स्नेह के रंग, साहित्य के संग

View स्नेह के रंग, साहित्य के संग flipbook.

स्नेह के रंग, साहत् य के संग ♥ प् या रे ब क त र फ से स े म भ ट ♥ ❀ बा ल सा हत् य व शे ष ❀

कुछ कहानयाँ केवल पढ़ नह जात, जीवन भर वे हमारे साथ रह जाती ह। कुछ कवताएँ केवल शब् द नह होत, वे हमारे भीतर कोई भाव जगा जाती ह। और कुछ लेखक ऐसे होते ह, जनक रचनाएँ एक पीढ़ से दू सरी पीढ़ तक पहुँ चती रहती ह। यह पुस् तक आपके लए ऐसी ही कुछ रचनाओं का संकलन है। इसम आप हद साहत् य के उन रचनाकार क कहानयाँ और कवताएँ पढ़गे, जनक रचनाएँ वष से हमारे साहत् य का हस् सा रही ह। प्रे मचन् द, महादेवी वमा, माखनलाल चतुवद और ऐसे ही अनेक साहत् यकार ने अपने शब् द के माध् यम से मनुष् य, समाज, प्र कृत, रश् त, संवेदनाओं और जीवन को समझा,ने क कोशश क है। इन रचनाओं को पढ़ते हु ए शायद आपको कुछ ऐसी बात मलगी, जनसे आप सहमत हगे, कुछ ऐसी, जन पर आप प्रश्न करना चाहगे और कुछ ऐसी जन् ह पढ़कर आप देर तक सोचते रहगे। यही साहत् य क खूबसूरती है, हर बार पढ़ने पर वह हम कुछ नया दखा सकता है। इस पुस् तक को आपके लए और भी वशेष बनाते ह इसके चत्र । इन साहत् यकार के चत्र हमारे ही ब ने बनाए ह। उन् हने तस् वीर को ध् यान से देखा, रेखाओं और अनुपात को समझा, प्र काश और छाया को पसल से उकेरा और धीरे-धीरे इन चेहर को कागज़ पर उतारा। इसलए इस पुस् तक म दो पीढ़याँ साथ दखाई देती ह, एक पीढ़ के शब् द और दू सरी पीढ़ क रेखाएँ। हम आपको यह पुस् तक केवल पढ़ने के लए नह दे रहे ह। हम चाहते ह क आप इसे अपना समझ। इसम से कोई कहानी चुन, कोई कवता बार-बार पढ़, कसी पात्र से जुड़, कसी वचार पर सहमत या असहमत ह या कसी पं को अपने पास रख ल। क् यक साहत् य क वरासत एक ऐसी परंपरा है जसे न केवल सँभालकर रखा जाता है, बक उसे पढ़ा जाता है, समझा जाता है, महसूस कया जाता है और फर आगे बढ़ाया जाता है। आज यह पुस् तक आपके हाथ म है। कल शायद आप ही इसे कसी और बे तक पहुँ चाएँगे। यही आपक साहत् यक वरासत है। शुभकामनाएँ! वालय परवार एक साहत् यक वरासत

च के सृजनकता नाइरा चुचरा 7A, धैय 7A, रश 7A, राा 7B, नयनतारा 7B, आयांश 7B

मुंशी ेमचंद- हद साहत् य के साट

मुंशी ेमचंद

हद साहत् य के महान लेखक मुंशी प्रे मचंद जी का असली नाम धनपत राय ीवास् तव था, लेकन वे ‘प्रे मचंद’ के नाम से प्र सद्ध हु ए। वे भारत के बहु त प्र सद्ध कहानीकार और लेखक थे। उनक कहानय म आम लोग के जीवन, उनक खुशय, दु ख और संघष को बहु त सुंदर ढंग से बताया गया है। उनक कहानयाँ हम प्रे म, त् याग, दया और मानवता क सीख देती ह। उनक प्र सद्ध रचनाओं म ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘पञ् च-परमेश्व र’ और ‘ईदगाह’ शामल ह।ेमचंद जी का परचय

ईद का दन था। गाँव म चार ओर खुशी और चहल-पहल थी। सुबह से ही बे नए कपड़े पहनकर ईदगाह जाने क तैयारी कर रहे थे। सभी के चेहर पर उत् साह था। कसी के पास नए जूते थे, तो कसी के पास नए कपड़े। बे मेले म मलने वाली चीज़ के बारे म बात कर रहे थे। कोई खलौना खरीदना चाहता था, तो कोई मठाई खाने के लए उत् साहत था। इन् ह ब के बीच हामद भी था। हामद बहु त गरीब था और अपनी दाद अमीना के साथ रहता था। उसके पास केवल तीन पैसे थे। दाद अमीना ने उसे प् यार से तैयार कया और ईदगाह जाने के लए भेजा। हामद के मन म ईद क खुशी थी। उसे वास था क उसके अब् बा एक दन बहु त- सा धन लेकर लौटगे और उसक अम् मा भी उसके लए बहु त सारी खुशयाँ लेकर आएँगी। दाद ने उसे प् यार से समझाया और दु आ देकर ईदगाह भेजा।ईदगाह

हामद गाँव के दू सरे ब के साथ ईदगाह पहुँ चा। वहाँ बहु त भीड़ थी। सभी लोग ने मलकर नमाज़ पढ़ और एक-दू सरे को ईद क शुभकामनाएँ द। नमाज़ के बाद बे खुशी- खुशी मेले क ओर चल पड़े। मेले म तरह-तरह क दु कान लगी थ। कह खलौने बक रहे थे, कह मठाइयाँ और कह घर म काम आने वाली चीज़।दू सरे ब ने अपने पैसे से तरह-तरह के खलौने खरीदे। कसी ने सपाही लया, कसी ने घोड़ा और कसी ने दू सरे सुंदर खलौने। बे मठाइयाँ भी खरीदकर बड़े मज़े से खाने लगे। हामद उन सभी चीज़ को ध् यान से देख रहा था, लेकन उसने कुछ नह खरीदा। हामद के पास केवल तीन पैसे थे। वह सोचता था क यद वह म का खलौना खरीदेगा, तो वह गरकर टूट सकता है। मठाई खरीदने पर वह थोड़ी देर म खत् म हो जाएगी। इसलए उसने अपने पैसे सँभालकर रखे। तभी हामद क नज़र लोहे के सामान क एक दु कान पर पड़ी। वहाँ कई चमटे रखे थे। चमटे को देखते ही उसे अपनी दाद अमीना क याद आ गई।

जब दाद घर म रोटयाँ बनाती थ, तो कई बार तवे से रोट उतारते समय उनके हाथ जल जाते थे। हामद ने सोचा, “अगर म दाद के लए चमटा ले जाऊँ, तो उनके हाथ नह जलगे।” उसने दु कानदार से चमटे क कमत पूछ। दु कानदार ने बताया क चमटा तीन पैसे का है। हामद ने बना देर कए अपने तीन पैसे दु कानदार को दे दए और चमटा खरीद लया। अब उसके पास एक भी पैसा नह बचा था, लेकन उसके मन म बहु त खुशी थी। उसे लग रहा था क उसने दाद के लए बहु त उपयोगी चीज़ खरीद है। जब दू सरे ब ने हामद के हाथ म चमटा देखा, तो वे उसका मज़ाक उड़ाने लगे। उन् ह लगा क मेले म खलौने और मठाइयाँ छोड़कर चमटा खरीदना कोई अ बात नह है। हामद ने अपनी बात समझाते हु ए कहा क उसका चमटा बहु त उपयोगी है। यह आग म भी काम आएगा, जल् द टूटेगा नह और सबसे बड़ी बात यह है क इससे दाद के हाथ नह जलगे।

हामद क बात सुनकर ब को उसक समझदारी का एहसास होने लगा। जस चमटे का वे मज़ाक उड़ा रहे थे, वही हामद के लए सबसे खास चीज़ बन गया था। जब हामद घर पहुँ चा, तो उसने चमटा अपनी दाद अमीना को दे दया। पहले तो दाद को समझ नह आया क वह चमटा कहाँ से लाया है। जब उन् ह पता चला क हामद ने अपने तीन पैसे खच करके उनके लए चमटा खरीदा है और अपने लए न कोई खलौना लया, न मठाई, तो उनक आँख म आँसू आ गए। दाद अमीना ने हामद को प् यार से गले लगा लया। उन् ह बहु त खुशी हु ई क इतने छोटे बे ने अपनी खुशी के बारे म न सोचकर उनक परेशानी के बारे म सोचा। उन् हने हामद को ढेर दु आएँ द। हामद भी दाद को खुश देखकर बहु तप्र सन्न हु आ।

हामद ने अपने छोटे-से त् याग से यह दखा दया क सा ेम केवल अपने लए चीज़ खरीदने म नह, बक अपन क जरू रत और खुशी को समझने म है। उसका चमटा साधारण था, लेकन उसके पीछे छपा ेम बहु त बड़ा था। सीख - हम अपनी खुशी के साथ-साथ अपने परवार और अपन क जरू रत का भी ध् यान रखना चाहए। सा ेम, त् याग, समझदारी और संवेदनशीलता ही इंसान को महान बनाते ह।

जुम् मन शेख और अलगू चौधरी बचपन से दोस् त थे। दोन को एक-दू सरे पर पूरा भरोसा था। वे साथ खाते-पीते नह थे। धम भी अलग थे। केवल वचार मलते थे। यही उनक मत्र ता का आधार था। जुम् मन क एक बूढ़ खाला (मौसी) थ। उनके पास थोड़ी ज़मीन-जायदाद थी। जुम् मन ने उन् ह फुसलाकर जायदाद अपने नाम लखवा ली। जब तक दान-पत्र क रजस् नहहु ई थी, खाला का खूब आदर होता था। रजस् होते ही सब कुछ बदल गया। अब खाला को सूखी रोट और कड़वे बोल ही सुनने को मलते थे। कुछ दन तक खालाजान ने सुना और सहा। जब और न सह सक तो जुम् मन से बोल, “बेटा! मुझे हर महीने कुछ रु पये दे दया कर। म अलग खा- पका लूँगी।” जुम् मन ने रु पये देने से मना कर दया। इस पर खाला बगड़ गईं । उन् हने पंचायत करने क धमक द। पढ़ा-लखा होने के कारण जुम् मन का बहु त मान था। वह जानता था क जीत उसी क होगी। हँसकर बोला, “ज़रू र करो।” पंच परमेश्व रलेखक: मुंशी ेमचंद

कई दन तक बूढ़ खाला, हाथ म लकड़ी लए घर-घर घूम। सब लोग से पंचायत म आने के लए कहा। कसी ने हाँ-हाँ करके टाल दया तो कसी ने उलटे उन् ह ही गालयाँ द। चार ओर से घूम-घाम कर बेचारी अलगू चौधरी के पास आईं । अलगू से भी पंचायत म आने के लए कहा। अलगू बोला, “आ तो जाऊँगा, पर मुँह न खोलूँगा। जुम् मन से मेरी पुरानी दोस् ती है। उससे बगाड़ नह कर सकता।” इस पर खाला बोल, “बेटा! क् या बगाड़ के डर से ईमान क बात न कहोगे?” खाला चली गईं , पर अलगू बहु त देर तक यही बात सोचता रहा। ✦ ✦ ✦ शाम के समय पेड़ के नीचे पंचायत बैठ। खाला ने पंच के आगे जायदाद का मामला रखा और न् याय माँगा। वे पंच का फैसला मानने को तैयार थ। फर सरपंच बनाने क बारी आई। पूछने पर जुम् मन बोला, “खाला जसे चाह, उसे बनाएँ। म भी पंच का फैसला मानने को तैयार ँ।” तब खाला ने अलगू को सरपंच बनाया। जुम् मन खुश हो गया। अब तो जीत उसी क होनी थी। पर अलगू कतराने लगा। तब खाला बोल—

“बेटा! दोस् ती के लए कोई अपना ईमान नह बेचता। पंच न कसी के दोस् त होते ह, न दुश् मन। पंच के दल म खुदा बसता है। उनके मुँह से जो बात नकलती है, वह खुदा क तरफ़ से नकलती है।” अलगू चौधरी सरपंच हु आ। खाला और जुम् मन अब उसके लए एक समान थे। अब जुम् मन ने अपनी बात पंच से कही, “खाला क जायदाद से मुझे ज़् यादा फ़ायदा नह होता। इसलए म उन् ह हर महीने खचा नह दे सकता। फर इस तरह क कोई लखी-पढ़ भी तो नह हु ई थी।” इस बात पर अलगू, जुम् मन से सवाल-जवाब करने लगा। जुम् मन हैरान था। फर अलगू ने फैसला सुनाया, “खाला को खचा देने लायक लाभ तो जायदाद से हो ही जाता है। अगर जुम् मन खचा नह देगा तो दान-पत्र क रजस् रद्द कर द जाएगी।” फैसला सुनकर जुम् मन दंग रह गया। “क् या यही कलयुग क दोस् ती है? जस पर भरोसा था, उसी ने समय पड़ने पर धोखा दया!” सब लोग अलगू क साई क तारीफ़ करने लगे। “इसी का नाम पंचायत है। दू ध का दू ध, पानी का पानी कर दया।” इस फैसले ने अलगू और जुम् मन को दुश् मन बना दया। सच के एक झके ने दोस् ती क जड़ हला द।

जुम् मन हर समय बदला लेने क सोचने लगा। शीघ्र ही उसे यह अवसर मला। ✦ ✦ ✦ पछले साल अलगू मेले से बड़े-बड़े सग वाला एक जोड़ा बैल खरीद लाया था। पंचायत के एक महीने बाद ही एक बैल मर गया। अब एक बैल से क् या होता? सो अलगू ने उसे गाँव के साहू को बेच दया। साहू ने डेढ़ सौ रु पये म बैल खरीद लया। एक महीने बाद दाम चुकाने क बात हु ई। समझू साहू गाँव से गुड़-घी लादकर मंडी ले जाते थे। फर मंडी से तेल, नमक लाकर गाँव म बेचते थे। नया बैल पाया तो दन म तीन-चार चक् कर लगाने लगे। पशु के साथ पशु- सा बताव कया। न ठक से चारा दया, न पानी ही। आखर एक दन, कोड़े क मार खाते-खाते बैल जो गरा, फर कभी न उठा। कई महीने बाद अलगू बैल के दाम माँगने गया। समझू साहू और उसक पत् नी ने उसे बहु त डाँटा। “मरा-सा बैल दया था, उस पर दाम माँगने चला है। यहाँ तो जन् म-भर क कमाई लुट गई।” अलगू डेढ़ सौ रु पये गँवाना नह चाहता था। लोग ने उसे पंचायत करने को कहा। वह मान गया।

पंचायत क तैयारयाँ हुईं । तीसरे दन शाम को उसी पेड़ के नीचे पंचायत बैठ। समझू साहू ने जुम् मन शेख को सरपंच बनाया। अलगू नराश हो गया। पर कुछ बोला नह। सरपंच बनते ही जुम् मन म ज़म् मेदारी आ गई। वह न् याय और धम के आसन पर बैठा था। यह समय बदला लेने का नह था। उसे केवल सच ही बोलना चाहए। पंच ने समझू साहू और अलगू चौधरी से सवाल-जवाब कया। अंत म जुम् मन ने फैसला सुनाया, “जब बैल खरीदा गया था, तब वह बीमार नह था। समझू साहू क लापरवाही और अत् याचार के कारण ही वह मारा गया। समझू साहू अलगू चौधरी को बैल के पूरे दाम द। अलगू चाह तो दाम कुछ कम कर सकते ह।” अलगू खुशी से झूम गया। उठ खड़ा हु आ और ज़ोर से बोला, “पंच परमेश्व र क जय!” थोड़ी देर बाद जुम् मन अलगू के पास आया। गले लगकर बोला, “आज पता चला है क पंच न कसी का दोस् त होता है, नदुश् मन। पंच म तो परमेश्व र वास करते ह।” अलगू रोने लगा। दल का मैल धुल चुका था। मत्र ता क मुरझाई हु ई लता फर हरी हो गई। लेखक: मुंशी ेमचंद

महादेवी वमा- छायावाद क प्र थम कवयी

महादेवी वमा-

महादेवी वमा क प्र सद्ध कहानी ‘गल् लू’ मनुष् य और एक छोटे जीव के बीच प्रे म, करु णा और आत् मीयता को दशाती है। एक दन लेखका को एक नन् ही गलहरी का बा घायल अवस्थ ा म मला, जसे वे अपने घर ले आईं और उसक देखभाल क। उन् हने उसका नाम गल् लू रखा। धीरे-धीरे गल् लू स् वस्थ होकर चंचल और शरारती हो गया तथा लेखका से बहु त घुल-मल गया। उसे काजू खाना बहु त पसंद था और वह लेखका का ध् यान अपनी ओर आकषत करने के लए तरह-तरह क हरकत करता था। लेखका भी उसे अपने परवार के सदस् य क तरह प् यार करती थ।स् वस्थ होने के बाद गल् लू स् वतंत्र होकर बाहर जाने लगा, फर भी वह प्र तदन लेखका के पास लौट आता था। लेखका के बीमार होने पर उसने उनके प्र त अपना लगाव और भी स्पष्ट कया। अंत म गल् लू ने लेखका क उँगली थामे हु ए अंतम साँस ली। लेखका ने उसे उसक प्र य सोनजुही क लता के नीचे दफना दया और उसक याद को सदैव अपने हृ दय म सँजोए रखा। संदेश: सा प्रे म और संवेदना मनुष् य और पशु-पय के बीच भी एक गहरा और अनमोल रश् ता बना सकते ह। गल् लू कहानी का सार

‘गौरा’ महादेवी वमा ारा रचत एक सुंदर और भावपूण रेखाचत्र है। इस रेखाचत्र म लेखका ने एक गाय के प्र त अपने गहरे प्रे म और लगाव को व्यक्त कया है। गौरा एक सुंदर, सफेद, स् वस्थ और आकषक गाय थी। उसक बड़ी-बड़ी आँख और शांत स् वभाव ने लेखका का मन मोह लया था। लेखका उसे अपने घर ले आईं और धीरे-धीरे गौरा परवार क एक सदस् य बन गई। घर के सभी लोग उसे बहु त प् यार करते थे और उसक देखभाल करते थे। गौरा भी अपने सरल और स् नेहपूण व्य वहार से सभी का मन जीत लेती थी। वह लेखका के प्र त वशेष लगाव रखती थी और उनके आसपास रहना पसंद करती थी। उसक मासूमयत, सरलता और शांत स् वभाव सभी को बहु त अा लगता था। गौरा

गौरा के साथ लेखका का संबंध केवल एक पशु और मनुष् य का नह, बक आत् मीयता और प्रे म का संबंध बन गया था। कुछ समय बाद गौरा बीमार पड़ गई और उसक तबीयत लगातार बगड़ने लगी। लेखका ने उसे बचाने के लए बहु त प्र यास कए और उसक पूरी लगन से सेवा क। उन् हने गौरा के प्र त अपनी जम् मेदारी और ममता म कोई कमी नह आने द। लेकन अनेक प्र यास के बाद भी गौरा को बचाया नह जा सका। उसक मृत् यु से लेखका को बहु त गहरा दु ख और पीड़ा हु ई। गौरा क याद लेखका के मन म हमेशा के लए बस गईं । इस रेखाचत्र म महादेवी वमा ने पशुओं के प्र त प्रे म, दया और करु णा क भावना को बहु त सुंदर ढंग से प्रस् तुत कया है। यह रचना हम समझाती है क पशु भी प्रे म, अपनापन और भावनाओं को समझते ह। हम पशुओं के साथ प्रे म और संवेदनशीलता से व्य वहार करना चाहए तथा उनक देखभाल और सुरा का ध् यान रखना चाहए। ‘गौरा’ हम मनुष् य और पशु के बीच बने नश् छल प्रे म और आत् मीय संबंध का सुंदर संदेश देती है।

जयशंकर प्र साद- छायावाद के महाकव

- जयशंकर प्र साद

रोहतास-दु ग के प्र कोष्ठ म बैठ हु ई युवती ममता, शोण के तीक्ष् ण गंभीर प्र वाह को देख रही है। ममता वधवा थी। उसका यौवन शोण के समान ही उमड़ रहा था। मन म वेदना, मस् तक म आँधी, आँख म पानी क बरसात लए, वह सुख के कंटक-शयन म वकल थी। वह रोहतास-दु गपत के मंी चूड़ामण क अकेलीदु हता थी, फर उसके लए कुछ अभाव होना असंभव था, परंतु वह वधवा थी—हदू -वधवा संसार म सबसे तुच्छ नराश्र य प्र ाणी है—तब उसक वडम् बना का कहाँ अंत था? चूड़ामण ने चुपचाप उसके प्र कोष्ठ म प्र वेश कया। शोण के प्र वाह म, उसके कल-नाद म अपना जीवन मलाने म वह बेसुध थी। पता का आना न जान सक। चूड़ामण व्य थत हो उठे। स् नेह- पालता पुी के लए क् या कर, यह र न कर सकते थे। लौटकर बाहर चले गए। ऐसा प्र ाय: होता, पर आज मंी के मन म बड़ी दु ता थी। पैर सीधे न पड़ते थे। एक पहर बीत जाने पर वे फर ममता के पास आए। उस समय उनके पीछे दस सेवक चाँद के बड़े थाल म कुछ लए हु ए खड़े थे; कतने ही मनुष् य के पद-शब् द सुन ममता ने घूम कर देखा। मंी ने सब थाल को रखने का संकेत कया। अनुचर थाल रखकर चले गए। ममता -जयशंकर प्र साद

ममता ने पूछा—यह क् या है, पता जी? तेरे लए बेट! उपहार है।—कहकर चूड़ामण ने उसका आवरण उलट दया। स् वण का पीलापन उस सुनहली संध् या म वकण होने लगा। ममता चक उठ— इतना स् वण! यहा कहाँ से आया? चुप रहो ममता, यह तुम् हारे लए है! तो क् या आपने म् लेच्छ का उत् कोच स् वीकार कर लया? पता जी यह अनथ है, अथ नह। लौटा दजए। पता जी! हम लोग ाह्म ण ह, इतना सोना लेकर क् या करगे? इस पतनोन् मुख ाचीन सामंत-वंश का अंत समीप है, बेट! कसी भी दन शेरशाह रोहताश्व पर अधकार कर सकता है; उस दन मंत् व न रहेगा, तब के लए बेट! हे भगवान! तब के लए! वपद के लए! इतना आयोजन! परम पता क इच्छ ा के वरुद्ध इतना साहस! पता जी, क् या भीख

न मलेगी? क् या कोई हदू भू-पृष्ठ पर न बचा रह जाएगा, जो ाह्म ण को दो मु अन्न दे सके? यह असंभव है। फेर दजए पता जी, म काँप रही ँ—इसक चमक आँख को अंधा बना रही है। मूख है—कहकर चूड़ामण चले गए।दू सरे दन जब डोलय का ताँता भीतर आ रहा था, ाह्म ण-मंी चूड़ामण का हृ दय धक्-धक करने लगा। वह अपने को रोक न सका। उसने जाकर रोहताश्व दु ग के तोरण पर डोलय का आवरण खुलवाना चाहा। पठान ने कहा— यह महलाओं का अपमान करना है। बात बढ़ गई। तलवार खच, ाह्म ण वह मारा गया और राजा- रानी और कोष सब छली शेरशाह के हाथ पड़े; नकल गई ममता। डोली म भरे हु ए पठान-सैनक दु ग भर म फैल गए, पर ममता न मली। काशी के उत्त र धमचक्र वहार, मौय और गुप् त साट क कत का खंडहर था। भग् न चूड़ा, तृण-गुल् म से ढके हु ए ाचीर, ईं ट क ढेर म बखरी हु ई भारतीय शल् प क वभूत, ीष् म क चंका म अपने को शीतल कर रही थी।

जहाँ पंचवगय भु गौतम का उपदेश ग्र हण करने के लए पहले मले थे, उसी स् तूप के भग् नावशेष क मलन छाया म एक झोपड़ी के दपालोक म एक स् ी पाठ कर रही थी— अनन् यान् तयन् तो माँ ये जना: पयुपासते... पाठ रु क गया। एक भीषण और हताश आकृत दप के मंदप्र काश म सामने खड़ी थी। स् ी उठ, उसने कपाट बंद करना चाहा। परंतु उस व्य क्त ने कहा—माता! मुझे आश्र य चाहए। तुम कौन हो?—स् ी ने पूछा। म मुग़ल ँ। चौसा-युद्ध म शेरशाह से वपन्न होकर रा चाहता ँ। इस रात अब आगे चलने म असमथ ँ।क् या शेरशाह से?—स् ी ने अपने ओठ काट लए। हाँ, माता! परंतु तुम भी वैसे ही ूर हो, वही भीषण रक्त क प् यास, वही नुर प्र तबब, तुम् हारे मुख पर भी है! सैनक! मेरी कुट म ान नह। जाओ, कह दू सरा आश्र य खोज लो। गला सूख रहा है, साथी छूट गए ह, अश्व गर पड़ा है—इतना थका हु आ ँ—इतना!—कहते-कहते वह व्य क्त धम-से बैठ गया और उसके सामने ब्र ाण् ड घूमने लगा। स् ी ने सोचा, यह वप कहाँ से आई! उसने जल दया, मुग़ल के प्र ाण क राहु ई।

वह सोचने लगी—ये सब वधम दया के पात्र नह—मेरे पता का वध करने वाले आततायी! घृणा से उसका मन वरक्त हो गया।स् वस्थ होकर मुग़ल ने कहा—माता! तो फर म चला जाऊँ?स् वस्थ होकर मुग़ल ने कहा—माता! तो फर म चला जाऊँ?स्त्र ी वचार कर रही थी—म ाह्म णी ँ, मुझे तो अपने धम- अतथदेव क उपासना-का पालन करना चाहए। परंतु यहाँ...नह-नह ये सब वधम दया के पात्र नह। परंतु यह दया तो नह...कतव्य करना है। तब? मुग़ल अपनी तलवार टेककर खड़ा हु आ। ममता ने कहा—क् या आश्च य है क तुम भी छल करो; ठहरो। छल! नह, तब नह—स्त्र ी! जाता ँ, तैमूर का वंशधर स्त्र ी से छल करेगा? जाता ँ। भाग् य का खेल है। ममता ने मन म कहा—यहाँ कौन दु ग है! यही झोपड़ी न; जो चाहे ले-ले, मुझे तो अपना कतव्य करना पड़ेगा। वह बाहर चली आई और मुग़ल से बोली—जाओ भीतर, थके हु ए भयभीत पथक! तुम चाहे कोई हो, म तुम् ह आश्र य देती ँ। म ाह्म ण- कुमारी ँ; सब अपना धम छोड़ द, तो म भी क् य छोड़ ँ? मुग़ल ने चंद्र मा के मंद प्र काश म वह महमामय मुखमंडल देखा, उसने मन-ही-मन नमस् कार कया। ममता पास क टूट हु ई दवार म चली गई। भीतर, थके पथक ने झोपड़ी म वश्र ाम कया।

प्रभात म खंडहर क स से ममता ने देखा, सैकड़ अारोही उस प्र ांत म घूम रहे ह। वह अपनी मूखता पर अपने को कोसने लगी। अब उस झोपड़ी से नकलकर उस पथक ने कहा—मज़ा! म यहाँ ँ। शब् द सुनते ही प्र सन्न ता क चीत् कार-ध् वन से वह प्र ांत गूँज उठा। ममता अधक भयभीत हु ई। पथक ने कहा—वह स् ी कहाँ है? उसे खोज नकालो। ममता छपने के लए अधक सचेष्ट हु ई। वह मृग-दाव म चली गई। दन-भर उसम से न नकली। संध् या म जब उन लोग के जाने का उपक्र म हु आ, तो ममता ने सुना, पथक घोड़े पर सवार होते हु ए कह रहा है—मज़ा! उस स् ी को म कुछदे न सका। उसका घर बनवा देना, क् यक मने वपत्त म यहाँ वाम पाया था। यह ान भूलना मत।—इसके बाद वे चले गए। चौसा के मुग़ल-पठान-युद्ध को बहु त दन बीत गए। ममता अब सत्त र वष क वृद्ध ा है। वह अपनी झोपड़ी म एक दन पड़ी थी। शीतकाल का प्र भात था। उसका जीण-कंकाल खाँसी से गूँज रहा था। ममता क सेवा के लए गाँव क दो-तीन स् याँ उसे घेर कर बैठ थ; क् यक वह आजीवन सबके सुख-दु :ख क समभागनी रही।

ममता ने जल पीना चाहा, एक स्त्र ी ने सीपी से जल पलाया। सहसा एक अारोही उसी झोपड़ी के ार पर दखाई पड़ा। वह अपनी धुन म कहने लगा—मज़ा ने जो चत्र बनाकर दया है, वह तो इसी जगह का होना चाहए। वह बुढय़ा मर गई होगी, अब कससे पूछूँ क एक दन शाहं हु मायूँ कस छप् पर के नीचे बैठे थे? यह घटना भी तो सतालीस वष से ऊपर क हु ई! ममता ने अपने वकल कान से सुना। उसने पास क स्त्र ी से कहा—उसे बुलाओ। अारोही पास आया। ममता ने रु क-रु क कर कहा—म नह जानती क वह शाहं था, या साधारण मुग़ल पर एक दन इसी झोपड़ी के नीचे वह रहा। मने सुना था क वह मेरा घर बनवाने क आा दे चुका था! भगवान् ने सुन लया, म आज इसे छोड़े जाती ँ। अब तुम इसका मकान बनाओ या महल, म अपने चर-वाम-गृह म जाती ँ! वह अारोही अवाक् खड़ा था। बुढय़ा के ाण-पी अनंत म उड़ गए। वहाँ एक अष्ट कोण मंदर बना; और उस पर शलालेख लगाया गया— सात देश के नरेश हु मायूँ ने एक दन यहाँ वाम कया था। उनके पुत्र अकबर ने उनक स् मृत म यह गगनचुंबी मंदर बनाया। पर उसम ममता का कह नाम नह था।

माखन लाल चतुवद- राीय कव और साहत् यकार

कव: माखनलाल चतुवद

चाह नह म सुरबाला के, गहन म गूँथा जाऊँ। चाह नह ेमी-माला म, बध प् यारा को ललचाऊँ। ✦ ✦ ✦ चाह नह साट के शव पर, हे हर, डाला जाऊँ। चाह नह देव के सर पर, चँ भाग् य पर इठलाऊँ। ✦ ✦ ✦ मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फक। मातृभूम पर शीश चढ़ाने, जस पथ जाव वीर अनेक। पुष् प क अभलाषा कव: माखनलाल चतुवद

सुभा कुमारी चौहान- वीर रस क कवयी

सुभा कुमारी चौहान

यह कदंब का पेड़ अगर माँ, होता यमुना तीरे, म भी उस पर बैठ कन् हैया बनता धीरे-धीरे। ले देती यद मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली, कसी तरह नीचे हो जाती यह कदंब क डाली। ✦ ✦ ✦ तुम् ह नह कुछ कहता, पर म चुपके-चुपके आता, उस नीची डाली से अम् मा, ऊँचे पर चढ़ जाता। वह बैठ फर बड़े मजे से म बाँसुरी बजाता, अम् मा-अम् मा कह बंसी के स् वर म तुम् ह बुलाता। ✦ ✦ ✦ सुन मेरी बंसी को माँ, तुम इतनी खुश हो जाती, मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आती। तुमको आता देख बाँसुरी रख म चुप हो जाता, प म छुपकर धीरे से फर बाँसुरी बजाता। ✦ ✦ ✦ कदंब का पेड कवयी: सुभा कुमारी चौहान

गुस् से होकर मुझे डाँटती, कहत, “नीचे आ जा।” पर जब म न उतरता, हँसकर कहत, “मुा राजा! नीचे उतरो मेरे भैया! तुम् ह मठाई दूँ गी, नए खलौने, माखन, मी, दू ध-मलाई दूँ गी।” ✦ ✦ ✦ म हँसकर सबसे ऊपर क टहनी पर चढ़ जाता, एक बार “माँ” कह प म वह कह छुप जाता। ✦ ✦ ✦ बहु त बुलाने पर भी माँ, जब म न उतरकर आता, तब माँ का हृ दय बहु त वकल हो जाता। ✦ ✦ ✦ तुम आँचल पसार कर अम् मा, वहाँ पेड़ के नीचे, ईश्व र से कुछ वनती करत, बैठ आँख मचे। तुम् ह ध् यान म लगी देख म धीरे-धीरे आता, और तुम् हारे फैले आँचल के नीचे छुप जाता। ✦ ✦ ✦ तुम घबराकर आँख खोलत, फर भी खुश हो जात, जब अपने मुा राजा को गोद म ही पात। इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे, माँ, कदंब का पेड़ अगर यह होता यमुना-तीरे।

सुभा कुमारी चौहान

अभी-अभी थी धूप, बरसने लगा कहाँ से यह पानी? कसने फोड़ घड़े बादल के, क है इतनी शैतानी। सूरज ने क् य बंद कर लया अपने घर का दरवाज़ा? उसक माँ ने भी क् या उसको बुला लया कहकर, “आ जा।” ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे ह, बादल ह कसको काका। कसको डाँट रहे ह, कसने कहना नह सुना माँ का? बजली के आँगन म अम् माँ चलती है कतनी तलवार! कैसी चमक रही है, फर भीपानी और धूप कवयी: सुभा कुमारी चौहान

क्य खाली जाते ह वार?क् या अब तक तलवार चलाना माँ, वे सीख नह पाए? इसीलए क् या आज सीखने आसमान पर ह आए? एक बार भी माँ, यद मुझको बजली के घर जाने दो, उसके ब को तलवार चलाना सखला आने दो।कवयी: सुभा कुमारी चौहान

हरवंश राय बच्च न— हद के प्र सद्ध कव

हरवंश राय बच्च न

जो बीत गई सो बात गई जीवन म एक सतारा था माना वह बेहद प् यारा था वह डूब गया तो डूब गया अम् बर के आनन को देखो कतने इसके तारे टूटे कतने इसके प् यारे छूटे जो छूट गए फर कहाँ मले पर बोलो टूटे तार पर कब अम् बर शोक मनाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन म वह था एक कुसुम थे उस पर नत् य नछावर तुम वह सूख गया तो सूख गया जो बीत गई सो बात गई जो बीत गई सो बात गई हरवंश राय बच्च न

स्नेह के रंग, साहत् य के संग साहत् य समाज का दपण है, जसम उसक आत् मा का प्र तबब दखाई देता है। Heritage Xperiential Learning School – Sec 64 5 Prajapati Road, Sector 64, Gurugram, Haryana 122101