत तथा श्र म आपूत कद्र के रू प म िवकसत कया जा रहा था। िटश ईस्ट इंडया कंपनी तथा बाद म िटश औपनवेशक शासन ने भारत क अथव्य वा को इस प्र कार पुनगठत कया क वह सााज्य वाद औद्य ोगक आवश्य कताओ क पूत कर सके। चीनी, कपास, चाय तथा अन्य नयतोुख कृिष उत्प ाद के उत्प ादन हेतु मॉरशस, फजी, गुयाना, नदाद, सूरनाम और अन्य उपनवेश म िवशाल श्र मशक्त क आवश्य कता उत्पन्न हुई। दासप्र था समाप्त होने के बाद इसी आवश्य कता क पूत गरिमटया श्र िमक ारा क गई। अतः गरिमटया प्र वासन कसी मानवीय काणकार योजना का परणाम नह था, ब औद्य ोगक पूँजीवाद क उत्प ादन-आवश्य कताओ से संचालत आथक नीित का हा था।प्रश्न –2 : ा गरिमटया प्र वासन को आथक सत क सहायता से भी समझा जा सकता है? नत रू प से। प्र वासन को समझने के लए केवल ऐितहासक घटनाओ का अध्य यन पयप्त नह है। अथशास्त्र म प्र वासन संबंधी अनेक सद्ध त िवकसत हुए ह जो इस प्र या क व्य ाा करते ह। सबसे पहले ‘ पुश–पुल सद्ध त ’ (PUSH–PULL THEORY) का उेख कया जा सकता है। यह सद्ध त बताता है क कुछ परितय लोग को अपने मूल ान से बाहर धकेलती ह-जैसे नधनता, अकाल, बेरोज़गार, सामाजक असुरा या कम आय। दूसर ओर बेहतर मजदूर, रोजगार, भोजन, ास्थ्य सुिवधाएँ तथा अपेाकृत सुरत जीवन जैसी परितय उ नए ान क ओर आकषत करती ह। यद्य िप यह सद्ध त बीसव शता के मध्य मव्य वत रू प से िवकसत हुआ, कु इसके आधारभूत तत्व गरिमटया प्र वासन पर भी लागू होते ह। उत्त र भारत के अनेक ामीण े म आथक संकट और जीिवका का अभाव लोग को बाहर जाने के लए प्रे रत कर रहा था, जबक उपनवेश म बेहतर अवसर का भ्र म उत्पन्न कया जा रहा था। इसके अितरक्त ‘न्यू इकॉनॉिमक्स ऑफ लेबर माइेशन ’ (NEW ECONOMICS OF LABOUR MIGRATION) भी महत्त्व पूण है। यह सद्ध त बताता है क प्र वासन केवल व्य क्त गत नणय नह होता; उसके पीछे परवार, उत्प ादन-व्य य, जोखम और आय के िविवध ोत का सामूहक आथक नणय भी काय करता है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 82प्रश्न –3 : ा गरिमटया श्र िमक वास्त व म बेहतर आथक अवसर क तलाश म गए थे, या यह औपनवेशक शोषण क प्र या थी ? यह हम अंत सावधानी से िवचार करना होगा। यह कहना उचत नह होगा क गरिमटया श्र िमक पूर तरह स्व तंत्र आथक नणय लेकर प्र वास कर रहे थे। अधकश श्र िमक के सामने िवकल्प सीिमत थे। आथक संकट, सामाजक असुरक्ष ा तथा औपनवेशक प्र शासन ारा नमत परितय ने उ ऐसे नणय लेने के लए िववश कया। दूसर ओर भत प्र या भी पूणतः पारदश नह थी। अनेक श्र िमक को गंतव्य देश क वास्त िवक परितय क जानकार नह थी। अनुबंध (AGREEMENT) उनके लए एक कानूनी दस्त ावेज़ अवश्य था, कतु उसके वास्त िवक अथ और परणाम को वे पूणतः समझ नह पाते थे। इसी कारण म गरिमटया व्य वा को श्र म-समझौते (LABOUR CONTRACT) क सामान्य प्र या नह, ब औपनवेशक पूँजीवाद ारा नयंत्र त श्र म-व्य वा के रू प म देखता हूँ, जसम श-संतुलन पूर तरह औपनवेशक शासन के पक्ष म था।प्रश्न –4 : ा गरिमटया व्य वा को पूँजीवाद (CAPITALISM) के िवकास से जोड़कर देखा जाना चाहए ? िबुल। गरिमटया व्य वा को पूँजीवाद से अलग करके नह समझा जा सकता। औोगक पूँजीवाद का मूल उेश्य उादन क अधकतम वृ तथा लागत का न्यू नतमकरण था। इसके लए सस्ते , अनुशासत और उपलब्ध श्र म क आवश्य कता थी। यह कारण है क दासप्र था समाप्त होने के बाद अनुबंधत श्र म (INDENTURED LABOUR) कव्य वा िवकसत क गई। यह व्य वा देखने म कानूनी अनुबंध पर आधारत प्र तीत होती थी, कतुव्य वहार म उसम श का असंतुलन, आथक नभरता और शोषण नहत था। यद व्य ापक ऐितहासक दृ ष्ट से देख, तो पूँजीवाद ने समय के साथ अपने रू प बदले ह। औोगक पूँजीवाद से लेकर वैक पूँजीवाद और आज के डजटल पूँजीवाद (DIGITAL CAPITALISM) तक उादन, श्र म और बाज़ार क संरचनाएँ नरंतर परवतत हुई ह। इसलए गरिमटया व्य वा का अध्य यन केवल अतीत का अध्य यन नह, ब आधुनक वैक अथव्य वा क ऐितहासक जड़ को समझने का माध्य म भी है।प्रश्न –5 : गरिमटया श्र िमक के अनुबंध (AGREEMENT) क अवध समाप्त होने के बाद उनके सामने सबसे बड़ आथक चुनौितय ा थ ? गरिमटया इितहास का यह पक्ष अभी भी अपेक्ष ाकृत कम अध्य यन का िवषय रहा है। अनुबंध समाप्त होने के बाद श्र िमक के जीवन क वास्त िवक आथक ित को समझने के लए अभीव्य ापक अिभलेखीय शोध (ARCHIVAL RESEARCH) क आवश्य कता है। उपलब्ध सावजनक ोत इस िवषय म सीिमत जानकार देते ह, इसलए शोधकतओ को ऐितहासक दस्त ावेज़, अनुबंध-पत्र और व्य गत अिभलेख का गहन अध्य यन करना होगा। फर भी उपलब्ध त के आधार पर यह स्पष्ट है क सबसे बड़ समा िवापन (DISPLACEMENT) थी। अनुबंध समाप्त होने के बाद श्र िमक ऐसे देश म खड़े थे जो उनके लए पूणतः अपरचत था। उनके पास न पयप्त आथक संसाधन थे, न कानूनी सुरक्ष ा और न ह ानीयप्र शासनक व्य वा क जानकार। उनके सामने यह दुिवधा थी क वे भारत लौट या उसी देश म नया जीवन प्र ारम्भ कर। दोन ह िवकल्प अंत कठन थे। भारत लौटने के लए आथक संसाधन नह थे, जबक वह बसने के लए भूिम, रोजगार और सामाजक सुरक्ष ा का अभाव था। परणामस्वरू प अनेक श्र िमक ने वष तक आथक अरता, असुरक्ष ा और संघषपूण जीवन व्य तीत कया। इसलए गरिमटया अनुभव का अध्य यन केवल अनुबंध क अवध तक सीिमत नह रहना चाहए; ब अनुबंधोत्त र (POST-INDENTURE) जीवन

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 83 का आथक अध्य यन भी समान रू प से महत्त्व पूण है।प्रश्न –6 : गरिमटया अनुभव से आज के नीित- नमताओ (POLICY MAKERS) और इितहासकार को ा सीख िमलती है? इितहास केवल अतीत का अध्य यन नह होता; वह वतमान नीितय के लए भी मागदशन प्र दान करता है। आज भारत िवश्व म सवधक प्र वासी धनराश (REMITTANCES) प्र ाप्त करने वाले देश म है। करोड़ भारतीय िविभन्न देश म कायरत ह और उनक आय भारतीय अथव्य वस्थ ा म महत्त्व पूण योगदान देती है। इसका अथ यह है क प्र वासन आज भी भारत क आथक संरचना का एक महत्त्व पूण अंग है। कु वतमान परस्थ ितय गरिमटया काल से िभन्न ह। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है क भारत कस प्र कार अपने श्र िमक को वैश्व क श्र म-बाज़ार के लए तैयार कर। यद प्र वासी श्र िमक कम कौशल वाले हगे, तो उ कम वेतन, असुरक्ष त रोजगार और कठन काय-स्थ ितय का सामना करना पड़ेगा। इसके िवपरत उच्च कौशल (HIGH SKILLS) वाले श्र िमक बेहतर अवसर प्र ाप्त करते ह। इसलए भारत क प्र ाथिमकता केवल श्र िमक को िवदेश भेजना नह होनी चाहए, ब उ गुणवापूण शक्ष ा, तकनीक दक्ष ता औरव्य ावसायक प्र शक्ष ण प्र दान करना होना चाहए। कौशल-िवकास (SKILL DEVELOPMENT) ह भिवष्य क सुरक्ष त प्र वासन नीित का आधार है।प्रश्न –7 : ा केवल िवदेश म रोजगार उपलब्ध कराना पयप्त होगा, या भारत के भीतर भी आथक सुधार आवश्य क ह? मेर िवचार से कसी भी स्वस्थ प्र वासन नीित का पहला उेश्य यह होना चाहए क व्य प्र वास करने के लए िववश न हो। यद देश के भीतर पयप्त रोजगार, सानजनक मजदूर, सामाजक सुरक्ष ा तथा जीवन-नवह क उचत परस्थ ितय उपलब्ध ह, तो प्र वासन व्य का स्वै क नणय होगा, बाध्य ता नह। भारत जैसे िवशाल श्र मबल वाले देश म यह आवश्य क है क घरलू अथव्य वस्थ ा को इतना सुदृ ढ़ बनाया जाए क लोग को सानजनक आजीिवका अपने ह क्षेत्र म उपलब्ध हो सके। न्यू नतम मजदूर,श्र िमक काण, सामाजक सुरक्ष ा योजनाएँ तथा रोजगार-सृजन-ये सभी प्र वासन नीित से जुड़े हुएप्रश्न ह। अतः कसी भी आथक नीित का उेश्य केवल श्र म- नयत (LABOUR EXPORT) नह होना चाहए, ब श्र िमक के जीवन क गुणवा (QUALITY OF LIFE) म सुधार होना चाहए।प्रश्न –8 : गरिमटया व्य वा ने औपनवेशक अथव्य वा और श्र म-बाज़ार को कस प्र कारप्र भािवत कया ? गरिमटया व्य वस्थ ा औपनवेशक श्र म-बाज़ार क एक संगठत आथक संरचना थी। इसका मूल उेश्य उादन को नरंतर बनाए रखना था। दासप्र था समाप्त होने के बाद चीनी, कागज़ तथा अन्य उोग के लए श्र िमक क भार आवश्य कता थी। इसी आवश्य कता ने अनुबंधत श्र म-प्र णाली को जन्म दया। कु इस व्य वस्थ ा क िवशेषता यह थी क इसम अनुबंध होने के बावजूद वास्त िवक श औपनवेशक शासन और पूँजीपितय के हाथ म थी। श्र िमक के पास न पयप्त सूचना थी, न वैधानक संरक्ष ण और न ह समान सौदेबाज़ी कक्ष मता। इसलए यह व्य वस्थ ा आथक असमानता और शोषण पर आधारत थी। इसे केवल श्र म-प्र वास नह, ब औपनवेशक पूँजीवाद क उादन-व्य वस्थ ा के रू प म समझना चाहए, जह श्र म स्व यं उादन क एक नयंत्र त इकाई बन गया था।प्रश्न –9 : ा गरिमटया व्य वा और वतमान वैक अथव्य वा के बीच कोई वैचारक संबंध देखा जा सकता है? इितहास नरंतरता (CONTINUITY) और परवतन (CHANGE) दोन का अध्य यन है। औोगक पूँजीवाद ने जस प्र कार श्र म, उादन

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 84 और बाज़ार को संगठत कया था, आज उसी प्र या का नया रू प डजटल पूँजीवाद (DIGITAL CAPITALISM) म दखाई देता है। आज उादन के साधन बदल गए ह। डेटा (DATA), कृत्र म बुद्ध मत्त ा (ARTIFICIAL INTELLIGENCE), डजटल ेटफ़ॉम और वैक सूचना-प्र णालय नई आथक श के ोत बन चुक ह। यद पहले उपनवेश पर नयंत्र ण संसाधन और श्र म के माध्य म से ािपत होता था, तो आज अनेक िवान " डजटल उपनवेशवाद " (DIGITAL COLONIZATION) क अवधारणा पर िवचार कर रहे ह, जह डेटा और तकनीक अवसंरचना नई आथक सत्त ा का आधार बनते जा रहे ह। इसलए गरिमटया व्य वा का अध्य यन केवल अतीत क ृित नह है; वह आधुनक वैक अथव्य वा को समझने का भी एक ऐितहासक आधार प्र दान करता है।प्रश्न –10 : ा गरिमटया श्र िमक ने मॉरशस, फजी, गुयाना, सूरनाम और नदाद जैसी उपनवेश क आथक उन्न ित म नणयक भूिमका नभाई? इस प्रश्न का उत्त र केवल सृितक या राजनीितकदृ ष्ट कोण से नह दया जा सकता; इसके लए उादन-अथशास्त्र (ECONOMICS OF PRODUCTION) का िवेषण आवश्य क है। इन सभी उपनवेश क अथव्य वा मुख्य तः बागान-आधारत (PLANTATION ECONOMY) थी। चीनी उादन, कृिष-िवार और नयतोुख उोग क सफलता का आधार संगठत श्र म था। गरिमटया श्र िमक ने इस उादन-व्य वा को रता प्र दान क। अतः इन उपनवेश के आथक िवकास का इितहासश्र िमक के योगदान के िबना अधूरा है। कु इस िवषय पर अभी भी तुलनात्म क आथक अध्य यन अपेक्ष त ह, जससे यह स्पष्ट कया जा सके क श्र म, पूँजी और औपनवेशक नीितय के पारस्प रक संबंध ने इन देश क अथव्य वा को कस प्र कार आकार दया।प्रश्न –11 : गरिमटया श्र म-प्र वास को समझने म शास्त्र ीय अथशास्त्र (CLASSICAL ECONOMICS) क ा भूिमका है? गरिमटया व्य वा को केवल ऐितहासक घटना के रू प म नह देखा जाना चाहए। इसके पीछे जो आथक संरचना काय कर रह थी, उसे समझने के लए शास्त्र ीय अथशास्त्र के मूल सद्ध त का अध्य यन आवश्य क है। िवशेष रू प से एडम थ (ADAM SMITH) और डेिवड रकाड (DAVID RICARDO) जैसे अथशास्त्र य के िवचार इस संदभ म अंत महत्त्व पूण ह। एडम थ ने ‘श्र म-िवभाजन ’ (DIVISION OF LABOUR) को उादन वृद्ध का आधार माना था। उनके अनुसार जब काय का िवभाजन होता है, तो उादन क्ष मता और दक्ष ता दोन म वृद्ध होती है। औोगक ित के दौरान यह सद्ध त बड़े पैमाने पर औपनवेशक उादन-व्य वा म लागू हुआ। चीनी, कपास और अन्य नयतोुख कृिष-उोग के लए श्र म का योजनाबद्ध संगठन कया गया और गरिमटया श्र िमक इसी उादन-प्र या के आवश्य क अंग बन गए। डेिवड रकाड ने श्र म, उादन और अंतरराष्ट यव्य ापार के बीच संबंध क व्य ाख्य ा करते हुए यहस्पष्ट कया क श्र म कसी भी अथव्य वा का मूल उादक संसाधन है। औपनवेशक शासन ने इन सद्ध त का उपयोग अपने आथक हत क पूत के लए कया। परणामस्वरू प उपनवेश म श्र िमक केवल उादन का साधन बनकर रह गए। इस दृ ष्ट से गरिमटया व्य वा शास्त्र ीय आथक सद्ध त के औपनवेशक प्र योग का एक ऐितहासक उदाहरण भी है।प्रश्न –12 : वतमान गरिमटया अध्य यन म आपको सबसे बड़े शोध-अंतराल (RESEARCH GAPS) कौन-से दखाई देते ह? गरिमटया अध्य यन म उेखनीय काय हुए ह, कतु अभी भी कई ऐसे क्षेत्र ह जह गंभीर शोध अपेक्ष त है। सबसे पहले श्र म-शोषण (LABOUR

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 85 EXPLOITATION) क आथक संरचना काव्य वत अध्य यन होना चाहए। अभी तक अधकश अध्य यन सृितक ृित, साहत्य और इितहास पर क द्र त रहे ह, जबक श्र म-बाज़ार, मजदूर, उादकता, अनुबंध क आथक प्र कृित तथा श्र िमक के वास्त िवक जीवन-स्त र का तुलनात्म क िवेषण अपेाकृत कम हुआ है। दूसरा महत्त्व पूण ेत्र अनुबंध-पत्र (AGREEMENT PERMITS) का अध्य यन है। इन दस्त ावेज़ के माध्य म से यह समझा जा सकता है क औपनवेशक शासन ने श्र िमक के साथ कस प्र कार के कानूनी संबंध ािपत कए, उनम अधकार और दाय क वास्त िवक ित ा थी तथा व्य वहार म इन अनुबंध का पालन कस सीमा तक हुआ। यद इन दोन ेत्र म गहन शोध कया जाए, तो गरिमटया इितहास के अनेक अनछुए आयाम सामने आ सकते ह।प्रश्न –13 : आपने अपने वक्तव्य म लगभग 68,000 अनुबंध (AGREEMENTS) का उेख कया। शोध क दृ से इनका ा महत्त्व है? गरिमटया अध्य यन क सबसे बड़ आवश्य कताप्र ामाणक ोत का व्य वत िवेषण है। उपलब्ध अिभलेख म लगभग 68,000 अनुबंध का उेख िमलता है। यह केवल एक सकय आँकड़ा नह है, ब लाख मानवीय अनुभव तक पहुँचने का प्र वेश-ार है। इन अनुबंध के माध्य म से शोधकत यह समझ सकते ह-श्र िमक कन ेत्र से आए। उनक आयु, जाित, व्य वसाय और पारवारक ित ा थी। उ कन देश म भेजा गया। अनुबंध क शत ा थ। वास्त िवक मजदूर और काय-ितय कैसी थ। यद इन दस्त ावेज़ का डजटल डेटाबेस तैयार कया जाए तथा मात्र ात्म क (QUANTITATIVE) और गुणात्म क (QUALITATIVE) दोन पद्ध ितय से उनका अध्य यन कया जाए, तो गरिमटया इितहास का आथक पुनलखन (ECONOMIC RECONSTRUCTION) संभव हो सकेगाप्रश्न –14 : भिवष्य के शोधाथय को कन सैितक क्षे पर िवशेष ान देना चाहए ? मेर िवचार से भिवष्य का गरिमटया अध्य यन अंतवषयी (INTERDISCIPLINARY) होना चाहए। शोधाथय को केवल इितहास या साहत्य तक सीिमत न रहकर प्र वासन सद्ध त (MIGRATION THEORY), आथक सद्ध त (ECONOMIC THEORY) तथा आथक िवचार के इितहास (HISTORY OF ECONOMIC THOUGHT) का भी अध्य यन करना चाहए। िवशेष रू प से यह समझना आवश्य क है क पूँजीवाद समय के साथ कस प्र कार बदलता गया। एडम थ क ‘ इनिवज़बल हड ’ (INVISIBLE HAND) क अवधारणा, श्र म-िवभाजन, वैश्व क बाज़ार और आधुनक डजटल अथव्य वा-इन सभी को एक ऐितहासक नरंतरता म देखने क आवश्य कता है। जब तक शोधकत आथक सद्ध त को ऐितहासक अनुभव से नह जोड़गे, तब तक गरिमटया अध्य यन का व्य ापक िवेषण संभव नह होगा।प्रश्न –15 : गरिमटया परयोजना के संदभ म आप भिवष्य म कस प्र कार के शैक्ष णक सहयोग क आवश्य कता महसूस करते ह? गरिमटया अध्य यन एक वैश्व क िवषय है। इसलए इसे केवल कसी एक िवश्व िवालय या एक शोध-दल तक सीिमत नह रखा जा सकता। मेर िवचार से इस ेत्र म राय और अंतररायस्त र पर संगोय, परचचओ तथा शोध-सहयोग (RESEARCH COLLABORATION) को बढ़ावा दया जाना चाहए। भारतीय सामाजक िवान अनुसंधान परषद (ICSSR), िवदेश मंत्र ालय, िविभन्न िवश्व िवालय तथा प्र वासी भारतीय अध्य यन कद्र के बीच समत शोध-कायक्र म िवकसत कए जा सकते ह। िवशेष रू प से आथक प्र वासन (ECONOMIC MIGRATION) को कद्र म रखकर बहुिवषयी

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 86 सेलन का आयोजन कया जाना चाहए, जह इितहासकार, अथशास्त्र ी, समाजशास्त्र ी, मानविवानी और साहत्य कार एक साझा मंच पर संवाद कर सक । इससे गरिमटया अध्य यन का दायरा और अधक व्य ापक तथा वैानक बनेगा। गरिमटया परयोजना के लए प्र ो. नलन भारती क प्र मुख अनुशंसाएँ इस संवाद से नम्न लखत महत्त्व पूण बदु उभरकर सामने आते ह- गरिमटया इितहास को आथक इितहास (ECONOMIC HISTORY) के दृ कोण से पुनपठ क आवश्य कता है। औपनवेशक पूँजीवाद और अनुबंधत श्र म-व्य वा के अंतसबंध का व्य वत अध्य यन कया जाना चाहए।श्र म-शोषण, मजदूर, उादकता तथा श्र म- बाज़ार के तुलनात्म क आथक अध्य यन कोप्र ाथिमकता द जानी चाहए। उपलब्ध 68,000 अनुबंध-प का डजटलीकरण और डेटा-आधारत िवेषण गरिमटया अध्य यन म नई दशा प्र दान कर सकता है।प्र वासन सत, आथक िवचार का इितहास तथा श्र म-अथशास्त्र को गरिमटया अध्य यन के साथ जोड़ा जाना चाहए। गरिमटया अध्य यन को साहत्य , इितहास और संृित के साथ-साथ अथशास्त्र और सावजनक नीित से भी जोड़ा जाना आवश्य क है। राय एवं अंतरराय संान के सहयोग से आथक प्र वासन पर क त शोध-संगोय और अकादिमक नेटवक का नमण कया जाना चाहए। समकालीन भारत के लए श्र िमक का कौशल- िवकास, सामाजक सुरा और सानजनक रोजगार, गरिमटया इितहास से प्र ाप्त सबसे महत्त्व पूण नीितगत शाएँ ह। नलन भारतीप्र ोफेसर, समाज िवान एवं मानिवक संकाय आईआईट पटना प्र ो. नलन भारती से उज्ज्व ल कुमार सह और िप्र यदश गौतम क बातचीत

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 87 इितहास, साहत्य और सृितक ृित के आलोक म गरिमटया जीवन का पुनपठ - ृित सह भारतीय गरिमटया इितहास का अध्य यन लंबे समय तक मुख्य तः औपनवेशक अिभलेख, प्र शासनक दावेज और आथक इितहास के परप्रेक्ष्य म कया जाता रहा है। परणामस्वरू प गरिमटयाश्र िमक के अनुभव के अनेक मानवीय और सृितक आयाम इितहास-लेखन के कद्र म नह आ सके। िवशेषतः उनक ृितय, नजी वुएँ, पारवारक संार, धामक िवास तथा भावनात्म क संसार अपेाकृत उपेत रहे। इ प्रश्न को कद्र म रखते हुए भारतीय सामाजक िवान अनुसंधान परषद (ICSSR) समथत शोध परयोजना " िटश औपनवेशक शासन के दौरान भारतीय श्र म प्र वासन का सृितक इितहास " के अंतगत भारतीय प्र ौोगक संान (IIT) पटना के मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग क प्रख्य ात िवदुषी प्र ो. ृित सह के साथ यह िवृत संवाद आयोजत कया गया। इस सााार का उेश्य गरिमटया इितहास को साहत्य , सृितक अध्य यन, ृित अध्य यन (MEMORY STUDIES) तथा उत्त र-औपनवेशक िवमश (POSTCOLONIAL STUDIES) के अंतःिवषयी परप्रेक्ष्य म समझना था।प्र ो. ृित सह भारतीय प्र ौोगक संान (IIT) पटना के मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग म अंग्रे ज़ी क प्र ो. ह। उनका शोध ेत्र डायोरा अध्य यन, गरिमटया श्र म-प्र वासन, उत्त र- औपनवेशक साहत्य , सृितक ृित, भौितक संृित (MATERIAL CULTURE), पयवरणीय साहत्य तथा भाषा-अध्य यन जैसे िविवध िवषय तक िवृत है। उने िवशेष रू प से भारतीय अनुबंधत श्र िमक (INDENTURED LABOURERS) के प्र वास, आघात (TRAUMA), ृित (MEMORY), सृितक पहचान (IDENTITY), वु-संृित (MATERIAL CULTURE) तथा अंतरपीढ़य अनुभव (TRANSGENERATIONAL EXPERIENCES) पर उेखनीय शोध कया है। प्रश्न –1 : आपके शोध-पत्र "LOOKING BACK AT HISTORY: THE ARTEFACTS OF GIRMITIYA LIFE" म आपने गरिमटया जीवन को समझने के लए वुओ (ARTEFACTS) को ऐितहासक ोत के रू प म देखा है। इस दृ कोण क प्रे रणा आपको कह से िमली ? इितहास और समाजशास्त्र सामान्य तः भौितक वुओ (ARTEFACTS) का अध्य यन उनके काल- नधरण अथवा सामाजक उपयोगता के आधार पर करते ह। उदाहरण के लए यद कसी पुरातत्व िवद् को कोई साड़ प्र ाप्त होती है, तो वह उसके नमणकाल का नधरण करगा, जबक समाजशास्त्र ी यह बताएगा क उस समय स्त्र य कस प्र कार के वस्त्र धारण करती थ। कु इन दोन दृ य म एक प्रश्न अनुत्त रत रह जाता है-उस वु का भावनात्म क और सृितक अथ ा था ? साहत्य का िवाथ होने के कारण मेरा प्र यास इसीप्रश्न का उत्त र खोजने का रहा। मेर लए साड़ केवल वस्त्र नह, ब ृित, सुरा, मातृभूिम और सृितक पहचान का जीवंत प्र तीक है। भारत म जस प्र कार स्त्र ी साड़ धारण करती थी, वह साड़प्र वासी जीवन म श्र म क परितय के अनुसार अपना रू प बदल लेती है। इस परवतन म केवल पहनावे का परवतन नह, ब संपूण सृितक अनुभव नहत है। जब साहत्य , इितहास और समाजशास्त्र -तीन एक साथ कसी वु का अध्य यन करते ह, तब वह वु जीवंत ऐितहासक साक्ष्य बन जाती है। मेरा उेश्य वुओ को केवल संग्र हालय क वुएँ न मानकर, उ गरिमटया समुदाय क जीिवत ृितय के रू प म समझना था।प्रश्न –2 : आपने अपने अध्य यन म साड़, रामचरतमानस, तुलसी तथा घर क िम जैसी साधारण वुओ को िवशेष महत्त्व दया है। ये वुएँ गरिमटया इितहास को समझने म कसप्र कार सहायक ह?

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 88 जब कोई व्य अपना देश छोड़कर अनत भिवष्य क ओर प्रस्थ ान करता है, तब वह अपने साथ संपूण संसार नह ले जा सकता। वह केवल वह वस्तु एँ चुनता है जनसे उसका गहरा भावनात्म क संबंध होता है। यह कारण है क गरिमटया श्र िमक क छोट-सी पोटली इितहास का अत्यं त महत्त्व पूण दस्त ावेज़ बन जाती है।प्र ारक प्र वासी भारतीय ारा रामचरतमानसको साथ ले जाना केवल धामक आस्थ ा का प्रश्न नह था। उने वाीक रामायण के स्थ ान पर रामचरतमानस इसलए चुना क वह लोकभाषा म रचत थी और सामान्य जन उसके साथ आत्म ीय संबंध स्थ ािपत कर सकते थे। उसी प्र कार तुलसी का पौधा, पूजा-स्थ ल क िम, या घर के गभगृह से ली गई थोड़-सी धूल अपने साथ ले जाना मातृभूिम को ृित म जीिवत रखने का सृितक प्र यास था। इन वस्तु ओ ने प्र वासी समुदाय को केवल धामक आधार ह नह दया, ब मानसक स्थ रता, आत्म क सत्व ना और सृितक नरंतरता भी प्र दान क। इसलए इितहासकार को इन वस्तु ओ को मात्र धामक प्र तीक न मानकर, िवस्थ ापन क सृितक मनोिवान के रू प म भी देखना चाहए।प्रश्न –3 : ा साहत्य गरिमटया इितहास को समझने म इितहास-लेखन क सीमाओ को िवृत करता है? इितहास हम घटनाओ का क्र म देता है, परंतु साहत्य उन घटनाओ के भीतर छपे हुए मानवीय अनुभव को अिभव्य देता है। यद इितहास हम बताता है क कतने लोग प्र वास पर गए, तो साहत्य यह समझने म सहायता करता है क उने घर छोड़ते समय ा महसूस कया, अपने अतीत को कस प्र कार याद रखा और नई परस्थ ितय म अपनी पहचान कैसे नमत क। मने अनुभव कया क गरिमटया साहत्य का अधकश अध्य यन या तो उदार मानवतावाद (LIBERAL HUMANIST) दृ ष्ट कोण से कया गया है अथवा केवल आथक और वगय (MARXIST) िवेषण तक सीिमत रहा है। इन दोन के बीच उन सृितक वस्तु ओ पर अपेक्ष त ध्य ान नह दया गया जनके माध्य म से प्र वासी समुदाय अपनी पहचान को संरक्ष त रखता है। इसी कारण मेर शोध का कद्र उन साधारण प्र तीत होने वाली वस्तु ओ पर गया ज सामान्य तः इितहासकार अनदेखा कर देते ह। वास्त व म वह वस्तु एँ प्र वासी समुदाय क ृित, सृितक नरंतरता और आत्म -पहचान क वाहक सद्ध होती ह।प्रश्न –4 : ा भौितक संृित (MATERIAL CULTURE) के अध्य यन से गरिमटया इितहास क नई ाा संभव है? नत रू प से। यद हम केवल प्र शासनक दस्त ावेज़ पर नभर रहगे, तो गरिमटया जीवन का केवल बाहर ढचा समझ पाएँगे। लेकन जब हम वस्तु ओ, ृितय, साहत्य और सृितक प्र तीक को साथ लेकर चलते ह, तब इितहास का मानवीय पक्ष उद्घाटत होता है। एक साधारण पोटली, एक साड़, एक धामक ंथ, तुलसी का पौधा या घर क िम-ये सभी वस्तु एँ उस समुदाय के भय, आशा, िवास और सृितक नरंतरता के प्र तीक ह। इनका अध्य यन यह स्पष्ट करता है क प्र वासी भारतीय केवल श्र िमक नह थे; वे अपनी सभ्य ता, संृित और ृितय के संवाहक भी थे। यह कारण है क म गरिमटया इितहास को MATERIAL CULTURE STUDIES के माध्य म से पढ़ने को भिवष्य क एक महत्त्व पूण शोध-दशा मानती हूँ।प्रश्न –5 : आपके शोध म प्र वासन (MIGRATION) को केवल भौगोलक परवतन नह, ब ‘आघात ’ (TRAUMA) के रू प म भी देखा गया है। गरिमटया अनुभव के संदभ म इस आघात को कस प्र कार समझा जाना चाहए ? भारतीय साहत्य क िवमश म ‘आघात अध्य यन ’ (TRAUMA STUDIES) अपेक्ष ाकृत नया क्षेत्र है। लंबे समय तक भारतीय संदभ म आघात का अध्य यन मुख्य तः भारत-िवभाजन (PARTITION)

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 89 और ी-अनुभव तक सीिमत रहा। बाद के वष म जडर तथा ीयर अध्य यन ने भी इस िवमश को समृद्ध कया। कतु गरिमटया प्र वासन के अनुभव को इसी दृ से पढ़ने का प्र यास बहुत कम हुआ है। मेर िवचार से िवदेश जाना केवल ान परवतन नह था; वह अपने पूर सामाजक संसार से िवेद था। आज यद कसी व्य क्त को िवदेश म नौकर िमलती है, तो उसके भीतर उाह होता है क उसे यह िवास रहता है क उसका अपना घर, परवार और देश उसके लए सुरक्ष त है तथा वह कभी भी लौट सकता है। लेकन उन्न ीसव शता के गरिमटयाश्र िमक क ित िबुल िभन्न थी। उनके लए समुद्र पार करना जीवन क अनत याा थी, जह वापसी क संभावना अत्यं त क्ष ीण थी। इसलए प्र वासन के साथ जुड़ भावनाएँ केवल उाह क नह थ। उनम भय, असुरक्ष ा, िवापन, भिवष्य क अनतता और िप्र यजन से ायी िबछोह क पीड़ा भी सलत थी। यह जटल भावनात्म क संरचना गरिमटया अनुभव को ‘आघात ’ (TRAUMA) के रू प म समझने का आधार प्र दान करती है।प्रश्न –6 : गरिमटया प्र वासय के जीवन म इस आघात के प्र मुख ोत ा थे ? यद हम गरिमटया प्र वासन क संपूण प्र या को देख, तो आघात केवल िवदेश पहुँचने के बाद प्र ारम्भ नह होता, ब उसक शुरु आत भारत म ह हो जाती है।प्र थम स्त र पर सामाजक और आथक संकट मौजूद थे। कसान क ऋणग्रस्त ता, अकाल, कृिष उादन म गरावट, नधनता तथा जीिवका का अभाव अनेक लोग को अपने गव छोड़ने के लए िववश कर रहा था। यह आथक संकट स्व यं एक गहरा मानसक आघात था। य क ित और भी जटल थी। अनेक युवा िवधवाएँ सामाजक बंधन और शोषण से मुक्त होने के लए प्र वास का िवकल्प चुनती थ। कुछ अिववाहत युवितय पारवारक परितय अथवा दहेज जैसी सामाजक समाओ के कारण घर छोड़ने के लए िववश हुईं । अनेक िववाहत महलाएँ अपने पित के साथ गईं , जबक कुछ घरलू हसा या पारवारक तनाव के कारण अकेले प्र वास पर नकल। इसलए ी-प्र वास के पीछे केवल आथक कारण नह, ब सामाजक और लगक (GENDERED) अनुभव भी कायरत थे। दूसरा आघात समुद्र याा का था। सीिमत ान वाले जहाज़ म महन तक कठन परितय म रहना, अपरचत लोग के बीच जीवन िबताना और भिवष्य के प्र ित नरंतर भय-यह सब उस मानसक तनाव को और गहरा कर देता था। तीसरा और सबसे महत्त्व पूण आघात नए देश म पहुँचने के बाद प्र ारम्भ होता था। वह भाषा अपरचत थी, संृित िभन्न थी, समाज नया था और जीवन क पूर संरचना बदल चुक थी। ऐसे समय मव्य क्त के पास केवल उसके ‘ जहाज़ी भाई ’ और ‘ जहाज़ी बहन ’ ह उसके अपने होते थे। यह नए सामाजक संबंध उसके जीवन का आधार बनते थे।प्रश्न –7 : आपने अपने शोध म ‘ ृित ’ (MEMORY) और ‘ उत्त र-ृित ’ (POSTMEMORY) को भी िवशेष महत्त्व दया है। गरिमटया अध्य यन म इनक ा भूिमका है? आघात का अध्य यन ृित के िबना अधूरा है। कोई भी पीड़ा केवल उसी व्य क्त तक सीिमत नह रहती जसने उसे प्रत्यक्ष रू प से अनुभव कया हो। वह ृितय के माध्य म से अगली पीढ़य तक पहुँचती रहती है। इसी प्र या को आधुनक ृित-अध्य यन म ‘ पोस्ट मेमोर ’ (POSTMEMORY) कहा जाता है। गरिमटया समुदाय के संदभ म यह प्रश्न और भी महत्त्व पूण हो जाता है क आज हम केवल पहली पीढ़ क नह, ब तीसर, चौथी और पचव पीढ़ के अनुभव का अध्य यन कर रहे ह। इन पीढ़य ने स्व यं गरिमटया जीवन नह जया, कतु उने अपने पूवज क ृितय, कथाओ, गीत, पारवारक परंपराओ और सृितक प्र तीक के माध्य म से उस अनुभव को आत्म सात कया। यह कारण है क गरिमटया साहत्य म ृित एक जीवंत सृितक शक्त के रू प म उपत होती है। वह केवल अतीत का पुनरण नह, ब

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 90 वतमान पहचान (IDENTITY) के नमण का आधार भी बनती है।प्रश्न –8 : ा साहत्य इन स्मृ ितय को इितहास क अपेा अधक प्र भावी ढंग से संरत करता है? इितहास हम तथ्य देता है, लेकन साहत्य उन तथ्य के भीतर छपे हुए अनुभव को अिभव्य देता है। अिभलेख हम बताएँगे क कोई व्य कस जहाज़ से गया, कब पहुँचा और कस बागान म कायरत था; कतु उसक आशंकाएँ, उसका भय, उसका अकेलापन और उसक सृितक स्मृ ितय हम साहत्य के माध्य म से अधक स्पष्ट रू प से प्र ाप्त होती ह। इसीलए म साहत्य को इितहास का िवकल्प नह, ब उसका पूरक मानती हूँ। दोन को साथ पढ़ने से ह हम गरिमटया जीवन के बाहर और भीतर दोन आयाम को समझ सकते ह।प्रश्न –9 : ा गरिमटया अनुभव को केवल पीड़ा का इितहास कहना उचत होगा ? नह। यह कहना अधूरा होगा। गरिमटया जीवन नत रू प से पीड़ा, िवापन और संघष का इितहास है, लेकन केवल इतना ह नह है। उसी संघष के भीतर नए सामाजक संबंध बने, नई सृितक पहचान िवकसत हुई और एक नएप्र वासी समाज का नमण हुआ।प्र वासय ने अपने साथ लाई गई सृितक स्मृ ितय को नए परवेश म पुनगठत कया। उने भाषा, धम, त्य ोहार, पारवारक संबंध और सामुदायक जीवन को नए संदभ म जीिवत रखा। इसलए गरिमटया इितहास को केवल दुःख के आान केरू प म नह, ब सृितक पुनसृजन (CULTURAL RECONSTRUCTION) के इितहास के रू प म भी पढ़ा जाना चाहए।प्रश्न –10 : औपनवेशक अिभलेख म गरिमटयाश्र िमक क व्य गत आवाज़ बहुत कम दखाई देती ह। ऐसे म आपने अिभलेख, संस्म रण, साहत्य और मौखक इितहास को एक साथ जोड़कर अध्य यन कया। इस शोध-याा क सबसे बड़ चुनौती ा रह ? गरिमटया इितहास पर काय करते समय सबसे बड़ चुनौती कसी एक ोत पर पूणतः िवश्व ास न कर पाना है। िवशेषकर जब हम साहत्य का उपयोग ऐितहासक ोत के रू प म करते ह, तब यह प्रश्न अत्यं त महत्त्व पूण हो जाता है क कौन-सा िववरण ऐितहासक यथाथ है और कह लेखक क कल्प नाशीलता सय हो जाती है। साहत्य का स्व भाव ह ऐसा है क उसम अनुभव को कलात्म क रू प दया जाता है। यद शोधकत पयप्त सावधानी न बरते, तो वह कल्प ना और इितहास के बीच क सीमा को पहचानने म कठनाई अनुभव कर सकता है। इसलए कसी भी साहत्य क ोत को सीधे ऐितहासक तथ्य के रू प म स्व ीकार करना उचत नह होगा। इसी चुनौती से उबरने के लए मने बहुोतीय (MULTI-SOURCE) शोध-पद्ध ित अपनाई। साहत्य क कृितय म वणत घटनाओ और वुओ का िमलान उपलब्ध ऐितहासक च, अिभलेखीय दावेज़, संस्म रण तथा अन्य शोध-ंथ से कया गया। िवशेष रू प से गायी बहादुर और अन्य शोधकतओ के काय म उपलब्ध दृश्य -सामी (VISUAL EVIDENCE) ने अनेक नष्क ष क पुष्ट करने म सहायता क। जब िविभन्न ोत एक-दूसर क पुष्ट करते ह, तभी इितहास अधक िवश्व सनीयरू प म सामने आता है।प्रश्न –11 : आपके शोध म वस्त्र , आभूषण, रामचरतमानस और अन्य सृितक प्र तीक कोस्मृ ित तथा पहचान के वाहक के रू प म देखा गया है। इस दृ कोण के पीछे आपक वैचारक प्रे रणा ा रह ? इस दृ ष्ट कोण के पीछे कसी एक सद्ध त क अपेक्ष ा मेर शोध-प्र या और मेर शक्ष क काप्र भाव अधक महत्त्व पूण रहा। उने सदैव यहप्रे रणा द क कसी भी वु को सतह रू प म देखने के बजाय उसके भीतर छपे सृितक अथ को समझने का प्र यास कया जाए। जब मने अपनी शोधाथ के साथ इस िवषय पर काय प्र ारम्भ कया, तब हमारा उेश्य केवल

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 91 पारंपरक ढंग से साहत्य का अध्य यन करना नह था। हम साहत्य से जुड़े रहते हुए कुछ नयादृ ष्ट कोण िवकसत करना चाहते थे। इसी खोज ने हमारा ध्य ान उन वुओ क ओर आकषत कया ज सामान्य तः इितहासलेखन म बहुत महत्त्व नह दया जाता-जैसे कपड़े, धामक ंथ, तुलसी का पौधा, आभूषण या छोट-सी पोटली। हमने स्व यं से प्रश्न कया क जब कोई व्य अपना पूरा जीवन छोड़कर िवदेश जा रहा है, तब वह अपने साथ ा लेकर जाता है? उस पोटली म रखी प्रत्ये क वु केवल उपयोगता क वु नह थी; वह उसक ृितय, िवास और सृितक पहचान काप्र ितनधत्व करती थी। यह प्रश्न धीर-धीर हमार शोध का आधार बन गया।प्रश्न –12 : आपने अपने अध्य यन म जनेऊ, रामचरतमानस और पोटली जैसी वस्तु ओ के माध्य म से सामाजक परवतन क भी चच क है। ा यह गरिमटया समाज के पुनगठन क ओर संकेत करता है? नत रू प से। प्र वासन केवल ान परवतन नह करता; वह सामाजक संरचनाओ को भी परवतत करता है। उदाहरण के लए उत्त र भारत के अनेक प्र वासी अपने साथ जनेऊ जैसी जाितगत पहचान का प्र तीक लेकर नकले थे। कु कोलकाता के बंदरगाह पर अनेक परितय म इन प्र तीक का त्य ाग करना पड़ा। जहाज़ पर सभी श्र िमक समान ित म थे; वह जाितगत िवभाजन का व्य ावहारक महत्त्व कम हो गया। बाद म नए देश म बसने के पात कुछ सृितक परंपराएँ पुनः ािपत हुईं , कतु उनका स्वरू प पहले जैसा नह रहा। इससे यह स्पष्ट होता है क प्र वासी समाज अपनी सृितक ृितय को पूर तरहत्य ागता भी नह है और उ यथावत बनाए भी नह रखता; ब नई परितय के अनुसार उनका पुननमण करता है। इसी प्र कार साहत्य म ऐसे प्र संग भी िमलते ह जह कुछ प्र वासी महलाओ ने भारत लौटने से इसलए इनकार कर दया क उ नए समाज म अपनी स्व तंत्र पहचान िवकसत करने का अवसर िमला था। इससे यह स्पष्ट होता है क प्र वासन केवल हान क कहानी नह, ब अनेक लोग के लए सामाजक पुनजन्म (SOCIAL REBIRTH) का अनुभव भी था।प्रश्न –13 : युवा शोधाथय के लए गरिमटया अध्य यन म भिवष्य क कौन-सी संभावनाएँ सबसे अधक महत्त्व पूण ह? मेर िवचार से गरिमटया अध्य यन म अभी अनेक ऐसे क्षेत्र ह जन पर गंभीर शोध अपेक्ष त है। सबसे पहले, शक्ष ा (EDUCATION) का प्रश्न अत्यं त महत्त्व पूण है। हम यह समझना चाहए क अनुबंधत श्र िमक और उनक संतान ने नए देश क शैक्ष क व्य वा म कस प्र कार प्र वेश कया, शक्ष ा ने उनके सामाजक उान म ा भूिमका नभाई तथा भाषा और शक्ष ा के माध्य म से उनक नई पहचान कैसे नमत हुई। दूसरा महत्त्व पूण क्षेत्र सावजनक जीवन (PUBLIC LIFE) म उनक भागीदार है। अनेक गरिमटया समुदाय ने समय के साथ प्र शासन, राजनीित,न्य ायपालका और शासन के उच्च पद तक उेखनीय ान प्र ाप्त कया। यह परवतन कसप्र कार संभव हुआ-इस पर अभी भी व्य ापक शोध क आवश्य कता है। मेर िवचार से भिवष्य का गरिमटया अध्य यन केवलश्र म-इितहास तक सीिमत नह रहेगा, ब शक्ष ा, सामाजक गितशीलता, लोकतत्र क सहभागता और नेतृत्व के इितहास को भी अपने भीतर समाहत करगा।प्रश्न –14 : गरिमटया इितहास के शोधाथय को ोत-संग्र ह (SOURCE COLLECTION) के स्त र पर कन चुनौितय का सामना करना पड़ता है? इस क्षेत्र म सबसे बड़ चुनौती ोत तक पहुँच (ACCESS) क है। अनेक महत्त्व पूण अिभलेखागार शोधकतओ के लए खुले ह और वह का प्र शासन भी सहयोगी है, कु कुछ ान पर अिभलेख तक पहुँच अत्यं त कठन होती है। प्र शासनक प्र याएँ, अिभलेख का अव्य वत संरक्ष ण तथा सीिमत

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 92 उपलब्ध ता शोध को प्र भािवत करते ह। दूसर चुनौती अंतरराय ोत से संबंधत है। गरिमटया इितहास का अध्य यन केवल भारतीय अिभलेख से संभव नह है। मॉरशस, फजी, गुयाना, सूरनाम, त्र नदाद, दण अका तथा िटेन के अिभलेखागार म उपलब्ध सामग्र ी भी समान रू प से महत्त्व पूण है। इन ोत तक पहुँचने के लए समय, संसाधन और संागत सहयोग आवश्य क है। यद शोध परयोजनाओ के माध्य म से शोधाथय को अंतरराय अिभलेखागार तक पहुँच उपलब्ध कराई जाए, तो गरिमटया इितहास का अध्य यन और अधक समृद्ध हो सकता है।प्र ो. ृित सह के साथ यह संवाद गरिमटया अध्य यन को एक नई वैचारक दशा प्र दान करता है। वे इितहास को केवल अिभलेख म नह, ब ृितय, वुओ, साहत्य , लोकिवास और सृितक अनुभव म खोजने का आग्र ह करती ह। उनका दृ कोण यह ािपत करता है क गरिमटया श्र िमक केवल औपनवेशक श्र म-व्य वा के शोिषत पात्र नह थे, ब वे अपनी संृित, ृितय और पहचान के सय संवाहक भी थे। ो. ृित सहप्र ोफेसर, समाज िवान एवं मानिवक संकाय आईआईट पटना ृित सह से रु च सह और ियदश गौतम क बातचीत

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 93दृश्य इितहास, अिभलेखागार और गरिमटया अध्य यन क नई दशाएँ-धमन्द्र नाथ ओझा ड. एन. ओझा दृश्य इितहास (VISUAL HISTORY), डॉूमट अध्य यन, सनेमा और सृितक अिभलेखागार से जुड़े गंभीर शोधकत ह। उनका काय िवशेष रू प से उन ऐितहासक अनुभव को दृश्य माध्य म के ारा पुनरण करने पर क त है जो मुख्य धारा इितहास-लेखन म अपेाकृत कमप्र ितनधत्व पाते ह। वे सनेमा को केवल मनोरंजन का माध्य म नह, ब ऐितहासक चेतना, सृितक ृित और जनसंचार का प्र भावी उपकरण मानते ह। गरिमटया इितहास, प्र वासी भारतीय समुदाय, सृितक पहचान, युद्ध कालीन दस्त ावेज़ और अंतरराष्ट य अिभलेखीय ोत के अध्य यन म उनक िवशेष रु च है। वतमान परयोजना म उनका योगदान दृश्य -सामी, डॉूमट ोत और वैक मीडया नेटवक के उपयोग क संभावनाओ को सामने लाना है। उपलब्ध संवाद से स्पष्ट है क वे इितहास, अथशास्त्र और मीडया अध्य यन के अंतवषयी समन्व य को गरिमटया अध्य यन क भिवष्य क दशा मानते ह।प्रश्न –1 : इितहास-लेखन म सनेमा और डॉूमट क ा भूिमका हो सकती है? सनेमा और डॉूमट इितहास को व्य ापक समाज तक पहुँचाने के अंत प्र भावी माध्य म ह। िवशेषकर बीसव शता के युद्ध कालीन समाचार-फ (NEWSREELS) ने यह सद्ध कया क दृश्य माध्य म घटनाओ को केवल दज ह नह करते, ब उनकेप्र ित जनमानस क संवेदना भी नमत करते ह। इितहास क बड़ समा यह रह है क वह प्र ायः अिभलेख और पुस्त क तक सीिमत रह जाता है, जबक दृश्य माध्य म उसे जीवंत अनुभव म बदल देते ह। गरिमटया इितहास के संदभ म यह और भी महत्त्व पूण हो जाता है, क यह ृित, िवापन,श्र म और सृितक पहचान जैसी अनुभूितय क य ह। यद इ दृश्य रू प म प्रस्तु त कया जाए, तो िबहार, तिमलनाडु, मॉरशस, फजी और कैरिबयाई समाज के बीच ऐितहासक संबंध को अधकप्र भावी ढंग से समझाया जा सकता है। सनेमा िविभन्न भाषाई और सृितक समुदाय के बीच संवाद का सेतु बन सकता है।प्रश्न –2 : गरिमटया इितहास के अध्य यन म दृश्य अिभलेखागार (VISUAL ARCHIVES) का ा महत्त्व है?दृश्य अिभलेखागार इितहास क उन परत को खोलते ह ज लखत दस्त ावेज़ हमेशा व्यक्त नह कर पाते। पुरानी फ़, समाचार-फुटेज, फ़ोटोाफ, नजी एल्ब म, जहाज़ के दृश्य , श्र िमक बस्त य के चत्र और युद्ध कालीन रकॉड-ये सभी इितहास के पूरक ोत ह। िवशेष रू प से गरिमटया समुदाय के संदभ म डायर, नजी पत्र और दृश्य -सामी अंत महत्त्व पूण ह। इनके माध्य म से हम केवल घटनाओ का क्र म नह, ब लोग के रहने-सहने, पहनावे, धामक व्य वहार, श्र म-परितय और सामुदायक जीवन क झलक प्र ाप्त करते ह। ऐसे ोत इितहास को मानवीय बनाते ह और ‘अनसुने नायक ’ को सामने लाते ह।प्रश्न –3 : आपने ‘अनसुने नायक ’ (UNSUNG HEROES) के दावेजीकरण क बात क। इसका ा आशय है? गरिमटया इितहास म कुछ बड़े नाम अवश्य िमलते ह, लेकन लाख श्र िमक के व्य क्त गत अनुभव इितहास के हाशए पर रह गए ह। हमार कोशश यह होनी चाहए क साधारण लोग क कहानय भी इितहास म ान पाएँ। सनेमा और डॉूमट इस काय के लए अंत उपयुक्त ह। कसी महला श्र िमक, कसी जहाज़ी परवार, कसी ानीय धामक नेता, कसी बागान मजदूर या कसी प्र वासी समुदाय क मौखक ृितय को दृश्य रू प म संरत कया जा सकता है। इससे इितहास केवल शासक और नीितय का इितहास नह रहेगा, ब श्र िमक, परवार और समुदाय का इितहास भी बनेगा।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 94प्रश्न –8 : गरिमटया इितहास पर आधारत फ़ल्म या डॉूमट तैयार करते समय शोधकतओ को कन नैितक (ETHICAL) बात का ान रखना चाहए ?दृश्य माध्य म अंत प्र भावशाली होते ह, इसलए उनके उपयोग म ऐितहासक प्र ामाणकता सवपर होनी चाहए। कसी भी घटना का नाटकयकरण (DRAMATIZATION) इस सीमा तक नह होना चाहए क वह ऐितहासक तथ्य को िवकृत कर दे। गरिमटया इितहास पीड़ा, िवापन, श्र म-शोषण और सृितक संघष का इितहास है। इसलए शोधकत और फल्म कार दोन का दायत्व है क वे पीड़त समुदाय क गरमा (DIGNITY) का सान कर। व्य गत संस्म रण, पारवारक अिभलेख और मौखक इितहास का उपयोग करते समय उनक सहमित, संदभ और संवेदनशीलता का पूरा ध्य ान रखा जाना चाहए। इितहास को लोकिप्र य बनाना आवश्य क है, लेकन लोकिप्र यता के लए उसक प्र ामाणकता से समझौता नह कया जाना चाहए। यह एक जेदार ऐितहासक डॉूमट क पहचान है।प्रश्न –9 : आपक दृ म गरिमटया परयोजना क सबसे बड़ उपल ा हो सकती है, यद यह अपने सभी उे को सफलतापूवक पूरा कर ले ? मेर िवचार से इस परयोजना क सबसे बड़ उपल केवल एक शोध-रपोट तैयार करना नह होगी, ब गरिमटया इितहास का एक समग्र सृितक अिभलेख (COMPREHENSIVE CULTURAL ARCHIVE) नमत करना होगा। यद इस परयोजना के माध्य म से दावेज़, फ़ल्म , मौखक इितहास, नजी डायरय, फ़ोटोग्र ाफ, सृितक स्मृ ितय और वैक अिभलेखीय सामग्र ी एक मंच पर संग्र हत हो जाएँ, तो यह आने वाली पीढ़य के लए एक ायी ज्ञ ान-संपदा (KNOWLEDGE RESOURCE) सद्ध होगी। साथ ह यह परयोजना भारत और प्र वासी भारतीय समुदाय के बीच सृितक संवाद को भी सुदृ ढ़ करगी। इससे गरिमटया इितहास केवल अतीत कस्मृ ित न रहकर वतमान और भिवष्य क पीढ़य के लए पहचान, इितहास और सृितक िवरासत का जीवंत दावेज़ बन जाएगा। धमन्द्र नाथ ओझा सनेमा िवशेषज्ञ ड. एन. ओझा दृश्य इितहास (VISUAL HISTORY), सनेमा अध्य यन, डॉूमट नमण और अिभलेखीय शोध (ARCHIVAL RESEARCH) के ेत्र के एक गंभीर अध्ये ता एवं शोध िवशेषज्ञ ह। उनका काय इितहास, संृित और दृश्य माध्य म के अंतसबंध को समझने तथा ऐितहासक ोत के नवीन उपयोग क संभावनाओ को िवकसत करने पर क त है। िवशेष रू प से वे इस िवचार के समथक ह क इितहास को केवल लखत दावेज़ तक सीिमत न रखकर चलचत्र , समाचार-फल्म (NEWSREELS), वृत्त चत्र (DOCUMENTARIES), नजी डायरय, छायाचत्र और अन्य दृश्य अिभलेख के माध्य म से भी पुनपठ कया जाना चाहए। धमन्द्र नाथ ओझा जी से वषा गुप् ता क बातचीत

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 95 पहला गरिमटया और गरिमटया जीवन-सत्य - अधीर कुमार प्रश्न 1. गरराज कशोर ने पहला गरिमटया म दण अका गए भारतीय गरिमटया श्र िमक के जीवन, उनक पीड़ा, शोषण और संघष को कसप्र कार साहत्य क अिभव्य प्र दान क है? पहला गरिमटया केवल गधीजी का जीवन-वृत नह है, ब दण अका म बसे समूचे भारतीय गरिमटया समाज क सामूहक पीड़ा का महाकाव्य ात्म क आख्य ान है। गरराज कशोर ने इितहास के त को मानवीय संवेदनाओ के साथ जोड़ते हुए उन श्र िमक क त्र ासद को चत्र त कया है ज बेहतर जीवन के प्र लोभन म अपनी मातृभूिम से दूर ले जाकर अमानवीय परितय म काम करने के लए िववश कया गया। उपास म उनका आथक शोषण ह नह, ब मानसक अपमान, नीय भेदभाव और सामाजक उपेा भी अत्यं त मामक ढंग से अिभव्यक्त हुई है। यह कारण है क यह उपास गरिमटया जीवन के इितहास को मानवीय संवेदना का स्व र प्र दान करता है।प्रश्न 2.' पहला गरिमटया ' एक ऐितहासक उपास है। इसम ऐितहासक त और साहत्य क कल्प ना के बीच कस प्र कार संतुलन ािपत कया गया है? गरराज कशोर ने ऐितहासक दस्त ावेज, पत्र , अिभलेख और गधी साहत्य का गंभीर अध्य यन कया है। उपास क घटनाएँ इितहाससम्म त ह, कतु पात्र के मनोभाव, संवाद और परितय के आंतरक अनुभव को साहत्य क कल्प ना के माध्य म से जीवंत बनाया गया है। यह कल्प ना इितहास का ान नह लेती, ब इितहास को अधक मानवीय और संवेदनशील बनाती है। इसलए यह उपास इितहास और साहत्य का अत्यं त संतुलत एवं िवश्व सनीय समन्व य प्रस्तु त करता है।प्रश्न 3.उपास म मोहनदास करमचंद गधी केव्य त्व -नमण म दण अका के गरिमटया भारतीय और उनके संघष क ा भूिमका दखाई देती है? दण अका गधीजी के जीवन का नणयक मोड़ है। वह उने केवल अपने साथ हुए अपमान का अनुभव नह कया, ब गरिमटया भारतीय के जीवन को नकट से देखा। उ अनुभव ने उनके भीतर सेवा, ाय और प्र ितरोध क चेतना को िवकसत कया। वास्त व म गधीजी ने गरिमटया समाज म अपने व्य क्तत्व का दपण देखा। मोहनदास से महात्म ा बनने क प्र या इसी सामूहक संघष और पीड़त मानवता के साथ आत्म ीय संबंध ािपत करने से प्र ारम्भ होती है। सत्य ाग्र ह, अहसा और सामुदायक नेतृत्व क उनक अवधारणाएँ भी इसी अनुभवभूिम से िवकसत हुईं ।प्रश्न 4.गरिमटया प्र था ने भारतीय श्र िमक के पारवारक जीवन, दपत्य संबंध और सामाजक संरचना को कस प्र कार प्र भािवत कया और पहला गरिमटया इन अनुभव को कस रू प म प्र ुत करता है? गरिमटया व्य वा ने भारतीय परवार को गहरस्त र पर प्र भािवत कया। िवापन, आथक असुरा और कठोर श्र म ने पारवारक संबंध को संकटग्रस्त बना दया। अनेक परवार टूट गए, सामाजक संरचनाएँ िबखर गईं और पारंपरक जीवन-व्य वा बदल गई। उपास इन अनुभव को केवलव्य क्त गत त्र ासद के रू प म नह, ब एक समूचे समुदाय क सृितक और सामाजक िवघटन- गाथा के रू प म प्रस्तु त करता है। इसके साथ ह यह भी दखाता है क कठन परितय म भी सामुदायक सहयोग और पारवारक मू ने लोग को जीिवत रखा। प्रश्न 5.उपास म गरिमटया य के जीवन, उनके दोहर शोषण, असुरा और संघष को कस सीमा तक अिभव्य िमली है? गरिमटया य औपनवेशक सा और िपतृसात्म क समाज-दोन प्र कार के शोषण का सामना करती ह। उपास म उनके जीवन क असुरा, श्र म, लगक हसा, पारवारक संकट और सामाजक संघष का यथाथ चत्र ण िमलता है। यद्य िप कथा का मुख्य कद्र गधीजी और व्य ापक गरिमटया समाज है, फर भी ी पात्र के माध्य म से लेखक यहस्पष्ट करते ह क गरिमटया अनुभव क सबसे

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 96 अधक त्र ासद महलाओ ने झेली। उनका संघष भारतीय सृितक मू क रक्ष ा और परवार को बचाए रखने का भी संघष है।प्रश्न - 6. अपनी मातृभूिम से दूर रहने वाले भारतीय के भीतर उत्पन्न िवापन-बोध, ृित, सृितक अता और मातृभूिम से जुड़ाव को उपास कसप्र कार प्र ुत करता है? उपास का एक अंत महत्व पूण पक्ष िवापन क मनोवैानक अनुभूित है। गरिमटया भारतीय शाररक रू प से भले ह भारत से दूर थे, लेकन उनक ृितय म गव, परवार, भाषा, धम और सृितक परंपराएँ नरंतर जीिवत थ। यह ृितय उनक सृितक पहचान का आधार बन। गरराज कशोर ने यह दखाया है क मातृभूिम से दूर होने पर भी भारतीयता उनके जीवन क क य श बनी रहती है। यह सृितक ृित उ संघष क प्रे रणा देती है।प्रश्न 7.' पहला गरिमटया ' म भाषा, धम, रित- रवाज और भारतीय सृितक परंपराएँ गरिमटया समुदाय क पहचान को बनाए रखने म कस प्र कार भूिमका नभाती ह? गरिमटया समाज क सबसे बड़ श उसक सृितक चेतना थी। भाषा, धामक आा, पव- ोहार, पारवारक संार और सामुदायक सहयोग ने भारतीय समुदाय को एक सूत्र म बधे रखा। यह सृितक पूँजी उ आत्म िवश्व ास देती है और औपनवेशक दमन के िवरुद्ध मानसक शप्र दान करती है। उपास यह ािपत करता है क सृितक पहचान केवल परंपरा नह, बप्र ितरोध क श भी है।प्रश्न 8.उपास म िटश औपनवेशक व्य वा, नीय भेदभाव और श्र िमक शोषण के िवरुद्ध भारतीय समुदाय के प्र ितरोध को कस प्र कार चत कया गया है? उपास म औपनवेशक सत्त ा का वास्त िवक चेहरा सामने आता है। भारतीय श्र िमक को मनुष्य नह,श्र म-श के रू प म देखा जाता था। नीय भेदभाव, कानूनी असमानता और सामाजक अपमान उनके दैनक जीवन का हा थे। गधीजी ने सबसे पहले भारतीय ापारय और गरिमटया श्र िमक के बीच क दूर समाप्त क और सभी भारतीय को साझा संघष के लए संगठत कया। इसी सामूहक एकता से साग्र ह क अवधारणा िवकसत हुई और अहसक प्र ितरोध का माग प्र शस्त हुआ। यह उपास का सबसे महत्व पूण राजनीितक संदेश है।प्रश्न 9. आज वैक प्र वासन, प्र वासी श्र म, नीय भेदभाव और सृितक पहचान के प्रश्न के संदभ म पहला गरिमटया क प्र ासंगकता को आप कसप्र कार देखते ह? आज िवश्व भर म प्र वासन, श्र िमक अधकार, नीय असमानता और सृितक पहचान के प्रश्न पहले से अधक महत्त्व पूण हो गए ह। पहला गरिमटया केवल अतीत का दस्त ावेज नह, ब वतमान और भिवष्य के लए भी मागदशक ग्रं थ है। यह हम सखाता है क िवापन क परितय म भी सृितक ृित, सामुदायक एकता और मानवीय गरमा को बनाए रखना संभव है। गधीजी के साग्र ह और अहसक प्र ितरोध का दशन भी इसी ऐितहासक अनुभव से िवकसत हुआ, इसलए यह उपास आज के वैश्व क प्र वासी िवमश म अंतप्र ासंगक और अनवाय पाठ के रू प म देखा जाना चाहए। अधीर कुमार प्र ोफेसर प. ल. मो. परसरश्र ी देव सुमन उत्त राखण्ड िवश्व िवालय, ऋिषकेश (उत्त राखंड) अधीर कुमार से उज्ज्व ल कुमार सह क बातचीत

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 97 भारतीय श्र म प्र वासन, ृित और सृितक पहचान -िप्र यंका पाठप्रश्न 1: आपने भारत और िवदेश के िविभन्न संान म अध्य यन और शोध कया है। ा इन अनुभव ने आपको प्र वासन को व्य गत स्त र पर समझने म मदद क ? नत रू प से। म स्व यं को इस दृ ष्ट से भाग्य शाली मानती हूँ क मुझे भारत के अनेक शहर म रहने और काय करने का अवसर िमला। मेर जीवन म यह केवल ान परवतन नह था, ब अनुभव, संृितय और िवचार का िवार भी था। इलाहाबाद, दी, जमशेदपुर, करगपुर और पटना जैसे शहर म रहने के दौरान मने भारत को एक नएरू प म देखा। प्रत्ये क शहर ने मुझे अलग-अलग भािषक, सृितक और सामाजक संसार से परचत कराया। इलाहाबाद ने मुझे भाषा और कथात्म क परंपराओ क िविवधता से परचत कराया। दी और करगपुर ने महानगरय जीवन, बहुभािषकता और बहुसृितकता को समझने का अवसर दया। जमशेदपुर का औद्य ोगक परवेश और पटना का समृद्ध ऐितहासक-सृितक संसार मेर लए िवशेषरू प से महत्त्व पूण रहे। इन अनुभव ने मुझे यह समझने म सहायता क क भारत एकरू प नह है, ब अनेक संृितय, भाषाओ और जीवन- शैलय क जीवंत पीकार है। मेर लए यह एक प्र कार का ‘आंतरक प्र वासन ’ था। इसने मेर पहचान, मेर िवचार और साहत्य को पढ़ने क मेर पद्ध ित को गहराई से प्र भािवत कया। मने महसूस कया क प्र वासन केवल एक भौगोलकप्र या नह है; यह व्य क संवेदनाओ, कल्प नाओ और आत्म बोध को भी रू पतरत करता है।प्रश्न 2 : ा आप मानती ह क प्र वासन व्य क पहचान, भाषा, संृित और ृितय को बदल देता है? िवशेष रू प से िबहार के संदभ म इसे कैसे देखा जा सकता है? म पूर तरह सहमत हूँ क प्र वासन एक परवतनकारप्र या है। साहत्य के अध्य ापक के रू प म मप्र वासन को केवल लोग के एक ान से दूसर ान तक जाने क घटना के रू प म नह देखती। जब कोई व्य प्र वास करता है तो वह अपने साथ अपनी भाषा, संृित, भोजन, ृितय, िवास और जीवन- पद्ध ित भी लेकर जाता है। िबहार का उदाहरण इस संदभ म अत्यं त महत्त्व पूण है। यद हम इितहास पर दृ ष्ट डाल तो पाएँगे क उन्न ीसव शता म मॉरशस, फ़जी, सूरनाम, नदाद और गुयाना जैसे देश म जाने वाले अधकश गरिमटया श्र िमक वतमान िबहार और पूव उत्त र प्र देश के े से गए थे। यद्य िप आधकारक दावेज़ म उ ‘ बंगाल प्रे सीडसी ’ केप्र वासी के रू प म दज कया गया, लेकन उनक भािषक और सृितक जड़ िबहार से जुड़ थ।प्र वास के पीछे केवल व्य गत इाएँ नह थ। औपनवेशक भूिम नीितय, कृिष संकट और श्र म क आवश्य कता जैसी राजनीितक और आथक परितय लोग को अपने घर छोड़ने के लए िववश करती थ। इसलए प्र वासन को समझने के लए उसके ऐितहासक और संरचनात्म क कारण को समझना आवश्य क है। मुझे िवशेष रू प से यह तथ्य आकषत करता है क भोजपुर, मगह, मैथली और हद जैसी भाषाएँ समुद्र पार कर गईं और आज भी िविभन्न प्र वासी समुदाय म जीिवत ह। इससे स्पष्ट होता है क भाषा केवल संप्रे षण का माध्य म नह, ब सृितक ृित का वाहक भी है। यह कारण है क प्र वासन पहचान को नष्ट नह करता; वह उसे नए संदभ म पुनगठत करता है। प्रश्न 3 : आपने मेडकल मैनटज़ के ेत्र म भी काय कया है। प्र वासन अध्य यन म मानसक और भावनात्म क प को आप कतना महत्त्व पूण मानती ह? मेडकल मैनटज़ हम कसी भी मानवीय अनुभव को केवल उसके बाहर या प्र शासनक रू प म नह देखने देती। यह हम व्य क भावनाओ, ृितय, पीड़ा और अनुभव क ओर ध्य ान देने के लए प्रे रत करती है।प्र वासन के संदभ म यह दृ ष्ट कोण अत्यं त महत्त्व पूण है। हम अक्स र प्र वासन को आँकड़, श्र म या

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 98 अथव्य वा के संदभ म देखते ह, लेकन उसके पीछे एक गहरा भावनात्म क संसार भी होता है। कोई व्य केवल ान नह बदलता; वह अपने गव क गलय, अपने घर का आँगन, अपने आसपास के पेड़, नदय, ानीय भोजन और बचपन क ृितय भी अपने साथ लेकर चलता है। गरिमटया अनुभव को समझने के लए इस भावनात्म क आयाम क उपेक्ष ा नह क जा सकती। यह िवजय िमश्र ा क ‘ डायोरक इमेजनेशन ’ क अवधारणा अत्यं त उपयोगी सद्ध होती है। िवजय िमश्र ा का तक है क डायोरा केवल िवापन का अनुभव नह है, ब एक खोए हुए घर क नरंतर पुनकल्प ना और पुननमण क प्र या भी है। प्र वासी समुदाय ृितय, इितहास और वतमान जीवन के बीच नरंतर संवाद करते रहते ह। मुझे लगता है क मेडकल मैनटज़ का प्र शक्ष ण हम इन सूक्ष्म भावनात्म क पहलुओ को पहचानने और उनका महत्त्व समझने क क्ष मता प्र दान करता है। इसलए प्र वासन को केवल आथक या राजनीितकप्र या मानना उसके मानवीय पक्ष के साथ अाय होगा।प्रश्न 4 : ा महलाएँ पुरु ष क तुलना म प्र वासन को अलग प्र कार से अनुभव करती ह? ह, नारवाद इितहासलेखन इस बात के अनेकप्र माण प्रस्तु त करता है क महलाएँ और पुरु षप्र वासन को समान रू प से अनुभव नह करते। महलाओ के अनुभव म परवार, देखभाल, मातृत्व , सामाजक नयंत्र ण और सुरक्ष ा जैसे प्रश्न गहराई से जुड़े होते ह। म इसे एक िवरोधाभासी ित कहूँगी। एक ओरप्र वासन महलाओ को शक्ष ा, रोजगार और आत्म नणय के अवसर देता है; दूसर ओर वे पारवारक अपेक्ष ाओ, सामाजक नगरानी और नैितक नयंत्र ण क संरचनाओ के भीतर भी रहती ह। नायला कबीर ने िवस्त ार से लखा है क प्र वासन एजसी और सशकरण का अवसर तो देता है, लेकन यह पहले से मौजूद असमानताओ—जाित, वग, क्षेत्र और भाषा—से अलग नह होता। िबहार के संदभ म यह और जटल हो जाता है। यह लंबे समय तक प्र वासन क चच मुख्य तः पुरु ष श्र मप्र वासन के रू प म क गई। पुरु ष बाहर गए, जबक महलाओ को ‘ पीछे छूटे हुए ’ समुदाय के रू प म देखा गया। लेकन वास्त व म वे परवार, कृिष, ब क शक्ष ा और सृितक परंपराओ को संभालने वाली क य श थ। कम्ब ल शॉ क ‘ इंटरसेक्श नैलट ’ क अवधारणा यह बहुत उपयोगी है। कसी महला का अनुभव केवल उसके लग से नधरत नह होता; उसक जाित, वग, भाषा और क्षेत्र ीय पृष्ठ भूिम भी उतनी ह महत्व पूण होती है। इसलए प्र वासन अध्य यन म महलाओ को एक समान श्रे णी मानना उचत नह होगा। हम उनके अनुभव क िविवधता को समझना होगा।प्रश्न 5: ऐितहासक अिभलेख म महलाओ कप्र वासी कहानय अक्स र कम दखाई देती ह, जबक वे सृितक परंपराओ क प्र मुख संरक्ष क रह ह। ऐसा ? यह अत्यं त महत्व पूण प्रश्न है। पारंपरक इितहास लेखन मुख्य तः प्र शासनक, आथक और राजनीितक दस्त ावेज पर आधारत रहा है। इन दस्त ावेज मश्र िमक क संख्य ा, अनुबंध, मजदूर और औपनवेशक नीितय दज ह, लेकन घरलू संसार, लोकपरंपराएँ, गीत, अनुष्ठ ान और ृितय प्र ायः अनुपत ह। महलाओ क भूिमका इ क्षेत्र म सबसे अधक दखाई देती है। वे लोकगीत, धामक प्र थाओ, भोजन संृित, पारवारक अनुष्ठ ान और मौखक इितहास के माध्य म से सृितक नरंतरता को बनाए रखती ह। इसलए वे अिभलेखीय इितहास म कम और जीिवत ृित म अधक उपत ह। नारवाद इितहासलेखन ने इस अनुपित को चुनौती द है। लडा हट्चयन क ‘ होरयोाफक मेटाफक्श न ’ क अवधारणा हम यह समझने म मदद करती है क साहत्य और कथा केवल इितहास का पुनरु ादन नह करते, ब वे उन आवाज़ को सामने लाते ह ज आधकारक इितहास ने हाशए

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 99 पर डाल दया था। जब कोई प्र वासी महला अपने गव क कहानी सुनाती है, कोई लोकगीत गाती है या कसी त्य ोहार क परंपरा को आगे बढ़ाती है, तो वह केवल सृितक या नह कर रह होती; वह इितहास का संरक्ष ण भी कर रह होती है। गरिमटया परंपरा म महलाओ ने भाषाओ, लोकगीत, धामक अनुान और खाद्य संृितय को महासागर के पार पहुँचाया। इस अथ म वे सामूहक ृित क संरक्ष क थ।प्रश्न 6: भारत म प्र वासन के इितहास म गरिमटया परंपरा को एक िवशष्ट ान प्र ाप्त है। आपके िवचार से इस परंपरा को समझने के समय कन बदुओ को ान म रखना चाहए ? मेर दृ ष्ट म गरिमटया परंपरा भारतीय प्र वासन के इितहास का एक अत्यं त महत्त्व पूण अध्य ाय है। यद्य िप मेरा शोध-क्षेत्र प्रत्यक्ष रू प से गरिमटया अध्य यन नह है, फर भी साहत्य , प्र वासन अध्य यन और सृितक इितहास के अंतसबंध के कारण इस िवषय से मेरा नरंतर जुड़ाव रहा है। मेरा मानना है क इस परंपरा को समझने के लए सबसे पहले इसे केवल श्र म-प्र वास के रू प म नह, ब औपनवेशक सा क एक सुिवचारत राजनीितक और आथक परयोजना के रू प म देखना होगा। गरिमटया श्र िमक अपनी इा से नह, ब औपनवेशक श्र म-व्य वा क आवश्य कताओ के कारण िवािपत हुए। दास-प्र था क समा के बाद यूरोपीय उपनवेश को श्र िमक क आवश्य कता थी और इसी आवश्य कता ने भारत से अनुबंधतश्र िमक के बड़े पैमाने पर प्र वासन को जन्म दया। इसलए इस इितहास को औपनवेशक सा, आथक शोषण और श्र म-नीितय से अलग करके नह समझा जा सकता। इसके साथ ह यह भी ध्य ान रखना चाहए क गरिमटया समुदाय केवल भारत छोड़कर नह गया, ब उसने भारत को अपने भीतर जीिवत रखा।प्र वासी समुदाय ने नए देश म रहते हुए भी भारतीय भाषाओ, धामक िवास, लोकाचार, त्य ोहार और पारवारक मू को संरक्ष त कया। समय के साथ इन परंपराओ म ानीय संृितय का भी समावेश हुआ और परणामस्वरू प एक नई सृितक पहचान का नमण हुआ। यह पर स्टु अट हॉल क सृितक पहचान (CULTURAL IDENTITY) क अवधारणा अत्यं त उपयोगी प्र तीत होती है। हॉल के अनुसार पहचान कोई र वु नह, ब नरंतर नमत होने वालीप्र या है। गरिमटया समुदाय इसका उृष्ट उदाहरण है। उने भारतीय पहचान को -का-त्य सुरक्ष त नह रखा, ब नए सामाजक और सृितक परवेश के साथ संवाद करते हुए उसका पुननमण कया। इसी प्र कार होमी के. भाभा क 'थड स्पे स ' (THIRD SPACE) क अवधारणा भी गरिमटया अनुभव को समझने म सहायक है। प्र वासी समुदाय न तो पूणतः अपने मूल देश म रहता है और न ह पूर तरह नए देश म समाहत हो जाता है। वह एक तीसर सृितक स्पे स का नमण करता है, जह दोन संृितय परस्प र संवाद करती ह और एक नई िमश्र त पहचान िवकसत होती है। मेर िवचार से गरिमटया इितहास का अध्य यन करते समय इितहास, साहत्य , समाजशास्त्र , मानवशास्त्र , भाषा-िवान और जडर स्ट डज़—इन सभी दृ ष्ट य का समन्व य आवश्य क है। तभी हम इस अनुभव क जटलता को समग्र रू प म समझ पाएँगे।प्रश्न 7: आपने चच के दौरान लोकगीत, मौखक परंपराओ और साहक आान का उेख कया। ा आप स्पष्ट करगी क प्र वासन के इितहास को समझने म इनक ा भूिमका है? भारत मूलतः कथाओ, गीत, ृितय और लोकपरंपराओ का देश है। हमार सामाजक जीवन का एक बड़ा हा लखत दावेज़ म नह, ब मौखक परंपराओ म सुरक्ष त है। िववाह संार, जन्म ोत्स व, पव-त्य ोहार, धामक अनुान और लोकगीत—इनम हमार सामूहक ृित पीढ़-दर- पीढ़ हतरत होती रह है। यद हम गरिमटया समुदाय क ओर देख तो पाएँगे

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 100 क उनके इितहास का सबसे जीवंत ोत यह मौखक परंपराएँ ह। सरकार अिभलेख हम यह बताते ह क कतने लोग कस जहाज़ से कह गए, कन शत पर गए और उने कतना श्र म कया। लेकन वे यह नह बताते क वे अपने घर को कसप्र कार याद करते थे, परवार से िबछड़ने का दुःख कैसा था, समु यात्र ा के दौरान उनके मन म कौन- सी आशंकाएँ थ, अथवा नए देश म वे अपनी सृितक पहचान को कस प्र कार बचाए रखना चाहते थे। इन प्र के उत्त र हम लोकगीत, कहानय और पारवारक ृितय म िमलते ह। िवशेष रू प से भोजपुर लोकगीत म िवरह, प्र तीक्ष ा, िबछोह और ृित के अत्यं त मामक चत्र िमलते ह। इन गीत म केवल प्र वासी का दुःख नह, ब पीछे छूटे परवार क पीड़ा भी व्यक्त होती है। पी अपने पित क प्र तीक्ष ा करती है, माता अपने पुत्र को याद करती है और पूरा परवार उस अनुपित के साथ जीना सीखता है। इस प्र कार लोकगीत प्र वासन के भावनात्म क इितहास का दस्त ावेज़ बन जाते ह। िबहार क सृितक परंपराओ—िवशेषकर छठ पव और रामलीला—को यद हम देख, तो स्पष्ट होगा कप्र वासी समुदाय ने इ िवदेश म भी जीिवत रखा। मॉरशस, सूरनाम, फ़जी और त्र नदाद जैसे देश म आज भी छठ पूजा केवल धामक आयोजन नह, ब सृितक ृित और सामूहक पहचान का उत्स व है। मौखक परंपराएँ इितहास के उन रक्त ान को भरती ह जह आधकारक अिभलेख मौन हो जाते ह। वे हम यह समझने म सहायता करती ह क इितहास केवल दस्त ावेज़ म नह लखा जाता; वह मनुष्य क ृितय, गीत और जीवन-अनुभव म भी सुरक्ष त रहता है। इसी कारण म मानती हूँ क भिवष्य के प्र वासन- अध्य यन म लोकसाहत्य , मौखक इितहास और सृितक प्र दशन कलाओ को बराबर महत्त्व दया जाना चाहए। पश्न 8: पवासन और िवशेष रू प से गरिमटया इितहास का अध्य यन करने वाले युवा शोधकतओ के लए आपका ा संदेश है? म सबसे पहले यह कहना चाहूँगी क कसी भी शोध का प्र ारम्भ संवेदनशीलता से होना चाहए। केवल सत के आधार पर कसी समाज को समझना पयप्त नह है। शोधकत को लोग के बीच जाना होगा, उनके अनुभव सुनने हगे और उनक ृितय को गंभीरता से दज करना होगा। मेर शक्ष क ने मुझे एक बात हमेशा सखाई क साहत्य केवल लखत पाठ नह होता। मनुष्य का अनुभव भी एक पाठ है और समाज क ृित भी एक पाठ है। इसलए यद हम प्र वासी समुदाय को समझना चाहते ह तो हम केवल अिभलेखागार तक सीिमत नह रहना चाहए। हम उन लोग तक पहुँचना होगा जो आज भी इन परंपराओ को जीिवत रखे हुए ह। म यह भी मानती हूँ क आज का समय अंतःिवषय (INTERDISCIPLINARY) शोध का समय है। यद कोई शोधाथ साहत्य का िवाथ है तो उसे समाजशास्त्र , मानवशास्त्र और इितहास भी पढ़ना चाहए। यद वह इितहास का िवाथ है तो उसे साहत्य , लोकसाहत्य और सृितक अध्य यन से भी परचत होना चाहए। वास्त व म कसी भी िवषय क समग्र समझ तभी िवकसत होती है जब हम उसे अनेक दृ ष्ट य से देखने का प्र यास करते ह। मने स्व यं अनुभव कया है क जब मने चकत्स ा मानिवक, जडर स्ट डज़ औरप्र वासन अध्य यन को साहत्य के साथ जोड़कर पढ़नाप्र ारम्भ कया, तब साहत्य के अनेक नए अथ मेर सामने खुलने लगे। गरिमटया अध्य यन जैसे िवषय म यह दृ ष्ट और भी अधक आवश्य क है क यह इितहास, भाषा, संृित, ृित, राजनीित, अथशास्त्र और मानव मनोिवान—सभी एक-दूसर से जुड़े हुए ह। म युवा शोधकतओ से आग्र ह करूँ गी क वे केवल पुस्त कालय तक सीिमत न रह। वे फल्ड वक कर,

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 101 मौखक इितहास संकलत कर, लोकगीत का दस्त ावेजीकरण कर, िविभन्न पीढ़य से संवाद कर और प्र वासी समुदाय के जीिवत अनुभव को शोध का आधार बनाएँ। यह दृ कोण भिवष्य के अधक मानवीय और व्य ापक प्र वासन अध्य यन का मागप्र शस्त करगा। डॉ. िप्र यंका त्र पाठ के साक्ष ाार के प्र मुख बदुप्र वासन केवल भौगोलक ानतरण नह, ब सृितक, भावनात्म क और मानसक परवतन क प्र या है। यह व्य क्त क पहचान, ृित और सामाजक संबंध का पुननमण करता है। िबहार का इितहास प्र वासन क ऐितहासक नरंतरता का इितहास है। औपनवेशक काल से लेकर वतमान तक यह प्र वासन सामाजक और आथक संरचना का अिभन्न अंग रहा है। गरिमटया श्र िमक केवल श्र मशक्त लेकर नह गए, ब अपनी भाषा, संृित, लोकिवश्व ास, भोजन, पव-त्य ोहार और ृितय भी साथ लेकर गए। इसी कारण भारतीय सृितक पहचान िवदेश म जीिवत रह सक। भोजपुर, मगह, मैथली और हद जैसी भाषाएँप्र वासी समुदाय म सृितक नरंतरता काप्र मुख माध्य म बन। भाषा केवल संप्रे षण का साधन नह ब ृित और पहचान का आधार है।प्र वासन अध्य यन म चका मानिवक (MEDICAL HUMANITIES) क दृ आवश्य क है, क यह प्र वासन के मानसक, भावनात्म क और मनोवैानक आयाम को समझने म सहायता करती है। िवजय िमश्र ा क ' डायोरक इमैजनेशन ' अवधारणा गरिमटया अनुभव को समझने क एक महत्त्व पूण सैितक कुंजी है। प्र वासी समुदाय अपने खोए हुए घर का सृितक पुननमण करते रहते ह। महलाएँ पुरु ष क तुलना म प्र वासन का अनुभव िभन्न रू प म करती ह। उनके अनुभव परवार, देखभाल, सुरक्ष ा, सामाजक नयंत्र ण और सृितक उत्त रदायत्व से जुड़े होते ह।प्र वासी महलाओ के अध्य यन म ' इंटरसेक्श नैलट ' (KIMBERLÉ CRENSHAW) का दृ कोण अत्यं त आवश्य क है, क जाित, वग, भाषा, क्षेत्र और लग िमलकर उनके अनुभव को नमत करते ह। इितहास लेखन म महलाओ क भूिमका अपेक्ष ाकृत अदृश्य रह है, जबक वे लोकपरंपराओ, धामक अनुान, लोकगीत और सृितक ृित क प्र मुख संरक्ष क रह ह। नारवाद इितहासलेखन महलाओ क अनुपत आवाज़ को इितहास म पुनः ािपत करने का प्र यास करता है। साहत्य और मौखक परंपराएँ इस पुनपठ म महत्व पूण भूिमका नभाती ह। गरिमटया इितहास को केवल आथक या राजनीितक दृ से नह समझा जा सकता; इसके सृितक और मानवीय पक्ष समान रू प से महत्त्व पूण ह। ुअट हॉल क ' सृितक पहचान ' तथा होमी के. भाभा के 'थड ेस ' जैसे सत गरिमटया अनुभव क व्य ाा के लए अत्यं त उपयोगी ह।प्र वासी समुदाय नई सृितक पहचान का नमण करते ह। लोकगीत, लोककथाएँ, मौखक इितहास और अनुान आधकारक इितहास के रक्त ान को भरते ह। ये प्र वासन के भावनात्म क इितहास के िवश्व सनीय ोत ह। छठ, रामलीला और भोजपुर लोकगीत प्र वासी भारतीय क सृितक ृित के जीवंत प्र तीक ह, जने िवदेश म भारतीय अता को सुरक्ष त रखा।प्र वासन अध्य यन म अंतःिवषय (INTERDISCIPLINARY) दृ कोण अनवाय

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 102 है। साहत्य , इितहास, समाजशास्त्र , मानवशास्त्र , जडर स्ट डज़ और सृितक अध्य यन का समन्व य आवश्य क है। युवा शोधकतओ को केवल अिभलेखीय ोत पर नभर न रहकर फल्ड वक , मौखक इितहास और जीिवत अनुभव को भी अपने शोध का आधार बनाना चाहए।प्र वासन अध्य यन का उेश्य केवल अतीत का पुननमण नह, ब ृित, पहचान और सृितक िवरासत के संरक्ष ण को समझना भी है। गरिमटया इितहास भारतीय प्र वासन का ऐसा अध्य ाय है, जो औपनवेशक शोषण, सृितक लचीलेपन, सामूहक ृित और नई पहचान के नमण—इन सभी आयाम को एक साथ समाहत करता है। ियंका पाठ भारतीय प्र ौोगक संान पटना (भारत) म अंग्रे जी क एसोसएट प्र ोफेसर और मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग क पूव िवभागाध्यक्ष ह डॉ. िप्र यंका त्र पाठ भारतीय प्र ौोगक संान (आईआईट) पटना के मानिवक एवं सामाजक िवान िवभाग म अंग्रे ज़ी क एसोसएट प्र ोफेसर ह। वे समकालीन भारतीय मानिवक क अग्र णी िवदुिषय म गनी जाती ह, जनका शोध साहत्य , समाज और संृित के अंतःसंबंध को बहुिवषयी (INTERDISCIPLINARY) दृ से समझने का प्र यास करता है। उनके प्र मुख शोध-क्षेत्र म जडर स्ट डज़ (GENDER STUDIES), मेडकल मैनटज़ (MEDICAL HUMANITIES), दक्ष ण एशयाई कथा-साहत्य (SOUTH ASIAN FICTION), प्र वासन अध्य यन (DIASPORA STUDIES), ग्र ाफक नैरटव् स, सृितक अध्य यन तथा भारतीय अंग्रे ज़ी साहत्य शािमल ह। उनके शोध म साहत्य को सामाजक परवतन, ृित, पहचान, ास्थ्य और लगक ाय के ापक िवमश से जोड़कर देखा जाता है। डॉ. त्र पाठ ने भारतीय प्र ौोगक संान, खड़गपुर से अंग्रे ज़ी साहत्य म पीएच.ड. क उपाध प्र ाप्त क। उ यूनाइटेड कगडम के यूनवसट ऑफ एडनबग के INSTITUTE FOR ADVANCED STUDIES IN THE HUMANITIES (IASH) क प्र ितत IPD VISITING RESEARCH FELLOWSHIP तथा यूनवसट ऑफ लीड्स क CHARLES WALLACE INDIA TRUST VISITING FELLOWSHIP प्र ाप्त हुई है। ये उपलय उनके अंतरराय अकादिमक योगदान क पु करती ह। उने GENDER, PLACE & CULTURE, JOURNAL OF GENDER STUDIES, JOURNAL OF GRAPHIC NOVELS AND COMICS, SOUTH ASIAN POPULAR CULTURE, CRITIQUE: STUDIES IN CONTEMPORARY FICTION तथा ECONOMIC AND POLITICAL WEEKLY जैसी प्र ितत अंतरराय शोध-पत्र काओ म अनेक शोध-पत्र प्र काशत कए ह। वे JOURNAL OF INTERNATIONAL WOMEN'S STUDIES तथा JOURNAL OF GRAPHIC NOVELS AND COMICS जैसी अंतरराय पत्र काओ के संपादकय काय से भी जुड़ रह ह। शोध एवं अध्य ापन के अितरक्त डॉ. त्र पाठ ने महला अध्य यन, घरलू हसा, सृितक ृित, मधुबनी कला, प्र वासन और चका मानिवक से संबंधत अनेक शोध-परयोजनाओ का सफल संचालन कया है। उनका अकादिमक योगदान िवशेषरू प से इस बात के लए उेखनीय है क वे साहत्य को केवल सदयबोध का माध्य म नह मानत, ब उसे सामाजक ाय, सृितक ृित, लगक समानता और मानवीय अनुभव के िवेषण का सशक्त उपकरण मानती ह। इसी कारण वे समकालीन भारतीय मानिवक और प्र वासन अध्य यन के क्षेत्र क एक प्र ितत शोधकत, अध्य ािपका और चतक के रू प म ापक रू प से सानत ह। ियंका पाठ सेरु च सह और अजीत आय क बातचीत

परयोजना के अंतगत गरिमटया अध्य यन से संबंधत वैश्व क साहत्य , संान, अिभलेख तथा शोधप्र वृय का व्य ापक अध्य यन कया गया।उेश्य भारतीय गरिमटया समुदाय के इितहास, सृितक िवरासत तथा वैश्व क योगदान को व्य वत रू प से दस्त ावेजीकृत करना है। इस दशा म पुस्त क, शोध लेख, िवरासत संान तथा शोध अंतराल का िवस्तृ त संकलन एवं िवेषण कया गया है। इस परयोजना के अंतगत िवश्व के अनेक महत्त्व पूण संान एवं संग्र हालय का दस्त ावेजीकरण कया गया। काय उपल पुस् तक का संकलन 20+ अंतरराीय पुस् तक का अध् ययन शोध लेख 50+ शोध प क समीा वैक संान 13+ संान एवं संग्र हालय का दस् तावेजीकरण रसच गैप भावी शोध े क पहचानप्र काशन काय समीा लेख एवं शोध सामग्र ी का प्र ारू प तैयार देश प्र मुख संान भारत Girmitiya Foundation, Bihar Museum मॉरीशस Aapravasi Ghat फजी Global Girmit Institute, Girmit Centre दण अका 1860 Heritage Centreन् यूज़ीलड Fiji Girmit Foundation वैक UNESCO Memory of the World SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 103 साहक समीा और पूव काय संकलन- रु च सह शोध समूह ारा कुछ महत्त्व पूण पुस्त क का अध्य यन कया गया — FROM INDIANS IN TRINIDAD TO INDO-TRINIDADIANS – N. JAYARAM THE GIRMITIYA DIASPORA – RUBEN GOWRICHARN GIRMITIYAS AND THE GLOBAL INDIAN DIASPORA – ASHUTOSH KUMAR AND CRISPIN BATES (संपादक) COOLIE WOMAN – GAIUTRA BAHADUR THE LEGACY OF INDIAN INDENTURE – MAURITS S. HASSANKHAN, LOMARSH ROOPNARINE, AND HANS RAMSOEDH KALA PANI CROSSINGS – ASHUTOSH BHARDWAJ AND JUDITH MISRAHI-BARAK (संपादक)

THE INDENTURED ARCHIPELAGO – RESHAAD DURGAHEE COLONIALISM AND MIGRATION; INDENTURED LABOUR BEFORE AND AFTER SLAVERY - P.C. EMMER INDENTURED LABOUR IN THE BRITISH EMPIRE, 1834-1920 - KAY SAUNDERS S HANDBOOK GLOBAL HISTORY OF WORK - KARIN HOFMEESTER, MARCEL VAN DER LINDEN THE LEGACY OF INDIAN INDENTURE: HISTORICAL AND CONTEMPORARY ASPECTS OF MIGRATION ANDTHE LEGACY OF INDIAN INDENTURE: HISTORICAL AND CONTEMPORARY ASPECTS OF MIGRATION AND DIASPORA - MAURITS S. HASSANKHAN, LOMARSH ROOPNARINE, HANS RAMSOEDH CONTRADICTORY INDIANNESS: INDENTURE, CREOLIZATION, AND LITERARY IMAGINARY - ATREYEE PHUKAN QUEERING COLONIAL NATAL: INDIGENEITY AND THE VIOLENCE OF BELONGING IN SOUTHERN AFRICA - T. J. TALLIE SLAVES, FREEDMEN AND INDENTURED LABORERS IN COLONIAL MAURITIUS - RICHARD B. ALLENRICHARD B. ALLEN WE MARK YOUR MEMORY: WRITINGS FROM THE DESCENDANTS OF INDENTURE - DAVID DABYDEEN, MARIA DEL PILAR KALADEEN AND TINA K. RAMNARINE COLLECTIVE MEMORY, IDENTITY AND THE LEGACIES OF SLAVERY AND INDENTURE - FARZANA GOUNDER, BRIDGET BRERETON, JEROME EGGER AND HILDE NEUS THE INDENTURED AND THEIR ROUTE: A RELENTLESS QUEST FOR IDENTITY - BHASWATI MUKHERJEE THE CAMBRIDGE SURVEY OF WORLD MIGRATION - ROBIN COHEN इन पुस्त क ने गरिमटया इितहास, प्र वासन, पहचान, संृित और ृित के िविभन्न आयाम को समझने म महत्त्व पूण योगदान दया। SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 104 रु च सह शोध परयोजना (सहायक)

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 105 गितिवधय 30 मई 2026 को आयोजत इस व्य ाान मे प्र ो. PROF. DR. CHAN E.S. CHOENNI ने 1833 म दासप्र था (SLAVERY) के उूलन के बाद िटश सााज्य वाद नीित के अंतगत उपनवेश म सस्ते श्र िमक क आवश्य कता को पूरा करने के लए भारतीय अनुबंधत श्र म व्य वा (INDENTURED LABOUR SYSTEM) क ापना पर िवशेषरू प से अपनी बात रखी। उने इस व्य वा के तहत 1834 से 1917 के बीच दस लाख से अधक भारतीय को फजी और मॉरशस जैसे उपनवेश म “ गरिमट ” (अनुबंध) के आधार पर भेजा गया था, अनुबंध म मजदूर और बेहतर जीवन के अवसर का वादा कया जाता था, कु वास्त िवकता म यह व्य वा ामक भत प्र याओ, कठोर दंडात्म क नयम और अमानवीय काय परितय के कारण दासप्र था के समान प्र तीत होती थी। िटश सरकार ने इसे स्व तंत्र श्र म व्य वा का “ महान प्र योग ” (GREAT EXPERIMENT) बताया, परंतु भारतीय रावादय और मानवतावाद कायकतओ के तीव्र िवरोध एवं दबाव के परणामस्वरू प अंततः इस प्र णाली को समाप्त कर दया गया। इसके बावजूद, इस प्र वासन ने िवश्व भर म फैले भारतीय प्र वासी समुदाय क सृितक पहचान और िवरासत पर ायी प्र भाव छोड़ा। आमंत्र त वा ने संबंधत िविभन्न महत्त्व पूण िवषय पर अपनी बात रखी। 17 जुलाई 2026 को आयोजत हुए व्य ाानमाला के व्य ाान मप्र ो. नागद्र कुमार (प्र ो. आई. आई. ट. रु ड़क) ने लेखक अिमताव घोष के उपास म इितहास, प्र वासन और सृितक ृित का गहरा अंतसबंध िवषय पर अपनी बात रखी । , जसे “STORIES IN TRANSIT” क अवधारणा के माध्य म से आमंत्र त वा के ारा व्य ाान म महत्त्व पूण बदुओ पर चच क गई। अिमताव घोष के उपास, िवशेषकर SEA OF POPPIES, RIVER OF SMOKE तथा FLOOD OF FIRE, औपनवेशक इितहास, गरिमटया श्र िमक के िवापन तथा बहुसृितक अनुभव को संवेदनशील ढंग सेप्रस्तु त करते ह। घोष यह दशते ह क प्र वासन केवल भौगोलक परवतन नह, ब ृितय, पहचान और सृितक िवरासत के पुननमण क प्र या भी है, जह व्य अपने अतीत और नई सामाजक परितय के बीच संबंध ािपत करता है। देखा जाए तो यह व्य ाान साहत्य क दृ से प्र वासन को समझाने म मददगार है।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 106 गितिवधय परयोजना ारा आयोजतव्य ाख्य ानमाला क दसव कड़ का आयोजन 26 जुलाई 2026 को सायं 7:00 बजे (भारतीय समयानुसार) कया गया इस व्य ाख्य ान का िवषय “The Girmitiya Women: Recruitment and Survival in the Sugar Estates of the Caribbean, Fiji, Mauritius and Natal after the Kala Pani Crossing” रखा गया है। इसम यह समझने का प्र यास कया गया क उीसव और बीसव शता के प्र ारंिभक दशक म भारत से गरिमटया श्र िमक केरू प म कैरिबयन, फजी, मॉरशस तथा नेटाल भेजी गई महलाओ क भत कन परितय म हुई तथा समु याा (काला पानी) के पात उने नए सामाजक एवं सृितक परवेश म कस प्र कार अपने अस्तत्व का नमण कया। व्य ाख्य ान म औपनवेशक श्र म व्य वा, लगक असमानता, सामाजक िवापन, आथक शोषण तथा बागान जीवन क कठोर परितय के बीच महलाओ के संघष, धैय, सृितक संरक्ष ण और सामुदायक नेतृत्व क भूिमका पर िवशेष प्र काश डाला जाएगा। इस अवसर पर मुख्य वा के रू प म डॉ. िप्र मनाथ गुार (Dr. Primnath Gooptar) ने अपने िवचार प्रस्तु त कए। डॉ. िप्र मनाथ गुार नदाद एवं टोबैगो के प्र ितत लेखक, जीवनीकार, सृितक इितहासकार, सामाजक कायकत तथा भारतीय प्र वासी अध्य यन के अग्र णी िवान ह। उने भारतीय गरिमटया इितहास, भारतीय डायोरा, इंडो-कैरिबयाई संृित तथा भारतीय सनेमा पर व्य ापक शोध कया है। भारतीय गरिमटया अनुभव से संबंधत अनेक अंतरराय सेलन म उनक सय सहभागता रह है तथा उनकप्र काशत पुस्त क और शोधकाय प्र वासी भारतीय इितहास के अध्य यन को नई दशा प्र दान करते ह। उनके अनुभव और शोध के आधार पर यहव्य ाख्य ान गरिमटया महलाओ के जीवन-संघष को वैश्व क प्र वासी िवमश के व्य ापक संदभ म समझने का अवसर प्र दान करगा। यह व्य ाख्य ान शोधाथय, िवश्व िवालय के अध्य ापक, इितहास, हद, समाजशास्त्र , महला अध्य यन, सृितक अध्य यन तथा प्र वासी साहत्य के िवाथय एवं शोधकतओ के लए अत्यं त उपयोगी सद्ध होगा। व्य ाख्य ान के माध्य म से प्र ितभागय को यह समझने का अवसर िमलेगा क गरिमटया महलाओ ने केवल श्र िमक के रू प म ह नह, ब परवार, भाषा, धम, लोकपरंपराओ और सृितक ृितय क संरक्ष क के रू प म भी भारतीय पहचान को िवदेश म जीिवत रखा। उनके संघष और योगदान ने प्र वासी भारतीय समाज के नमण तथा सृितक नरंतरता को बनाए रखने म नणयक भूिमका नभाई।

SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 107 हमार संरक्ष को. आनंद कुमार त् यागीकुलपत महात् मा गांधी काशी वापीठ, वाराणसीो. जे. अनुराधाकायवाहक कुलपत हैदराबाद वश्व वालय, हैदराबादो. कामेश्व र नाथ सहकुलपत दण बहार केन् ीय वश्व वालय, गया जीो. अजीत कुमार चतुवदीकुलपत बनारस हन्दू वश्व वालय, वाराणसी

श्री अखलेश मश्र ापूव राजदूत, आयरलडप्रो. टी.एन. संहिनदेशक, आईआईटी पटनाप्रो. केशरी लाल वमाकुलपित, छत्र पित शवाजी िवश्व िवद्य ालय, मुंबईप्रो. पंचानन मोहंतीसेवािनवृत्त प्र ो., सीएएलटीएस, हैदराबाद िवश्व िवद्य ालयप्रो. िवनीता दामोदरनदक्ष ण एशयाई इितहास (इितहास) कप्र ो., ससेक्स िवश्व िवद्य ालय, यू. के.प्रो. िवद्य ा सासेवािनवृत्त प्र ो., िकरोड़ी माल कॉलेज, िदी िवश्व िवद्य ालयप्रो. श्र ानंद एच. संहिगरमितयालॉजी प्र ो., ईआईएमटी, ूरख, (ट्जरलड)प्रो. प्र मोद के. नायरिवभागाध्यक्ष , अंग्रे जी िवभाग, यूओएच, हैदराबादप्रो. अजय कुमार साहूिवभागाध्यक्ष , भारतीय प्र वासी अध्य यन कद्र , यूिनवसटी ऑफ हेल् थ, हैदराबाद ।डॉ. रानी प्र काशवरष्ठ वैािनक, प्र ाकृितक इितहास संग्र हालय, लंदनडॉ. हरओमप्रमुख सचव, ावसाियक शक्ष ा एवं उद्य मता िवभाग, उत्त र प्र देश सरकारडॉ. सुभािषनी लता कुमारभाषा एवं सािहत्य िवभाग, िफजी राीय िवश्व िवद्य ालय, िफजीडॉ. रतु त्य ागीच िवभाग, पांिडचेरी िवश्व िवद्य ालय, पांिडचेरीडॉ. शुच गुाइंडोलोजस्ट एवं सांृितक वृत्त चत्र कारप्रो. नागद्र कुमारवरष्ठ प्र ो., अंग्रे जी िवभाग, आईआईटीरु ड़कप्रो. दुगिवजय संहपूव कुलपित, जय प्र काश िवश्व िवद्य ालय, छपराप्रो. बद्र ीनारायणकुलपित, टाटा इंस्ट ीूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबईप्रो. देवेन्द्र चौबेसीआईएल, जेएनयू, नई िदीप्रो. आशुतोष संहइितहास िवभाग, बीएचयू, वाराणसीडॉ. धनंजय संहिहंदी िवभाग, पांिडचेरी िवश्व िवद्य ालय, पांिडचेरीप्रो. भुवन झाइितहास िवभाग, िदी िवश्व िवद्य ालयप्रो. रिवकांतइितहास िवभाग, सीडीएस, िदीवरष्ठ कािमक अधकारी (ामा प्र साद मुखज पोट, कलकत्त ा (प. ब.)SPECIAL ISSUE https://girmitiya.inप्र वासीजुलाई 2026 वाराणसी 108 हमार सलाहकार कावेरी चोपाध्य ाय

सम् पादन सहयोग डॉ . अजीत आया (परयोजना शोध सहायक) डॉ . रु िच िसंह (परयोजना शोध सहायक) डॉ . वषा गुा (ेत्र अन् वेषक) सुश्र ी ियदश गौतम (ेत्र अन् वेषक) ोजेक् ट कंसल् टट डॉ . कुमुद रंजन िमश्रश्र ी उज्ज् वल कुमार िसंह